विदा दो माँ.. प्रणाम गुरुदेव

जनवरी 19, 2009 को 11:19 अपराह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1, सरफ़रोशी की तमन्ना में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ
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अबतक आपने पढ़ा.. ..

यदि मैंने घृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुम ने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे वह करो, किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं इसका परिणाम अच्छा न होगा । जीवनदात्री, तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन पोषण ही नहीं किया किन्तु आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं । जन्म जन्मान्तर परमात्मा ऐसी ही माता दें । यही इच्छा है ।       अब आगे पढ़ें..

महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर न होने दिया । सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुये मुझे सान्त्वना देती रहीं । तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट न अनुभव किया । इस संसार में मेरी किसी भी भोग विलास तथा ऎश्वर्य की इच्छा नहीं केवल एक ही तृष्णा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता ।  किन्तु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती, और तुम्हें मेरी मृत्यु का दुख-सम्वाद सुनाया जायेगा ।  मां मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता भारतमाता की सेवा में अपने जीवन को बलि वेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कुल को कलंकित न किया, अपनी प्रतिज्ञा में दृढ़ रहा ।

हे माँ, हे जन्मदात्री !  वर दो कि अन्तिम   समय  भी  मेरा  हृदय किसी  प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण  कमलों  को  प्रणाम कर   मैं   परमात्मा   का  स्मरण करता  हुआ  शरीर त्याग   करूं !

जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जावेगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्जवल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जायेगा गुरू गोविन्दसिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु का सम्वाद सुना था तो बहुत हर्षित हुईं और गुरू के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बांटी थी । हे माँ, हे    जन्मदात्री ! वर दो कि अन्तिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूं

मेरे गुरूदेव
माता जी के अतिरिक्त जो कुछ जीवन तथा शिक्षा मैने प्राप्त की वह पूज्यपाद श्री 108 स्वामी सोमदेव जी की कृपा का परिणाम है । आपका नाम श्रीयुत ब्रजलाल चौपड़ा था । पंजाब के लाहौर शहर में आपका जन्म हुआ था । आपका कुटुम्ब प्रसिद्ध था, क्योंकि आपके दादा महाराज रणजीतसिंह के मन्त्रियों में से एक थे । आपके जन्म के कुछ समय पश्चात आप की माता का देहान्त हो गया था । आपकी दादी ने ही आपका पालन-पोषण किया था ।
आप अपने पिता की अकेली सन्तान थे ।

जब आप बड़े हुए तो चाचियों ने दो तीन बार आपको जहर देकर मार देने का प्रयत्न किया, ताकि उनके लड़कों को ही जायदाद का अधिकार मिल जावें । आपके चाचा आप पर बड़ा स्नेह करते थे, और शिक्षादि की ओर विशेष ध्यान रखते थे । अपने चचेरे भाइयों के साथ-साथ आप भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे । जब आपने इंटेस की परीक्षाफल प्रकाशित होने पर आप यूनिवर्सिटी में प्रथम आये और चचा के लड़के फेल हो गये । घर में बड़ा शोक मनाया गया । दिखाने के लिये भोजन तक  नहीं बना । आपकी प्रशंसा तो दूर, किसी ने उस दिन भोजन करने को भी न पूछा और बड़ी उपेक्षा की दृष्टि  से देखा । आप का हृदय पहले से ही घायल था, इस घटना से आपके जीवन को  और भी बड़ा आघात पहुंचा । चाचा जी के कहने सुनने पर कालेज में नाम लिखा तो लिया, किन्तु बड़े उदासीन रहने लगे ।

आप के हृदय में दया बहुत थी । बहुधा अपनी किताबें तथा कपड़े दूसरे सहपाठियों को बांट दिया करते थे । नये कपड़े बांटकर पुराने कपड़े स्वयं पहना करते थे । एक दो बार चाचा से दूसरे लोगों ने कहा कि श्री ब्रजलाल को कपड़़े भी आप नहीं बनवा देते, जो वह पुराने फटे कपड़े पहने फिरते हैं । चाचा को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उन्होंने कई जोड़े कपड़े थोड़े दिनों पहिले ही बनवाये थे ।

आपके सन्दूकों की तलाशी ली गई उनमें दो चार जोड़ी पुराने कपड़े निकले, तब चाचा ने पूछा तो मालूम हुआ कि वे नये कपड़े निर्धन विद्यार्थियों को बांट दिया करते हैं । चाचा जी ने कहा जब कपड़े बांटने की इच्छा हो कह दिया करो, तो हम विद्यार्थियों को कपड़े बनवा दिया करेंगे । अपने कपड़े न बांटा करो । वे बहुधा निर्धन विद्यार्थियों को अपने घर पर ही भोजन कराया करते थे । चाचियों तथा चचाजात भाइयों के व्यवहार से आपको बड़ा क्लेश होता था । इसी कारण से आपने विवाह न किया ।

