जेल और भेद जानने का प्रयत्न

फ़रवरी 10, 2009 को 10:16 अपराह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4 में प्रकाशित किया गया | 4 टिप्पणियाँ
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मैं गिरफ़्तार हो गया । मैं केवल एक अंगोछा पहने हुये था । पुलिस वालों को अधिक भय न था । पूछा यदि घर में कोई अस्त्र हो,  तो दे दीजिये मैने कहा कोई आपत्तिजनक वस्तु घर में नहीं है । उन्होंने बड़ी सज्जनता की । मेरे हथकड़ी इत्यादि कुछ न डाली । मकान की तलाशी लेते समय एक पत्र मिल गया, जो मेरी जेब में था । कुछ होनहार था, कि तीन चार पत्र मैंने लिखे थे । डाकखाने में डालने को भेजे, तब तक डाक निकल चुकी थी । मैंने वह सब अपने पास ही रख लिये । विचार हुआ कि डाक के बम्बे में डाल दूं । 

फिर विचार किया जैसे बम्बे में पड़े रहेंगे वैसे जेब में पड़े है । मैं उन पत्रों को वापस घर ले आया । उन्हीं में एक पत्र आपत्तिजनक था,  जो पुलिस के हाथ लग गया । गिरफतार होकर पुलिस कोतवाली पहुंचा । वहां पर एक खुफिया पुलिस के अफसर से भेंट हुई । उस समय उन्होंने कुछ ऐसी बातें की,  जिन्हें मैं या एक व्यक्ति और जानता था । कोई तीसरा व्यक्ति इस प्रकार से व्यौरावार नहीं जान सकता    था 

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । किन्तु सन्देह इस कारण न हो सका कि मैं दूसरे व्यक्ति के कार्यों पर अपने शरीर के समान ही विश्वास रखता था । शाहजहांपुर में जिन-जिन व्यक्तियों की गिरफतारी हुई,  वह भी बड़ी आश्चर्यजनक प्रतीत होती थी, जिन पर कोई सन्देह भी न करता था, पुलिस उन्हें कैसे जान गई ? दूसरे स्थानों पर क्या हुआ,  कुछ भी न मालूम हो सका ।

जेल पहुंच जाने पर मैं थोड़ा बहुत अनुमान कर सका, कि सम्भवतः दूसरे स्थानों में भी गिरफतारियां हुई होंगी, गिरफतारियों के समाचार सुन शाहजहाँपुर शहर के अब्य सभी मित्र भयभीत हो गये । किसी से इतना भी न हो सका कि जेल में हम लोगों के पास समाचार भेजने का प्रबन्ध कर देता ।

जेल
जेल में पहुंचते ही खुफिया पुलिस वालों ने
यह प्रबन्ध कराया कि हम सब एक दूसरे से अलग रखे गये, किन्तु फिर भी एक दूसरे से बातचीत हो जाती थी यदि साधारण कैदियों के साथ रखते तब तो बातचीत का पूर्ण प्रबन्ध हो जाता,  इस कारण से सबको अलग-अलग तनहाई की कोठरियों में बन्द किया । यही प्रबन्ध दूसरे जिले की जेलों में भी किया गया था ।

जहां जहां पर इस सम्बन्ध में गिरफतारियां हुई थीं अलग-अलग रखने से पुलिस को यह सुविधा हाती है कि प्रत्येक से पृथक पृथक मिलकर बातचीत करते हैं । कुछ भय दिखाते है,  कुछ इधर उधर की बातें करके भेद जाने का प्रयत्न करते हैं । अनुभवी लोग तो पुलिस वालों से मिलने से इन्कार ही कर देते हैं । क्योंकि उनसे मिलकर हानि के अतिरिक्त लाभ कुछ नहीं होता । कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो समाचार जानने के लिये कुछ बातचीत करते हैं ।

पुलिस वालों से मिलना ही क्या है वे तो चालबाजी से बात निकालने की रोटी ही खाते है । उनका जीवन इसी प्रकार की बातों में व्यतीत होता है । नवयुवक दुनियादारी क्या जानें,  न वे इस प्रकार की बातें बना सकते हैं । जब किसी प्रकार कुछ समाचार ही न मिलते तब तो बहुत जी घबड़ाता । यही पता नहीं चलता कि पुलिस क्या कर रही है,  भाग्य का क्या निर्णय होगा ?  जितना समय व्यतीत होता जाता था उतनी ही चिन्ता बढ़ती जाती थी ।

जेल अधिकारियों से मिलकर पुलिस यह भी प्रबन्ध करा देती है कि मुलाकात करने वालों से घर के सम्बन्ध में बातचीत करें,  मुकद्दमें के सम्बन्ध में कोई बातचीत न करें । सुविधा के लिये सबसे प्रथम यह परमावश्यक है कि एक विश्वासपात्र वकील किया जावे जो यथा समय आकर बातचीत कर सके ।

