जन्म जन्मान्तर परमात्मा ऐसी माता दें

जनवरी 18, 2009 को 11:27 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | 3 टिप्पणियाँ
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अबतक आपने पढ़ा..

वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि एक सौ रूपये से अधिक का दावा है, यह मुकद्दमा खारिज हो जावेगा । किन्तु मुझ पर कुछ प्रभाव न हुआ, मैंने हस्ताक्षर न  किये । अपने जीवन में सर्वप्रकारेण सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाता, सत्य-सत्य कह देता था । मेरी माता मेरे धर्म-कार्य में तथा शिक्षादि में बड़ी सहायता करती थी । वह प्रातःकाल चार बजे ही मुझे जगा दिया करती थीं। मैं नित्य प्रति नियम पूर्वक हवन भी किया करता । अब आगे पढ़ें…

मेरी छोटी बहिन का विवाह करने के निमित्त माता जी तथा पिताजी ग्वालियर गये । मैं तथा श्री दादी जी शाहज़हाँपुर में ही रह गये, क्योंकि मेरी वार्षिक परीक्षा थी । परीक्षा समाप्त करके मैं भी बहिन के विवाह में सम्मिलित होने को गया । बारात आ चुकी थी । मुझे ग्राम के बाहर ही मालूम हेा गया कि बारात में वेश्या आई है । मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ । मैंने विवाह में कोई भाग न लिया । मैंने माता जी से थोड़े रूपये मांगे ।

माता जी ने मुझे लगभग 125 दिये जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया । यह अवसर रिवाल्वर खरीदने का अच्छा हाथ लगा । मैंने सुन रखा था कि रियासत में बड़ी आसानी से हथियार मिल जाते हैं । बड़ी खोज की । टोपीदार बन्दूक तथा पिस्तौल तो मिलते थे किन्तु कारतूसी हथियारों का कहीं पता नहीं । बड़े प्रयत्न के बाद एक महाशय ने मुझे ठग लिया और रू० 75 में टोपीदार पांच फायर करने वाला एक रिवाल्वर दिया, रियासत की बनी हुए बारूद और थोड़ी सी टोपियां दे दीं । मैं इसी को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ । सीधा शाहज़हाँपुर पहुंचा । रिवाल्वर को भर कर चलाया तो गोली केवल पन्द्रह या बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न थी ।

मुझे बड़ा खेद हुआ । माताजी भी जब लौट कर शाहज़हाँपुर आईं तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या लाये ?  मैंने कुछ कह कर टाल दिया । रूपये सब खर्च हो गये । स्यात एक गिन्नी बच रही  थी, सो वह मैंने माताजी को लौटा दी ।

मुझे जब किसी बात के लिए धन की आवश्यकता होती, मैं माता जी से कहता और वह मेरी मांग पूरी कर देती । मेरा स्कूल घर से एक मील दूर था । मैंने माता जी से प्रार्थना की कि मुझे साइकिल ले दें ।  उन्होंने लगभग एक सौ रूपये दिये । मैंने साइकिल खरीद ली । उस मैं अंग्रेजी के नवें दर्जें में आ गया था । किसी धार्मिक या देश सम्बन्धी पुस्तक पढ़ने की इच्छा होती तो माता जी ही से दाम ले जाता । लखनउ कांग्रेस जाने के लिये मेरी बड़ी इच्छा थी । दादी जी तथा पिता जी बहुत कुछ विरोध करते रहे, किन्तु माता जी ने मुझे खर्च दे ही दिया ।

उसी समय शाहज़हाँपुर में सेवा समिति का आरम्भ हुआ था । मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था । पिता जी तथा दादी जी को मेरे इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे किन्तु माता जी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं जिसके कारण उन्हें बहुधा पिताजी का ताड़ना तथा दण्ड भी सहन करना पड़ता था । वास्तव में मेरी माता जी स्वर्गीय देवी है ।

