श्री अशफाक उल्ला खां – मैं मुसलमान तुम काफिर ?

फ़रवरी 26, 2010 को 10:58 अपराह्न | Posted in 2.अशफ़ाक़ उल्ला खाँ, काकोरी के शहीद, फाँसी, विशेष परिचय | 5 टिप्पणियाँ
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इस तरह की अपनी कुर्बानियों से  वतन  की  मिट्टी – पानी  का  कर्ज़  अदा  करने  वाले  सिरफिरे  मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का परिचय जुड़ा दिखता है । अपने जीवनकाल में भी यह दोनों मित्रों ने एक नायाब दोस्ती की मिसाल कायम की थी । सँभवतः भाई  शिव  वर्मा  जी  ने  इसी कारण  मुख्य आरोपियों  की  परिचय श्रॄँखला  में  इन्हें  बिस्मिल  जी  के  बाद  दूसरा  स्थान  दिया  है । शहीद अशफ़ाक़ उल्ला को जीवनपर्यँन्त यह सवाल सता रहा और वह अपने सखा से यह पूछते रहते कि लोग आख़िर ऎसा क्यों सोचते ही हैं कि मैं मुसलमान तु्म क़ाफ़िर ! पढ़िये उनकी कहानी…

श्री अशफाक उल्ला खां पहिले मुसलमान है, जिन्हें  षडयन्त्र  के  मामले  में  फांसी  हुई  है । बीस पच्चीस वर्ष के इतिहास में, जब से राजनैतिक  षडयन्त्रों  की  चर्चा  सुनने  में  आई, अनेक आत्मायें फांसी और गोली का शिकार बना दी गयी । परन्तु आज तक किसी मुसलमान को यह शिकार बनते हुए नहीं सुना गया । इससे जनता में यह धारणा बैठ गयी थी कि मुसलमान लोग षडयन्त्रों में भाग नहीं ले सकते ।

किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे ।

वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी  बनाई  हुई  कविताएं  अदालत  आते-जाते  अक्सर  काकोरी  के अभियुक्त गाया करते थे ।

श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है ।

बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह  नवयुवक  और  कोई  न  था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब  श्री  रामप्रसाद  शाहजहांपुर  आये ।

श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।

उनके  निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है । मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है । अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था

एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु  उस  प्रेम  के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है । यह  एक  दूसरे  को  राम  और कृष्ण कहते है । अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते ।

जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये । स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया  कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया ।

अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले । शेष अगली कड़ी में समाप्य

सेशन कोर्ट का फैसला

जनवरी 12, 2009 को 1:17 पूर्वाह्न | Posted in काकोरी के शहीद, काकोरी षड़यंत्र, वन्दे मातरम, सरफ़रोशी की तमन्ना | 1 टिप्पणी
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अब तक आपने पढ़ा…

उस दिन के सवाल जवाब में यह भी मालूम हुआ कि काकोरी के मामले में सरकार दो लाख रूपये खर्च कर चुकी है । प्रान्त के कार्यकर्ताओं के पास यही एक अन्तिम अस्त्र था, जिससे वे काकोरी के अभियुक्तों के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते थे । किन्तु गवर्नर साहब की स्वेच्छाचारिता के कारण वह अस्त्र भी निष्फल हुआ। अनशन तो किसी प्रकार टूट गया, मगर विशेष अधिकार उन्हें अभी तक नसीब न हुये । पराधीन देश के पराधीन निवासियों के लिये जो कुछ हो जाय थोड़ा है । सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करने का निश्चय किया .. .. 

अब आगे..

सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करना निश्चय किया । इस निश्चय के अनुसार श्री बनवारी लाल, श्री भूपेन्द्रनाथ सन्याल और श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल  के अलावा अन्य अभियुक्त ने सेशन जज के फैसले के खिलाफ अपील दायर की । उधर सरकार की ओर से सजा बढ़ाने के लिए लिखा पढ़ी की गई । दोनों मामले साथ-साथ चीफ कोट में चीफ जस्टिस सर लुई स्टुवर्ट और जस्टिस मोहम्मद रजा के सामने पेश हुये । 18 जुलाई को अपील प्रारम्भ हुई । सरकार ने अपनी पैरवी के लिये तो यहाँ भी पं0 जगतनारायण को बुलाया किन्तु फांसी की सजा पाये हुये अभियुक्त श्री रामप्रसाद, श्री राजेन्द्र और श्री रोशन सिंह के मामले की पैरवी के लिए क्रमश: श्री लक्ष्मी शंकर मिश्र, श्री एच0 सी0 दत्त ओर श्री जयकरण नाथ मिश्र को नियुक्त किया । अभियुक्त चाहते थे कि उनके लिये किसी अच्छी वकील का प्रबन्ध किया जाय । उन्होंने अपना यह विचार  प्रकट भी किया किन्तु सुनता कौन है ?

