अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही

जून 4, 2009 को 1:02 पूर्वाह्न | Posted in आत्मकथा, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना | 3 टिप्पणियाँ
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अब विचारने की बात यह कि भारतवर्षमें क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ?

 गत पृष्ठों में मैंने अपने अनुभवों का उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों को उदर-पूर्ति तक के लिये कितना कष्ट उठाना पड़ा । प्राण-पण से चेष्टा करने पर भी असहयोग आन्दोलन के पश्चात कुछ थोड़े से ही गिने चुने युवक सँयुक्त प्रान्त में ऐसे मिल सके, जो क्रान्तिकारी आन्दोलन का समर्थन करके सहायता लेने को उद्यत हुये । इन गिने चुने व्यक्तियों में भी हार्दिक सहानुभूति रखने वाले, अपने जान पर खेल जाने वाले कितने थे उस का कथन ही क्या है ?

कैसी बड़ी-बड़ी आशायें बंधा कर इन व्यक्तियों को क्रान्तिकारी समिति का सदस्य बनाया गया था, और इस अवस्था में, जब कि असहयोगियों ने सरकार की ओर से घृणा उत्पन्न कराने में कोई कसर न छोड़ी थी, खुले रूप में राज्यद्रोही बातों का पूर्ण प्रचार किया गया था । इस पर भी बोलशेविक सहायता की आशायें बंधा-बंधा कर तथा क्रान्तिकारियों के उंचे-उंचे आदर्शों तथा बलिदानों का उदाहरण दे देकर प्रोत्साहन किया जाता था ।

नवयुवकों के हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति बड़ा प्रेम तथा श्रद्धा होती है । उनकी अस्त्र शस्त्र रखने की स्वाभाविक इच्छा तथा रिवाल्वर या पिस्तौल से प्राकृतिक प्रेम उन्हें क्रान्तिकारी दल से सहानुभूति उत्पन्न करा देता है । मैंने अपने क्रान्तिकारी जीवन में एक भी युवक ऐसा न देखा जो एक रिवाल्वर या पिस्तौल पास रखने की इच्छा न रखता हो । जिस समय उन्हें रिवाल्वर के दर्शन होते हैं,वे समझते हैं कि इष्टदेव के दर्शन प्राप्त हुये आधा जीवन सफल हो गया । उसी समय वे समझते हैं कि क्रान्तिकारी दल के पास इस प्रकार के सहस्त्रों अस्त्र होंगे, तभी तो यह इतनी  बड़ी सरकार से युद्ध करने का प्रयत्न कर रहे हैं । वह सोचते हैं कि धन की भी कोई कमी न होगी ।

अब क्या, अब तो समिति के व्यय से दॆश भ्रमण का अवसर भी प्राप्त होगा, बड़े-बड़े त्यागी महात्माओं के दर्शन होंगे सरकारी गुप्तचर विभाग का भी हाल मालूम हो सकेगा, सरकार द्वारा जब्त किताबें कुछ तो पहले ही पढ़ा दी जाती है, रही सही की आशा रहती है कि बड़ा उच्च साहित्य भी देखने को मिलेगा, जो यों कभी प्राप्त नहीं हो सकता । साथ ही साथ ख्याल होता है कि क्रान्तिकारियों ने दॆश के राजा महाराजाओं को तो अपने पक्ष में कर ही लिया होगा । अब क्या थोड़े दिन की ही कसर है फिर तो लौट दिया सरकार का राज्य ! बम बनाना सीख ही जायेंगे । अमर बूटी प्राप्त हो जावेगी, इत्यादि । परन्तु जैसे ही एक युवक क्रान्तिकारी दल का सदस्य बन कर हार्दिक प्रेम से समिति के कार्यों में योग देता है, थोड़े दिनों में ही उसे विशेष सदस्य होने के अधिकार प्राप्त होते है, वह ऐक्टिव मेम्बर बनता है, उसे संस्था का कुछ असली भेद मालूम होता है,तब समझ में आता है कि कैसे भीषण कार्य में उसने हस्तक्षेप किया है । फिर तो वही द्शा हो जाती है, जो नकटा-पथ के सदस्यों की थी ।

