चालबाजार

फ़रवरी 5, 2009 को 9:30 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-3, सरफ़रोशी की तमन्ना | 1 टिप्पणी
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नोट बनाने के प्रयोगों के बाद… कई महानुभावों ने गुप्त समिति के नियमादि बना कर मुझे दिखायें । उन में एक नियम यह भी था कि जो व्यक्ति समिति का कार्य करें, उन्हें समिति की ओर से कुछ मासिक दिया जावे । मैंने इस नियम को अनिवार्य रूप में मानना अस्वीकार किया । मैं यहां तक सहमत था कि जो व्यक्ति सर्वप्रकारेण समिति के कार्य में अपना समय व्यतीत करें, उनको केवल गुजारा मात्र समिति की ओर से दिया जा सकता है क्योंकि जो लोग किसी व्यवसाय को करते हैं,  उन्हें किसी प्रकार का मासिक देना उचित  प्रतीत न होता  था ।

जिन्हें समिति के कोष में से कुछ दिया जावे, उन को भी कुछ व्यवसाय करने का प्रबन्ध करना उचित है, ताकि वह लोग सर्वथा समिति की सहायता पर निर्भर रह कर निरे भाड़े के टट्टू न बन जावें । भाड़े के टट्टुओं से समिति का कार्य लेना, जिस में कतिपय मनुष्यों के प्राणों का उत्तरदायित्व हो और थोड़ा सा भेद खुलने से ही बड़ा भयंकर परिणाम हो सकता है, उचित नहीं हैं तत्पश्चात उन महानुभावों की सम्मति हुई कि एक नि्श्चित को्ष समिति के सदस्यों के देने के निमित्त स्थापित किया जावे । जिसकी आय का ब्यौरा इस प्रकार हो कि

डकैतियों से जितना धन प्राप्त हो उसका आधा समिति के कार्यों मे व्यय किया जावे और आधा समिति के सदस्यों को बराबर बांट दिया जावें इस प्रकार के परामर्श से मैं सहमत न हो सका । और मैने इस प्रकार की गुप्त समिति में, कि जिस का एक उद्देश्य पेट-पूर्ति हो योग देने से इनकार कर दिया । जब मेरी इस प्रकार की दृष्टि देखी तो उन महानुभावों ने आपस में षड़यन्त्र रचा । जब मैंने उन महानुभावों के परामर्श तथा नियमादि को स्वीकार न किया तो वे चुप हो गये । मैं भी कुछ समझ न सका कि जो लोग मुझमें इतनी श्रद्धा रखते थे, जिन्होंने कई प्रकार की आशायें बांध कर मुझ से क्रान्तिकारी दल का पुर्नसंगठन करने की प्रार्थनायें की थीं, अनेकों प्रकार की आशायें बंधाई थी, सब कार्य स्वयं करने के वचन दिये थे, वे लोग ही मुझ पर इस प्रकार के नियम बनाने की सम्मति मांगने लगे ।

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । प्रथम प्रयत्न में जिस समय मैनपुरी षड़यन्त्र के सदस्यों के सहित कार्य करता था उस समय हम में से कोई भी अपने व्यक्तिगत प्राइवेट खर्च में समिति का धन व्यय करना पूर्ण पाप समझता था । जहां तक हो सकता अपने खर्च में से माता पिता से कुछ लाकर प्रत्येक सदस्य समिति के कार्यों में धन व्यय किया करता था । इस कारण मेरा साहस इस प्रकार के नियमों में सहमत होने को न हो सका । मैंने विचार किया कि यदि कोई समय आया, और किसी प्रकार अधिक धन प्राप्त हुआ, तो कुछ ऐसे स्वार्थी सदस्य हो सकते हैं, जो अधिक धन लेने की इच्छा करें, और आपस में वैमनस्य बढ़े ।

