कालकोठरी के गीत और अँतिम नोट

अगस्त 15, 2009 को 2:15 पूर्वाह्न | Posted in अंतिम समय की बातें, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था, फाँसी | 5 टिप्पणियाँ
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अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी में गाये जाने वाले गीतों का उल्लेख करते हुये एक अँतिम नोट राष्ट्रवासियों के नाम दिया है, जो कि स्वगत कथन जैसा ही है । – प्रस्तुतकर्ता : डा० अमर कुमार की टिप्पणी

अलीपुर बम्ब केस के अभियुक्तों के काले पानी जाते समय, श्री ओमप्रकाश जी  के उदगार जिनको मैं काल कोठरी के अन्दर गाया करता था । साथ ही अन्य कवितायें और अशरार मैं लिपिबद्ध कर रहा हूँapna kuchh am

हैफ जिस पै कि हम तैयार थे मर जाने को ।
यकायक हम से छुड़ाया उसी काशाने को ।।
आस्मां क्या यही बाकी था गजब ढाने को ।
लाके गुर्बत में जो रक्खा हमें तड़फाने को ।।
क्या कोई और बहाना न था तरसाने को ।। 1।।

फिर न गुलशन में हमें लायेगा सयाद कभी ।
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फरियाद कभी ।।
याद आयेगा किसे यह दिले नाशाद कभी ।
हम भी इस बाग में थे कैद से आजाद कभी ।।
अब तो काहे को मिलेगी यह हवा खाने को ।।2।।

दिल फिदा करते है कुर्बान जिगर करते हैं ।
पास जो कुछ है वह माता की नजर करते है ।।
खाने वीरान कों देखिये घर करते हैं ।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते है ।।
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को ।।3।।

देखिये कब यह असीराने मुसीबत छूटें ।
मादरेहिन्द के अब भाग खुलें या फूटें ।।
देश सेवक सभी अब जेल में मूंजे कूटें ।
आप यहां ऐश से दिन रात बहारें लूटें ।।
क्यों न तरजीह दें इस जीने से मर जाने को ।।4।।

कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी ।
जिन्दगी भर को हमें भेज दे कालेपानी ।।
मुंह में जल्लाद हुए जाते है छाले पानी ।।
आबे खंजर का पिला करके दुआले पानी ।।
मर न क्यों जाये हम इस उम्र के पैमाने को ।।5।।

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर ।
हमको भी पाला था मां बाप ने दुख सह सह कर ।।
वक्ते रूखसत उन्हें इतना भी न आये कहकर ।
गोद में आंसू कभी टपके जो रूख से बहकर ।।
तिफल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को ।।6।।

देश सेवा का ही बहता है लहू नस नस में ।
अब तो खा बैठे है चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ।।
सरफरोशी की अदा होती है यों ही रसमें ।
भाई खंजर से गले मिलते है सब आपस में ।।
बहिनें तैयार चिताओं में है जल जाने को ।।7।।

नौजवानों जो तबियत में तुम्हारी खट के ।
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ।।
आप के आज बदन होवें जुदा कट कट के ।
और सद चााक हो माता का कलेजा फटके ।।
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को ।।8।।

अपनी किस्मत में अजल से ही सितम रखा था ।
रंज रक्खा था महिन रक्खा था गम रक्खा था ।।
किसको परवाह थी और किसमें यह दम रक्खा था।
हमने जब बादिये गुरवत में कदम रखा था ।।
दूर तक यादे वतन आई थी समझाने को ।।9।।

अपना कुछ गम नहीं लेकिन यह ख्याल आता है ।
मादरे हिन्द पे कब तक जवाल आता है ।।
हरदयाल आता है योरूप से न अजीत आता है ।
कौम अपनी पै तो रो रो के मलाल आता है ।।
मुन्तजिर रहते है हम खाक में मिल जाने को ।।10।।

मैकदा किसका है यह जाने सबू किस का है ।
वार किसका है मेरी जां यह गुलू किसका है ।।
जो बहे कौम की खातिर वह लहू किस का है ।
आसमां साफ बता दे तू उदू किस का है ।।
क्यों नये रंग बदलता है यह तड़फाने को ।। 11।।