जब चारों ओर से असफलता तथा अविश्वास की घटायें दिखाई देती है, तब यही विचार होता है कि ऐसे दुर्गम पथ में ये परिणाम तो होते ही हैं । दूसरे दॆश के क्रान्तिकारियों के मार्ग में भी ऐसी ही बाधायें उपस्थित हुई होंगी । वीर वही कहलाता है, जो अपने लक्ष्य सो नहीं छोड़ता, इसी प्रकार की बातों से मन को शान्त किया जाता है । भारत के जन साधारण की तो कोई बात ही नही , अधिकांश शिक्षित समुदाय भी यह नहीं जानता कि क्रान्तिकारी दल क्या पदार्थ है । फिर उन से सहानुभूति कौन रक्खे ? अतएव बिना  दॆशवासियों  की  सहानुभूति  के  अथवा  जनता  की  आवाज  के  साथ  नहीं  होने  से सरकार  भी किसी बात की कुछ चिन्ता नहीं करती । दो चार पढ़े लिखे एक दो अंग्रेजी अखबार में दबे हुये शब्दों में यदि दो एक लेख लिख दे, तो वे अरण्य रोदन के समान कुछ भी प्रभाव नहीं रखते ! उन की ध्वनि व्यर्थ में ही आकाश में विलीन हो जाती है ।

तमाम बातों को देख कर अब तो मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही । भागने की मुझे सुविधायें थी । गिरफतारी से पहले ही मुझे अपने गिरफतारी का पूरा पता चल गया था । गिरफतारी के पूर्व भी यदि इच्छा करता तो पुलिस वालों को मेरी हवा भी न मिलती, किन्तु मुझे अपने शक्ति की परीक्षा करनी थी । गिरफतारी के बाद सड़क पर आध घण्टे तक बिना किसी बन्धन के घूमता रहा । पुलिस वाले शान्ति पूर्वक बैठे हुये थे । जब पुलिस कोतवाली में पहुंचा, दो पहर के समय पुलिस कोतवाली ने दफ़्तर में बिना किसी बन्धन के खुला हुआ बैठा था । केवल एक सिपाही निगरानी के लिये पास बैठा हुआ था, जो रात भर का जगा था । सब पुलिस अफसर भी रात भर के जगे थे, क्योंकि गिरफ़्तारियों में लगे रहे थे । सब आराम करने चले गये थे । निगरानी वाला सिपाही भी घोर निद्रा में सो गया । दफतर में केवल एक मुन्शी लिखा पढ़ी कर रहे थे ।

वह श्रीयुत रोशनसिंह अभियुक्त के फूफीजात भाई थे । यदि मैं चाहता तो धीरे से उठ कर चल देता । पर मैं ने विचारा कि मुन्शी जी महाशय बुरे फसेंगे । मैंने मुन्शी जी को बुला कर कहा कि यदि भावी आपत्ति के लिये तैयार हो तो मैं जाउं । वे  मुझे  पहले  से  जानते  थे, पैरों पड़ गये कि गिरफ़्तार हो जाउंगा, बाल-बच्चे भूखों मर जावेंगे । मुझे दया आ गई । एक घण्टा बाद श्री अशफाकउल्ला खां के मकान की तलाशी ले कर पुलिस वाले लौटे । श्री अशफाकउल्ला खां  भाई  के  कारतूसी  बन्दूक  और कारतूसों  से  भरी  हुई  पेटी लाकर उन्हीं मुन्शीजी के पास रख दी गई, और मैं पास ही कुर्सी पर खुला हुआ बैठा था । केवल एक सिपाही खाली हाथ पास में खड़ा था । इच्छा हुई कि बन्दूक उठा कर कारतूसों की पेटी गले में डाल लूं फिर कौन सामने आयेगा । पर फिर सोचा कि मुन्शी जी पर आपत्ति आवेगी, विश्वासघात करना ठीक नहीं । उसी समय खुफिया पुलिस के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट सामने छत पर आये 

