मेरे विचार से, यदि ऎसा हो…

जनवरी 24, 2009 को 10:22 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | 1 टिप्पणी
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अबतक आपने पढ़ा….

अंग्रेजी में एक कहावत है Only for once and Forever ओनली फार वन्स एण्ड फार एवर ! तात्पर्य यह है कि यदि एक समय कोई बात पैदा हुई, मानो सदा के लिए रास्ता खुल गया । दवाइयां कोई लाभ नहीं पहुंचाती । अंडों, जूस, मछली के तेल, मांस आदि पदार्थ भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं । सबसे आवश्यक बात चरित्र सुधारना ही होती है । विद्यार्थियों तथा उनके अध्यापकों को उचित है कि वे देश की दुर्द्शा पर दया करके अपने चरित्र को सुधारने का प्रयत्न करें । संसार में ब्रम्हचर्य ही सारी शक्तियों का मूल है । बिना ब्रम्हचर्य व्रत पालन किये मनुष्य जीवन नितान्त शुष्क तथा नीरस प्रतीत होता है । विद्या, बल तथा बुद्धि सब ब्रम्हचर्य के प्रताप से ही प्राप्त होते है । अब आगे पढ़ें…

Sarfaroshi 

संसार में जितने बड़े आदमी हुये हैं, उनमें से अधिकतर ब्रम्हचर्य व्रत के प्रताप से ही बड़े बने और सैकड़ों हजारों वर्ष के बाद भी उनका यशगान करके मनुश्य अपने आपको कृतार्थ करते हैं ब्रम्हचर्य की महिमा यदि जानना हो तो परशुराम, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, भी्ष्म, ईसा, मेजिनी, बंदा, रामकृ्ष्ण, दयानन्द तथा राममूर्ति की जीवनियों का अध्ययन करो ।
जिन विद्यार्थियों को बाल्यवस्था में किसी कुटेव की बान पड़ जाती है, या जो बुरी संगत में पड़ कर अपना आचरण बिगाड़ लेते है और फिर अच्छी शिक्षा पाने का व आचरण सुधारने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु सफल मनोरथ नहीं होते, उन्हें निराश न होना चाहिये ।

मनुश्य जीवन अभ्यासों का एक समूह है । मनुश्य के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक विचार तथा भाव उत्पन्न हेाते रहते हैं, उनमें से जो उसे रूचिकर होते हैं वे प्रथम कार्य रूप में परिणत होते है । क्रिया के बार-बार होने से उसमें से ऐच्छिक भाव निकल जाता है और उसमें तात्कालिक प्रेरणा उत्पन्न हो जाती है, इन तात्कालिक प्रेरक क्रियाओं का जो पुनरावृत्ति का फल है अभ्यास कहते हैं । मानवी चरित्र इन्हीं अभ्यासों द्वारा बनता है । अभ्यास से तात्पर्य आदत, स्वभाव बान है । अभ्यास अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं । यदि हमारे मन में निरन्तर अच्छे विचार उत्पन्न हों, तो उनका फल अच्छे अभ्यास होंगे और यदि मन बुरे विचारों में लिप्त रहे, तो निश्चय रूपेण अभ्यास बुरे होंगे ।

मन इच्छाओं का केन्द्र है । उन्हीं की पूर्ति के लिए मनुश्य को प्रयत्न करना पड़ता है । अभ्यासों के बनने में पैतृक संस्कार अर्थात माता-पिता के अभ्यासों के अनुसार अनुसरण ही बच्चों के अभ्यास का सहायक होता है । दूसरे जैसी परिस्थितियों में निवास होता है, वैसे ही अभ्यास भी पड़ते है । तीसरे प्रयत्न से भी अभ्यासों का निर्माण होता है । यह शक्ति इतनी प्रबल हो सकती है कि इसके द्वारा मनुश्य पैतृक संस्कार तथा परिस्थितियों को भी जीत सकता है । हमारे जीवन का प्रत्येक कार्य जब अभ्यासों के आधीन है ।

यदि अभ्यासों द्वारा हमें कार्य में सुगमता प्रतीत न होती, तो हमारा जीवन बड़ा दुखमय प्रतीत होता । लिखने का अभ्यास, वस्त्र पहिनना, पठन-पाठन इत्यादि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है । यदि हमें प्रारम्भिक समय की भांति सदैव सावधानी से काम लेना हो तो कितनी कठिनता प्रतीत हो । इसी प्रकार बालक का खड़ा होना और चलना भी है कि उस समय वह क्या कष्ट अनुभव करता है, किन्तु एक मनुश्य मीलों चला जाता है । बहुत लोग तो चलते-चलते नींद भी ले लेते है । जेल में बाहरी दीवारों पर घड़ी में चाबी लगाने वाले जिन्हें बराबर छः घंटे चलना होता है, वे बहुधा चलते-चलते सो लिया करते है ।