दर्द मन्दों से मुसीबत की हवालत पूछो ।
मरने वालों से जरा लुत्फ शहादत पूछो ।।
चश्में मुश्ताक से कुछ दीद की हसरत पूछो ।
सोज कहते हैं किसे पूछो तो परवाने को ।।12।।

बात तो जब है कि इस बात की जिदें ठाने ।
देश के वास्ते कुर्बान करें सब जाने ।।
लाख समझायें कोई एक न उसकी माने ।
कहता है खून से मत अपना गरेबां साने ।।
नासहा आग लगे तेरे इस समझाने को ।।13।।

न मयस्सर हुआ गहत में कभी मेल हमें ।
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें ।।
एक दिन को भी न मंजूर हुई बेल हमें ।
याद आयेगा बहुत लखनउ का जेल में ।।
लोग तो भूल ही जायेंगे इस अफसाने को ।।14।।

अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली ।
एक होती है फकीरों की हमेशा बोली ।।
खून से फाग रचायेगी हमारी टोली ।
जब से बंगाल में खेले है कन्हैया होली ।।
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को ।।15।।

नौजवानों यही मौका है उठो खुल खेलों ।
खिदमते कौम में जो आवे बला तुम झेलो ।।
देश के सदके में माता को जवानी दे दो ।
फिर मिलेगा न ये माता की दुआयें ले लो ।
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने की ।।16।।

aankh ka noor hoon

न किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का करार हूं ।
जो किसी के काम न आ सकूं वह मैं एक मुश्ते गुबार हूं ।।
न दवायें दर्दें जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नजर हूं मै ।
न इधर हूं मैं न उधर हूं मैं न शकेव हूं न करार हूं ।।
मैं नहीं हूं नरामये जां फिजां मेरा सुन के कोई करेगा क्या ।
मैं बड़े वियोगा की हूं सदा ओ बड़े दुखी की पुकार हूं ।।
न मैं किसी का हूं दिलरूबा न किसी के दिल में बसा हुआ ।
मैं जमीं की पीठ का बोझ हूं औ फलक के दिल का गुबार हूं ।।
मेरा बखत मुझ से बिछड़ गया मेरा रंग रूप बिगड़ गया ।
जो चमन खिजां से उजड़ गया  मैं उसी की फसले बहार हूं ।।
पये फातिहा कोई आये क्यों कोई खामा लाके जलाये क्यों ।
कोई चार फूल चढ़ाये क्योंकि मैं बेकसी का मजार हूं ।।
न अखतर से अपना हबीब हूं न अखतरों का रकीब हूं ।
जो बिगड़ गया वह नसीब हूं जो उजड़ गया वह दयार हूं ।।

इसके आगे श्रद्धेय हुतात्मा ने 11 अन्य रचनायें भी दी हैं, जो एक सँकलन के रूप में पृष्ठ चँद राष्ट्रीय अशआर और कवितायें पर दी जा रही हैं । ऎसा इस कड़ी के प्रवाह के दृष्टिगत किया गया है डा० अमर

Flying_bird परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है । मैं तो अपना कार्य कर चुका । मैने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकाल कर भारतवासियों को  दिखला  दिया, जो  सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ । अब किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिये कि मुसलमानों पर विश्वास न करना चाहिये । पहला तजर्बा था जो पूरी तौर से कामयाब हुआ ।

अब देशवासियों से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फांसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिये कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक दल एक हो कर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें । जो कांग्रेस तय करें, उसे  सब  पूरी  तौर  से  मानें  और  उस  पर  अमल करें । ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत दूर न होगा जब कि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की मांग के सामने  सिर  झुकाना  पड़े, और  यदि  ऐसा  करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों की मांग के सामने सिर झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तबतो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जावेगा ।

हिंदू-मुसलिम एकता ही हम लोगों की यादगार तथा अन्तिम इच्छा है, चाहे  वह  कितनी  कठिनता से क्यों न हो । जो मैं कह राहा हूं वही श्री अशफ़ाक उल्ला खां बारसी का भी मत है, क्योंकि  अपील  के समय हम दोनों लखनउ जेल में फांसी की कोठरियों में आमने सामने कई दिन तक रहे थे । आपस में हर तरह की बातें हुई थी । गिरफतारी के बाद से हम लोगों की सजा पड़ने तक श्री अशफ़ाक उल्ला खां की बड़ी उत्कट इच्छा यही थी, कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा ने पूरी कर दी ।