मुझ में जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माता जी तथा गुरूदेव श्री सोमदेव की कृपाओं का ही परिणाम है । दादी जी तथा पिता जी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किन्तु माता जी यही कहती कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा । माता जी के प्रोत्साहन तथा सदव्यवहार ने मुरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा ।

मेरी मां
ग्यारह वर्ष की उम्र में माता जी का विवाह कर शाहज़हाँपुर आई थी । उस समय तक आप नितान्त अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के सदृश थीं । शाहज़हाँपुर अपने के थोड़े दिनों बाद श्री दादीजी ने अपनी छोटी बहिन को बुला लिया । उन्हीं ने गृह-कार्य में माता जी को शिक्षा दी । थोड़े ही दिनों में माता जी ने सब गृह कार्य को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबन्ध करने लगी ।

मेरे जन्म होने के पांच या सात वर्ष बाद आपने हिन्दी पढ़ना प्रारम्भ किया । पढ़ने का शौक आप को खुद ही पैदा हुआ था । मोहल्ले की संग सहेली जो घर पर आ जाती थीं, उन्हीं में से जो कोई शिक्षित थीं, माता जी उन से अक्षर बोध करती । इसी प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता उस में पढ़ना लिखना करती । परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वे देवनागरी पुस्तकों का अवलोकन करने लगीं । मेरी बहिनों को छोटी आयु में माता जी ही उन्हें शिक्षा दिया करती थी ।

जब से मैंने आर्य समाज में प्रवेश किया, तब से माता जी से खूब वार्तालाप होता उस समय की अपेक्षा अब आपके विचार भी कुछ उदार हो  गये हैं यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्य की भांति संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता । शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी आपने मेरी वह सहायता की है जो मेजिनी को उनकी माता ने की थी । यथा समय मैं उन सारी बातों का उल्लेख करूंगा । माता जी का सब से बड़ा आदेश मेरे लिये वही था कि किसी की प्राणहानि न हो । उन का कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदण्ड न देना । आपके इस आदेश की पूर्ति करने के लिये मजबूरन दो एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी ।

जन्मदात्री जननी, इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण परिशोध करने के प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला । इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूं तो तुम से उऋण नहीं हो सकता । जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुम ने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुम ने किस प्रकार अपनी दैवी वाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है । तुम्हारी दया से ही मैं देशसेवा में संलग्न हो सका ।

धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी । जो कुछ शिक्षा मैने ग्रहण किया उस का भी श्रेय तुम्हीं हो है । जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश दिया करती थीं उसका स्मरण कर तुम्हारी स्वर्गीय मूर्तिका ध्यान आ जाता है और मस्तक नत हो जाता है । तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई तो बड़े स्नेह से हर एक बात को समझा किया । यदि मैंने घृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुम ने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे वह करो, किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं इसका परिणाम अच्छा न होगा । जीवनदात्री, तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन पोषण ही नहीं किया किन्तु आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं । जन्म जन्मान्तर परमात्मा ऐसी ही माता दें । यही इच्छा है ।

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पिताजी का ग्राहस्थ और मेरा जन्म

जनवरी 13, 2009 को 10:51 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | 1 टिप्पणी
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अब तक आपने पढ़ा…

… दादी जी आदर्श माता थी, उन्होंने इस प्रकार के प्रलोभनों की किन्चित मात्र भी परवा न की और अपने बच्चों का किसी न किसी प्रकार पालन करती रहीं । मेहनत मजदूरी तथा ब्राम्हण वृत्ति द्वारा कुछ धन एकत्रित हुआ । कुछ महानुभावों के कहने से पिता जी के किसी पाठाशाला में शिक्षा पाने का प्रबन्ध कर दिया गया । श्री दादा जी ने भी कुछ प्रयत्न किया, उनका वेतन भी बढ़ गया और वे 7द्ध मासिक पाने लगे । इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़, पैसे तथा दुवन्नी, चवन्नी इत्यादि बेचने की दूकान की । पांच सात आने रोज पैदा होने लगे । जो दुर्दिन आये थे, प्रयत्न तथा साहस से दूर होने लगे । इसका सब श्रेय श्री दादी जी को ही है ।

