मैं मन ही मन घुटा करता

फ़रवरी 14, 2009 को 12:55 पूर्वाह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4 में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ
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एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया,  जिसमें तीन डाक्टर थे । उन बुद्धू की जब कुछ समझ में न आया, तो यह कह दिया गया कि सेठ जी को कोई भी बीमारी ही नहीं है । अब आगे..

जब से काकोरी षड़्यन्त्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से उनमें एक अद्भुत परिवर्तन का समावेश हुआ, जिसका अवलोकन कर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही । जेल में सब से बड़ी बात तो यह थी कि प्रत्येक आदमी अपनी अपनी नेतागिरी की दुहाई देता था । कोई भी बड़े छोटे का भेद न रहा । बड़े अनुभवी पुरूषों की बातों की अवहेलना होने लगी । डिसप्लिन का नाम भी न रहा । बहुधा उल्टे जवाब मिलने लगे । छोटी सी छोटी बातों पर मतभेद हो जाता । इस प्रकार का मतभेद कभी-कभी वैमनस्य तक का रूप धारण कर लेता । आपस में झगड़ा भी हो जाता ।

खैर ! जहां चार बर्तन रहते हैं वहां खटकाते ही हैं । ये लोग तो मनुष्य देहधारी थे । परन्तु लीडरी की धुन ने पार्टी बन्दी का ख्याल पैदा कर दिया । जो नवयुवक जेल के बाहर अपने से बड़ों की आज्ञा को वेद-वाक्य के समान मानते थे वे ही उन लोगों का तिरस्कार तक करने लगे । इसी प्रकार आपस का वादा विवाद कभी-कभी भयंकर रूप धारण कर लिया करता । प्रान्तीय प्रश्न छिड़ जाता । बंगाली तथा संयुक्त प्रान्त वासियों के कार्य की आलोचना होने लगती । इसमें कोई सन्देह नहीं कि, बंगाल ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में दूसरे प्रान्तों से अधिक कार्य किया है ।

किन्तु बंगालियों की हालत यह है कि जिस कार्यालय या दफतर में एक भी बंगाली पहुंच जावेगा थोड़े ही दिनों में ही उस स्थान पर बंगाली ही बंगाली दिखाई देंगे । जिस शहर में बंगाली रहते हैं उनकी बस्ती अलग ही बसती है । बोली भी अलग । खान-पान भी एकदम अलग । यही सब जेल में अनुभव हुआ । जिन महानुभावों में त्याग की मूर्ति समझता था, उनके अन्दर बंगालीपने का भाव देखा ।

मैंने जेल से बाहर कभी स्वप्न में भी यह विचार न किया था कि क्रान्तिकारी दल के सदस्यों में भी प्रान्तीय भावों का समावेश होगां । मैं तो यही समझता रहा कि क्रान्तिकारी तो समस्त भारतवर्ष को स्वतन्त्र करने का प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें किसी प्रान्त विशेष से क्या सम्बन्ध । परन्तु साक्षात् अनुभव कर लिया कि प्रत्येक बंगाली के दिमाग में कविवर रवीन्द्र नाथ का गीत आमार सोनार बांगला, आमितोमा के भालो वासी मेरे सोने का बंगाल मैं तुझ से मुहब्बत करता हूं  इत्यादि ठूंस-ठूंस कर भरा था,  जिसका उनके नेमित्तिक जीवन में पग-पग पर प्रकाश होता था ।

अनेक प्रयत्न करने पर भी जेल के बाहर इस प्रकार का अनुभव कदापि न प्राप्त हो सकता था । बड़ी भयंकर से भयंकर आपत्ति में भी मेरे मुंह से कभी आह न निकली । प्रिय सहोदर का देहान्त होने पर भी आंख से आंसू न गिरा, किन्तु इस दल के कुछ व्यक्ति ऐसे थे जिनक आज्ञा को मैं संसार में सब से श्रेष्ठ मानता था, जिनकी जरा से कड़ी दृष्टि भी मैं सहन न कर सकता था, जिन के कटु वचनों के कारण मेरे हृदय पर चोट लगती थी, और अश्रुओं का श्रोत उबल पड़ता था । मेरी इस अवस्था को देख कर दो चार मित्रों को जो मेरी प्रकृति को जानते थे बड़ा आश्चर्य होता था ।

लिखते हुये हृदय कम्पित होता है कि उन्हीं सज्जनों में बंगाली तथा अबंगाली का भाव इस प्रकार भरा था कि बंगालियों की बड़ी से बड़ी भूल, हठधर्मी तथा भीरूता की अवहेलना की गई । यह देखकर पुरूषों का साहस बढ़ता था, नित्य नई चालें चलीं जाती थी । आपस में ही एक दूसरे के विरूद्ध षड़्यन्त्र रचे जाते थे । बंगालियों का न्याय अन्याय सब सहन कर लिया जाता था । इन सारी बातों ने मेरे हृदय को टूक-टूक कर डाला । सब कृत्यों को देख मैं मन ही मन घुटा करता । 