श्री अशफ़ाक उल्ला खां तो अंग्रेजी सरकार से दया प्रार्थना करने पर राजी ही न थे । उन का तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबन्द करीम के अलावा किसी दूसरे से दया की प्रार्थना न करना चाहिय, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने सरकार से दया प्रार्थना की थी । इसका  दोषी  मैं  ही  हूं, जो  अपने  प्रेम  के  पवित्र  अधिकारों  का  उपयोग  करके  श्री अशफ़ाकउल्ला खां को उन के दृढ़ निश्चय से विचलित किया । मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ द्वितीया के अवसर पर गोरखपुर जेल से श्री अशफ़ाक को पत्र लिख कर क्षमा प्रार्थना की थी । परमात्मा जाने  कि  वह  पत्र  उनके  हाथों  तक  पहुंचा भी या नही, खैर !

परमात्मा की  ऐसी  ही  इच्छा थी  कि  हम  लोगों  को  फांसी  दी  जावे, भारतवासियों  के जले हुये दिलों पर नमक पड़े, वे  बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उन के कार्य को देख कर सुखी हों । जब हम नवीन शरीर धारण कर के देशसेवा में योग देने को उद्यत हों, उस समय तक भारतवर्श की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई हो । जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जावे । ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जावें ।

प्रीवीकौंसिल में अपील भिजवा कर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया उसका भी एक विशेष अर्थ था । सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु दण्ड उपयुक्त दण्ड नहीं । क्योंकि न जाने किस की गोली से आदमी मारा गया । अगर डकैती डालने की जिम्मेवारी के ख्याल से मृत्युदण्ड दिया गया तो चीफ कोर्ट के फैसले के अनुसार भी मैं ही डकैतियों का  जिम्मेदार  तथा  नेता  था, और  प्रान्त  का  नेता  भी  मैं  ही  था  अतएव  मृत्यु दण्ड  तो अकेला मुझे ही मिलना चाहिए था । अतः तीन को फांसी नहीं देना चाहिये था । इसके अतिरिक्त दूसरी सजायें सब स्वीकार होती । पर ऐसा क्यों होने लगा ?

मैं विलायती न्यायालय की भी परीक्षा कर के स्वदेशवासियों के लिए उदाहरण छोड़ना चाहता  था, कि  यदि  कोई  राजनैतिक  अभियोग  चले  तो  वे  कभी  भूल  करके  भी  किसी अंग्रेजी अदालत का विश्वास न करें । तबियत आये तो जोरदार बयान दें । अन्यथा मेरी तो यही राय है कि अंग्रेजी अदालत के सामने न तो कभी कोई बयान दें और न कोई सफाई पेश करें । काकोरी षडयन्त्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें । इस अभियोग में सब प्रकार के उदाहरण मौजूद है ।

प्रीवीकौंसिल में अपील दाखिला कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख हटवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है, और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इस में मुझे बड़ी निराशा पूर्ण असफलता हुई । अन्त में मैने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूँ । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीनों फांसी वालों की फांसी की सजा माफ कर देनी पड़ेगी, और यदि न करते तो मैं करा लेता ।

मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु  बाहर  से  कोई   सहायता  न  मिल  सकी  यही   तो  हृदय  पर  आघात  लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी  दल खड़ा  किया  था, वहां  से  मुझे  प्राणरक्षा  के  लिये  एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं । फांसी  पाने  का  मुझे  कोई  भी  शोक  नहीं  क्योंकि  मैं  इस  नतीजे  पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था ।

मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो  अधिक  उपयोगी  सिद्ध हेागी ।

परिस्थिति  अनुकूल  न  होने  से  ऐसे  आन्दोलनों  से  अधिकतर  परिश्रम  व्यर्थ  जाता  है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।
देशवासियों  से  यही  अन्तिम  विनय  है  कि  जो  कुछ  करें, सब  मिल  कर  करें, और  सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।।

रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल
१५ दिसम्बर १९२७ ई०
 

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कार्यकर्ताओं में बड़ी खलबली मच गयी…

जनवरी 9, 2009 को 11:33 अपराह्न | Posted in काकोरी के शहीद, काकोरी षड़यंत्र, रंग दे बसंती चोला, सरफ़रोशी की तमन्ना | 3 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा..

