अशफ़ाकउल्ला ख़ाँ वारसी : अन्तिम समय में दो शब्द

मई 18, 2009 को 5:30 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, काकोरी के शहीद, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना | 11 टिप्पणियाँ
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नमस्कार ! एक  अँतराल  के  पश्चात  यह  कड़ियाँ  प्रारँभ  करने  का  मन बनाया है । किसी हुतात्मा की अवमानना सहन न कर पाना,एक प्रमुख कारण रहा था । न जाने कब, हम इन सिरफिरों को गँभीरता से ले पायेंगे ?यदि इनके स्थान पर कोई स्वयँ का सम्बन्धी शहीद हो गया होता.. तो ?             
इस प्रस्तुति पर होली की शुभकामनायें, और फ़ोलो-मी जैसे सँदेश क्या दर्शाते हैं ?
मेरी  धर्मपत्नी  श्रीमती  रूबी  मज़ूमदार,  सहयोगिनी अमिता  श्रीवास्तव  एवँ  कतिपय  अन्य  मित्रों  का  मानना है, कि  अपनों  से  ऎसी  खिन्नता  के  चलते  हिन्दी जगत  और  विश्व समुदाय  को  क्षति पहुँचाने का मेरा अधिकार नहीं बनता है । किंवा यह चूक अनजाने में होने जा रही थी । अस्तु
, आत्मकथा की शेष कड़ियाँ आज से प्रारँभ हो रहीं हैं । यह सुनिश्चित कर लिया गया है, कि पाठ का क्रम मूल पुस्तक का ही रहे ।  सुधी पाठक अबतक की अनुपस्थिति एवँ पीड़ा के लिये क्षमा करें –

तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये ।
बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।।

….. उनकी बला से कि कोई तकलीफ उठावें । यदि कोई एक दो चालाक हुए भी तो थोड़े दिन बड़े ओहदे की फिराक में काम दिखाया,  दौड़ धूप की,  कुछ पदवृद्धि हो गई और सब काम बन्द । इस प्रान्त में कोई बाकायदा पुलिस का गुप्तचर विभाग नहीं, जिस को नियमित रूप से शिक्षा दी जाती हो । फिर काम करते-करते अनुभव हो ही जाता है । इसके आगे ’ बिस्मिल ’ जी  लिखते हैं :

मैनपुरी षडयन्त्र तथा इस षडयन्त्र से इसका पूरा पता लग गया, कि थोड़ी सी कुशलता से कार्य करने पर पुलिस के लिये पता पाना बड़ा कठिन है । वास्तव में उनके कुछ भाग्य ही अच्छे होते है । जब से इस मुकदमें की जांच शुरू हुई, पुलिस ने इस प्रान्त के सन्दिग्ध क्रान्तिकारी व्यक्तियों पर दृष्टि डाली, उनसे मिली, बातचीत की । एक दो को कुछ धमकी दी । चोर की दाढ़ी में तिनका वाली जनश्रुति के अनुसार एक महाशय से पुलिस को सारा भेद मालूम हो गया । हम सबके सब बड़े चक्कर में थे, कि इतनी जल्दी पुलिस ने मामले का पता कैसे लगा लिये। उक्त महाशय की ओर तो ध्यान भी न जा सकता था ।

पर गिरफतारी के समय मुझसे तथा पुलिस के अफसर से जो बातें हुई, उनमें पुलिस अफसर ने वे सब बातें मुझ से कहीं जिन को मेरे तथा उक्त महाशय के  अतिरिक्त कोई भी दूसरा जान ही न सकता था । और भी बड़े पक्के तथा बुद्धि गम्य प्रमाण मिल गये, कि जिन बातों को उक्त महाशय जान सके थे, वे ही पुलिस जान सकी । जो बातें आप को मालूम न थी, वे पुलिस को किसी प्रकार न मालूम हो सकी । उन बातों से यह निश्चय हो गया कि यह काम उन्हीं महाशय का है । यदि ये महाशय पुलिस के हाथ न आते और भेद न खोल देते, तो पुलिस सिर पटक कर रह जाती, कुछ भी पता न चलता ।