परिणाम बड़़े भयंकर हो सकते है । अतः इस प्रकार के कार्य में योग देना मैंने उचित न समझा । मेरी यह अवस्था देख इन लोगों ने आपस में षड़यन्त्र रचा, कि जिस प्रकार मैं कहूं वे नियम स्वीकार कर लें और विश्वास दिला कर जितने अस्त्र-शस्त्र मेरे पास थे, उनको मुझसे लेकर सब पर अपना आधिपत्य जमा लें । यदि मैं अस्त्र-शस्त्र मांगू तो मुझसे युद्ध किया जावे,  और आ पड़े तो मुझे कहीं ले जाकर जान से मार दिया जावे ।

तीन सज्जनों ने इस प्रकार का षड़यन्त्र रचा और मुझ से चालबाजी करनी चाही । दैवात् उन में से एक सदस्य के मन में कुछ दया आई । उसने आकर मुझसे सब भेद कह दिया । मुझे सुन कर बड़ा खेद हुआ कि जिन व्यक्तियों को मैं पिता तुल्य मान कर श्रद्धा करता हूं, वे ही मेरे नाश करने का इस प्रकार नीचता का कार्य करने को उद्यत है । मैं संभल गया । मैं उन लोगों से सतर्क रहने लगा कि पुनः प्रयाग की सी घटना न घटे ।

जिन महाशय ने मुझसे भेद कहा था, उन की उत्कट इच्छा थी कि वे एक रिवाल्वर रखें और इस इच्छा पूर्ति के लिये उन्होंने मेरा विश्वासपात्र बनने के कारण मुझसे भेद कहा । मुझसे एक रिवाल्वर मांगा कि मैं उन्हें कुछ समय के लिये रिवाल्वर दूं । यदि मैं उन्हें रिवाल्वर दे दूं तो वह उसे हजम कर जावें । मैं कर ही क्या सकता था । और अब रिवाल्वर इत्यादि पाना कोई सरल कार्य न था । बाद को बड़ी कठिनता से इन चालबाजियों से अपना पीछा छुड़ाया ।

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पुर्नसंगठन

फ़रवरी 3, 2009 को 1:04 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-3, सरफ़रोशी की तमन्ना | टिप्पणी करे
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पिछली बार.. अनुभवहीनता से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ी । कोई पथ प्रदर्शक तथा सहायक नहीं, जिस से परामर्श करता । व्यर्थ के उद्योग धन्धों तथा स्वतन्त्र कार्यों में शक्ति का व्यय करता रहा । अब आगे..

पुर्नसंगठन

जिन महानुभावों को मैं पूजनीय दृष्टि से देखता था, उन्होंने अपनी इच्छा प्रकट की कि मैं क्रान्तिकारी दल का पुनः संगठन करूं । गत जीवन के अनुभव से मेरा हृदय अत्यन्त दुखित था । मेरा साहस न देख कर, इन लोगों ने बहुत उत्साहित किया और कहा कि हम आप से केवल निरीक्षण का कार्य लेंगे । बाकी सब कार्य स्वयं ही करेंगे ।

कुछ मनुष्य हम ने पहले जुटा लिये हैं, धन की कमी न होगी, आदि । मान्य पुरूषों की प्रवृत्ति देख मैंने भी स्वीकृति दे दी । मेरे पास जो अस्त्र-शस्त्र थे मैंने दिये । जो दल उन्होंने एकत्रित किया था, उस के नेता से मुझे मिलाया । उस की वीरता की बड़ी प्रशंसा की । वह एक अ्शिक्षित ग्रामीण पुरूष था। मेरी समझ में आ गया कि बदमाशों का या स्वार्थी जनों का कोई संगठन है ।