उन्हें सख्त सजा दिलाने के लिये तो सरकार ने दो लाख रूपये खर्च कर दिये और इस अपील में और भी खर्च करने को तैयार हुई, किन्तु उन फांसी पर लटकने वालों के लिये उसने थोड़ी सी रकम भी खरचना मन्जूर नहीं किया । दिखावे के लिये एक बड़े वकील से, जिसे अभियुक्त चाहते थे, कुछ बात-चीत भी की गई किन्तु मेहनताना इतना कम दिया जा रहा था कि उन सज्जन को साफ-साफ शब्दों में सरकारी आदमी से यह कहना पड़ा कि तुम काकोरी के कैदियों के साथ किसी किस्म का सलूक करना नहीं चाहते, किन्तु चाहते यह भी हो कि बदनामी भी न हो । अभियुक्त पं. रामप्रसाद ने पं0 लक्ष्मीशंकर मिश्र की मारफत अपने मामले की पैरवी कराने से इनकार कर दिया । उन्होंने कहा कि या तो कोई अच्छा वकील नियुक्त किया जाये या मुझे स्वयं पैरवी करने दिया जाये । किन्तु चीफ कोर्ट का हुक्म हुआ कि दो में से एक भी न मानी जायेगी और पं0 लक्ष्मीशंकर ही मामले की पैरवी करेंगे, यह भी सरकारी रिआयत है जो वह अपने खर्च से उनके लिये वकील दे रही है । गरज यह कि जिस प्रकार सरकार ने चाहा, उसी प्रकार अपील की सुनवाई हुई । दौरान अपील में अभियुक्त श्री प्रणवेश चैटर्जी के भाई ने अपने भाई की ओर से एक दरख्वास्त दी जिसमें बहुत से अपराध स्वीकार कर लिये ओर अपील वापिस लेते हुये अपनी गलतियों पर अफसोस किया और मामला चीफ कोर्ट के हाथों में दीन भाव से सौंप दिया । इस अपील की सुनवाई 2 अगस्त को खतम हो गई । किन्तु फैसला उस दिन नहीं सुनाया गया ।

इसी बीच में श्री अशफाकउल्ला खां की अपील की भी सुनवाई हुई ।  श्रीशचीन्द्रनाथ बख्षी ने अपील नहीं की थीं 12 अगस्त को सबका फैसला एक साथ ही सुना दिया गया । इसमें सेशन जज द्वारा दी गई सजाओं में परिवर्तन किया गया । श्री रामप्रसाद, श्री राजेन्द्र लहरी, श्री रोशनसिंह और श्री अशफाकउल्ला की फांसी की सजायें कायम रहीं । श्री जोगेश चटर्जी, श्री गोविंद चरणकार, श्री मुन्दीलाल की सजाएं बढ़ाकर दस-दस वर्ष की कैद से आजन्म कालापानी की कर दी गईं । श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य और श्री विष्णुशरण दुबलिस की सजाएं सात-सात वर्ष से बढ़ाकर दस-दस वर्ष की कर कर दी गईं । श्री रामनाथ पाण्डेय की सजा घटा कर 5 वर्ष से 3 वर्ष कर दी गई और श्री प्रणवेश की सजा घटा कर 5 वर्ष से 4 वर्ष की गई । शेष अभियुक्तों की सजाएं पूर्ववत् ही बनी रहीं ।