मानसिक भावों को शुद्ध रखते हुए अन्तःकरन को उच्च विचारों में बलपूर्वक संलग्न करने का अभ्यास करने से अवश्य सफलता होगी । प्रत्येक विद्यार्थी या नवयुवक को जो कि ब्रम्हचर्य-व्रत के पालन की इच्छा रखता है उचित है कि अपनी दिनचर्या अवश्य नि्श्चित करे । खान पानादि का विशेष ध्यान रखे । महात्माओं के जीवन चरित्र तथा चरित्र संगठन सम्बन्धी पुस्तकों का अवलोकन करे । प्रेमालाप तथा उपन्यासों में समय नष्ट न करें । खाली समय अकेला न बैठे । जिस समय कोई बुरे विचार उत्पन्न हों तुरन्त शीतल जल का पान कर घूमने लगे, या किसी अपने से बड़े के पास जाकर बातचीत करने लगे । अश्लील इ्श्क भरी गजलें, शेर तथा गानों को न पढ़े और न सुने ।

स्त्रियों के अंतःदर्शन से बचता रहे । माता तथा बहिन से भी एकान्त में न मिले । सुन्दर सहपाठियों या अन्य विद्यार्थियों से स्पर्श तथा आलिंगन की भी आदत न डाले । विद्यार्थी प्रातःकाल सूर्य उदय होने से एक घण्टा पहिले शैय्या त्याग कर शौचादि से निवृत हो व्यायाम करे, या वायु सेवनार्थ बाहर मैदान में जावे । सूर्य उदय होने के पांच दस मिनट पूर्व स्नान से निवृत हेा कर यथाविश्वास परमात्मा का ध्यान करें । सदैव कुंए के ताजे जल से स्नान करें । यदि कुंए का जल प्राप्त न हो तो जाड़ों में जल को थोड़ा सा गुनगुना करके और गर्मियों में शीतल जल से स्नान करें । स्नान करने के पश्चात एक खुरखुरे तौलियो अंगौछा से खूब शरीर मले ।

उपासना के पश्चात थोड़ा सा जलपान करें । कोई फल शुष्क मेवा दूध अथवा सब से उत्तम यह है कि गेहूं का दलिया रंधवा कर यथारूचि मीठा या नमक डाल कर खावें फिर अध्ययन करें और दस बजे से ग्यारह बजे के मध्य में भोजन कर लेवे । भोजनों में मांस, मछली, खट्टे गरिष्ठ, बासी तथा उत्तेजक पदार्थों का त्याग करें । प्याज, लहसुन, मिर्च, आम की खटाई और अधिक मसालेदार भोजन कभी न खायें । सात्विक भोजन करें । शुष्क भोजनों का भी त्याग करें । जहां तक हो सके सब्जी अर्थात साग अधिक खावे । भोजन खूब चबा -चबा कर करे । अधिक गरम या अधिक ठण्डा भोजन भी वर्जित है ।

स्कूल अथवा कालेज से आकर थोड़ा सा आराम कर के एक घण्टा लिखने का काम करके खेलने के लिये जावे । मैदान में थोड़ा सा घूमे भी । घूमने के लिये चैक बाजार की गन्दी हवा में जाना ठीक नहीं । स्वच्छ वायु का सेवन करे । प्रयत्न हो कि, संध्या समय भी शौच अवश्य जावे । थोड़ा सा ध्यान करके हल्का भोजन कर ले । यदि हो सके तो रात्रि के समय केवल दुग्ध पीने का अभ्यास डाले, या फल खा लिया करे । स्वप्न दोषादिक व्याधियां केवल पेट के भारी होने से ही होती हैं ।

जिस दिन भोजन भली-भांति नहीं पचता, उस दिन विकार हो जाता है, या मानसिक भावनाओं की अधिकता से निद्रा ठीक न आकर स्वप्नावस्था में वीर्यपात हो जाता है । रात्रि के समय साढ़े दस बजे तक पठन-पाठन करे, पुनः सो जावे । सोना सदैव खुली हवा में चाहिये । बहुत मुलायम चिकने बिस्तर पर न सोवें । जहां तक हो सके, लकड़ी के तख्त पर कम्बल या गाढ़े की चादर बिछा कर सोवें । अधिक पाठ करना हो तो साढ़े नौ या दस पर सो जावे । प्रातःकाल साढ़े तीन या चार बजे उठ कर कुल्ला कर के शीतल जल पान करें और शौच से निवृत हो पठन-पाठन करें । सूर्योदय के निकट फिर नित्य की भांति व्यायाम या भ्रमण करें ।

सब व्यायामों में दण्ड बैठक सर्वोंत्तम है जहां जी चाहा व्यायाम कर लिया । यदि हो सके तो प्रोफेसर राममूर्ति की विधि से दण्ड तथा बैठक करें । प्रोफेसर साहब की यह रीति विद्यार्थियों के लिए बड़ी लाभदायक है । थोड़े समय में ही पर्याप्त परिश्रम हो जाता है । दण्ड बैठक के अलावा शीर्षासन और पद्मासन का भी अभ्यास करना चाहिये और अपने कमरे में वीरों और महात्माओं के चित्र रखना चाहिए ।

गुरु सोमदेव व क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात

जनवरी 20, 2009 को 9:04 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | टिप्पणी करे
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अबतक आपने पढ़ा….