उन्होंने देखा कि मेरे एक ओर कारतूस तथा बन्दूक पड़ी है, उधर दूसरी ओर श्रीयुत प्रेमकृष्ण का माउजर पिस्तौल तथा कारतूस रखे है, क्योंकि यह सब चीजें मुन्शी जी के पास आ कर जमा होती थी । मैं बिना किसी बन्धन के बीच में खुला हुआ बैठा हूं । डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट को तुरन्त सन्देह हुआ,उन्होंने तत्काल ही  बन्दूक  पिस्तौल वहां से हटवा कर मालखाने में बन्द करा दिये । सायंकाल को पुलिस की हवालात में बन्द किया गया । निश्चित किया कि अब भाग चलूं । पाखाने के बहाने से बाहर निकाला गया । एक सिपाली कोतवाली से बाहर दूसरे स्थान में शौच के निमित्त लिवा गया । दूसरे सिपाहियों ने उससे बहुत कुछ कहा कि रस्सी डाल लो । उस ने कहा मुझे विश्वास है यह भागेंगे नहीं ।  

सेशन कोर्ट का फैसला

जनवरी 12, 2009 को 1:17 पूर्वाह्न | Posted in काकोरी के शहीद, काकोरी षड़यंत्र, वन्दे मातरम, सरफ़रोशी की तमन्ना | 1 टिप्पणी
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अब तक आपने पढ़ा…

उस दिन के सवाल जवाब में यह भी मालूम हुआ कि काकोरी के मामले में सरकार दो लाख रूपये खर्च कर चुकी है । प्रान्त के कार्यकर्ताओं के पास यही एक अन्तिम अस्त्र था, जिससे वे काकोरी के अभियुक्तों के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते थे । किन्तु गवर्नर साहब की स्वेच्छाचारिता के कारण वह अस्त्र भी निष्फल हुआ। अनशन तो किसी प्रकार टूट गया, मगर विशेष अधिकार उन्हें अभी तक नसीब न हुये । पराधीन देश के पराधीन निवासियों के लिये जो कुछ हो जाय थोड़ा है । सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करने का निश्चय किया .. .. 

अब आगे..

सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करना निश्चय किया । इस निश्चय के अनुसार श्री बनवारी लाल, श्री भूपेन्द्रनाथ सन्याल और श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल  के अलावा अन्य अभियुक्त ने सेशन जज के फैसले के खिलाफ अपील दायर की । उधर सरकार की ओर से सजा बढ़ाने के लिए लिखा पढ़ी की गई । दोनों मामले साथ-साथ चीफ कोट में चीफ जस्टिस सर लुई स्टुवर्ट और जस्टिस मोहम्मद रजा के सामने पेश हुये । 18 जुलाई को अपील प्रारम्भ हुई । सरकार ने अपनी पैरवी के लिये तो यहाँ भी पं0 जगतनारायण को बुलाया किन्तु फांसी की सजा पाये हुये अभियुक्त श्री रामप्रसाद, श्री राजेन्द्र और श्री रोशन सिंह के मामले की पैरवी के लिए क्रमश: श्री लक्ष्मी शंकर मिश्र, श्री एच0 सी0 दत्त ओर श्री जयकरण नाथ मिश्र को नियुक्त किया । अभियुक्त चाहते थे कि उनके लिये किसी अच्छी वकील का प्रबन्ध किया जाय । उन्होंने अपना यह विचार  प्रकट भी किया किन्तु सुनता कौन है ?

