अन्तिम समय की बातें

मार्च 30, 2009 को 1:21 पूर्वाह्न | Posted in अंतिम समय की बातें, आत्मकथा, खण्ड-4, चँद शेर | 6 टिप्पणियाँ
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मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं  :  श्री बिस्मिल की इस स्वीकारोक्ति में मेरी असहमति का कोई स्थान नहीं है । कदाचित मुझे लगने लगा था, कि हम अपने देश के शहीदों के प्रति उदासीन हैं.. निश्चित ही यह हतोत्साहित करने का कारक हो सकता था.. पर ऎसा नही है ! हम उदासीन न सही पर उनको ठीक से जान पाने को उत्सुक अवश्य रहे हैं.. अनिश्चय से उत्पन्न इस स्थिति से .. इन कड़ियों को जारी रख पाने में इस अनावश्यक विलम्ब के लिये हुतात्मा क्षमा करें !
साथ ही .. इस प्रकार के प्रस्तुतिकरण में पृष्ठक्रम को तोड़ना कितना उचित है.. यह तो नहीं जानता, पर 
‘माशूक के थोड़े से एहसान  ‘ के बाद के पन्नों को प्रस्तुत करने से पहले, इसी पुस्तक से ‘ अंतिम समय की बातें ‘ को यहाँ पहले रखने का लोभ संवरण नही कर पा रहा हूँ..
इसके उपरांत
‘ थोड़े से एहसान ‘  के बाद की कड़ियाँ यथावत जारी रहेंगी ! शुभस्तुः 

सर फ़रोशाने वतन फिर देखलो मकतल में है ।
मुल्क पर कुर्बान हो जाने के अरमां दिल में हैं ।।
तेरा है जालिम की यारों और गला मजलूम का ।
देख लेंगे हौसला कितना दिले कातिल में है ।।
शोरे महशर बावपा है मार का है धूम का ।
बलबले जोशे शहादत हर रगे बिस्मिल में है ।।

आज 17 दिसम्बर 1927 ई0 को निम्नलिखित पक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जब कि 19 दिसम्बर 1927  ई0 सोमवार पौष कृष्ण 11 सम्वत् 1984 को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है । अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ही । यह सब सर्वशक्तिमान प्रभु की लीला है । सब कार्य उसके इच्छानुसार ही होते है । यह परम पिता परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किस को शरीर त्यागना होता है ।

मृत्यु के सकल उपक्रम निमित्त मात्र है । जब तक कर्म क्षय नहीं होता, आत्मा को जन्म-मरण के बन्धन में पड़ना ही होता है, यह शास्त्रों का निश्चय है । यद्यपि यह, वह परमब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणाम स्वरूप कौन सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा, किन्तु अपने लिये ये मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही पुनः भारतवर्ष में ही किसी निकटवर्ती सम्बन्धी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण करूंगा, क्योंकि मेरा जन्म जन्मान्तर यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो

कोई किसी पर हुकूमत न करें । सारे संसार में जनतन्त्र की स्थापना हो । वर्तमान समय में भारतवर्ष की बड़ी सोचनीय अवस्था है । अतएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब तक कि भारतवर्ष के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण स्वतन्त्र न हो जावेंगे, परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना होगी कि वह मुझे इसी देश में जन्म दें, ताकि मैं उसकी पवित्र वाणी वेद वाणी का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक पहुंचाने में समर्थ हो सकूं ।

सम्भव है कि मैं मार्ग निर्धारण में भूल करूं, पर इसमें मेरा कोई विशेष दोष नहीं, क्योंकि मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं । भूल न करना केवल सर्वज्ञ से ही सम्भव है । हमें परिस्थितियों के अनुसार ही सब कार्य करने पड़े और करने होंगे । परमात्मा अगले जन्म में सुबुद्धि प्रदान करें कि मैं जिस मार्ग का अनुसरण करूं, वह त्रुटि रहित ही हो ।

अब मैं उन बातों का भी उल्लेख कर देना उचित समझता हूं जो काकोरी षड्यन्त्र के अभियुक्तों के सम्बन्ध में सेशन जज के फैसला सुनाने के पश्चात घटित हुई । 6 अप्रैल सन 27 ई को सेशन जज ने फैसला सुनाया था। 18 जुलाई सन 27 ई0 को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई । इसमें कुछ की सजायें बढ़ी और एकाध को कम भी हुई । अपील होने की तारीख से पहले मैं ने संयुक्त प्रान्त के गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि अब भविष्य में क्रान्तिकारी दल से कोई सम्बन्ध न रखूंगा । इस मेमोरिलय का जिक्र मैंने अपनी अन्तिम दया प्रार्थना पत्र में जो मैं ने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था, उसमें कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना न स्वीकार की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमें की बहस लिखकर भेजी, जो छापी गई ।

जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी, तो उन्हें बड़ा सन्देह हुआ कि वह बहस मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का यह नतीजा निकला कि चीफ कोर्ट अवध से मुझे महा भयंकर षड्यन्त्रकारी की पदवी दी गई । मेरे पश्चाताप पर जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा का प्रकाश इस प्रकार किया कि यदि यह रामप्रसाद छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा । बुद्धि की प्रखरता तथा समझ पर कुछ प्रकाश डालते हुए निर्दयी हत्यारे के नाम से विभूषित किया गया । लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु काकारी षड़यन्त्र का चीफ कोर्ट आद्योपान्त, फैसला पढ़ने से भली भांति विदित होता है कि मुझे मुत्युदण्ड किस ख्याल से दिया गया ।

यह निश्चय किया गया कि रामप्रसाद ने सेशन जज के विरूद्ध अपशब्द कहे है, खुफिया विभाग के कार्यकर्ताओं पर लांछन लगाये हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके विरूद्ध आवाज उठाई है, अतएव रामप्रसाद सबसे बड़ा गुस्ताख मुलजिम है । अब माफी चाहे वह किसी भी रूप में मांगे, नहीं दी जा सकती । चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रान्तीय गवर्नर तथा फिर वाइसराय के पास दया प्रार्थना की गई । रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लहरी, रोशनसिंह तथा अ्शफ़ाक़उल्ला खां के मृत्यु दण्ड को बदलकर अन्य दूसरी सजा देने की सिफारि्श करते हुए मेम्बरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन पत्र दिया । मेरे पिता ने ढाई सौ रईस, आनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदारों के हस्ताक्षर से एक अलग प्रार्थना पत्र भेजा, किन्तु श्रीमान सर बिलियम मेरिस की सरकार ने एक भी न सुनी ।

उसी समय लेज़िस्लेटिव एसेम्बली तथा कौंसिल आफ स्टेट के 78 सदस्यों ने भी हस्ताक्षर करके वाइसराय के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि काकोरी षड़यन्त्र के मृत्युदण्ड पाये हुओं को मृत्युदण्ड की सजा बदलकर दूसरी सजा कर दी जावे, क्योंकि दौरा जज ने सिफारिश की है कि यदि यह लोग पश्चाताप करें तो सरकार दण्ड कम कर दें । चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है ।

किन्तु वाइसराय महोदय ने भी एक न सुनी । इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा अन्य एसेम्बली के कुछ सदस्यों ने भी वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु दण्ड न दिया जावे । इतना होने पर सबको आ्शा थी कि वायसराय महोदय अवश्यमेव मृत्युदण्ड की आज्ञा रदद कर देंगे । इसी हालत में चुपचाप विजयाद्शमी से दो दिन पहले जेलों को तार भेज दिये गये, कि दया नहीं होगी । सब को फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई ।

जब मुझे सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल ने तार सुनाया, मैंने भी कह दिया कि आप अपना कार्य कीजिये । किन्तु सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया प्रार्थना का सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम सा बना रखा है कि प्रत्येक फांसी के कैदी की ओर से जिसकी दया भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहां से खारिज हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रान्तीय सरकार के पास अवश्य भेजते हैं कोई दूसरा जेल सुपरिन्टेन्डेण्ट ऐसा नहीं करता । उपरोक्त तार लिखते समय मेरा कुछ विचार हुआ कि प्रिवीकौंसिल इग्लैण्ड में अपील की जावे । मैंने श्रीयुत मोहनलाल सक्सेना वकील लखनउ को इस प्रकार की सूचना दी ।

बाहर किसी को वाइसराय की अपील खारिज होने की बात पर विश्वास भी न हुआ । जैसे तैसे करके श्रीयुत मोहनलाल द्वारा प्रिवीकौंसिल में अपील कराई गई । नतीजा पहले से ही मालूम था। वहां से भी अपील खारिज हुई । यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ?  क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ?  इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।  

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माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत है

फ़रवरी 18, 2009 को 8:57 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, खण्ड-4, चँद शेर | 7 टिप्पणियाँ
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तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये ।
बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।।

अब आगे पृष्ठ 131 से जारी है…. समिति के सदस्यों ने इस प्रकार का व्यवहार किया । बाहर जो साधारण जीवन के सहयोगी थे,  उन्होंने भी अद्धभुत रूप धारण किया । एक ठाकुर साहब के पास काकोरी डकैती का नोट मिल गया था । वह कहीं से शहर में पा गये थे । जब गिरफ़्तारी हुई,  मजिस्टेट के यहाँ से जमानत नामंजूर हुई जज साहब ने चार हजार की जमानत मांगी ।
कोई जमानती न मिलता था । आपके वृद्ध भाई मेरे पास आये । पैरों पर सिर रख कर रोने लगे ।

मैंने जमानत कराने का प्रयत्न किया । मेरे माता-पिता कचहरी जा कर खुले रूप से पैरवी करने को मना करते रहे कि पुलिस खिलाफ है,  रिपोर्ट हो जायेगी, पर मैंने एक न सुनी । कचहरी जा कर, कोशिश करके जमानत दाखिल कराई । जेल से उन्हें स्वयं जा कर छुड़वा लाया । पर जब मैंने उक्त महाशय का नाम उक्त घटना की गवाही देने के लिये सूचित किया, तब पुलिस ने उन्हें धमकाया और उन्होंने पुलिस को तीन बार लिख कर दिया कि वह रामप्रसाद को जानते भी नहीं ।