डिप्टी कमिश्नर के पास रिपोर्ट हुईं उसने आप को दर्शनार्थ बुलाया । वह बड़ा क्रोधित था । लेख को पढ़ कर कांपता, और क्रोध में आकर मेज पर हाथ दे मारता था । किन्तु अन्तिम शब्दों को पढ़कर वह चुप हो जाता । उस लेख के शब्द यों थे, कि यदि अंग्रेज अब भी न समझेंगे तो वह दिन दूर नहीं कि सन 57 के दृश्य फिर दिखाई दें और अंग्रेजों के बच्चों का कतल किया जावे, उनकी रमणियों की बेइज्जती हो इत्यादिं, किन्तु क्या यह सब स्वप्न है ? यह सब स्वप्न है, इन्हीं शब्दों को पढ़ कर डिप्टी कमिश्नर कहता कि हम तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते । अब आगे पढ़ें…

स्वामी सोमदेव भ्रमण करते हुए बम्बई पहुंचे । वहां पर आप के उपदेशों को सुन कर जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा । एक व्यक्ति, जो श्रीयुत अबुलकलाम आजाद के बड़े भाई थे, आप के व्याख्यान को सुन कर मोहित हो गये । वह आप को अपने घर लिवा ले गये । इस समय तक आप गेरूआ कपड़ा न पहिनते थे । केवल एक लुंगी और कुरता पहनते थे और साफा बांधते थे ।

श्रीयुत अबुलकलाम आजाद के पूर्वज अरब के निवासी थे । आपके पिता के बम्बई में बहुत से मुरीद थे और कथा की तरह कुछ धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने पर हजारों रूपये चढ़ावें में आया करते थे । वह सज्जन इतने मोहित हो गये कि उन्होंने धार्मिक कथाओं का पाठ करने के लिए जाना छोड़ दिया । वह दिन रात आप के पास ही बैठे रहते । जब आप उनसे कहीं जाने को कहते तो वह रोने लगते ओर कहते कि मैं तो आपके आत्मिक ज्ञान के उपदेशों पर मोहित हूं । मुझे संसार में किसी वस्तु की भी इच्छा नही । आपने एक दिन क्रोधित होकर उन के धीरे से चपत मार दी जिससे वह दिन भर रोते रहे । उनको घर वालों तथा मज़हबी शिष्यों ने बहुत कुछ समझाया किन्तु वह धार्मिक कथा कहने न जाते ।

यह देख कर उनके मुरीदों को बड़ा क्रोध आया कि हमरे धर्मगुरू एक काफिर के चक्कर में फंस गये हैं । एक दिन संध्या को स्वामी जी अकेले समुद्र के तट पर भ्रमण करने गये थे कि कई मुरीद मकान पर बन्दूक ले कर स्वामी जी को मार डालने के लिए आये । यह समाचार जान कर उन्होंने स्वामी जी के प्राणों का भय देख स्वामी जी से बम्बई छोड़ देने की प्रार्थना की । प्रातःकाल एक स्टेशन पर स्वामी जी केा तार मिला कि आपके प्रेमी श्रीयुत अबुलकलाम आजाद के भाई साहब ने आत्महत्या कर ली । तार पा कर आप को बड़ा क्लेश हुआ । जिस समय आपको इन बातों का स्मरण हो आता था, तो बड़े दुखी होते थे ।

एक दिन संध्या के समय मैं आप के निकट बैठा हुआ था अंधेरा काफी हो गया था । स्वामी जी ने बड़ी गहरी ठण्डी सांस ली, मैंने चेहरे की ओर देखा तो आंखों से आंसू बह रहे थे । मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ मैंने कई घंटे कारण जानने की प्रार्थना की । तब आप ने उपरोक्त विवरण सुनाया ।

