राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।

जुलाई 20, 2009 को 1:00 पूर्वाह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा…  उनको  उचित  है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता  प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और  उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।  इसके आगे स्व० बिस्मिल लिखते हैं..

जो धनी मानी स्वदेश सेवार्थ बड़े-बड़े विद्यालयों तथा पाठशालाओं की स्थापना करते है, उनको उचित है कि विद्यापीठों के साथ-साथ उद्योगपीठ, शिल्पविद्यालय तथा कलाकौ्शल भवनों की स्थापना भी करें । इन विद्यालयों के विद्यार्थियों को नेतागीरी के लोभ से बचाया जावे । विद्यार्थियों का जीवन सादा हो और विचार उच्च हों । इन्हीं विद्यालयों में एक-एक उपदेशक विभाग भी हो, जिस में विद्यार्थी प्रचार करने का ढंग सीख सकें । जिन युवकों के हृदय में स्वदेश सेवा के भाव हो उनको कष्ट सहन करने की आदत डालकर सुसंगठित रूपसे ऐसा कार्य करना चाहिये, जिसका परिणाम स्थायी हो ।

कैथोराइन ने इसी प्रकार कार्य किया था । उदर पूर्ति के निमित्त कैथोराइन के अनुयायी ग्रामों में जाकर कपड़े सीते या जूट बनाते और रात्रि के समय किसानों को उपदे्श देते थें जिस समय से मैंने कैथोराइन की जीवनी का अंग्रेजी भाषा में अध्ययन किया, मुझ पर उस का बहुत प्रभाव हुआ।  मैंने तुरन्त उस की जीवनी कैथोराइन नाम से हिन्दी में प्रकाशित कराई ।

मैं भी उसी प्रकार काम करना चाहता था, पर बीच ही में क्रान्तिकारी दल में फंस गया । मेरा तो अब दृढ़ निश्चय हो गया है कि अभी पचास वर्ष तक क्रान्तिकारी दल की भारतवर्ष में सफलता नहीं हो सकती, क्योंकि  यहां  की  जनता  उसके  उपयुक्त  नहीं । अतएव क्रान्तिकारी दल का संगठन कर के व्यर्थ में नवयुवकों के जीवन को कष्ट करना और शक्ति का दुरूपयोग करना बड़ी भूल है । इससे लाभ के स्थान में हानि की सम्भावना बहुत अधिक है ।

नवयुवकों को मेरा अन्तिम सन्देश यही है कि वे रिवाल्वर या पिस्तौल को अपने पास रखने की इच्छा केा त्याग कर सच्चे देशसेवक बने । पूर्ण स्वाधीनता उन का ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी बनने का प्रयत्न करते रहें । फल की इच्छा छोड़ कर सच्चे प्रेम से कार्य करें । परमात्मा सदैव उनका भली ही करेगा ।

यदि देश हित मरना पड़े मुझ को सहस्त्रों बार भी ।
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाउं कभी ।।
हे ई्ष भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो ।
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।

सर फ़रोशाने वतन फिर देखलो मकतल में है ।
मुल्क पर कुर्बान हो जाने के अरमां दिल में हैं ।।
तेरा है जालिम की यारों और गला मजलूम का ।
देख लेंगे हौसला कितना दिले कातिल में है ।।
शोरे महशर बावपा है मार का है धूम का ।
बलबले जोशे शहादत हर रगे बिस्मिल में है ।।

आज 17 दिसम्बर 1927 ई0 को निम्नलिखित पक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जब कि 19 दिसम्बर 1927  ई0 सोमवार पौष कृष्ण 11 सम्वत् 1984 को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है । अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ही । यह सब सर्वशक्तिमान प्रभु की लीला है । सब कार्य उसके इच्छानुसार ही होते है । यह परम पिता परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किस को शरीर त्यागना होता है ।

मृत्यु के सकल उपक्रम निमित्त मात्र है । जब तक कर्म क्षय नहीं होता, आत्मा को जन्म-मरण के बन्धन में पड़ना ही होता है, यह शास्त्रों का निश्चय है । यद्यपि यह, वह परमब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणाम स्वरूप कौन सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा, किन्तु अपने लिये ये मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही पुनः भारतवर्ष में ही किसी निकटवर्ती सम्बन्धी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण करूंगा, क्योंकि मेरा जन्म जन्मान्तर यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो

कोई किसी पर हुकूमत न करें । सारे संसार में जनतन्त्र की स्थापना हो । वर्तमान समय में भारतवर्ष की बड़ी सोचनीय अवस्था है । अतएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब तक कि भारतवर्ष के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण स्वतन्त्र न हो जावेंगे, परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना होगी कि वह मुझे इसी देश में जन्म दें, ताकि मैं उसकी पवित्र वाणी वेद वाणी का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक पहुंचाने में समर्थ हो सकूं ।

सम्भव है कि मैं मार्ग निर्धारण में भूल करूं, पर  इसमें  मेरा  कोई  विशेष  दोष  नहीं, क्योंकि मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं । भूल  न  करना  केवल  सर्वज्ञ  से  ही  सम्भव है । हमें  परिस्थितियों  के  अनुसार  ही  सब  कार्य  करने  पड़े  और  करने  होंगे । परमात्मा  अगले  जन्म  में  सुबुद्धि  प्रदान  करें  कि  मैं  जिस  मार्ग  का  अनुसरण  करूं, वह  त्रुटि  रहित  ही  हो ।

अब मैं उन बातों का भी उल्लेख कर देना उचित समझता हूं जो काकोरी षड्यन्त्र के अभियुक्तों के सम्बन्ध में सेशन जज के फैसला सुनाने के पश्चात घटित हुई । 6 अप्रैल सन 27 ई को सेशन जज ने फैसला सुनाया था। 18 जुलाई सन 27 ई0 को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई । इसमें कुछ की सजायें बढ़ी और एकाध को कम भी हुई । अपील होने की तारीख से पहले मैं ने संयुक्त प्रान्त के गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि अब भविष्य में क्रान्तिकारी दल से कोई सम्बन्ध न रखूंगा । इस मेमोरिलय का जिक्र मैंने अपनी अन्तिम दया प्रार्थना पत्र में जो मैं ने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था, उसमें कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना न स्वीकार की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमें की बहस लिखकर भेजी, जो छापी गई ।

जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी, तो उन्हें बड़ा सन्देह हुआ कि वह बहस मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का यह नतीजा निकला कि चीफ कोर्ट अवध से मुझे महा भयंकर षड्यन्त्रकारी की पदवी दी गई । मेरे पश्चाताप पर जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा का प्रकाश इस प्रकार किया कि यदि यह रामप्रसाद छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा । बुद्धि की प्रखरता तथा समझ पर कुछ प्रकाश डालते हुए निर्दयी हत्यारे के नाम से विभूषित किया गया । लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु काकारी षड़यन्त्र का चीफ कोर्ट आद्योपान्त, फैसला पढ़ने से भली भांति विदित होता है कि मुझे मुत्युदण्ड किस ख्याल से दिया गया ।

यह निश्चय किया गया कि रामप्रसाद ने सेशन जज के  विरूद्ध  अपशब्द  कहे  है, खुफिया  विभाग  के कार्यकर्ताओं पर लांछन लगाये हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके विरूद्ध आवाज उठाई है, अतएव रामप्रसाद सबसे बड़ा गुस्ताख मुलजिम है । अब माफी चाहे वह किसी भी रूप में मांगे, नहीं दी जा सकती । चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रान्तीय गवर्नर तथा फिर वाइसराय के पास दया प्रार्थना की गई । रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लहरी, रोशनसिंह तथा अ्शफ़ाक़उल्ला खां के मृत्यु दण्ड को बदलकर अन्य दूसरी सजा देने की सिफारि्श करते हुए मेम्बरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन पत्र दिया । मेरे पिता ने ढाई सौ रईस, आनरेरी  मजिस्ट्रेट  तथा  जमींदारों  के  हस्ताक्षर  से  एक अलग प्रार्थना पत्र भेजा, किन्तु श्रीमान सर बिलियम मेरिस की सरकार ने एक भी न सुनी ।

उसी समय लेज़िस्लेटिव एसेम्बली तथा कौंसिल आफ स्टेट के 78 सदस्यों  ने  भी  हस्ताक्षर  करके वाइसराय के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि काकोरी षड़यन्त्र के मृत्युदण्ड पाये हुओं को मृत्युदण्ड की सजा बदलकर दूसरी सजा कर दी जावे, क्योंकि दौरा जज ने सिफारिश की है कि यदि यह लोग पश्चाताप करें तो सरकार दण्ड कम कर दें । चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है ।