हिन्दू मुसलिम झगड़े में जिनके घरों की रक्षा की थी,  जिनके बाल बच्चे मेरे सहारे मुहल्ले में निर्भयता से निवास करते रहे,  उन्होंने ही मेरे खिलाफ झूठा गवाहियां बनवाकर भेजी । कुछ मित्रों के भरोसे पर उन का नाम गवाही में दिया कि जरूर गवाही देंगे,  संसार लौट जावे पर वे नहीं डिग सकते । किन्तु वचन दे चुकने पर भी जब पुलिस का दबाव पड़ा,  वे भी गवाही देने से इन्कार कर गये ।

जिनको अपना हृदय, सहोदर तथा मित्र समझ कर हर आवश्यकता होता यथा शक्ति उनको पूर्ण करने की प्राणपण से चेष्टा करता था, उनसे इतना भी न हुआ कि कभी जेल पर आकर दर्शन दे जाते, फांसी की कोठरी में ही आकर सन्तोषदायक दो बातें कर जातें । एक दो सज्जनों ने इतनी कृपा तथा साहस किया कि दस मिनट के लिये अदालत में दूर खड़े होकर दर्शन दे गये ।

यह सब इसलिये कि पुलिस का आतंक छाया हुआ था कि कहीं गिरफ़्तार न कर लिये जावें । इस पर भी जिसने जो कुछ किया और दिया, मैं उसी को अपना सौभाग्य समझता हूं,  और उनका आभारी हूं –
वह  फूल चढ़ाते है तुरबत भी दबी जाती है ।
माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत है ।।

परमात्मा से यही प्रार्थना है कि सब प्रसन्न तथा सुखी रहें । मैंने तो सब बातों को जानकर ही इस मार्ग में पैर रखा था । मुकद्दमें के पहले संसार का कोई अनुभव ही न था । न कभी जेल देखा, न किसी अदालत का कोई तर्जुबा ही न था ।  जेल में जाकर मालूम हुआ कि किसी नई दुनिया में पहुंच गया । मुकद्दमें के पहले मैं यह भी न जानता था, कि कोई लेखन-कल-विज्ञान भी है । इसका भी कोई दक्ष भी होता है, जो लेखन शैली को देखकर लेखकों का निर्णय कर सकता है ।

यह भी नहीं पता था कि लेख किस प्रकार मिलाये जाते है, एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य के लेख में क्या भेद होता है, क्यों भेद होता है, लेखन कला का दक्ष हस्ताक्षर को प्रमाणित कर सकता है, तथा लेखक के वास्तविक लेख में तथा बनावटी लेख में भेद कर सकता है । इस प्रकार का कोई भी अनुभव तथा ज्ञान न था । अनुभव तथा ज्ञान न रखते हुये भी एक प्रान्त की क्रान्तिकारी समिति का सम्पूर्ण भार लेकर उसका संचालन कर रहा था ।

बात यह है कि क्रान्तिकारी कार्य की शिक्षा देने के लिये कोई पाठशाला तो है ही नहीं । यही हो सकता था कि पुराने अनुभवी क्रान्तिकारियों से कुछ सीखा जावे । न जाने कितने व्यक्ति बंगाल तथा पंजाब षड़यन्त्रों में गिरफ़्तार हुए, पर किसी ने भी यह उद्योग न किया कि एक इस प्रकार की पुस्तक लिखी जावे जिससे नवागन्तुकों को कुछ अनुभव की बातें मालूम होती ।

लोगों को इस बात की बड़ी उत्कण्ठा होगी कि क्या यह पुलिस का भाग्य ही था, जो सब बना बनाया मामला हाथ आ गया ! क्या पुलिस वाले परोक्ष ज्ञानी होते है ? कैसे गुप्त बातों का पता चला लेते है ?

इनकी सफलता पर  यह कहना पड़ता है कि यह इस पराधीन देश का दुर्भाग्य ! ब्रिटिश सरकार का सौभाग्य !! बंगाल पुलिस के सम्बन्ध में तो अधिक कहा नहीं जा सकता, क्योंकि मेरा कुछ विशेषानुभव नहीं । इस प्रान्त की खुफिया पुलिस वाले तो महान भांदू होते हैं । जिन्हें साधारण ज्ञान भी नहीं होता । साधारण पुलिस से खुफिया में आते हैं साधारण पुलिस की दारोगाई करते हैं,  मजे में लम्बी-लम्बी घूस खा कर बड़े-बड़े पेट बढ़ा आराम करते हैं ।

उनकी बला से कि कोई तकलीफ उठावें । यदि कोई एक दो चालाक हुए भी तो थोड़े दिन बड़े ओहदे की फिराक में काम दिखाया,  दौड़ धूप की,  कुछ पदवृद्धि हो गई और सब काम बन्द । इस प्रान्त में कोई बाकायदा पुलिस का गुप्तचर विभाग नहीं,  जिस को नियमित रूप से शिक्षा दी जाती हो । फिर काम करते-करते अनुभव हो ही जाता है ।

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