प्रतिज्ञा, पलायनावस्था व शाहजहांपुर

जनवरी 28, 2009 को 10:01 अपराह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, काकोरी षड़यंत्र, खण्ड-2 में प्रकाशित किया गया | 4 टिप्पणियाँ
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अब हमलोग पिछली कड़ी  से आगे  बढ़ते हैं..

इन्हीं विचारों में निमग्न यमुना तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया कि धर्मशाला चल कर ताला तोड़ सामान निकालूं । फिर विचारा धर्मशाला जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा । अभी ठीक नहीं । अकेले बदला लेना ठीक नहीं । और कुछ साथियों को लेकर फिर बदला लिया जावेगा । मेरे एक साधारण मित्र प्रयाग में रहते थे । उनके पास जाकर बड़ी मुश्किल से एक चार ली, और रेल से लखनउ आया, लखनउ आकर बाल बनवाये । धोती, जूता खरीदें, क्योंकि मेरे पास रूपये थे । रूपये न भी होते तो मैं सदैव जो चालीस-पचास रूपये की सोने की अंगूठी पहने रहता था उसे काम में ला सकता । वहां से आकर अन्य सदस्यों से मिलकर सब विवरण कह सुनाया । कुछ दिन जंगल में रहा ।

इच्छा थी कि सन्यासी हो जाउं संसार कुछ नहीं । बाद को फिर माता जी के पास गया । उन से सब कह सुनाया। उन्होंने मुझे ग्वालियर जाने का आदेश दिया । थोड़े दिनों में माता-पिता सभी दादी जी के भाई के यहां आ गये। मैं भी वही आ गया । मैं प्रत्येक समय यहीं विचार किया करता कि मुझे बदला अवश्य लेना चाहिये, एक दिन प्रतिज्ञा कर के रिवाल्वर लेकर शत्रु की हत्या करने की इच्छा से मैं गया भी, किन्तु सफलता न हुई । इसी प्रकार की उधेड़-बुन में मुझे ज्वर आने लगा । कई महीने तक बीमार रहा । माता जी मेरे विचारों को समझ गईं । माता जी ने बड़ी सांत्वना दी कहने लगीं कि, प्रतिज्ञा करो कि तुम अपनी हत्या की चेष्टा करने वालों को जान से न मारोगे । मैं ने प्रतिज्ञा करने में इतस्ततः किया, तो वह कहने लगीं मैं मातृऋण के बदले में प्रतिज्ञा करातीं हूं, क्या उत्तर है ?

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मैंने कहा-मैं उन से बदला लेने की प्रतिज्ञा कर चुका हूं । माता जी ने मुझे बाध्य कर मेरी प्रतिज्ञा भंग  कराई । अपनी बात श्रेष्ठ रखी । मुझे भी सिर नीचा करना पड़ा । उस दिन से मेरा ज्वर कम होने लगा और मैं अच्छा हो गया ।

पलायनावस्था
मैं ग्राम में ग्रामवासियों की भांति उसी प्रकार के वस्त्र पहिन कर निवास करने लगा । खेती भी करने लगा । देखने वाले अधिक से अधिक इतना समझ सकते थे कि मैं शहर में रहा हूं, सम्भव है कुछ पढ़ा भी होउं । खेती के कामों में मैंने विशेष ध्यान दिया । शरीर तो हृष्ट-पु्ष्ट था ही, थोड़े ही दिनों में अच्छा खासा किसान बन गया । उस कठोर भूमि में खेती करना कोई सरल कार्य नहीं । बबूल, नीम के अतिरिक्त कोई एक दो आम के वृक्ष कहीं भले ही दिखलाई दे जावें बाकी वह नितान्त मरूभूमि है । खेत में जाता था । थोड़ी देर में ही झरबेरी के कांटों से पैर भर जाते । पहले पहल बड़ा कष्ट प्रतीत हुआ । कुछ समय पश्चात अभ्यास हो गया । जितना खेत उस देश का एक बलि्ष्ठ पु्रुष दिन भर में जोत सकता था, उतना मैं भी जोत लेता था । मेरा चेहरा बिल्कुल काला पड़ गया । थोड़े दिनों के लिये मैं शाहजहांपुर की ओर घूमने आया । तो कुछ लोग मुझे पहचान न सके । 

