कालकोठरी के गीत और अँतिम नोट

अगस्त 15, 2009 को 2:15 पूर्वाह्न | Posted in अंतिम समय की बातें, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था, फाँसी | 5 टिप्पणियाँ
टैग: , , , , , , , ,

अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी में गाये जाने वाले गीतों का उल्लेख करते हुये एक अँतिम नोट राष्ट्रवासियों के नाम दिया है, जो कि स्वगत कथन जैसा ही है । – प्रस्तुतकर्ता : डा० अमर कुमार की टिप्पणी

अलीपुर बम्ब केस के अभियुक्तों के काले पानी जाते समय, श्री ओमप्रकाश जी  के उदगार जिनको मैं काल कोठरी के अन्दर गाया करता था । साथ ही अन्य कवितायें और अशरार मैं लिपिबद्ध कर रहा हूँapna kuchh am

हैफ जिस पै कि हम तैयार थे मर जाने को ।
यकायक हम से छुड़ाया उसी काशाने को ।।
आस्मां क्या यही बाकी था गजब ढाने को ।
लाके गुर्बत में जो रक्खा हमें तड़फाने को ।।
क्या कोई और बहाना न था तरसाने को ।। 1।।

फिर न गुलशन में हमें लायेगा सयाद कभी ।
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फरियाद कभी ।।
याद आयेगा किसे यह दिले नाशाद कभी ।
हम भी इस बाग में थे कैद से आजाद कभी ।।
अब तो काहे को मिलेगी यह हवा खाने को ।।2।।

दिल फिदा करते है कुर्बान जिगर करते हैं ।
पास जो कुछ है वह माता की नजर करते है ।।
खाने वीरान कों देखिये घर करते हैं ।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते है ।।
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को ।।3।।

देखिये कब यह असीराने मुसीबत छूटें ।
मादरेहिन्द के अब भाग खुलें या फूटें ।।
देश सेवक सभी अब जेल में मूंजे कूटें ।
आप यहां ऐश से दिन रात बहारें लूटें ।।
क्यों न तरजीह दें इस जीने से मर जाने को ।।4।।

कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी ।
जिन्दगी भर को हमें भेज दे कालेपानी ।।
मुंह में जल्लाद हुए जाते है छाले पानी ।।
आबे खंजर का पिला करके दुआले पानी ।।
मर न क्यों जाये हम इस उम्र के पैमाने को ।।5।।

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर ।
हमको भी पाला था मां बाप ने दुख सह सह कर ।।
वक्ते रूखसत उन्हें इतना भी न आये कहकर ।
गोद में आंसू कभी टपके जो रूख से बहकर ।।
तिफल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को ।।6।।

देश सेवा का ही बहता है लहू नस नस में ।
अब तो खा बैठे है चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ।।
सरफरोशी की अदा होती है यों ही रसमें ।
भाई खंजर से गले मिलते है सब आपस में ।।
बहिनें तैयार चिताओं में है जल जाने को ।।7।।

नौजवानों जो तबियत में तुम्हारी खट के ।
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ।।
आप के आज बदन होवें जुदा कट कट के ।
और सद चााक हो माता का कलेजा फटके ।।
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को ।।8।।

अपनी किस्मत में अजल से ही सितम रखा था ।
रंज रक्खा था महिन रक्खा था गम रक्खा था ।।
किसको परवाह थी और किसमें यह दम रक्खा था।
हमने जब बादिये गुरवत में कदम रखा था ।।
दूर तक यादे वतन आई थी समझाने को ।।9।।

अपना कुछ गम नहीं लेकिन यह ख्याल आता है ।
मादरे हिन्द पे कब तक जवाल आता है ।।
हरदयाल आता है योरूप से न अजीत आता है ।
कौम अपनी पै तो रो रो के मलाल आता है ।।
मुन्तजिर रहते है हम खाक में मिल जाने को ।।10।।

मैकदा किसका है यह जाने सबू किस का है ।
वार किसका है मेरी जां यह गुलू किसका है ।।
जो बहे कौम की खातिर वह लहू किस का है ।
आसमां साफ बता दे तू उदू किस का है ।।
क्यों नये रंग बदलता है यह तड़फाने को ।। 11।।

दर्द मन्दों से मुसीबत की हवालत पूछो ।
मरने वालों से जरा लुत्फ शहादत पूछो ।।
चश्में मुश्ताक से कुछ दीद की हसरत पूछो ।
सोज कहते हैं किसे पूछो तो परवाने को ।।12।।

बात तो जब है कि इस बात की जिदें ठाने ।
देश के वास्ते कुर्बान करें सब जाने ।।
लाख समझायें कोई एक न उसकी माने ।
कहता है खून से मत अपना गरेबां साने ।।
नासहा आग लगे तेरे इस समझाने को ।।13।।

