मालिक तेरी रजा रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे

फ़रवरी 23, 2010 को 11:50 अपराह्न | Posted in 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, विशेष परिचय | 3 टिप्पणियाँ
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जहाँ  तक  मैं  समझता  हूँ  कि  पिछली सँदर्भित  कड़ी  सहित  परिचय श्रृँखला  की  यह  कड़ियाँ  सँभवतः  श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने या क्राँति-दल के साथियों ने सामूहिक रूप से मिलजुल कर तैयार की होगी । यह तो सर्वविदित है कि बिस्मिल जी ने यह पाँडुलिपि जेल में उनकी माता के सँग आये हुये मित्र श्री शिव वर्मा को ही अपने बलिदान-दिवस से ठीक एक दिन पहले 18 दिसम्बर को सौंपी थी । श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा इसे पुस्तकाकार रूप  दिये  जाने  के  मध्य  ही  यह  परिचय  श्रृँखला  सम्मिलित  की  गयी  होगी । चूँकि यह पुस्तक अपने प्रकाशन  के  चौथे  दिन  ही  ज़ब्त  कर  ली  गयी  थी, इसलिये  कालाँतर  में  इससे  किसी  छेड़-छाड़  की सँभावना कम ही  दिखती है । निवेदन- डा. अमर कुमार                                          अस्तु आगे बढ़ते हैं.. पढ़िये बकौल श्री शिवप्रसाद वर्मा जी

इन पंक्तियों के लेखक ने उन्हें तथा अन्तिम बार मृत्यु के केवल एक दिन पहले फांसी की कोठरी में देखा था और उनका यह सब हाल जाना था । उस सौम्य मूर्ति की मस्तानी अदा आज भी भूली नहीं है- जब कभी किसी को उनका नाम लेते सुनता हूं तो एक दम उस प्यारे का वही स्वरूप आंखों के सामने नाचने लगता है । लोगों को उन्हें गालियां देते देख, हृदय कह उठता है, क्या वह डाकू का स्वरूप था अन्तस्तल में छिपकर न जाने कौन बार-बार यही प्रश्न करने लगता है-क्या वे हत्यारे की आंखें थी ? भाई दुनियां के सभ्य लोग कुछ भी क्यों न कहें, किन्तु मैं तो उसी दिन से उनका पुजारी हुं । दास हूँ । भक्त हूँ ।।

उस दिन मां को देखकर उस मातृभूमि-भक्त पुजारी की आंखों में आंसू आ गए । उस समय पर जननी के हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था, वह  भी  भूलना  नहीं  है । वह एक स्वर्गीय दृश्य था और उसे देखकर जेल कर्मचारी भी दंग रह गये थे । माता ने कहा-मैं तो समझती थी तुमने अपने पर विजय पाई है किन्तु यहां तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है । जीवन पर्यन्त देश के लिये आंसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिये रोने बैठे हो – इस  कायरता  से  अब  क्या  होगा  तुम्हें  वीर  की भांति हंसते हुए प्राण देते देखकर मैं अपने आपको धन्य समझूंगी । मुझे गर्व है कि इस गये-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश की वेदी पर प्राण दे रहा है । मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था, इसके बाद तुम देश की चीज थे, और  उसी के काम आ गए । मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है । उत्तर में उसने कहा मां, तुम  तो  मेरे  हृदय  को  भली-भांति  जानती हो । क्या तुम समझती हो कि मैं तुम्हारे लिये रो रहा हूं अथवा इसलिये रो रहा हूं कि मुझे कल फांसी हो जायेगी यदि ऐसा है तो मैं कहूंगा कि तुमने जननी होकर भी मुझे समझ न पायी, मुझे अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है । हां, यदि  घी  को  आग  के  पास  लाया जायेगा तो उसका पिघलना स्वाभाविक है । बस उसी प्राकृतिक सम्बन्ध से दो चार आंसू आ गए । आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत सन्तुष्ट हूं ।

प्रातःकाल नित्य कर्म, सन्ध्या वन्दन आदि से निवृत हो, माता को एक पत्र लिखा जिस में देशवासियों के नाम सन्देश भेजा और फिर फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गये । जब फांसी के तख्ते पर ले जाने वाले आये तो वन्दे मातरम और भारत माता की जय कहते हुए तुरन्त उठ चल दिये । चलते समय उन्होंने यह कहा –