मुझ से उस दल के नेता ने दल का कार्य निरीक्षण करने की प्रार्थना की । दल में कई फौज से आये हुये लड़ाई से वापिस किये गये व्यक्ति भी थे । मुझे इस प्रकार के व्यक्तियों से कभी कोई काम न पड़ा था । मै दो एक महानुभावों को साथ ले कर इन लोगों का कार्य देखने के लिये गया । थोड़़े दिनों बाद इस दल के नेता महाशय एक वेश्या को भी ले आये । उसे रिवाल्वर दिखाया कि यदि कहीं गई तो गोली से मारी जायेगी । यह समाचार सुन उसी दल के दूसरे सदस्य ने बड़ा क्रोध प्रकाशित किया और मेरे पास खबर भेजने का प्रबन्ध किया । उसी समय एक दूसरा आदमी पकड़ा गया, जो नेता महाशय को जानता था ।

नेता महाशय रिवाल्वर तथा कुछ सोने के आभूषणों सहित गिरफतार हो गये । उन की वीरता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, जो इस प्रकार प्रकट हुई कि कई आदमियों के नाम पुलिस को बतायें और इकबाल कर दिया लगभग तीस चालीस आदमी पकड़े गये । एक दूसरा व्यक्ति था जो बहुत वीर था । पुलिस उसके पीछे पड़ी हुई थी । एक दिन पुलिस कप्तान ने सवार तथा तीस चालीस बन्दूक वाले सिपाही लेकर उसके घर में उसे घेर लिया । उस ने छत पर चढ़ कर दोनाली कारतूसी बन्दूक से लगभग तीन सौ फायर किये बन्दूक गरम होकर गल गई । पुलिस वाले समझे कि घर में कई आदमी है ।

सब पुलिस वाले छिप कर आड़ में से सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगे। उसने मौका पाया । मकान के पीछे से कूद पड़ा, एक सिपाही ने देख लिया । उसने सिपाही की नाक पर रिवाल्वर का कुन्दा मारा । सिपाही चिल्लाया । सिपाही के चिल्लाते ही मकान में से फायर हुआ । पुलिस वाले समझे मकान में ही में है । सिपाही को धोखा हुआ होगा । बस तो वह जंगल में निकल गया । अपनी स्त्री को एक टोपीदार बन्दूक दे आया था कि यदि चिल्लाहट हो तो फायर कर देना । ऐसा ही हुआ और वह निकल गया । जंगल में जाकर एक दूसरे दल से मिला । जंगल में भी एक समय पुलिस कप्तान से सामना हो गया । गोली चली । उसके भी पैर में छर्रें लगे थे । अब यह बड़े साहसी हो गये थे ।

सभी समझ गये थे कि पुलिस वाले किस प्रकार समय पर आड़ में छिप जाते हैं । इन लोगों का दल छिन्न-भिन्न हो गया था । अतः उन्होंने मेरे पास आश्रय लेना चाहा । मैंने बड़ी कठिनता से अपना पीछा छुड़ाया । तत्पश्चात् यह लोग जंगल में जाकर ये दूसरे दल से मिल गये । वहां पर दुराचार के कारण जंगल के दल के नेता  ने इन्हें गोली से मार दिया । उस नेता को भी समय पाकर उसके साथी ने गोली से मार दिया । इस प्रकार से सब दल छिन्न-भिन्न हो गया । जो पकड़े गये उन पर कई डकैतियां चली, किसी का तीस साल, किसी को पचास साल, किसी को बीस साल की सजायें हुई । एक बेचारा जिसका किसी डकैती से कोई सम्बन्ध न था, केवल शत्रुता के कारण फंसा दिया गया । उसे फांसी हो गई

और जो सब प्रकार डकैतियों में सम्मिलित था,  जिसके पास डकैती का माल तथा कुछ अन्य हथियार पाये  गये ।  पुलिस से गोली भी चली उसे पहले फांसी की सजा की आज्ञा हुई पर पैरवी अच्छी हुई । अतएव हाईकोर्ट से फांसी की सजा माफ हो गई, केवल पांच वर्ष की सजा रह गई । जेल वालों से मिल कर उसने डकैतियों में शिनाख्त न होने दी थी । इस प्रकार इस दल की समाप्ति हुई ।  देव योग से हमारे अस्त्र बच गये । केवल एक ही रिवाल्वर पकड़ा गया ।

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