उन्हें सख्त सजा दिलाने के लिये तो सरकार ने दो लाख रूपये खर्च कर दिये और इस अपील में और भी खर्च करने को तैयार हुई, किन्तु उन फांसी पर लटकने वालों के लिये उसने थोड़ी सी रकम भी खरचना मन्जूर नहीं किया । दिखावे के लिये एक बड़े वकील से, जिसे अभियुक्त चाहते थे, कुछ बात-चीत भी की गई किन्तु मेहनताना इतना कम दिया जा रहा था कि उन सज्जन को साफ-साफ शब्दों में सरकारी आदमी से यह कहना पड़ा कि तुम काकोरी के कैदियों के साथ किसी किस्म का सलूक करना नहीं चाहते, किन्तु चाहते यह भी हो कि बदनामी भी न हो । अभियुक्त पं. रामप्रसाद ने पं0 लक्ष्मीशंकर मिश्र की मारफत अपने मामले की पैरवी कराने से इनकार कर दिया । उन्होंने कहा कि या तो कोई अच्छा वकील नियुक्त किया जाये या मुझे स्वयं पैरवी करने दिया जाये । किन्तु चीफ कोर्ट का हुक्म हुआ कि दो में से एक भी न मानी जायेगी और पं0 लक्ष्मीशंकर ही मामले की पैरवी करेंगे, यह भी सरकारी रिआयत है जो वह अपने खर्च से उनके लिये वकील दे रही है । गरज यह कि जिस प्रकार सरकार ने चाहा, उसी प्रकार अपील की सुनवाई हुई । दौरान अपील में अभियुक्त श्री प्रणवेश चैटर्जी के भाई ने अपने भाई की ओर से एक दरख्वास्त दी जिसमें बहुत से अपराध स्वीकार कर लिये ओर अपील वापिस लेते हुये अपनी गलतियों पर अफसोस किया और मामला चीफ कोर्ट के हाथों में दीन भाव से सौंप दिया । इस अपील की सुनवाई 2 अगस्त को खतम हो गई । किन्तु फैसला उस दिन नहीं सुनाया गया ।

इसी बीच में श्री अशफाकउल्ला खां की अपील की भी सुनवाई हुई ।  श्रीशचीन्द्रनाथ बख्षी ने अपील नहीं की थीं 12 अगस्त को सबका फैसला एक साथ ही सुना दिया गया । इसमें सेशन जज द्वारा दी गई सजाओं में परिवर्तन किया गया । श्री रामप्रसाद, श्री राजेन्द्र लहरी, श्री रोशनसिंह और श्री अशफाकउल्ला की फांसी की सजायें कायम रहीं । श्री जोगेश चटर्जी, श्री गोविंद चरणकार, श्री मुन्दीलाल की सजाएं बढ़ाकर दस-दस वर्ष की कैद से आजन्म कालापानी की कर दी गईं । श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य और श्री विष्णुशरण दुबलिस की सजाएं सात-सात वर्ष से बढ़ाकर दस-दस वर्ष की कर कर दी गईं । श्री रामनाथ पाण्डेय की सजा घटा कर 5 वर्ष से 3 वर्ष कर दी गई और श्री प्रणवेश की सजा घटा कर 5 वर्ष से 4 वर्ष की गई । शेष अभियुक्तों की सजाएं पूर्ववत् ही बनी रहीं ।