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे ।

जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,
तेरा ही जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे ।।

फांसी के दवाजे पर पहुंच कर उन्होंने अँतिम इच्छा स्वरूप कहा -मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । इस के बाद तख्ते पर खड़े होकर प्रार्थना के बाद विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि…आदि मन्त्र का जाप करते हुए गोरखपुर के जेल में वे फन्दे पर झूल गये ।फांसी के वक्त जेल के चारों ओर बहुत बड़ा पहरा था । गोरखपुर की जनता ने उनके ‘शव को लेकर आदर के साथ ’शहर में घुमाया । बाजार में अर्थी पर इत्र तथा फूल बरसाये गये, और पैसे लुटाये गये । बड़ी धूमधाम से उन की अन्त्येष्टि क्रिया की गई । उनकी इच्छा के अनुसार सब संस्कार वैदिक ढंग से किये गये थे ।

अपनी माता के द्वारा जो सन्देश उन्होंने देशवासियों के नाम भेजा है, उसमें उत्तेजित युवक समुदाय को ‘शाँत करते हुए यह कहा कि यदि किसी के हृदय में जोश, उमंग तथा उत्तेजना उत्पन्न हुई है तो उन्हें उचित है कि अति ‘शीघ्र ग्रामों में जा कर कृषकों की दशा सुधारे, श्रम-जीवियों   की  उन्नति की चेष्टा करें, जहां तक हो सके साधारण जन समूह को शिक्षा दें, कांग्रेस के लिये कार्य करें, और यथा साध्य दलितोद्धार के लिये प्रयत्न करें । मेरी यही विनती है कि किसी को भी घृणा तथा उपेक्षा की दृष्टि से न देखा जावे, किन्तु सब के साथ करूणा सहित प्रेम भाव का बर्ताव किया जावे ।

मैं एक ओर बैठकर विमुग्ध नेत्रों से उस छवि का स्वाद ले रहा था कि किसी ने कहा-समय हो गया । बाहर आकर दूसरे दिन सुना कि उन्हें फांसी दे दी गई । उसी समय यह भी सुना कि तख्ते पर खड़े होकर उस प्रेम-पुजारी ने अपने आपको गिरधारी के चरणों में समर्पित करते हुए यह कहा था-मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । जान देना सहज है  युद्ध  में  वीर  जान  देते  ही  है और दुनिया उनका आदर करती ही है । लोग बुरे काम में भी जान देते है, रंडी के लिये भी जान देते है और लेते भी है । भाई को सम्पत्ति से वंचित करने के लिये जान ली और दी जाती है । पर एक ऐसे काम के लिये जिस में अपना कोई स्वार्थ भी न हो दो साल के करीब जेल में सड़कर भारत की आजादी के लिये वह वीर हंसते-हंसते फांसी के फन्दे पर भूल गया भाई राम प्रसाद यह तुम्हारा ही काम था, सत्य धर्म का मर्म तुमने ही जान पाया था । वह वीर जहां से आया था वहीं को चला गया ।

प्यारे बिस्मिल की प्यारे बातें
यह चारीगर उल्फत गाफिल नजर आता है ।
बीमार का बच जाना मुश्किल नजर आता है ।।
है दर्द बड़ी नयामत देता है जिसे खालिक।
जी दरदे मुहब्बत के काबिल नजर आता है ।।
जिस दिल में उतर जाये उस दिल को मिटा डाले ।
हर तीर तेरा जालिम कातिल नजर आता है ।।
मजरूह न थी जब तक दिल दिल ही न था मेरा ।
सदके तेरे तीरों का बिस्मिल नजर आता है ।।

अदालत में जज से
जज साहब हम जानते हैं कि आप हमें क्या सजा देंगे । हम जानते है कि आप हमें फांसी की सजा देंगे, और हम जानते है कि यह ओठ जो अब बोल रहे है वह कुछ दिनों बाद बन्द हो जायेंगे । हमारा बोलना, सांस लेना और काम करना यहां कि हिलना और जीना सभी इस सरकार के स्वार्थ के विरूद्ध है । न्याय के नाम पर ‘शीघ्र ही मेरा गला घूंट दिया जायेगा ? मैं जानता हूं कि मैं मरूंगा मरने से नहीं घबराता । किन्तु क्या जनता  और  इससे सरकार का उदेश्य पूर्ण हो जायेगा ?  क्या  इसी  तरह  हमेशा भारत मां के  वक्षस्थल पर विदेशियों का तांडव नृत्य होता रहेगा ? कदापि नहीं, इतिहास इसका प्रमाण है । मैं मरूंगा किन्तु कब्र से फिर निकल आउंगा और मातृभुमि का उद्धार करूंगा ।….