अब आगे …

जिस साहस तथा धैर्य से उन्होंने काम लिया वह वास्तव में अशिक्षित ग्रामीण महिला की क्या सामर्थ्य है कि वह नितान्त अपरिचित स्थान में जा कर मेहनत मजदूरी करके अपना तथा अपने बच्चों का पेट पालन करते हुए उन को शिक्षित बनावे और फिर ऐसी परिस्थियों में जब कि उसने कभी अपने जीवन में घर से बाहर पैर न रखा हो ओर जो ऐसे कट्टर देश की रहने वाली हो कि जहां पर प्रत्येक हिन्दू प्रथा का पूर्णतया पालन किया जाता हो । जहां के निवासी अपनी प्रथाओं की रक्षा के लिये प्राणों की किन्चित मात्र भी चिन्ता नहीं करते हों । किसी ब्राम्हण, क्षत्री या वैश्य की कुल वधू का क्या साहस जो डेढ़ हाथ का घूंघट निकाले बिना एक घर से दूसरे घर चली जावें ।

शूद्र जाति की वधूओं के लिये भी यही नियम है कि वे रास्तें में बिना घूंघट निकाले न जावें । शूद्रों का पहनावा ही अलग है, ताकि उन्हें देख कर सही दूर से पहिचान लिया जावे कि यह किसी नीच जाति की स्त्री है । ये प्रथायें इतनी प्रचलित है कि उन्होंने अत्याचार का रूप धारण कर लिया है । एक समय किसी चमार वधू जो अंग्रेजी राज्य से विवाह करके के गई थी, कुल प्रथानुसार जमींदार के घर में पैर छूने के लिये गई । वह पैर में बिछवे नूपुर पहने हुई थी और सब पहनावा चमारों का पहने थी ।  जमींदार महोदय की निगाह उस के पैरों पर पड़ी । पूछने पर मालूम हुआ कि चमार की बहू है । जमींदार साहब जूता पहन कर आये और उस के पैरों पर खड़े हो कर इस जोर से दबाया कि उसकी उंगलियां कट गईं । उन्होंने कहा कि यदि चमारों की बहुयें बिछुवी पहनेंगी तो उंची जाति के घर की स्त्रियां क्या पहनेगी ?  नितान्त अशिक्षित तथा मूर्ख है, किन्तु जाति अभिमान में चूर रहा करते  हैं । गरीब से गरीब अशिक्षित ब्राम्हण या क्षत्रिय चाहे वह किसी आयु का हो यदि  शूद्र जाति की बस्ती से गुजरे तो चाहे कितना ही धनी या वृद्ध कोई  शूद्र क्यों न हो उस को उठ कर पालागन या जुहार करनी ही पड़ेगी । यदि ऐसा न करें तो उसी समय वह ब्राम्हण या क्षत्रीय उसे जूतों से मार सकता है और सब उस शूद्र का ही दोष बता कर उसका तिरस्कार करेंगे ।

यदि किसी कन्या या बहू पर व्यभिचारिणी होने का सन्देह किया जावे तो उसे बिना किसी विचार के मार चम्बल में प्रवाहित कर दिया जाता है । इसी प्रकार यदि किसी विधवा पर व्यभिचार या किसी प्रकार आचरण भ्रष्ट होने का दो्ष लगाया जावें तो चाहे वह गर्भवती ही क्यों न हो उसे तुरन्त ही काट कर चम्बल में पहुंचा दें और किसी को कानों कान भी खबर न होने दें । वहां के मनुष्य भी सदाचारी होते हैं वे सब की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझते हैं । स्त्रियों की मान मर्यादा की रक्षा के लिये प्राण देने में कोई चिन्ता नहीं करते । इस प्रकार के देश में विवाहित हो कर सब प्रकार की प्रथाओं को देखते हुए भी इतना साहस करना यह दादी जी का ही काम था ।