इस फैसले से प्रान्त के कार्यकर्ताओं में और भी असंतोष और रोष हुआ । ठा० मनजीत सिंह एम० एल० सी० ने कौंसिल के आगामी अधिवेशन में इस आशय का प्रस्ताव पेश करने की सूचना दी कि फ़ाँसी की सजा पाये हुए लोगों की सजाएं कम करके आजन्म काले पानी की सजाएं कर दी जायें । फांसी 16 सितम्बर को हाने वाली थी इस बीच में कौंसिल का अधिवेशन नहीं हो रहा था । यह आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो कि कौंसिल में प्रस्ताव पे्श करने के पहिले ही इनको फांसी  पर टांग दिया जायेगा ।  इसलिए ठाकुर मनजीतसिंह ने एसेम्बली के सदस्यों को भी एक पत्र लिखा, जिसमें सजा घटवाने का उद्योग करने की प्रार्थना की और यह भी कहा कि आगामी बैठक तक उन की फांसी रूक जाये, ताकि मैं अपना प्रस्ताव कौंसिल में पेश कर सकूं । एक ओर तो यह उद्योग किया गया और दूसरी ओर प्रान्तीय कौंसिल के मेम्बरों ने गवर्नर साहब के पास एक आवेदन-पत्र भेज कर फांसी पाये अभियुक्तों पर, उनकी युवावस्था के नाम पर, दया दिखाने की प्रार्थना की । गवर्नर साहब का शासनकाल समाप्त हो चुका था । वे शीघ्र ही जाने वाले थे । इसलिए मेम्बरों को आस थी कि शायद वे चलते-चलते इतना सलूक कर जायें । किन्तु उनकी सब आशायें दुराशा मात्र साबित हुईं और गवर्नर महोदय ने दया प्रार्थना अस्वीकार कर दी । इस प्रकार की एक दया-प्रार्थना एसेम्बली और स्टेट कौंसिल के सदस्यों ने वायसराय से भी की थी किन्तु उन्होंने भी इसी निर्दयता के साथ उसे अस्वीकार कर दिया । हां, इस लिखा पढ़ी में इतना जरूर हुआ कि फांसी की पहिली तिथि 16 सितम्बर टल गई और उस दिन अभिुक्तों को फांसी नहीं हुई ।

इसके बाद फांसी देने के लिये 11 अक्टूबर की तारीख नियत की गई । अभियुक्तों ने सरकार के मनोभाव जान ही लिये थे, इस लिये यहां से कुछ होता न देख उन्होंने प्रीवी-कौसिंल में अपने मामले की अपील करने का विचार किया। उन्होंने अपना यह विचार सरकार पर प्रकट किया और इसलिये उन्हें अपील का मौका देने के लिए फांसी की दूसरी तारीख भी टल गई । अंग्रेजी सल्तनत में न्याय कितना महंगा पड़ता है, यह किसी से छिपा नही । इतने ही मामले में अभियुक्त बहुत बड़ी आर्थिक हानि उठा चुके थे । घर के लोग सगे-सम्बन्धी सब परेशान हो  गए थे । फिर भी इस आशा से कि शायद वहां न्याय हो, इन्होंने लम्बा खर्च बर्दाश्त करके भी अपील करने का ही निश्चय किया । येन-केन प्रकारेण धन का प्रबन्ध कर के श्री पोलक महाशय को, जो इंग्लैण्ड में थे, मामले के काग़जा़त सौंपे गए । वहां पर एक बैरिस्टर की मारफत यह अपील प्रीवी-कौंसिल में दायर की गई, किन्तु प्रीवी-कौंसिल के न्यायधीशों ने इसे इस योग्य भी न समझा कि इसकी सुनवाई की जाये । उन्होंने उस पर विचार करना अस्वीकार कर दिया । 29 अक्टूबर को प्रान्तीय कौंसिल में भी काकोरी के कैदियों का प्रश्न आया ।

पं०  गोविन्द बल्लभपन्त ने सरकार को खूब आड़े हाथों लिया । बहुत देर तक प्रश्नोत्तर होते रहे । किन्तु बेहया सरकारर टस से मस नहीं हुई । अब सारा खेल खतम हो चुका था । अपीलें की जा चुकी थी, कौंसिल में प्रश्न छेड़े जा चुके थे । गवर्नर से दया-प्रार्थना की जा चुकी थी, वायसराय से भी सजा घटाने की प्रार्थना की जा चुकी थी, सम्राट के पास भी प्रार्थना पत्र भेजे जा चुके थे, जो उपाय शक्ति के अन्दर थे, वे सब किये जा चुके थे । किन्तु सभी जगह केवल शून्य ही हाथ आया । 19 दिसम्बर को अभियुक्तों को फांसी पर लटका देना निश्चय हो गया । प्रान्त भर में बड़ी बेचैनी पैदा हो गई  ।       17 दिसम्बर को प्रान्तीय कौंसिल में पं. गोविन्दबल्लभ पन्त ने इस मामले को फिर उठाया । उन्होंने प्रेसीडेण्ट से प्रार्थना की कि सब काम बन्द करके इस मामले पर विचार किया जाये । पहिले प्रसिडेण्ट महाशय इस प्रार्थना को अस्वीकार किये देते थे, किन्तु तीन बजे के करीब जब मेम्बरों ने उन से फिर प्रार्थना की, तब वे राजी हुए, किन्तु उस दिन तीन बजे के कुछ बाद ही सरकारी काम समाप्त हो जाने पर डिप्टी प्रसिडेण्ट ने, जो उस समय प्रसिडेण्ट का काम कर रहे थे, कौंसिल की बैठक सोमवार तक लिए स्थगित कर दी । सोमवार को सबेरे ही फांसी का समय था । इस लिए मेम्बरों में बड़ी खलबली मच गई । उन्होंने होम मेम्बर नवाब साहब छतारी तक के दरे-दौलत की ख़ाक छानी, किन्तु कोई सुनवाई न हुई और प्रान्तीय कौंसिल में, एक शब्द कहने का मौक़ा दिये बिना ही प्रान्त के चार होनकार नवयुवक फांसी के तख्ते पर टांग दिये गये !