इनके साथ राजनैतिक कैदियों का सा ही बर्ताव किया जाना चाहिए था, किन्तु ऐसा न कर के इन को मामूली कपड़े जबर्दस्ती छीन कर जेल की पोशाक पहनाई गई ।  जेल के कर्मचारियों का व्यवहार भी इनके प्रति अच्छा नहीं था । इनके स्वाभिमान ने इन्हें ये बातें नहीं सहने दीं और सब अभियुक्तों ने अनशन व्रत कर दिया । अभियुक्तों के बल को कम करने के अभिप्राय से ही वे भिन्न-भिन्न जेलों को भेज दिये गये थें मगर उन्होंने अलग-अलग रह कर भी स्वाभिमान के लिए यह व्रत चालू रखा, इस अनशन के समाचार छिपाने की भी कोशिश पहिले ही की तरह की गयी । सगे सम्बन्धी तक अभियुक्तों से नहीं मिलने दिये गये । जब यह समाचार बाहर फैला तब प्रान्त के कार्यकर्ताओं में बड़ी खलबली मच गयी… और आगे 

कुछ कौंसिल सदस्यों ने जो जेल विज़िटर थे, जेलों में जाकर अभियुक्तों से मिलना चाहा, परन्तु उन्हें भी मिलने की इजाज़त नहीं दी गयी । इस पर एक सदस्य ने तो इस पद से इस्तीफ़ा तक दे दिया । अस्तु मामला दिन व दिन संगीन होता गया । दिन के बाद हफ़्ते और हफ़्ते के बाद महीने समाप्त होने लगे । अनशन करने वालों की दशा अधिकाधिक कमजोर होने लगी, एक-एक आदमी का वज़न 43-43 और 44-44 पौंड कम हो गया, किन्तु फिर भी उनकी बातों की कोई परवाह नहीं थी । स्थिति बड़ी चिन्ताजनक होती जा रही थी । जिद्दी सरकार जिद छोड़ने के लिए राज़ी नहीं थी और स्वाभिमानी अभियुक्त अपने बात पर अटल थे । यह चिन्ताजनक स्थिति देख कर श्री गणेष शंकर विद्यार्थी ने प्रान्तीय होम मेम्बर आनरेबुल मोहम्मद अहमद सईद खां साहब, नवाब छतारी को एक तार और एक लम्बा पत्र भेजा, जिस में अभियुक्तों की तमाम दशा का वर्णन करते हुए और यह दिखलाते हुए कि अभियुक्तों को राजनैतिक कैदियों जैसा विशेष व्यवहार पाने का हक़ है, यह कहा कि शीघ्र से शीघ्र दस्तान्दाजी़ करके इस मामले का समझौता कराइये । होम मेम्बर साहब इस तार और इस लम्बे पत्र को साफ़ पी गये । जवाब में इतना तो जरूर लिखा कि पत्र मिल गया, मगर इसके आगे उसका क्या हुआ सो आज तक न मालूम हुआ । जिस समय मुकद्मा चल रहा था उस समय भी जब अभियुक्तों ने विशेष व्यवहार पाने की बात कही थी, तब यह कह कर टाल दिया गया था कि विचाराधीन कैदियों के साथ विशेष व्यवहार का् प्रश्न नहीं उठता । मामला ख़तम हो जायेगा तब देखा जायेगा ।

मगर अब, जब मामला खतम हो गया और सेशनजज ने भी साफ़ तौर से यह कह दिया कि अभियुक्तों पर डकैतियों का जो अभियोग है, वह राजनैतिक समझा जाने योग्य है, क्योंकि उन्होंने स्वार्थ कि लिये डाके नहीं डाले, तब यह सलूक कि उनको बन्दर की शकल बना कर जेलों में रखा गया, सब बातों में मामूली डकैतों जैसा बर्ताव किया जाने लगा और विरोध करने पर अभियुक्त कालकोठरियों में बन्द किये जाने लगे काकोरी के अभियुक्त शिक्षित सभ्य और भले घरों के नवयुवक हैं । उनकी स्थिति के अनुसार उनके साथ जेल में व्यवहार किया जाना नितान्त आवश्यक था । स्वयं होम मेम्बर साहब तक हैसियत के अनुसार सुविधा देने की बात पहिले स्वीकार कर चुके थे, किन्तु जब समय आया तो गोता लगा गये अथवा थूककर चाट गये । बंगाल आदि प्रान्तों में ऐसे कैदियों के साथ विशेष बर्ताव करने का प्रबन्ध है, मगर संयुक्त प्रान्त की एक बात ही निराली है । यहां इन दलीलों और अपीलों की कोई सुनवाई न हुई । इस इधर-उधर की कोशिश में लगभग डेढ़ महीना बीत गया । सरकार टस से मस न हुई ।