वकील के लिये किसी प्रकार की रूकावट नहीं हो सकती । वकील के साथ जो अभियुक्त की बातें होती है,  उनको कोई दूसरा नहीं सुन सकता क्योंकि इस प्रकार का कानून है,  इस प्रकार का अनुभव बाद में हुआ । गिरफतारी के बाद शाहजहांपुर के वकीलों से मिलना भी चाहा,  किन्तु शाहजहांपुर में ऐसे दब्बू वकील रहते हैं जो सरकार के विरूद्ध मुकद्दमें में सहायता देने में हिचकते हैं ।

मुझसे खुफिया पुलिस के कप्तान साहब मिले । थोड़ी सी बातें करके अपनी इच्छा प्रकट की कि मुझे सरकारी गवाह बनाने की इच्छा रखते हैं । थोड़े दिनों में एक मित्र ने भयभीत होकर, कि कहीं यह भी न पकड़ा जावे, बनारसीलाल से भेंट की और समझा बुझाकर उसे सरकारी गवाह बना दिया । बनारसी लाल बहुत घबराता था कि कौन सहायता देगा, सजा जरूर हो जावेगी । यदि किसी वकील से मिल लिया होता तो उसका धैर्य न टूटता ।

पं0  हरकरननाथ शाहजहांपुर आये,  जिस समय वह अभियुक्त श्रीयुत प्रेमकृष्ण खन्ना से मिले,  उस समय अभियुक्त ने पं0 हरकरननाथ से बहुत कुछ कहा कि मुझ से तथा दूसरे अभियुक्तों से मिल लें । यदि वह कहा मान जाते और मिल लेते तो बनारसीलाल का साहस हो जाता और वह डटा रहता । उसी रात्रि को पहले एक इन्स्पेक्टर पुलिस बनारसीलाल से मिले । फिर जब मैं सो गया तब बनारसीलाल को निकाल कर ले गये ।

प्रातःकाल पांच बजे के करीब, जब बनारसीलाल की कोठरी में से कुछ शब्द न सुनाई दिया, तो बनारसीलाल को पुकारा । पहरे पर जो कैदी था, उससे मालूम हुआ, बनारसीलाल बयान दे चुके । बनारसीलाल के सम्बन्ध में सब मित्रों ने कहा था कि इस से अवश्य धोखा होगा,  पर मेरी बुद्धि में कुछ न समाया था । प्रत्येक जानकार ने बनारसीलाल के सम्बन्ध में यही भविष्यवाणी की थी कि वह आपत्ति पड़ने पर अटल न रह सकेगा । इस कारण सब ने उसे किसी प्रकार के गुप्त कार्य में लेने की मनाही की थी । अब तो जो होना था सो हो ही गया

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नोट बनाने के प्रयोग

फ़रवरी 4, 2009 को 4:17 पूर्वाह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-3, सरफ़रोशी की तमन्ना में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ
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पुनर्गठन के बाद…. इसी बीच मेरे एक मित्र की एक नोट बनाने वाले महाशय से भेंट हुई । उन्होंने बड़ी-बड़ी आशायें बांधी । बड़ी लम्बी लम्बी स्कीम बांधने के पश्चात मुझसे कहा कि एक नोट बनाने वाले से भेंट हुई है । बड़ा दक्ष पुरू्ष है । मुझे भी बना हुआ नोट देखने की बड़ी उत्कट इच्छा थीं । मैंने उन सज्जन के दर्शन की इच्छा प्रकट की । जब उक्त नोट बनाने वाले महाशय मुझे मिल तो बड़ी कौतुहलोत्पादक बातें की ।

मैंने कहा कि मैं स्थान तथा आर्थिक सहायता दूंगा, नोट बनाओ । जिस प्रकार उन्होंने मुझ से कहा, मैंने सब प्रबन्ध कर दिया, किन्तु मैंने कह दिया था कि नोट बनाते समय मैं वहां उपस्थित रहूंगा । मुझे बताना कुछ मत, पर मैं नोट बनाने की रीति अवश्य देखना चाहता हूं । पहले पहल उन्होंने दस रूपये का नोट बनाने का निश्चय किया । मुझ से एक दस रूपये का नया साफ नोट मंगाया । नौ रूपये दवा खरीदने के बहाने से ले गये ।

रात्रि में नोट बनाने का प्रबन्ध हुआ । दो शीशे लाये । कुछ कागज भी लाये । दो तीन शीशियों में कुछ दवाई थी । दवाइयों को मिला एक प्लेट में सादे कागज पानी में भिगोये । मैं जो साफ नोट लाया था । उस पर एक सादा कागज लगा कर दोनों को दूसरी दवा डालकर धोया । फिर सादे कागजों में लपेट कर पुड़िया सी बनाई और अपने एक साथी को दी कि उसे आग पर गरम कर लावे । आग वहां से कुछ दूर पर जलती थी ।

कुछ समय तक वह आग पर गरम करता रहा और पुड़िया लाकर वापस कर दी । नोट बनाने वाले ने पुड़िया खोल कर दोनों शीशों की दवा में धोया और फीते से शीशों को बांध कर रख दिया और कहा कि दो घण्टे में नोट बन जावेगा शीशे रख दिये । बातचीत होने लगी । कहने लगा । इस प्रयोग में बड़ा व्यय होता है ।