एक बार विचार हुआ कि सरकार से समझौता कर लिया जावे । बैरिस्टर साहब ने खुफिया पुलिस के कप्तान से परामर्श आरम्भ किया । किन्तु यह सोचकर कि इससे क्रान्तिकारी दल की निष्ठा न मिट जावे, यह विचार छोड़ दिया गया, युवकबृन्द की सम्मति हुई कि अनशन व्रत कर के सरकार से हवालाती की हालत में ही मांगें पूरी करा ली जावें । क्योंकि लम्बी-लम्बी सजायें होंगी । संयुक्त प्रान्त के जेलों में साधारण कैदियों का भोजन खाते हुये सजा काट कर जेल से जिन्दा निकलना कोई सरल कार्य नहीं ।

जितने राजनैतिक कैदी षड़यन्त्रों के सम्बन्ध में सजा पाकर इस प्रान्त के जेलों में रखे गये उनमें से पांच छः महात्माओं ने इस प्रान्त के जेलों के व्यवहार के कारण ही जेलों में प्राण त्याग किये । इस विचार के अनुसार काकोरी के लगभग सब हवालातियों ने अनशन व्रत आरम्भ कर दिया । दूसरे ही दिन सब पृथक कर दिये गये । कुछ व्यक्ति डिस्टिक्ट जेल में रखे गये, कुछ सेन्टल जेल भेजे गये । अनशन करते पन्द्रह दिवस व्यतीत हो गये, सरकार के कान पर जूं  न रेंगी । उधर सरकार का काफी नुकसान हो रहा था ।

जज साहब तथा दूसरे कचहरी के कार्यकर्ताओं को घर बैठे का वेतन देना पड़ता था । सरकार को स्वयं चिन्ता थी कि किसी प्रकार अनशन छूटे । जेल अधिकारियों ने पहले आठ आने रोज तय किये थे । मैंने उस समझौते को अस्वीकार कर दिया । और बड़ी कठिनता से दस आने रोज पर ले आया । उस अनशन व्रत में पन्द्रह दिवस तक मैंने केवल जल पी कर निर्वाह किया था । मुझे सोलहवें दिन नाक से दूध पिलाया गया था । श्रीयुत् रोषनसिंह जी ने भी इसी प्रकार मेरा साथ दिया था । वे पन्द्रह दिन तक लगभग बराबर चलते फिरते रहे थे । स्नानादि करके अपने नैमित्तिक कर्म भी कर लिया करते थे ।

दस दिन तक तो मेरे मुंह को देखकर अनजान पुरूष यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि मैं अन्न नहीं खाता । समझौते के जिन खुफिया पुलिस के अधिकारियों से मुख्य नेता महोदय का वार्तालाप बहुधा एकान्त में हुआ करता था, समझौते की बात खत्म हो जाने पर भी आप उन लोगों से मिलते रहे । मैंने कुछ   विशेष ध्यान न दिया । यदा कदा दो एक बात से पता चलता  कि समझौते के अतिरिक्त कुछ  दूसरी तरह की बातें भी होती है ।

मैंने इच्छा प्रकट की कि मैं भी एक समय सी0आई0डी0 के कप्तान से मिलूं, क्योंकि मुझ से पुलिस बहुत असंतुष्ट थी । मुझे पुलिस से न मिलने दिया गया । परिणाम स्वरूप सी0आईडी0 वाले मेरे पूरे दुश्मन हो गये । सब मेरे व्यवहार की ही शिकायत किया करते । पुलिस अधिकारियों से बातचीत करके मुख्य नेता महाशय को कुछ आशा बंध गई । आप का जेल से निकलने का उत्साह जाता रहा ।

जेल से निकलने के उद्योग में जो उत्साह था, वह बहुत ढीला हो गया । नवयुवकों की श्रद्धा को मुझसे हटाने के लिये अनेकों प्रकार की बातें की जाने लगीं । मुख्य नेता महोदय ने स्वयं कुछ कार्य कर्ताओं से मेरे सम्बन्ध में कहा कि ये कुछ रूपये खा गये । मैंने एक-एक पैसे का हिसाब रखा था । जैसे ही मैंने इस प्रकार की बातें सुनी, मैंने कार्यकारिणी के सदस्यों के सामने रख कर हिसाब देना चाहा, और अपने विरूद्ध आक्षेप करने वाले को दण्ड देने का प्रस्ताव उपस्थित किया ।