अन्त में सोमवार 19 दिसम्बर 1927 के हत्यारे दिन ने अपना मुंह दिखायां श्री राजेन्द्र लहरी अपने साथियों से दो दिन पहिले ही-17 दिसम्बर को ही अपने अमूल्य प्राण-दान से गोंडा के रक्त-पिपासु फांसी के तख्ते की तृष्णा बुझा चुके थे । 19 दिसम्बर को शेष तीनों वीरों ने भी मातृ-मंदिर की बलिवेदी पर अपने-अपने बहुमूल्य शीश चढ़ा दिये । सब में एक अवर्णनीय गम्भीरता थी । जननी-जन्मभूमि के वक्ष का स्तनपान करने की उन में अलौकिक उत्सुकता थी, अपनी इस उत्सुकता में उन्होंने एक दिन पहिले ही से बाहर का दूध पीना छोड़ दिया था । उनमें मृत्यु का भय नहीं था ।

साधारण लोगों की भांति वे बेहोशी की अवस्था में, घसीट कर फांसी के तख्ते पर नहीं लाये गये थे । वे अपने आप ही तैयारी कर रहे थे । प्रातःकाल होते ही वे अपनी अनन्त यात्रा के उद्योग में लग गये थे और मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे ।

मुहूर्त की सूचना मिलते ही मुस्काराये और गम्भीर स्वर में वन्दे-मातरम और भारतमाता की जयघोष किया और फिर हंसते खेलते उस भयानक प्रेताकार फांसी के तख्ते पर चढ़ गये ।

थोड़ी ही देर में उनका शरीर उस फन्दे में झूलने लगा और स्वयं के साथ उनकी पवित्र प्राणवायु उनकी प्राणप्रिय भारतमाता की वायु से मिल गयी । थोड़ी देर बार उनके स्थूल शरीर भी भारतमाता की छाती पर लेटते हुये पाये गयें चारों ओर शान्ति छा गई

इस प्रकार इन वीरात्माओं की जीवन-यज्ञ की पूर्णाहुति समाप्त हुई । देष भर में शोक और विषाद की लहर फैल गई । सबों ने अपनी-अपनी श्रद्धांजलि चढ़ा  कर उनका तर्पण किया और माता के वह पागल पुजारी अपनी जीवन लीला समाप्त कर अनन्त की गोद में विलीन हो गये । फांसी के दिवस समस्त देश भर में बड़ा शोक मनाया गया । लोगों ने व्रत रखें और शोक तथा सहानुभूति सूचक सभायें हुईं । कहीं-कहीं विद्यालयों और कालेजों के छात्रों ने भी व्रत रखें । दिल्ली के इस्लामी स्कूल के सभी छात्र तथा शिक्षकों ने व्रत रख कर दुख प्रकट किया । देश भर में सरकार के इस कृत्य की आज निन्दा हो रही थी, सभी शोकातुर थे । बड़ा अन्धकारमय दिन था !

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