न मयस्सर हुआ गहत में कभी मेल हमें ।
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें ।।
एक दिन को भी न मंजूर हुई बेल हमें ।
याद आयेगा बहुत लखनउ का जेल में ।।
लोग तो भूल ही जायेंगे इस अफसाने को ।।14।।

अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली ।
एक होती है फकीरों की हमेशा बोली ।।
खून से फाग रचायेगी हमारी टोली ।
जब से बंगाल में खेले है कन्हैया होली ।।
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को ।।15।।

नौजवानों यही मौका है उठो खुल खेलों ।
खिदमते कौम में जो आवे बला तुम झेलो ।।
देश के सदके में माता को जवानी दे दो ।
फिर मिलेगा न ये माता की दुआयें ले लो ।
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने की ।।16।।

aankh ka noor hoon

न किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का करार हूं ।
जो किसी के काम न आ सकूं वह मैं एक मुश्ते गुबार हूं ।।
न दवायें दर्दें जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नजर हूं मै ।
न इधर हूं मैं न उधर हूं मैं न शकेव हूं न करार हूं ।।
मैं नहीं हूं नरामये जां फिजां मेरा सुन के कोई करेगा क्या ।
मैं बड़े वियोगा की हूं सदा ओ बड़े दुखी की पुकार हूं ।।
न मैं किसी का हूं दिलरूबा न किसी के दिल में बसा हुआ ।
मैं जमीं की पीठ का बोझ हूं औ फलक के दिल का गुबार हूं ।।
मेरा बखत मुझ से बिछड़ गया मेरा रंग रूप बिगड़ गया ।
जो चमन खिजां से उजड़ गया  मैं उसी की फसले बहार हूं ।।
पये फातिहा कोई आये क्यों कोई खामा लाके जलाये क्यों ।
कोई चार फूल चढ़ाये क्योंकि मैं बेकसी का मजार हूं ।।
न अखतर से अपना हबीब हूं न अखतरों का रकीब हूं ।
जो बिगड़ गया वह नसीब हूं जो उजड़ गया वह दयार हूं ।।

इसके आगे श्रद्धेय हुतात्मा ने 11 अन्य रचनायें भी दी हैं, जो एक सँकलन के रूप में पृष्ठ चँद राष्ट्रीय अशआर और कवितायें पर दी जा रही हैं । ऎसा इस कड़ी के प्रवाह के दृष्टिगत किया गया है डा० अमर

Flying_bird परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है । मैं तो अपना कार्य कर चुका । मैने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकाल कर भारतवासियों को  दिखला  दिया, जो  सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ । अब किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिये कि मुसलमानों पर विश्वास न करना चाहिये । पहला तजर्बा था जो पूरी तौर से कामयाब हुआ ।

अब देशवासियों से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फांसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिये कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक दल एक हो कर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें । जो कांग्रेस तय करें, उसे  सब  पूरी  तौर  से  मानें  और  उस  पर  अमल करें । ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत दूर न होगा जब कि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की मांग के सामने  सिर  झुकाना  पड़े, और  यदि  ऐसा  करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों की मांग के सामने सिर झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तबतो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जावेगा ।

हिंदू-मुसलिम एकता ही हम लोगों की यादगार तथा अन्तिम इच्छा है, चाहे  वह  कितनी  कठिनता से क्यों न हो । जो मैं कह राहा हूं वही श्री अशफ़ाक उल्ला खां बारसी का भी मत है, क्योंकि  अपील  के समय हम दोनों लखनउ जेल में फांसी की कोठरियों में आमने सामने कई दिन तक रहे थे । आपस में हर तरह की बातें हुई थी । गिरफतारी के बाद से हम लोगों की सजा पड़ने तक श्री अशफ़ाक उल्ला खां की बड़ी उत्कट इच्छा यही थी, कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा ने पूरी कर दी ।

श्री अशफ़ाक उल्ला खां तो अंग्रेजी सरकार से दया प्रार्थना करने पर राजी ही न थे । उन का तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबन्द करीम के अलावा किसी दूसरे से दया की प्रार्थना न करना चाहिय, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने सरकार से दया प्रार्थना की थी । इसका  दोषी  मैं  ही  हूं, जो  अपने  प्रेम  के  पवित्र  अधिकारों  का  उपयोग  करके  श्री अशफ़ाकउल्ला खां को उन के दृढ़ निश्चय से विचलित किया । मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ द्वितीया के अवसर पर गोरखपुर जेल से श्री अशफ़ाक को पत्र लिख कर क्षमा प्रार्थना की थी । परमात्मा जाने  कि  वह  पत्र  उनके  हाथों  तक  पहुंचा भी या नही, खैर !