छोटे-छोटे नोट बनाने से कोई लाभ नहीं । बड़े नोट बनाना चाहिये । जिस में पर्याप्त धन की प्राप्ति हो । इस प्रकार मुझे भी सिखा देने का वचन दिया।  मुझे कुछ कार्य था । मैं जाने लगा तो वह भी चला गया । दो घंटे बाद आने का निश्चय हुआ । मैं विचारने लगा कि किस प्रकार एक नोट के उपर दूसरा सादा कागज रखने से नोट बन जावेगा । मैंने प्रेस का काम सीखा था । थोड़ी बहुत फोटोग्राफी भी जानता था । साइंस का भी अध्ययन किया था, कुछ समझ में न आया कि नोट सीधा कैसे छपेगा ।

सब से बड़ी बात यह थी कि नम्बर कैसे छपेंगे ? मुझे बड़ा भारी सन्देह हुआ । दो घंटे बाद मैं जब गया तो रिवाल्वर भर कर जेब में डाल ले गया । यथासमय वह महाशय आये । उन्होंने शीशे खोल कर कागज निकाल कर उन्हें फिर एक दवा में धोया । अब दोनों कागज खोले ।   अब दोनों कागज खोले गये । एक मेरा लाया हुआ नोट ओर दूसरा और एक दस रूपये का साफ नोट उसी के उपर से उतार कर सुखाया । कहा कितना साफ नोट है । मैंने हाथ में लेकर देखा ।

दोनों नोट के नम्बर मिलाये । नम्बर नितान्त भिन्न-भिन्न थे । मैंने जब से रिवाल्वर निकाल नोट बनाने वाले महाशय की छाती पर रख कर कहा, बदमाश !  इस तरह ठगता फिरता है ? वह डर से कांप कर गिर पड़ा ।  मैंने उसको उसकी मूर्खता समझाई कि यह ढ़ोंग ग्रामवासियों के सामने चल सकता है, अनजान पढ़े-लिखे भी धोखे में आ सकते हैं । किन्तु तू मुझे धोखा देने आया है ? अन्त में मैंने उससे प्रतिज्ञा पत्र लिखा कर,  और उसपर उस के हाथ की दसों अंगुलियों के निशान लगवाये कि वह ऐसा काम फिर न करेगा ।

दसों अंगुलियों के निशान देने से उस ने कुछ ढ़ील की । मैंने रिवाल्वर उठाया कि गोली चलती है, उसने तुरन्त दसों अंगुलियों के निशान बना दिये । बुरी तरह कांप रहा था । मेरे उन्नीस रूपये खर्च हो चुके थे । मैंने दोनों नोट रख लिये और शीशे दवायें इत्यादि सब छीन लीं कि मित्रों को तमाशा दिखाउंगा । तत्पश्चात उन महाशय को बिदा किया । उसने किया यह था कि जब अपने साथी को आग पर गरम करने के लिये कागज की पुड़िया दी थी, उसी समय उस साथी ने सादे कागज की पुड़िया बदल कर दूसरी पुड़िया ले आया जिस में दोनों नोट थे ।

इस प्रकार नोट बन गया । इस प्रकार का एक बड़ा भारी दल है जो सारे भारतवर्ष में ठगी का काम करके हजारों रूपये पैदा करता है । मैं एक सज्जन को जानता हूं जिन्होंने इस प्रकार पचास हजार से अधिक रूपये पैदा कर लिये । होता यह है कि ये लोग अपने एजेण्ट रखते है । वे एजेण्ट साधारण पुरूषों के पास जाकर नोट बनाने की कथा कहते हैं । आता धन किसे बुरा लगता है । वे नोट बनवाते हैं इस प्रकार पहले दस का नोट बना कर दिया, वह बाजार में बेंच आये ।

सौ रूपये का बना कर दिया । वह भी बाजार में चलाया और चल क्यों न जावे ? इस प्रकार के सब नोट असली होते है । वे तो केवल चाल से रख दिये जाते हैं । इसके बाद कहा कि हजार या पांच सौ का नोट लाओ जो कुछ धन भी मिले । जैसे तैसे कर के बेचारा एक हजार का नोट लाया । सादा कागज रख कर शीशे  में बांध दिया । हजार का नोट जेब में रखा और अपना रास्ता लिया ।

नोट के मालिक रास्ता देखते हैं, वहां नोट बनाने वालों का पता नहीं । अन्त में विवश हो शीशे  को खोला जाता है, तो दो सादे कागज के अलावा कुछ नहीं मिलता । वे अपने सिर पर हाथ मार कर रह जाते हैं । इस डर से कि यदि पुलिस को मालूम हो गया तो और लेने के देने पड़ेगे, किसी से कुछ कह भी नहीं सकते । कलेजा मसोस कर रह जाते हैं । पुलिस ने इस प्रकार के कुछ अभियुक्तों को गिरफतार भी किया, किन्तु ये लोग पुलिस को नियम पूर्वक चौथ देते हैं और इस कारण बचे रहते हैं ।  

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