अभियुक्तों की हालत बहुत ही गिर गयी । अनेक अभियुक्त मृत्यु शैय्या पर पड़ गये । अब शिथिलता करने का समय न था । अभियुक्तों के रिश्तेदारों में बड़ी चिन्ता थी । अभियुक्त राजकुमार सिंह की माता ने तो जब से अनशन का हाल सुना तब से उन्होंनें भी खाना ही छोड़ दिया । इससे वे बहुत कमजोर हो गयी । एक दिन तो वे बेहोश हो गयीं और कई घण्टे तक उसी अवस्था में रहीं । वह दशा देख कर श्री गणेष शंकर विद्यार्थी जेलों में अभियुक्तों से मिल कर उनको अनशन तोड़ने के लिए समझाने लगे । पहिले तो कुछ जेलों के अधिकारियों ने यह समझा कि कहीं ये अभियुक्तों को और न भड़कायें, इसलिए इजाज़त नहीं दी । परन्तु एकाध जगह का उदाहरण उन के सामने आया, तब इन्हें जेलों में अभियुक्तों से मिलने की इजाज़त मिल गयी । फिर भी एकाध स्थान में ये नहीं जा सके । किन्तु इनके इतने ही परिश्रम ने काफ़ी काम किया । इन्होंने बरेली, फतेहगढ़ नैनी आदि कई जेलों के अभियुक्तों से बातचीत की और उन्हें राजी कर लिया । इस प्रकार अनशन का अन्त करा कर श्री गणेष शंकर जी अभियुक्तों को स्थायी रूप से विषेश व्यवहार की सुविधा दिलाने का फिर प्रयत्न करते रहें इसी बीच में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने यह प्रस्ताव पास किया कि काकोरी के कैदियों के साथ विशेष व्यवहार किया जाये । बाद को मद्रास के कांग्रेस अधिवेशन में भी इस आशय का एक प्रस्ताव पास हुआ था । इस प्रस्ताव से इस मामले ने, जो अभी तक केवल प्रान्तीय रूप धारण किये था, सार्वदेशिक रूप धारण कर लिया ।

22 जून को यह मामला युक्त प्रांतीय कौंसिल में जोरों के साथ उठाया गया । सवालों का तांता बांध दिया गया । किन्तु सरकार की ओर से किसी बात का उचित और सन्तोषजनक उत्तर नहीं दिया गया । होम मेम्बर ने इन सवाल-जवाबों में साफ तौर से यह एलान कर दिया कि उनके साथ दुबारा कैदियों का सा ही बर्ताव किया जायेगा, वे उसी श्रेणी में रखे गये है । इस बात से कौंसिल के स्वराजी सदस्यों को बड़ा असन्तोष हुआ । एक स्वराजी सदस्य ने यह प्रस्ताव पेश करना चाहा कि काकोरी के कैदियों के साथ विशेष बर्ताव किया जाये । परन्तु गर्वनर महोदय ने इस प्रस्ताव के पेश करने की इजाज़त ही नहीं दी । उस दिन के सवाल जवाब में यह भी मालूम हुआ कि काकोरी के मामले में सरकार दो लाख रूपये खर्च कर चुकी है । प्रान्त के कार्यकर्ताओं के पास यही एक अन्तिम अस्त्र था, जिससे वे काकोरी के अभियुक्तों के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते थे । किन्तु गवर्नर साहब की स्वेच्छाचारिता के कारण वह अस्त्र भी निष्फल हुआ। अनशन तो किसी प्रकार टूट गया, मगर विशेष अधिकार उन्हें अभी तक नसीब न हुये । पराधीन देश के पराधीन निवासियों के लिये जो कुछ हो जाय थोड़ा है । सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करने का निश्चय किया .. ..  जारी है 

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