बिना दृढ़ प्रमाणों के भयकंर से भयंकर व्यक्ति पर भी हाथ रखने का साहस नहीं होता, क्योंकि जनता में आन्दोलन फैलने से बदनामी हो जाती है । सरकार पर जवाबदेही आती है । अधिक से अधिक दो चार मनुष्य पकड़े जाते, और अन्त में उन्हें भी छोड़ना पड़ता । परन्तु जब पुलिस को वास्तविक सूत्र हाथ आ गया, उसने अपने सत्यता को प्रमाणित करने के लिये लिखा हुआ प्रमाण पुलिस कोदिया, उस अवस्था में भी यदि पुलिस गिरफतारियां न करती, तो फिर कब करती ? जो  भी  हुआ, परमात्मा  उन  का  भी  भला करे ।  अपना तो जीवन भर यही उसूल रहा-

सताये तुझ को जो कोई बे वफ़ा बिस्मिल ।
तो मुंह से कुछ न कहना आह! कर लेना ।।
हम शहीदा ने वफा का दीनो ईमां और है ।
सिजदा करते हैं हमेशा पांव पर जल्लाद ।।

मैंने इस अभियोग में जो भाग लिया अथवा जिनको जिन्दगी की जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी, उन में से सब से ज्यादा हिस्सा श्रीयुत अशफाकउल्ला खां वारसी का है । मैं अपनी कलम से उन के लिये भी अन्तिम समय में दो शब्द लिख देना अपना कर्तव्य समझता हूं ।

अशफ़ाक
मुझे भली भांति याद है कि मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहांपुर आया था, तो तुम से स्कूल में भेंट हुई थी । तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी।  तुम ने मुझ से मैनपुरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करना चाही थी । मैंने यह समझा कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझ से इस प्रकार की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि से दिया था । तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था । तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों का प्रकाश हो रहा था ।

तुम ने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने इरादे पर डटे रहे । जिस प्रकार हो सका कांग्रेस में बातचीत की । अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का वि्श्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नही, तुम्हारे दिल में मुल्क की खिदमत करने की ख्वाहि्श थी । अन्त में तुम्हारी विजय हुई । तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली । तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे । यह जान कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे भाई बन कर तुम्हें संतोष न हुआ ।

तुम समानता के अधिकार चाहते थे, तुम मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे । वही हुआ ? तुम मेरे सच्चे मित्र थे । सब को  आश्चर्य  था  कि  एक  कटटर  आर्य  समाजी  और  मुसलमान  का  मेल  कैसा ? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था । आर्यसमाज मन्दिर में मेरा निवास था,किन्तु तुम इन बातों की किंचितमात्र चिन्ता न करते थे । मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे । मेरे पास आर्यसमाज मन्दिर में आते-जाते थे । हिंदू-मुसलिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लम खुल्ला गालियां देते थे, काफिर  के  नाम  से पुकारते थे, पर तुम कभी भी उन के विचारों से सहमत न हुये ।

सदैव हिन्दू मुसलिम ऐक्य के पक्षपाती रहे । तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त थे । तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही था कि मुसलमानों को खुदा अकल देता कि वे हिन्दुओं के साथ मेल कर के हिन्दोस्तांन की भलाई करते । जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी पढ़ सकें ?