मैं रात को शाहजहांपुर पहुंचा । गाड़ी छूट गई । दिन के समय पैदल जा रहा था, एक पुलिस वाले ने पहचान लिया । वह और पुलिस वालों को लेने के लिये गया । मैं भागा, पहले दिन काफी थका हुआ था । लगभग बीस मील पहले दिन पैदल चला था । उस दिन भी 35 मील पैदल चलना पड़ा । मेरे माता पिता ने सहायता की । मेरा समय अच्छे प्रकार व्यतीत हो गया । माता जी की पूंजी तो मैंनें नष्ट कर दी । पिता जी से, सरकार की ओर से कहा गया कि लड़के की गिरफतारी के वारंट की पूर्ति के लिए लड़के का हिस्सा, जो उसके दादा की जायदाद होगी,  नीलाम किया जावेगा ।

पिता जी घबड़ा कर दो हजार रूपये का मकान आठ सौ में तथा दूसरी चीजें भी थोड़े दामों में बेचकर शाहजहांपुर छोड़ कर भाग गये । दो बहिनों का विवाह हुआ, जो कुछ रहा बचा था, वह भी व्यय हो गया । माता पिता की हालत फिर निर्धनों की सी हो गई । समिति के जो दूसरे सदस्य भागे हुये थे, उनकी बहुत बुरी दशा हुई । महीनों चनों पर ही समय काटना पड़ा । दो चार रूपये जो मित्रों तथा सहायकों से मिल जाते थे, उन्हीं पर गुजर होता था । पहनने को कपड़े  तक न थे ।

विवश होकर रिवाल्वर तथा बन्दूकें बेंची, तब दिन कटे । किसी से कुछ कह भी न सकते थे, गिरफ़्तारी के भय के कारण कोई व्यवसाय या नौकरी न कर सकते थे । उसी अवस्था में मुझे व्यवसाय करने का विचार हुआ । मैंने अपने सहपाठी तथा मित्र श्रीयुत सुशीलचन्द्र की, जिन का देहान्त हो गया था, उनकी स्मृति में बंगला भाषा का अध्ययन किया । मेरे छोटे भाई का जब जन्म हुआ तो मैंने उसका नाम भी सुशीलचन्द्र रखा । मैंने विचारा कि एक पुस्तक माला निकालूं लाभ भी होगां कार्य भी सरल है । बंगला से हिन्दी में पुस्तकों का अनुवाद करके प्रकाशित कराउंगा । कुछ भी अनुभव नहीं था ।

बंगला पुस्तक ‘ निहिलिस्ट-रहस्य ‘ का अनुवाद प्रारम्भ कर दिया । जिस प्रकार अनुवाद किया,  उसका स्मरण कर कई बार हंसी आ जाती थी । कई बैल, गाय तथा भैंस लेकर उसर में चराने के लिये जाया करता था । खाली बैठा रहना पड़ता था । अतएव कापी पेंसिल लेकर जाया करता और पुस्तक का अनुवाद किया करता था । पशु जब कहीं दूर निकल जाते तब अनुवाद छोड़, लाठी लेकर उन्हें हकारने जाया करता था । कुछ समय के लिये एक साधु की कुटी पर जाकर रहा । वहां अधिक समय अनुवाद करने में व्यतीत करता था । भोजन के लिये आटा ले जाता था चार पांच दिन के लिये इकट्ठा आटा रखता था । भोजन स्वयं बना लेता था । जब पुस्तक ठीक हो गई तो सुशील माला के नाम से पुस्तक माला निकाली । पुस्तक का नाम बोलिशेविकों की करतूत रखा गया था । दूसरी पुस्तक मन की लहर छपवाई । इस व्यवसाय में लगभग पांच सौ रूपये की हानि हुई ।

जब राजकीय घोषणा हुई और राजनैतिक कैदी छोड़े गये, तब शाहजहांपुर आ कर कोई व्यवसाय करने का विचार हुआ, ताकि माता पिता की कुछ सेवा हो सके । विचार किया करता था कि इस जीवन में अब फिर कभी आजादी से शाहजहांपुर में विचरण न कर सकूंगा । पर परमात्मा की लीला अपार है । वे दिन आये । मैं पुनः शाहजहांपुर का निवासी हुआ ।

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