अंग्रेजी की योग्यता आप की बड़ी उच्च कोटि की थी । शास्त्र-विषयक आप का ज्ञान बड़ा गम्भीर था । आप बड़े निर्भीक वक्ता थे । आपकी योग्यता को देख कर एक बार मद्रास की कांग्रेस कमेटी ने अखिल भारतवर्षीय कांग्रेस का प्रतिनिधि चुन कर भेजा था । आगरा की आर्यमित्र सभा के वार्षिकोत्सव पर आप के व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप जी बड़े मुग्ध हुये थे । राज साहब ने आपके पैर छुये और अपनी कोठी पर लिवा ले गये । उस समय से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते और आप को अपना गुरू मानते थे । इतना साफ निर्भीक बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा । सन 1913 ई0 में मैंने आप का पहला व्याख्यान शाहज़हाँपुर में सुना था । आर्य समाज के वार्षिकोत्सव पर आप पधारे थे । उस समय आप बरेली में निवास करते थे ।

आपका शरीर बहुत ही कृ्श था क्योंकि आप को एक अद्भुत रोग हो गया था । आप जब शौच जाते थे, तब आप के खून गिरता था । कभी दो छटांक, कभी चार छटांक और कभी-कभी तो एक सेर तक खून गिरता था । आपको बवासीर नहीं थी । ऐसा कहते थे कि किसी प्रकार योग की क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आंत में कुछ विकार उत्पन्न हो गया । आंत सड़ गई । पेट चिरवा कर आंत कटवाना पड़ी और तभी से वह रोग हो गया था । बड़े -बड़े वैद्य डाक्टरों की औषधि की किन्तु कुछ लाभ न हुआ ।

इतने कमजोर होने पर भी जब व्याख्यान देते तब इतने जोर से बोलते कि तीन चार फरलांग से आपका व्याख्यान साफ सुनाई देता था । दो तीन वर्ष तक आप को हर साल आर्य समाज के वार्षिकोत्सव पर बुलाया जाता । सन् 1915 ई0 में कतिपय सज्जनों की प्रार्थना पर आप आर्य समाज मन्दिर शाहजहांपुर में ही निवास करने लगे । इसी समय से मैने आप की सेवा-सुश्रूषा में समय व्यतीत करना आरम्भ कर दिया ।

स्वामी जी मुझे धार्मिक तथा राजनैतिक उपदेश देते थे और इस प्रकार की पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश करते थें । राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि का था । लाला हरदयाल से आप से बहुत परामर्श होता था । एक बार महात्मा मुन्शीराम जी तथा स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानन्द जी को आपने पुलिस के प्रकोप से बचाया । आर्चाय रामदेव जी तथा श्रीयुत कृष्ण जी से आपका बड़ा स्नेह था । राजनीति में आप मुझ से अधिक खुलते न थें आप मुझसे बहुधा कहा करते थे कि इन्टेन्स पास कर लेने के बाद योरूप यात्रा अवश्य करना । इटली जा कर महात्मा मेजिनी की जन्मभूमि के दर्शन अवश्य करना ।

सन 1916 ई0 में लाहौर षड्यन्त्र का मामला चला । मैं समाचार पत्रों में उस का सब वृतान्त बड़े चाव से पढ़ा करता था । श्रीयुत भाई परमानन्द जी में मेरी बड़ी श्रद्धा थी क्योंकि उनकी लिखी हुए तवारीख हिन्द पढ़ कर मेरे हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा था । लाहौर षड़यन्त्र का फैसला अखबारों में छपा । श्री भाई परमानन्द जी को फांसी की सजा पढ़ कर मेरे शरीर में आग लग गई ।

मैने विचारा कि अंग्रेज बड़े अत्याचारी है । इनके राज्य में न्याय नहीं, जो इतने बड़े महानुभाव को फांसी की सजा का हुकम दे दिया । मैने सप्रतिज्ञा की कि इसका बदला अवश्य लूंगा । जीवन भर अंग्रेजी राज्य को विध्वंस करने का प्रयत्न करता रहूंगा । इस प्रकार की प्रतिज्ञा कर चुकने के पश्चात मैं स्वामी जी के पास आया । सब समाचार सुनाये और अखबार दिया । अखबार पढ़कर स्वामी जी भी बड़े दुखित हुये । तब मैने अपनी प्रतिज्ञा के सम्बन्ध में कहा । स्वामी जी कहने लगे कि प्रतिज्ञा करना सरल है, किन्तु उस पर दृढ़ रहना कठिन है ।  मैने स्वामी जी को प्रणाम कर उत्तर दिया कि यदि श्री चरणों की कृपा बनी रहेगी तो प्रतिज्ञा की पूर्ति में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं करूंगा ।

उस दिन से स्वामी जी कुछ-कुछ खुले । वे बहुत सी बातें बताया करते थे । उस ही दिन से मेरे क्रान्तिकारी जीवन का सूत्रपात हुआ । यद्यपि आप आर्य-समाज के सिद्धांतों को सर्वप्रकारेण मानते थे । किन्तु परमहंस राजकृश्ण, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ तथा महात्मा कबीरदास के उपदेशों का अधिकतर वर्णन करते थे ।

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