किन्तु वाइसराय महोदय ने भी एक न सुनी । इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा अन्य एसेम्बली के कुछ सदस्यों ने भी वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु दण्ड न दिया जावे । इतना होने पर सबको आ्शा थी कि वायसराय महोदय अवश्यमेव मृत्युदण्ड की आज्ञा रदद कर देंगे । इसी हालत में चुपचाप विजयाद्शमी से दो दिन पहले जेलों को तार भेज दिये गये, कि दया नहीं होगी । सब को फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई ।

जब मुझे सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल ने तार सुनाया, मैंने भी कह दिया कि आप अपना कार्य कीजिये । किन्तु सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया प्रार्थना का सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम सा बना रखा है कि प्रत्येक फांसी के कैदी की ओर से जिसकी दया भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहां से खारिज हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रान्तीय सरकार के पास अवश्य भेजते हैं कोई दूसरा जेल सुपरिन्टेन्डेण्ट ऐसा नहीं करता । उपरोक्त तार लिखते समय मेरा कुछ विचार हुआ कि प्रिवीकौंसिल इग्लैण्ड में अपील की जावे । मैंने श्रीयुत मोहनलाल सक्सेना वकील लखनउ को इस प्रकार की सूचना दी ।

बाहर किसी को वाइसराय की अपील खारिज होने की बात पर विश्वास भी न हुआ । जैसे तैसे करके श्रीयुत मोहनलाल द्वारा प्रिवीकौंसिल में अपील कराई गई । नतीजा पहले से ही मालूम था। वहां से भी अपील खारिज हुई । यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।

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जन्म जन्मान्तर परमात्मा ऐसी माता दें

जनवरी 18, 2009 को 11:27 अपराह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ
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अबतक आपने पढ़ा..

वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि एक सौ रूपये से अधिक का दावा है, यह मुकद्दमा खारिज हो जावेगा । किन्तु मुझ पर कुछ प्रभाव न हुआ, मैंने हस्ताक्षर न  किये । अपने जीवन में सर्वप्रकारेण सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाता, सत्य-सत्य कह देता था । मेरी माता मेरे धर्म-कार्य में तथा शिक्षादि में बड़ी सहायता करती थी । वह प्रातःकाल चार बजे ही मुझे जगा दिया करती थीं। मैं नित्य प्रति नियम पूर्वक हवन भी किया करता । अब आगे पढ़ें…

मेरी छोटी बहिन का विवाह करने के निमित्त माता जी तथा पिताजी ग्वालियर गये । मैं तथा श्री दादी जी शाहज़हाँपुर में ही रह गये, क्योंकि मेरी वार्षिक परीक्षा थी । परीक्षा समाप्त करके मैं भी बहिन के विवाह में सम्मिलित होने को गया । बारात आ चुकी थी । मुझे ग्राम के बाहर ही मालूम हेा गया कि बारात में वेश्या आई है । मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ । मैंने विवाह में कोई भाग न लिया । मैंने माता जी से थोड़े रूपये मांगे ।

माता जी ने मुझे लगभग 125 दिये जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया । यह अवसर रिवाल्वर खरीदने का अच्छा हाथ लगा । मैंने सुन रखा था कि रियासत में बड़ी आसानी से हथियार मिल जाते हैं । बड़ी खोज की । टोपीदार बन्दूक तथा पिस्तौल तो मिलते थे किन्तु कारतूसी हथियारों का कहीं पता नहीं । बड़े प्रयत्न के बाद एक महाशय ने मुझे ठग लिया और रू० 75 में टोपीदार पांच फायर करने वाला एक रिवाल्वर दिया, रियासत की बनी हुए बारूद और थोड़ी सी टोपियां दे दीं । मैं इसी को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ । सीधा शाहज़हाँपुर पहुंचा । रिवाल्वर को भर कर चलाया तो गोली केवल पन्द्रह या बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न थी ।

मुझे बड़ा खेद हुआ । माताजी भी जब लौट कर शाहज़हाँपुर आईं तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या लाये ?  मैंने कुछ कह कर टाल दिया । रूपये सब खर्च हो गये । स्यात एक गिन्नी बच रही  थी, सो वह मैंने माताजी को लौटा दी ।