तुमने स्वदेश भक्ति के भावों को भी भली भांति समझाने के लिये ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया । अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुंह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे, जिससे सबको बड़ा आ्श्चर्य होता था । तुम्हारी इस प्रकार की प्रकृति देख कर बहुतों को संदेह होता था, कि कहीं इस्लाम-धर्म त्याग कर शुद्धि न करा ले । पर तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार से अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली । बहुधा  मित्र मण्डली में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विष्वास करके धोखा न खाना ।

तुम्हारी जीत हुई, मुझ में तुम में कोई भेद न था । बहुधा मैंने तुमने एक थाली में भोजन किये । मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि हिन्दू मुसलमान में कोई भेद है । तुम मुझ पर अटल विश्वास तथा अगाध प्रीति रखते थे, हां ! तुम मेरा नाम लेकर नहीं पुकार सकते थे । तुम तो सदैव राम कहा करते थे । एक समय जब तुम्हें हृदय-कम्प का दौरा हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुंह से बारम्बार राम, हाय राम ! के शब्द निकल रहे थे । पास खड़े हुए भाई बान्धवों को आष्चर्य था कि राम, राम कहता है ।

कहते थे कि अल्लाह, अल्लाह कहो, पर तुम्हारी राम-राम की रट थी । उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को जानते थे । तुरन्त मैं बुलाया गया । मुझसे मिलने पर तुम्हें षान्ति हुई,  तब सब लोग राम-राम के भेद को समझे । अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथा मित्रता का परिणाम क्या हुआ ? मेरे विचारों के रंग में तुम भी रंग गये । तुम भी एक कट्टर क्रान्तिकारी बन गये ।  अब तो तुम्हारा दिन-रात प्रयत्न यही था, कि जिस प्रकार हो सके मुसलमान नवयुवकों में भी क्रान्तिकारी भावों का प्रवेष हो सके। वे भी क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दे ।

जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे, सब  पर  तुमने  अपने  विचारों  का  प्रभाव  डालने  का  प्रयत्न  किया । बहुधा क्रान्तिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैने कैसे एक मुसलमान को क्रान्तिकारी दल का प्रतिश्ठित सदस्य बना लिया । मेरे साथ तुमने जो कार्य किये, वे सराहनीय है !  तुम ने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना न की । एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर रहते थे । तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था । तुम्हारे भाव बड़े उच्च थे ।

मुझे यदि शान्ति है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुंह उज्जवल कर दिया । भारत के इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गई, कि अशफाकउल्ला ख़ाँ ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दिया । अपने भाई बन्धु तथा सम्बन्धियों के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया । गिरफतार हो जाने पर भी अपने विचारों में दृढ़ रहा ! जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे, वैसे ही मानसिक वीर तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए । इन सबके  परिणाम  स्वरूप अदालत  में तुमको  मेरा सहकारी ठहराया गया, और जज ने हमारे मुकदमें का फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में भी जयमाल फांसी की रस्सी पहना दी ।

प्यारे भाई तुम्हे यह समझ कर सन्तोष होगा कि जिसने अपने माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश-सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट कर दिया, जिसने अपना तन मन धन सर्वस्व मातृसेवा में अर्पण करके अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया,  उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया ।

असगर हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है ।
रखना कभी न पांव, यहां सर लिये हुये ।।
सहायक काकोरी शडयन्त्र का भी फैसला जज साहब की अदालत से हो गया। श्री अशफाकउल्ला खां वारसी को तीन फांसी और दो काले पानी की आज्ञायें हुईं । श्रीयुत शचीन्द्रनाथ बख़्शी को पांच काले पानी की आज्ञायें हुई । एक सन्देश
वे मरते समय देशवासियों के नाम एक सन्दे्श भी छोड़ गये । सन्दे्श का सारांश यहां दिया जाता है –