घरेलू दुर्व्यवहार से दुखित हो कर आपने घर त्याग देने का निश्चय कर लिया और एक रात को जब सब सो रहे थे, चुपचाप उठकर घर से निकल गये । कुछ भी सामान साथ में न लिया । बहुत दिनों तक इधर-उधर भटकते रहें भटकते -भटकते आप हरिद्वार पहुंचे । वहां एक सिद्ध योगी से भेंट हुई श्री ब्रजलाल जी को जिस वस्तु की इच्छा थी वह प्राप्त हो गई । उसी स्थान पर रह कर श्री ब्रजलाल जी ने योग विद्या की पूर्ण शिक्षा पाई ।

योगीराज की कृपा से आप अटठारह बीस घण्टे की समाधि लगा लेने लगे । कई वर्ष तक आप वहां रहे इस समय आप को योग का इतना अभ्यास हो गया था कि अपने शरीर को इतना हल्का कर लेते थे कि पानी पर पृथ्वी के समान चले जाते थे । अब आप को देश भ्रमण तथा अध्ययन करने की इच्छा उत्पन्न हुई । अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए अध्ययन करते रहें । जर्मनी तथा अमेरिका से बहुत सी पुस्तकें मंगाई, जो कि शास्त्रों के संबन्ध में ही थीं ।

जब लाल लालजपतरात को देश निर्वासन का दण्ड मिला था, उस समय आप लाहौर में थे । वहां उन्होंने एक समाचार पत्र की सम्पादकी के लिए डिक्लेरेशन दाखिल किया । डिप्टी कमिश्नर उस किसी के भी समाचार पत्र के डिक्लेरेशन को स्वीकार न करता था, जब आपसे भेंट हुई तो वह बड़ा प्रभावित हुआ और उसने डिक्लेरेशन मंजूर कर लिया । अखबार का पहला ही अभिलेख अंग्रेजों को चेतावनी के नाम से निकाला । लेख इतना उत्तेजनापूर्ण था कि थोड़ी देर में ही समाचार पत्र की सब प्रतियां बिक गईं और जनता के अनुरोध पर उसी अंक का दूसरा और संस्करण प्रकाशित करना पड़ गया ।

डिप्टी कमिश्नर के पास रिपोर्ट हुईं उसने आप को दर्शनार्थ बुलाया । वह बड़ा क्रोधित था । लेख को पढ़ कर कांपता, और क्रोध में आकर मेज पर हाथ दे मारता था । किन्तु अन्तिम शब्दों को पढ़कर वह चुप हो जाता। उस लेख के शब्द यों थे, कि यदि अंग्रेज अब भी न समझेंगे तो वह दिन दूर नहीं कि सन 57 के दृश्य फिर दिखाई दें और अंग्रेजों के बच्चों का कतल किया जावे, उनकी रमणियों की बेइज्जती हो इत्यादिं, किन्तु क्या यह सब स्वप्न है ? यह सब स्वप्न है, इन्हीं शब्दों को पढ़ कर डिप्टी कमिश्नर कहता कि हम तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते ।

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जन्म जन्मान्तर परमात्मा ऐसी माता दें

जनवरी 18, 2009 को 11:27 अपराह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ
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अबतक आपने पढ़ा..

वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि एक सौ रूपये से अधिक का दावा है, यह मुकद्दमा खारिज हो जावेगा । किन्तु मुझ पर कुछ प्रभाव न हुआ, मैंने हस्ताक्षर न  किये । अपने जीवन में सर्वप्रकारेण सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाता, सत्य-सत्य कह देता था । मेरी माता मेरे धर्म-कार्य में तथा शिक्षादि में बड़ी सहायता करती थी । वह प्रातःकाल चार बजे ही मुझे जगा दिया करती थीं। मैं नित्य प्रति नियम पूर्वक हवन भी किया करता । अब आगे पढ़ें…

मेरी छोटी बहिन का विवाह करने के निमित्त माता जी तथा पिताजी ग्वालियर गये । मैं तथा श्री दादी जी शाहज़हाँपुर में ही रह गये, क्योंकि मेरी वार्षिक परीक्षा थी । परीक्षा समाप्त करके मैं भी बहिन के विवाह में सम्मिलित होने को गया । बारात आ चुकी थी । मुझे ग्राम के बाहर ही मालूम हेा गया कि बारात में वेश्या आई है । मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ । मैंने विवाह में कोई भाग न लिया । मैंने माता जी से थोड़े रूपये मांगे ।

माता जी ने मुझे लगभग 125 दिये जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया । यह अवसर रिवाल्वर खरीदने का अच्छा हाथ लगा । मैंने सुन रखा था कि रियासत में बड़ी आसानी से हथियार मिल जाते हैं । बड़ी खोज की । टोपीदार बन्दूक तथा पिस्तौल तो मिलते थे किन्तु कारतूसी हथियारों का कहीं पता नहीं । बड़े प्रयत्न के बाद एक महाशय ने मुझे ठग लिया और रू० 75 में टोपीदार पांच फायर करने वाला एक रिवाल्वर दिया, रियासत की बनी हुए बारूद और थोड़ी सी टोपियां दे दीं । मैं इसी को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ । सीधा शाहज़हाँपुर पहुंचा । रिवाल्वर को भर कर चलाया तो गोली केवल पन्द्रह या बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न थी ।