परमात्मा की दया से दुर्दिन समाप्त हुए । पिताजी कुछ शिक्षा पा गये और एक मकान भी श्री दादाजी ने खरीद लिया । दरवाजे-दरवाजे भटकने वाले कुटुम्ब को शान्ति पूर्वक बैठने का स्थान मिल गया और फिर श्री पिताजी के विवाह करने का विचार हुआ । दादी जी, दादाजी तथा पिता जी के साथ अपने मायके गयी । वहीं पिता जी का विवाह कर दिया । वहां दो चार मास रहकर सब लोग वधू को विदा कराके साथ लिवा लाये ।

विवाह हो जाने के पश्चात पिताजी म्यूनिसिपैलिटी में 15 रू० मासिक वेतन पर नौकर हो गये । उन्होंने कोई बड़ी शिक्षा प्राप्त न की थी । पिताजी को यह नौकरी पसन्द न आई । उन्होंने एक दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर स्वतन्त्र व्यवसाय आरम्भ करने का प्रयत्न किया और कचहरी में सरकारी स्टाम्प बेचने लगे । आप के जीवन का अधिक भाग इसी व्यवसाय में व्यतीत हुआ । साधारण श्रेणी का गृहस्थ बन कर उन्होंने इसी व्यवसाय द्वारा अपनी सन्तानों की शिक्षा दी, अपने कुटुम्ब का पालन किया और अपने मुहल्ले के गण्यमान्य व्यक्तियों में गिने जाने लगे । आप रूपये का लेन-देन भी करते थे । आपने तीन बैल गाड़ियां भी बनाई थी जो किराये पर चला करती थीं । पिता जी का व्यायाम से प्रेम था आप का शरीर बड़ा सुदृढ़ और सुडौल था । आप नियम पूर्वक अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे ।

पिता जी के गृह में एक पुत्र उत्पन्न हुआ, किन्तु वह मर गया । उसके एक साल बाद इस शहीदाने वतन लेखक राम प्रसाद ने श्री पिताजी के गृह में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 11 सम्वत् 1954 विक्रमी को जन्म लिया । बड़े प्रयत्नों से मानता मान कर अनेकों गंडे ताबीज तथा कवचों द्वारा श्री दादी जी ने इस शरीर की रक्षा का प्रयत्न किया । स्यात् बालकों का रोग गृह में प्रवेश कर गया था । अतएव जन्म लेने के एक या दो मास पश्चात ही मेरे शरीर की अवस्था भी पहले बालक वैसी होने लगी थी । किसी ने बताया कि सफेद खरगोश को मेरे शरीर पर से घुमा कर जमीन पर छोड़ दिया जावे, यदि बीमारी होगी तो खरगोश तुरन्त मर जावेगा । कहते हैं कि हुआ भी ऐसा ही । एक सफ़ेद खरगो्श मेरे् शरीर पर से उतार कर जैसे ही जमींन पर छोड़ा गया, वैसे ही उसने तीन चार चक्कर काटे और मर गया । मेरे विचार में किसी अंश में यह सम्भव भी है क्योंकि ऎसी जानकारी है ..

.. कि  औ्षधि तीन प्रकार की होती है  1- दैविक, 2- मानुषिक, 3- पैशाचिक पैशाचिक औषधियों में अनेक प्रकार के पशु या पक्षियों के मांस अथवा रूधिर का व्यवहार होता है, जिन का उपयोग वैद्यक के ग्रन्थों में पाया जाता है । इनमें से एक प्रयोग बड़ा ही कौतुहलोत्पादक तथा आश्चर्यजनक है  कि जिस बच्चे को जमोखे सूखा की बीमारी हो गई हो यदि उसके सामने चिमगादड़ को चीर कर के लाया जावे तो एक दो मास का बालक चिमगादड़ को पकड़ कर के उसका खून चूस लेगा और बीमारी जाती रहेगी । यह बड़ी उपयोगी औषधि है और एक महात्मा की बतलाई हुई है ।

 

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