भारतमाता के रंग-मंच पर अपना पार्ट अब हम अदा कर चुके । हम ने गलत सही जो कुछ किया, वह स्वतन्त्रता प्राप्त की भावना से किया । हमारे इस काम की कोई प्रशंसा करेंगे और कोई निन्दा । किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ी है । क्रान्तिकारी बड़े वीर योद्धा और बड़े अच्छे वेदान्ती होते है । वे सदैव अपने देश की भलाई सोचा करते है । लोग कहते हैं कि हम देश को भय त्रस्त करते है,किन्तु बात ऐसी नहीं है । इतनी लम्बी मियाद तक हमारा मुकदमा चला मगर हम ने किसी एक गवाह तक को भयत्रस्त करने की चेष्टा नहीं की,न किसी मुखबिर को गोली मारी । हम चाहते तो किसी गवाह,या किसी खुफिया पुलिस के अधिकारी या किसी अन्य ही आदमी को मार सकते थे । किन्तु हमारा यह उदेश्य नहीं था । हम तो कन्हाई लाल दत्त,खुदीराम बोस, गोपी मोहन साहा आदि की स्मृति में फांसी पर चढ़ जाना चाहते थे ।

मैं गिरफ़्तार हो गया

फ़रवरी 8, 2009 को 12:34 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, काकोरी षड़यंत्र, खण्ड-4 | 2 टिप्पणियाँ
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नवयुवकों का भी उत्साह बढ़ गया । जितना कर्जा था निपटा दिया । अस्त्रों की खरीद के लिये लगभग एक हजार रूपये भेज दिये । प्रत्येक केन्द्र के कार्यकर्ता को यथा स्थान भेज कर दूसरे प्रान्तों में भी कार्य विस्तार करने का निर्णय कर के कुछ प्रबन्ध किया । एक युवक दल ने बम बनाने का प्रबन्ध किया,  मुझसे भी सहायता चाही । मैंने आर्थिक सहायता देकर अपना एक सदस्य भेजने का वचन दिया । किन्तु कुछ त्रुटियां हुई, जिससे सम्पूर्ण दल अस्त-व्यस्त हो गया । मैं इस  विषय में  कुछ  भी  न  जान  सका  कि   दूसरे   देश  के क्रान्तिकारियों ने प्रारम्भिक अवस्था में हम लोगों की भांति प्रयत्न किया या नहीं । यदि पर्याप्त अनुभव होता तो इतनी साधारण भूलें न करे ।

यह अवस्था देख मुझे बड़ा खेद तथा आश्चर्य होता है क्योंकि नेतागिरी का भूत सबसे भयानक होता है । जिस समय से यह भूत खोपड़ी पर सवार होता है, उसी समय से सब काम चौपट हो जाता है, केवल एक दूसरे के दोष देखने में समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है ।

त्रुटियों के होते हुये भी कुछ भी न बिगड़ता और न कुछ भेद खुलता, न इस अवस्था को पहुंचते । क्योंकि मैंने जो संगठन किया था उसमें किसी ओर से मुझे कोई कमजोरी न दिखाई देती थी । कोई भी किसी प्रकार की कमजोरी न समझ सकता था । इसी कारण आंख बन्द किये बैठे रहे । किन्तु आस्तीन में सांप छिपा हुआ था ! ऐसा गहरा मुंह मारा कि चारों खाने चित्त कर दिया !  कहा है कि..

जिन्हें हम हार समझे थे गला अपना सजाने को।
वही अब नाग बन बैठे हमारे काट खाने को ।।

नवयुवकों में आपस की होड़ के कारण बहुधा कलह भी हो जाती थी, जो भयंकर रूप धारण कर लेती । मेरे पास जब मामला आता तो मैं प्रेमपूर्वक समिति की दशा का अवलोकन करके, सब को शान्ति कर देता । कभी नेतृत्व को लेकर वादाविवाद चल जाता । एक केन्द्र के निरीक्षक से वहां के कार्यकर्ता अत्यन्त असन्तुष्ट थे ।

क्योंकि निरीक्षक से अनुभवहीनता के कारण कुछ भूलें हो गई थीं । यह अवस्था देख मुझे बड़ा खेद तथा आश्चर्य होता है क्योंकि नेतागिरी का भूत सबसे भयानक होता है । जिस समय से यह भूत खोपड़ी पर सवार होता है, उसी समय से सब काम चौपट हो जाता है । केवल एक दूसरे के दोष देखने में समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है । इस प्रकार के समाचार सुन मैंने सबको एकत्रित कर खूब फटकारा । सब अपनी त्रुटि समझ कर पछतायें और प्रीति पूर्वक आपस में मिल कर कार्य करने लगे ।