मुझे बड़ा खेद हुआ । माताजी भी जब लौट कर शाहज़हाँपुर आईं तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या लाये ?  मैंने कुछ कह कर टाल दिया । रूपये सब खर्च हो गये । स्यात एक गिन्नी बच रही  थी, सो वह मैंने माताजी को लौटा दी ।

मुझे जब किसी बात के लिए धन की आवश्यकता होती, मैं माता जी से कहता और वह मेरी मांग पूरी कर देती । मेरा स्कूल घर से एक मील दूर था । मैंने माता जी से प्रार्थना की कि मुझे साइकिल ले दें ।  उन्होंने लगभग एक सौ रूपये दिये । मैंने साइकिल खरीद ली । उस मैं अंग्रेजी के नवें दर्जें में आ गया था । किसी धार्मिक या देश सम्बन्धी पुस्तक पढ़ने की इच्छा होती तो माता जी ही से दाम ले जाता । लखनउ कांग्रेस जाने के लिये मेरी बड़ी इच्छा थी । दादी जी तथा पिता जी बहुत कुछ विरोध करते रहे, किन्तु माता जी ने मुझे खर्च दे ही दिया ।

उसी समय शाहज़हाँपुर में सेवा समिति का आरम्भ हुआ था । मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था । पिता जी तथा दादी जी को मेरे इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे किन्तु माता जी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं जिसके कारण उन्हें बहुधा पिताजी का ताड़ना तथा दण्ड भी सहन करना पड़ता था । वास्तव में मेरी माता जी स्वर्गीय देवी है ।

मुझ में जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माता जी तथा गुरूदेव श्री सोमदेव की कृपाओं का ही परिणाम है । दादी जी तथा पिता जी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किन्तु माता जी यही कहती कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा । माता जी के प्रोत्साहन तथा सदव्यवहार ने मुरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा ।

मेरी मां
ग्यारह वर्ष की उम्र में माता जी का विवाह कर शाहज़हाँपुर आई थी । उस समय तक आप नितान्त अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के सदृश थीं । शाहज़हाँपुर अपने के थोड़े दिनों बाद श्री दादीजी ने अपनी छोटी बहिन को बुला लिया । उन्हीं ने गृह-कार्य में माता जी को शिक्षा दी । थोड़े ही दिनों में माता जी ने सब गृह कार्य को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबन्ध करने लगी ।

मेरे जन्म होने के पांच या सात वर्ष बाद आपने हिन्दी पढ़ना प्रारम्भ किया । पढ़ने का शौक आप को खुद ही पैदा हुआ था । मोहल्ले की संग सहेली जो घर पर आ जाती थीं, उन्हीं में से जो कोई शिक्षित थीं, माता जी उन से अक्षर बोध करती । इसी प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता उस में पढ़ना लिखना करती । परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वे देवनागरी पुस्तकों का अवलोकन करने लगीं । मेरी बहिनों को छोटी आयु में माता जी ही उन्हें शिक्षा दिया करती थी ।

जब से मैंने आर्य समाज में प्रवेश किया, तब से माता जी से खूब वार्तालाप होता उस समय की अपेक्षा अब आपके विचार भी कुछ उदार हो  गये हैं यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्य की भांति संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता । शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी आपने मेरी वह सहायता की है जो मेजिनी को उनकी माता ने की थी । यथा समय मैं उन सारी बातों का उल्लेख करूंगा । माता जी का सब से बड़ा आदेश मेरे लिये वही था कि किसी की प्राणहानि न हो । उन का कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदण्ड न देना । आपके इस आदेश की पूर्ति करने के लिये मजबूरन दो एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी ।

जन्मदात्री जननी, इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण परिशोध करने के प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला । इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूं तो तुम से उऋण नहीं हो सकता । जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुम ने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुम ने किस प्रकार अपनी दैवी वाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है । तुम्हारी दया से ही मैं देशसेवा में संलग्न हो सका ।

धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी । जो कुछ शिक्षा मैने ग्रहण किया उस का भी श्रेय तुम्हीं हो है । जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश दिया करती थीं उसका स्मरण कर तुम्हारी स्वर्गीय मूर्तिका ध्यान आ जाता है और मस्तक नत हो जाता है । तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई तो बड़े स्नेह से हर एक बात को समझा किया । यदि मैंने घृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुम ने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे वह करो, किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं इसका परिणाम अच्छा न होगा । जीवनदात्री, तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन पोषण ही नहीं किया किन्तु आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं । जन्म जन्मान्तर परमात्मा ऐसी ही माता दें । यही इच्छा है ।

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