इस फैसले से प्रान्त के कार्यकर्ताओं में और भी असंतोष और रोष हुआ । ठा० मनजीत सिंह एम० एल० सी० ने कौंसिल के आगामी अधिवेशन में इस आशय का प्रस्ताव पेश करने की सूचना दी कि फ़ाँसी की सजा पाये हुए लोगों की सजाएं कम करके आजन्म काले पानी की सजाएं कर दी जायें । फांसी 16 सितम्बर को हाने वाली थी इस बीच में कौंसिल का अधिवेशन नहीं हो रहा था । यह आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो कि कौंसिल में प्रस्ताव पे्श करने के पहिले ही इनको फांसी  पर टांग दिया जायेगा ।  इसलिए ठाकुर मनजीतसिंह ने एसेम्बली के सदस्यों को भी एक पत्र लिखा, जिसमें सजा घटवाने का उद्योग करने की प्रार्थना की और यह भी कहा कि आगामी बैठक तक उन की फांसी रूक जाये, ताकि मैं अपना प्रस्ताव कौंसिल में पेश कर सकूं । एक ओर तो यह उद्योग किया गया और दूसरी ओर प्रान्तीय कौंसिल के मेम्बरों ने गवर्नर साहब के पास एक आवेदन-पत्र भेज कर फांसी पाये अभियुक्तों पर, उनकी युवावस्था के नाम पर, दया दिखाने की प्रार्थना की । गवर्नर साहब का शासनकाल समाप्त हो चुका था । वे शीघ्र ही जाने वाले थे । इसलिए मेम्बरों को आस थी कि शायद वे चलते-चलते इतना सलूक कर जायें । किन्तु उनकी सब आशायें दुराशा मात्र साबित हुईं और गवर्नर महोदय ने दया प्रार्थना अस्वीकार कर दी । इस प्रकार की एक दया-प्रार्थना एसेम्बली और स्टेट कौंसिल के सदस्यों ने वायसराय से भी की थी किन्तु उन्होंने भी इसी निर्दयता के साथ उसे अस्वीकार कर दिया । हां, इस लिखा पढ़ी में इतना जरूर हुआ कि फांसी की पहिली तिथि 16 सितम्बर टल गई और उस दिन अभिुक्तों को फांसी नहीं हुई ।

इसके बाद फांसी देने के लिये 11 अक्टूबर की तारीख नियत की गई । अभियुक्तों ने सरकार के मनोभाव जान ही लिये थे, इस लिये यहां से कुछ होता न देख उन्होंने प्रीवी-कौसिंल में अपने मामले की अपील करने का विचार किया। उन्होंने अपना यह विचार सरकार पर प्रकट किया और इसलिये उन्हें अपील का मौका देने के लिए फांसी की दूसरी तारीख भी टल गई । अंग्रेजी सल्तनत में न्याय कितना महंगा पड़ता है, यह किसी से छिपा नही । इतने ही मामले में अभियुक्त बहुत बड़ी आर्थिक हानि उठा चुके थे । घर के लोग सगे-सम्बन्धी सब परेशान हो  गए थे । फिर भी इस आशा से कि शायद वहां न्याय हो, इन्होंने लम्बा खर्च बर्दाश्त करके भी अपील करने का ही निश्चय किया । येन-केन प्रकारेण धन का प्रबन्ध कर के श्री पोलक महाशय को, जो इंग्लैण्ड में थे, मामले के काग़जा़त सौंपे गए । वहां पर एक बैरिस्टर की मारफत यह अपील प्रीवी-कौंसिल में दायर की गई, किन्तु प्रीवी-कौंसिल के न्यायधीशों ने इसे इस योग्य भी न समझा कि इसकी सुनवाई की जाये । उन्होंने उस पर विचार करना अस्वीकार कर दिया । 29 अक्टूबर को प्रान्तीय कौंसिल में भी काकोरी के कैदियों का प्रश्न आया ।