मुझे जब किसी बात के लिए धन की आवश्यकता होती, मैं माता जी से कहता और वह मेरी मांग पूरी कर देती । मेरा स्कूल घर से एक मील दूर था । मैंने माता जी से प्रार्थना की कि मुझे साइकिल ले दें ।  उन्होंने लगभग एक सौ रूपये दिये । मैंने साइकिल खरीद ली । उस मैं अंग्रेजी के नवें दर्जें में आ गया था । किसी धार्मिक या देश सम्बन्धी पुस्तक पढ़ने की इच्छा होती तो माता जी ही से दाम ले जाता । लखनउ कांग्रेस जाने के लिये मेरी बड़ी इच्छा थी । दादी जी तथा पिता जी बहुत कुछ विरोध करते रहे, किन्तु माता जी ने मुझे खर्च दे ही दिया ।

उसी समय शाहज़हाँपुर में सेवा समिति का आरम्भ हुआ था । मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था । पिता जी तथा दादी जी को मेरे इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे किन्तु माता जी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं जिसके कारण उन्हें बहुधा पिताजी का ताड़ना तथा दण्ड भी सहन करना पड़ता था । वास्तव में मेरी माता जी स्वर्गीय देवी है ।

मुझ में जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माता जी तथा गुरूदेव श्री सोमदेव की कृपाओं का ही परिणाम है । दादी जी तथा पिता जी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किन्तु माता जी यही कहती कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा । माता जी के प्रोत्साहन तथा सदव्यवहार ने मुरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा ।

मेरी मां
ग्यारह वर्ष की उम्र में माता जी का विवाह कर शाहज़हाँपुर आई थी । उस समय तक आप नितान्त अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के सदृश थीं । शाहज़हाँपुर अपने के थोड़े दिनों बाद श्री दादीजी ने अपनी छोटी बहिन को बुला लिया । उन्हीं ने गृह-कार्य में माता जी को शिक्षा दी । थोड़े ही दिनों में माता जी ने सब गृह कार्य को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबन्ध करने लगी ।

मेरे जन्म होने के पांच या सात वर्ष बाद आपने हिन्दी पढ़ना प्रारम्भ किया । पढ़ने का शौक आप को खुद ही पैदा हुआ था । मोहल्ले की संग सहेली जो घर पर आ जाती थीं, उन्हीं में से जो कोई शिक्षित थीं, माता जी उन से अक्षर बोध करती । इसी प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता उस में पढ़ना लिखना करती । परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वे देवनागरी पुस्तकों का अवलोकन करने लगीं । मेरी बहिनों को छोटी आयु में माता जी ही उन्हें शिक्षा दिया करती थी ।

जब से मैंने आर्य समाज में प्रवेश किया, तब से माता जी से खूब वार्तालाप होता उस समय की अपेक्षा अब आपके विचार भी कुछ उदार हो  गये हैं यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्य की भांति संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता । शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी आपने मेरी वह सहायता की है जो मेजिनी को उनकी माता ने की थी । यथा समय मैं उन सारी बातों का उल्लेख करूंगा । माता जी का सब से बड़ा आदेश मेरे लिये वही था कि किसी की प्राणहानि न हो । उन का कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदण्ड न देना । आपके इस आदेश की पूर्ति करने के लिये मजबूरन दो एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी ।

जन्मदात्री जननी, इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण परिशोध करने के प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला । इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूं तो तुम से उऋण नहीं हो सकता । जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुम ने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुम ने किस प्रकार अपनी दैवी वाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है । तुम्हारी दया से ही मैं देशसेवा में संलग्न हो सका ।

धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी । जो कुछ शिक्षा मैने ग्रहण किया उस का भी श्रेय तुम्हीं हो है । जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश दिया करती थीं उसका स्मरण कर तुम्हारी स्वर्गीय मूर्तिका ध्यान आ जाता है और मस्तक नत हो जाता है । तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई तो बड़े स्नेह से हर एक बात को समझा किया । यदि मैंने घृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुम ने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे वह करो, किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं इसका परिणाम अच्छा न होगा । जीवनदात्री, तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन पोषण ही नहीं किया किन्तु आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं । जन्म जन्मान्तर परमात्मा ऐसी ही माता दें । यही इच्छा है ।

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