एक दिन वह सहसा बोल पड़े-
उदय काल के सूर्य का सौन्दर्य डूबते हुए सूर्य की छटा को कभ्ीा नहीं पा सकता है। और :-
प्रेम का पंथ कितना कठिन है संसार की सारी आपत्तियां मानों प्रेमी ही के लिये बनी हों।
उफ! कैसा व्यापार है कि हम सब कुछ देदे और हमें आपकी सहानुभूति या फिर कुछ भी नही । लेकिन फिर भी हम कभी मानेंगे नहीं – स्वाधीनता की कीमत कुछ भी नहीं
फांसी के कुछ दिन पहिले उन्होंने अपने एक मित्र के पास एक पत्र भेजा था उसमें उन्होंने लिखा थाः
19 तारीख को जो कुछ होने वाला है उसके लिये मैं अच्छी तरह तैयार हूं। यह है ही क्या ? केवल शरीर का बदलना मात्र है । मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातृभूमि तथा उसकी दीन सन्तति के लिये नये उत्साह और ओज के साथ काम करने के लिए ‘शीघ्र ही फिर लौट आयेगी ।
यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी,
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान मैं लाउं कभी ।
हे ईश, भारतवर्ष में ‘शतबार मेरा जन्म हो,
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।
मरते बिसमिल रोशन, लहरी, अशफाक, अत्याचार से,
होंगे पैदा सैकड़ों उनके रूधिर की धार से ।।
उनके प्रबल उद्योग से उद्धार होगा देश का,
तब नाश होगा सर्वथा दुख ‘शोक के लवकेश का ।।

सब से मेरा नमस्ते कहिये । कृपा करके इतना कष्ट और उठाइये कि मेरा अन्तिम नमस्कार पूजनीय पं० जगतनारायण  मुल्ला  की  सेवा  तक भी पहुंचा दीजिये । उन्हें हमारी कुर्बानी और खून से सने हुए रूपये की कमाई से सुख की नींद आवे । बुढ़ापे में भगवान पं0 जगतनारायण को ‘शान्ति प्रदान करें ।

राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।

जुलाई 20, 2009 को 1:00 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था | 5 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा…  उनको  उचित  है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता  प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और  उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।  इसके आगे स्व० बिस्मिल लिखते हैं..

जो धनी मानी स्वदेश सेवार्थ बड़े-बड़े विद्यालयों तथा पाठशालाओं की स्थापना करते है, उनको उचित है कि विद्यापीठों के साथ-साथ उद्योगपीठ, शिल्पविद्यालय तथा कलाकौ्शल भवनों की स्थापना भी करें । इन विद्यालयों के विद्यार्थियों को नेतागीरी के लोभ से बचाया जावे । विद्यार्थियों का जीवन सादा हो और विचार उच्च हों । इन्हीं विद्यालयों में एक-एक उपदेशक विभाग भी हो, जिस में विद्यार्थी प्रचार करने का ढंग सीख सकें । जिन युवकों के हृदय में स्वदेश सेवा के भाव हो उनको कष्ट सहन करने की आदत डालकर सुसंगठित रूपसे ऐसा कार्य करना चाहिये, जिसका परिणाम स्थायी हो ।

कैथोराइन ने इसी प्रकार कार्य किया था । उदर पूर्ति के निमित्त कैथोराइन के अनुयायी ग्रामों में जाकर कपड़े सीते या जूट बनाते और रात्रि के समय किसानों को उपदे्श देते थें जिस समय से मैंने कैथोराइन की जीवनी का अंग्रेजी भाषा में अध्ययन किया, मुझ पर उस का बहुत प्रभाव हुआ।  मैंने तुरन्त उस की जीवनी कैथोराइन नाम से हिन्दी में प्रकाशित कराई ।