पं०  गोविन्द बल्लभपन्त ने सरकार को खूब आड़े हाथों लिया । बहुत देर तक प्रश्नोत्तर होते रहे । किन्तु बेहया सरकारर टस से मस नहीं हुई । अब सारा खेल खतम हो चुका था । अपीलें की जा चुकी थी, कौंसिल में प्रश्न छेड़े जा चुके थे । गवर्नर से दया-प्रार्थना की जा चुकी थी, वायसराय से भी सजा घटाने की प्रार्थना की जा चुकी थी, सम्राट के पास भी प्रार्थना पत्र भेजे जा चुके थे, जो उपाय शक्ति के अन्दर थे, वे सब किये जा चुके थे । किन्तु सभी जगह केवल शून्य ही हाथ आया । 19 दिसम्बर को अभियुक्तों को फांसी पर लटका देना निश्चय हो गया । प्रान्त भर में बड़ी बेचैनी पैदा हो गई  ।       17 दिसम्बर को प्रान्तीय कौंसिल में पं. गोविन्दबल्लभ पन्त ने इस मामले को फिर उठाया । उन्होंने प्रेसीडेण्ट से प्रार्थना की कि सब काम बन्द करके इस मामले पर विचार किया जाये । पहिले प्रसिडेण्ट महाशय इस प्रार्थना को अस्वीकार किये देते थे, किन्तु तीन बजे के करीब जब मेम्बरों ने उन से फिर प्रार्थना की, तब वे राजी हुए, किन्तु उस दिन तीन बजे के कुछ बाद ही सरकारी काम समाप्त हो जाने पर डिप्टी प्रसिडेण्ट ने, जो उस समय प्रसिडेण्ट का काम कर रहे थे, कौंसिल की बैठक सोमवार तक लिए स्थगित कर दी । सोमवार को सबेरे ही फांसी का समय था । इस लिए मेम्बरों में बड़ी खलबली मच गई । उन्होंने होम मेम्बर नवाब साहब छतारी तक के दरे-दौलत की ख़ाक छानी, किन्तु कोई सुनवाई न हुई और प्रान्तीय कौंसिल में, एक शब्द कहने का मौक़ा दिये बिना ही प्रान्त के चार होनकार नवयुवक फांसी के तख्ते पर टांग दिये गये !

अन्त में सोमवार 19 दिसम्बर 1927 के हत्यारे दिन ने अपना मुंह दिखायां श्री राजेन्द्र लहरी अपने साथियों से दो दिन पहिले ही-17 दिसम्बर को ही अपने अमूल्य प्राण-दान से गोंडा के रक्त-पिपासु फांसी के तख्ते की तृष्णा बुझा चुके थे । 19 दिसम्बर को शेष तीनों वीरों ने भी मातृ-मंदिर की बलिवेदी पर अपने-अपने बहुमूल्य शीश चढ़ा दिये । सब में एक अवर्णनीय गम्भीरता थी । जननी-जन्मभूमि के वक्ष का स्तनपान करने की उन में अलौकिक उत्सुकता थी, अपनी इस उत्सुकता में उन्होंने एक दिन पहिले ही से बाहर का दूध पीना छोड़ दिया था । उनमें मृत्यु का भय नहीं था ।

साधारण लोगों की भांति वे बेहोशी की अवस्था में, घसीट कर फांसी के तख्ते पर नहीं लाये गये थे । वे अपने आप ही तैयारी कर रहे थे । प्रातःकाल होते ही वे अपनी अनन्त यात्रा के उद्योग में लग गये थे और मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे ।

मुहूर्त की सूचना मिलते ही मुस्काराये और गम्भीर स्वर में वन्दे-मातरम और भारतमाता की जयघोष किया और फिर हंसते खेलते उस भयानक प्रेताकार फांसी के तख्ते पर चढ़ गये ।

थोड़ी ही देर में उनका शरीर उस फन्दे में झूलने लगा और स्वयं के साथ उनकी पवित्र प्राणवायु उनकी प्राणप्रिय भारतमाता की वायु से मिल गयी । थोड़ी देर बार उनके स्थूल शरीर भी भारतमाता की छाती पर लेटते हुये पाये गयें चारों ओर शान्ति छा गई

इस प्रकार इन वीरात्माओं की जीवन-यज्ञ की पूर्णाहुति समाप्त हुई । देष भर में शोक और विषाद की लहर फैल गई । सबों ने अपनी-अपनी श्रद्धांजलि चढ़ा  कर उनका तर्पण किया और माता के वह पागल पुजारी अपनी जीवन लीला समाप्त कर अनन्त की गोद में विलीन हो गये । फांसी के दिवस समस्त देश भर में बड़ा शोक मनाया गया । लोगों ने व्रत रखें और शोक तथा सहानुभूति सूचक सभायें हुईं । कहीं-कहीं विद्यालयों और कालेजों के छात्रों ने भी व्रत रखें । दिल्ली के इस्लामी स्कूल के सभी छात्र तथा शिक्षकों ने व्रत रख कर दुख प्रकट किया । देश भर में सरकार के इस कृत्य की आज निन्दा हो रही थी, सभी शोकातुर थे । बड़ा अन्धकारमय दिन था !

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