अब तो बंगालियों का साहस न हुआ कि मुझ से हिसाब समझें । मेरे आचरण पर भी आक्षेप किये गये । जिस दिन सफाई की बहस में मैंने समाप्त की, सरकारी वकील ने उठ कर मुक्त कंठ से मेरी बहस की प्रशंसा की कि सैकड़ों वकीलों से अच्छी बहस की । मैंने नमस्ते कर उत्तर दिया कि आप के चरणों की कृपा है । क्योंकि इस मुकद्में के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह को सुन कर मैंने भी साहस किया था ।         

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प्रलोभन, शिनाख़्त तथा बनवारीलाल

फ़रवरी 13, 2009 को 2:33 पूर्वाह्न | आत्म-चरित, काकोरी षड़यंत्र, खण्ड-4 में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ
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बनारसीलाल के सम्बन्ध में सब मित्रों ने कहा था कि इस से अवश्य धोखा होगा, पर मेरी बुद्धि में कुछ न समाया था । प्रत्येक जानकार ने बनारसीलाल के सम्बन्ध में यही भविष्यवाणी की थी कि वह आपत्ति पड़ने पर अटल न रह सकेगा । इस कारण सब ने उसे किसी प्रकार के गुप्त कार्य में लेने की मनाही की थी । अब तो जो होना था सो हो ही गया । अब आगे..

थोड़े दिनों के बाद जिला कलेक्टर मिले । कहने लगे फांसी हो जावेगी । बचना हो तो बयान दे दो । मैंने कुछ उत्तर न दिया । तत्पश्चात खुफिया पुलिस के कप्तान साहब मिले, बहुत सी बातें की । कई कागज दिखलाये । मैनें कुछ कुछ अन्दाजा लगाया कि कितनी दूर तक वे लोग पहुंच गये है । मैंने कुछ बातें बनाई ताकि पुलिस का ध्यान दूसरी ओर चला जावे,  परन्तु उन्हें तो विश्वसनीय सूत्र हाथ लग चुका था, वे बनावटी बातों पर क्यों विश्वास करते ? अन्त में उन्होंने अपनी यह इच्छा प्रकट की कि यदि मैं बंगाल का सम्बन्ध बताकर कुछ बोलशेविक सम्बन्ध के विषय में अपना बयान दे दूं ।

तो वह मुझे थोड़ी सी सजा करा देंगे,  और सजा के थोड़े दिनों बाद ही जेल से निकाल कर इंग्लैण्ड भेज देंगे । और पन्द्रह हजार रूपये पारितोषिक सरकार से दिला देंगे । मैं मन ही मन बहुत हंसता था । अन्त में एक दिन फिर मुझसे जेल में मिलने को गुप्तचर विभाग के कप्तान साहब आये । मैंने अपनी कोठरी में से निकलने से ही इन्कार कर दिया । वह कोठरी पर आकर बहुत सी बातें करते रहें ।

अन्त में परेशान होकर चले गये । शिनाख्तें कराई गई पुलिस को जितने आदमी मिल सके उतने आदमी लेकर शिनाख्तें कराई । भाग्यवश श्री अइनुद्दीन साहब मुकदमें के मजिस्टेट मुकर्रर हुए,  जी भर कर के पुलिस की मदद की । शिनाख्तों में अभियुक्तों को साधारण मजिस्टेटों की भांति भी सुविधायें न दी । दिखाने के लिये कागजी कार्यवाई खूब साफ रखी । जबान के बड़े मीठे थे । प्रत्येक अभियुक्त से बड़े प्रेम से मिलते थे । बड़ी मीठी मीठी बातें करते थे । सब समझतें थे कि हम से सहानुभूति रखते है ।

कोई न समझ सका कि अन्दर ही अन्दर घाव कर रहे हैं । इतना चालाक अफसर शायद ही केाई दूसरा हो । जब तक मुकद्दमा उनकी अदालत में रहा किसी को कोई शिकायत का मौका ही न दिया । अगर कभी कोई बात भी हो जाती तो वह ऐसे ढ़ंग से उसे टालने की कोशिश करता कि किसी को बुरा भी न लगता । बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में अभियुक्तों से क्षमा तक मांगने में संकोच न किया । किन्तु कागजी कार्रवाई में इतना होशियार था कि जो कुछ लिखा सदैव अभियुक्तों के विरूद्ध । जब मामला सेशन सुपुर्द किया और आज्ञापत्र में युक्तियां दीं, तब जाकर सब की आंखें खुलीं कि कितना गहरा घाव मार दिया । मुकद्मा अदालत में न आया था ।