मैं भी उसी प्रकार काम करना चाहता था, पर बीच ही में क्रान्तिकारी दल में फंस गया । मेरा तो अब दृढ़ निश्चय हो गया है कि अभी पचास वर्ष तक क्रान्तिकारी दल की भारतवर्ष में सफलता नहीं हो सकती, क्योंकि  यहां  की  जनता  उसके  उपयुक्त  नहीं । अतएव क्रान्तिकारी दल का संगठन कर के व्यर्थ में नवयुवकों के जीवन को कष्ट करना और शक्ति का दुरूपयोग करना बड़ी भूल है । इससे लाभ के स्थान में हानि की सम्भावना बहुत अधिक है ।

नवयुवकों को मेरा अन्तिम सन्देश यही है कि वे रिवाल्वर या पिस्तौल को अपने पास रखने की इच्छा केा त्याग कर सच्चे देशसेवक बने । पूर्ण स्वाधीनता उन का ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी बनने का प्रयत्न करते रहें । फल की इच्छा छोड़ कर सच्चे प्रेम से कार्य करें । परमात्मा सदैव उनका भली ही करेगा ।

यदि देश हित मरना पड़े मुझ को सहस्त्रों बार भी ।
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाउं कभी ।।
हे ई्ष भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो ।
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।

सर फ़रोशाने वतन फिर देखलो मकतल में है ।
मुल्क पर कुर्बान हो जाने के अरमां दिल में हैं ।।
तेरा है जालिम की यारों और गला मजलूम का ।
देख लेंगे हौसला कितना दिले कातिल में है ।।
शोरे महशर बावपा है मार का है धूम का ।
बलबले जोशे शहादत हर रगे बिस्मिल में है ।।

आज 17 दिसम्बर 1927 ई0 को निम्नलिखित पक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जब कि 19 दिसम्बर 1927  ई0 सोमवार पौष कृष्ण 11 सम्वत् 1984 को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है । अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ही । यह सब सर्वशक्तिमान प्रभु की लीला है । सब कार्य उसके इच्छानुसार ही होते है । यह परम पिता परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किस को शरीर त्यागना होता है ।

मृत्यु के सकल उपक्रम निमित्त मात्र है । जब तक कर्म क्षय नहीं होता, आत्मा को जन्म-मरण के बन्धन में पड़ना ही होता है, यह शास्त्रों का निश्चय है । यद्यपि यह, वह परमब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणाम स्वरूप कौन सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा, किन्तु अपने लिये ये मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही पुनः भारतवर्ष में ही किसी निकटवर्ती सम्बन्धी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण करूंगा, क्योंकि मेरा जन्म जन्मान्तर यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो

कोई किसी पर हुकूमत न करें । सारे संसार में जनतन्त्र की स्थापना हो । वर्तमान समय में भारतवर्ष की बड़ी सोचनीय अवस्था है । अतएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब तक कि भारतवर्ष के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण स्वतन्त्र न हो जावेंगे, परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना होगी कि वह मुझे इसी देश में जन्म दें, ताकि मैं उसकी पवित्र वाणी वेद वाणी का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक पहुंचाने में समर्थ हो सकूं ।

सम्भव है कि मैं मार्ग निर्धारण में भूल करूं, पर  इसमें  मेरा  कोई  विशेष  दोष  नहीं, क्योंकि मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं । भूल  न  करना  केवल  सर्वज्ञ  से  ही  सम्भव है । हमें  परिस्थितियों  के  अनुसार  ही  सब  कार्य  करने  पड़े  और  करने  होंगे । परमात्मा  अगले  जन्म  में  सुबुद्धि  प्रदान  करें  कि  मैं  जिस  मार्ग  का  अनुसरण  करूं, वह  त्रुटि  रहित  ही  हो ।

अब मैं उन बातों का भी उल्लेख कर देना उचित समझता हूं जो काकोरी षड्यन्त्र के अभियुक्तों के सम्बन्ध में सेशन जज के फैसला सुनाने के पश्चात घटित हुई । 6 अप्रैल सन 27 ई को सेशन जज ने फैसला सुनाया था। 18 जुलाई सन 27 ई0 को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई । इसमें कुछ की सजायें बढ़ी और एकाध को कम भी हुई । अपील होने की तारीख से पहले मैं ने संयुक्त प्रान्त के गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि अब भविष्य में क्रान्तिकारी दल से कोई सम्बन्ध न रखूंगा । इस मेमोरिलय का जिक्र मैंने अपनी अन्तिम दया प्रार्थना पत्र में जो मैं ने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था, उसमें कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना न स्वीकार की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमें की बहस लिखकर भेजी, जो छापी गई ।

जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी, तो उन्हें बड़ा सन्देह हुआ कि वह बहस मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का यह नतीजा निकला कि चीफ कोर्ट अवध से मुझे महा भयंकर षड्यन्त्रकारी की पदवी दी गई । मेरे पश्चाताप पर जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा का प्रकाश इस प्रकार किया कि यदि यह रामप्रसाद छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा । बुद्धि की प्रखरता तथा समझ पर कुछ प्रकाश डालते हुए निर्दयी हत्यारे के नाम से विभूषित किया गया । लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु काकारी षड़यन्त्र का चीफ कोर्ट आद्योपान्त, फैसला पढ़ने से भली भांति विदित होता है कि मुझे मुत्युदण्ड किस ख्याल से दिया गया ।

यह निश्चय किया गया कि रामप्रसाद ने सेशन जज के  विरूद्ध  अपशब्द  कहे  है, खुफिया  विभाग  के कार्यकर्ताओं पर लांछन लगाये हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके विरूद्ध आवाज उठाई है, अतएव रामप्रसाद सबसे बड़ा गुस्ताख मुलजिम है । अब माफी चाहे वह किसी भी रूप में मांगे, नहीं दी जा सकती । चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रान्तीय गवर्नर तथा फिर वाइसराय के पास दया प्रार्थना की गई । रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लहरी, रोशनसिंह तथा अ्शफ़ाक़उल्ला खां के मृत्यु दण्ड को बदलकर अन्य दूसरी सजा देने की सिफारि्श करते हुए मेम्बरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन पत्र दिया । मेरे पिता ने ढाई सौ रईस, आनरेरी  मजिस्ट्रेट  तथा  जमींदारों  के  हस्ताक्षर  से  एक अलग प्रार्थना पत्र भेजा, किन्तु श्रीमान सर बिलियम मेरिस की सरकार ने एक भी न सुनी ।

उसी समय लेज़िस्लेटिव एसेम्बली तथा कौंसिल आफ स्टेट के 78 सदस्यों  ने  भी  हस्ताक्षर  करके वाइसराय के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि काकोरी षड़यन्त्र के मृत्युदण्ड पाये हुओं को मृत्युदण्ड की सजा बदलकर दूसरी सजा कर दी जावे, क्योंकि दौरा जज ने सिफारिश की है कि यदि यह लोग पश्चाताप करें तो सरकार दण्ड कम कर दें । चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है ।

किन्तु वाइसराय महोदय ने भी एक न सुनी । इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा अन्य एसेम्बली के कुछ सदस्यों ने भी वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु दण्ड न दिया जावे । इतना होने पर सबको आ्शा थी कि वायसराय महोदय अवश्यमेव मृत्युदण्ड की आज्ञा रदद कर देंगे । इसी हालत में चुपचाप विजयाद्शमी से दो दिन पहले जेलों को तार भेज दिये गये, कि दया नहीं होगी । सब को फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई ।

जब मुझे सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल ने तार सुनाया, मैंने भी कह दिया कि आप अपना कार्य कीजिये । किन्तु सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया प्रार्थना का सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम सा बना रखा है कि प्रत्येक फांसी के कैदी की ओर से जिसकी दया भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहां से खारिज हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रान्तीय सरकार के पास अवश्य भेजते हैं कोई दूसरा जेल सुपरिन्टेन्डेण्ट ऐसा नहीं करता । उपरोक्त तार लिखते समय मेरा कुछ विचार हुआ कि प्रिवीकौंसिल इग्लैण्ड में अपील की जावे । मैंने श्रीयुत मोहनलाल सक्सेना वकील लखनउ को इस प्रकार की सूचना दी ।

बाहर किसी को वाइसराय की अपील खारिज होने की बात पर विश्वास भी न हुआ । जैसे तैसे करके श्रीयुत मोहनलाल द्वारा प्रिवीकौंसिल में अपील कराई गई । नतीजा पहले से ही मालूम था। वहां से भी अपील खारिज हुई । यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।

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