पर ऐसी अवस्था हो गई थी कि दलबन्दी की नौबत आ गई थी । एक प्रकार से तो दलबन्दी हो ही गई थी पर मुझ पर सब की श्रद्धा थी और मेरे वक्तव्य को सब सदस्य  मान लेते थे । सब कुछ होने पर भी मुझे किसी ओर से किसी प्रकार का सन्देह न था । किन्तु परमात्मा को ऐसा ही स्वीकार था जो इस अवस्था का दर्शन कराना पड़ा ।                             

गिरफ़्तारियाँ
काकोरी डकैती होने के बाद से ही पुलिस बहुत सचेत हुई ।
बड़े जोरों के साथ जांच आरम्भ हो गई । शाहजहांपुर में कुछ नई मूर्तियों के दर्शन हुये । कुछ पुलिस के विशेष सदस्य मुझसे भी मिले । चारों ओर शहर में यही चर्चा थी कि रेलवे डकैती किसने कर ली ? उन्हीं दिनों शहर में दो एक डकैती के नोट निकल आये ।

कुछ यह भी विचार था कि दे्श की सहानुभूति की परीक्षा की जावे । जिस दे्श पर हम अपना बलिदान देने को उपस्थित हैं, उस दे्श के वासी हमारे साथ कितनी सहानुभूति रखते हैं ?

अब तो पुलिस का अनुसन्धान और भी बढ़ने लगा । कई मित्रों ने मुझसे कहा कि सतर्क रहो । दो एक सज्जन ने निश्चित रूपेण  समाचार दिया कि मेरी गिरफ़्तारी जरूर हो जावेगी ।  मेरी कुछ समझ में न आयां मैंने विचार किया कि यदि  गिरफ़्तारी हो भी गई तो पुलिस को मेरे विरूद्ध कुछ भी प्रमाण न मिल सकेगा । bismil_बिस्मिल मेरे विचार में मुझे अपनी बुद्धिमता पर कुछ अधिक ही  विश्वास था । अपनी बुद्धि के सामने दूसरों की बुद्धि को तुच्छ समझता था । कुछ यह भी विचार था कि दे्श में लोगों की सहानुभूति की परीक्षा की जावे । जिस दे्श पर हम सदैव अपना   बलिदान देने  को उपस्थित हैं,  उस दे्श के वासी हमारे साथ कितनी सहानुभूति रखते हैं ? 

कुछ जेल का अनुभव भी प्राप्त करना था । वास्तव में मैं काम करते करते श्रान्त हो गया था । भविष्य के कार्यों में अधिक नर-हत्या का ध्यान कर के मैं हत्बुद्धि सा हो गया था । मैंने किसी के कहने की कोई भी चिन्ता न की । रात्रि के समय ग्यारह बजे के लगभग एक मित्र के यहा से अपने घर पर गया । रास्ते में खुफिया पुलिस के सिपाहियों से भेंट हुई । कुछ विशेष रूप से उस समय भी वे मेरी देखभाल कर रहे थे । मैंने कोई चिन्ता न की और घर पर जाकर सो गया । प्रातःकाल चार बजने पर जगा ।

मेरे  शौचादि  से  निवृत्त   होने   पर   बाहर   द्वार   पर  जैसे बन्दूक  के  कुन्दों  का  शब्द  सुनाई  दिया, मैं समझ गया कि पुलिस आ गई है । मैं तुरन्त ही द्वार खोलकर बाहर गया । एक पुलिस अफसर ने बढ़कर हाथ पकड़ लिया । मैं गिरफ़्तार हो गया । मैं केवल एक अंगोछा पहने हुये था । पुलिस वालों को अधिक भय न था । पूछा यदि घर में कोई अस्त्र हो,  तो दे दीजिये ।  

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