उसी समय रायबरेली में बनवारीलाल की गिरफतारी हुई । मुझे हाल मालूम हुआ । मैंने पंडित हरकरननाथ से कहा कि सब काम छोड़कर सीधे रायबरेली जावें और बनवारीलाल से मिलें, किन्तु उन्होंने मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान दिया । मुझे बनवारी लाल पर पहले से ही सन्देह था, क्योंकि उसका रहन-सहन इस प्रकार का था कि जो ठीक न था । जब दूसरे सदस्यों के साथ रहता, तब उनसे कहा करता कि मैं जिला-संगठनकर्ता हूं मेरी गणना अधिकारियों में है । मेरी आज्ञा पालन किया करो । मेरे जूठे बर्तन मला करो । कुछ विलासिता प्रिय भी था । प्रत्येक समय शीशा, कन्घा तथा साबुन साथ रखता था ।

मुझे इस से भय था, किन्तु हमारे दल के एक खास आदमी का वह विश्वासपात्र रह चुका था । उन्होंने सैकड़ों रूपये देकर उस की सहायता की थी । इसी कारण हम लोग भी अन्त तक उसे मासिक सहायता देते रहे थे । मैने बहुत कुछ हाथ पैर मारे । पर कुछ भी न चली, और जिस का मैं भय करता था वहीं हुआ । भाड़े के टट्टू अधिक बोझ न सम्भाल सका, उस ने बयान दे ही दिये । जब तक वह गिरफतार न हुआ था कुछ सदस्यों ने इस के पास जो अस्त्र थे वे मांगे । पर इसने न दिये । जिला अफसर की शान में रहा । गिरफतार होते ही सब शान मिट्टी में मिल गई ।

बनवारी लाल के बयान दे देने से पुलिस का मुकद्मा मजबूती पकड़ गया । यदि वह अपना बयान न देता तो मुकद्मा बहुत कमजोर था । सब लोग चारों आर से एकत्रित कर के लखनउ जिला जेल में रखे गये । थोड़े समय तक अलग-अलग रहे, किन्तु अदालत में मुकद्मा आने से पहले ही एकत्रित कर दिये गये । मुकद्में में रूपये की जरूरत थी । अभियुक्तों के पास क्या था ?

उनके लिये धन संग्रह करना कितना दुस्तर था न जाने किस प्रकार निर्वाह करते थे । अधिकतर अभियुक्तों का कोई सम्बन्धी पैरवी भी न कर सकता था । जिस किसी के कोई था भी वह बाल बच्चों तथा घर को संभालता था, इतने समय तक घर बार छोड़ कर मुकद्मा करता । यदि चार अच्छे पैरवी करने वाले होते, तो पुलिस का तीन चैथाई मुकद्मा टूट जाता ।

लखउन ऐसे जनाने शहर में मुकद्मा हुआ, जहां अदालत में कोई भी शहर का आदमी न आता था । इतना भी तो न हुआ कि एक अच्छा प्रेस रिपोर्टर ही रहता, मुकद्में की सारी कार्यवाही को, जो कुछ अदालत में होता था, प्रेस में भेजता रहता । इण्डियन डेली टेलीग्राफ वालों ने कृपा की । यदि कोई अच्छा रिपोर्टर आ भी गया, और कुछ अदालत की कार्यवाही ठीक-ठीक प्रकाशित हुई तो पुलिस वालों ने जज साहब से मिल कर तुरन्त उस रिपोर्टर को निकलवा दिया । जनता की कोई सहानुभूति न थी ।

जो पुलिस के जी में आया करती रही, इन सारी बातों को देख कर जज का साहस बढ़ गया । उसने जैसा जी चाहा सब कुछ किया । अभियुक्त चिल्लाये हाय! हाय! पर कुछ भी सुनवाई न हुई । और बातें तो दूर, श्रीयुत दामोदर स्वरूप सेठ को पुलिस ने जेल में सड़ा डाला । लगभग एक वर्ष तक आप जेल में तड़पते रहे । एक सौ पाउण्ड से केवल 66 पाउण्ड वजन रहा गया । कई बार जेल में मरणासन्न हो गये ।

नित्य बेहोशी आ जाती थी । लगभग दस मास तक कुछ भी भोजन न कर सके । जो कुछ छटांक दो छटांक दूध किसी प्रकार पेट में पहुंच जाता था, उससे इस प्रकार की विकट वेदना होती थी कि कोई आप के पास खड़े होकर उस छटपटाने के दृश्य को देख न सकता था । एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया,  जिसमें तीन डाक्टर थे । उन बुद्धू की जब कुछ समझ में न आया, तो यह कह दिया गया कि सेठ जी को कोई भी बीमारी ही नहीं है ।

 

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