परमात्मा की  ऐसी  ही  इच्छा थी  कि  हम  लोगों  को  फांसी  दी  जावे, भारतवासियों  के जले हुये दिलों पर नमक पड़े, वे  बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उन के कार्य को देख कर सुखी हों । जब हम नवीन शरीर धारण कर के देशसेवा में योग देने को उद्यत हों, उस समय तक भारतवर्श की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई हो । जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जावे । ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जावें ।

प्रीवीकौंसिल में अपील भिजवा कर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया उसका भी एक विशेष अर्थ था । सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु दण्ड उपयुक्त दण्ड नहीं । क्योंकि न जाने किस की गोली से आदमी मारा गया । अगर डकैती डालने की जिम्मेवारी के ख्याल से मृत्युदण्ड दिया गया तो चीफ कोर्ट के फैसले के अनुसार भी मैं ही डकैतियों का  जिम्मेदार  तथा  नेता  था, और  प्रान्त  का  नेता  भी  मैं  ही  था  अतएव  मृत्यु दण्ड  तो अकेला मुझे ही मिलना चाहिए था । अतः तीन को फांसी नहीं देना चाहिये था । इसके अतिरिक्त दूसरी सजायें सब स्वीकार होती । पर ऐसा क्यों होने लगा ?

मैं विलायती न्यायालय की भी परीक्षा कर के स्वदेशवासियों के लिए उदाहरण छोड़ना चाहता  था, कि  यदि  कोई  राजनैतिक  अभियोग  चले  तो  वे  कभी  भूल  करके  भी  किसी अंग्रेजी अदालत का विश्वास न करें । तबियत आये तो जोरदार बयान दें । अन्यथा मेरी तो यही राय है कि अंग्रेजी अदालत के सामने न तो कभी कोई बयान दें और न कोई सफाई पेश करें । काकोरी षडयन्त्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें । इस अभियोग में सब प्रकार के उदाहरण मौजूद है ।

प्रीवीकौंसिल में अपील दाखिला कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख हटवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है, और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इस में मुझे बड़ी निराशा पूर्ण असफलता हुई । अन्त में मैने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूँ । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीनों फांसी वालों की फांसी की सजा माफ कर देनी पड़ेगी, और यदि न करते तो मैं करा लेता ।

मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु  बाहर  से  कोई   सहायता  न  मिल  सकी  यही   तो  हृदय  पर  आघात  लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी  दल खड़ा  किया  था, वहां  से  मुझे  प्राणरक्षा  के  लिये  एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं । फांसी  पाने  का  मुझे  कोई  भी  शोक  नहीं  क्योंकि  मैं  इस  नतीजे  पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था ।

मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो  अधिक  उपयोगी  सिद्ध हेागी ।

परिस्थिति  अनुकूल  न  होने  से  ऐसे  आन्दोलनों  से  अधिकतर  परिश्रम  व्यर्थ  जाता  है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।
देशवासियों  से  यही  अन्तिम  विनय  है  कि  जो  कुछ  करें, सब  मिल  कर  करें, और  सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।।

रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल
१५ दिसम्बर १९२७ ई०
 

-silhouette

फांसी की कोठरी है या, साधना की गुफा

मई 19, 2009 को 12:17 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, खण्ड-4, चँद शेर, फाँसी, सरफ़रोशी की तमन्ना | 11 टिप्पणियाँ
टैग: , , , , , , ,

फांसी की कोठरी
अन्तिम समय निकट है । दो फांसी की सजायें सिर पर झूल रहा है । पुलिस को साधारण जीवन में और समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी भर के कोसा है । खुली  अदालत  में  जज  साहब, खुफिया पुलिस  के  अफसर, मजिस्टेट, सरकारी  वकील  तथा  सरकार  को  खूब  आड़े  हाथों लिया है । हर एक के दिल में मेरी बातें चुभ रही है । कोई दोस्त अपना अथवा यार मददगार नहीं जिसका सहारा हो । एक परमपिता परमात्मा की याद है । गीता का पाठ करते हुए सन्तोष है कि

जो कुछ किया सो तै किया, मैं कुछ कीन्हा नाहिं ।
जहां कहीं कुछ मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ।।

ब्रह्मरण्या धाय कर्माणि संगंत्यक्त्वा करोति यः ।
लिश्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा ।।
  भगवद्गीता । 5।10
जो फल की इच्छा को त्यागकर के कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार जल में रहकर भी कमलपत्र जल में लिप्त नहीं होता । जीवन पर्यन्त जो कुछ किया, स्वदेश की भलाई समझ कर किया । यदि शरीर की पालना की तो इसी विचार से कि सु्दृढ़ शरीर से भले प्रकार स्वदेश सेवा हो सके । बड़े प्रयत्नों से यह शुभ दिन प्राप्त हुआ ।

संयुक्त प्रान्त में इस तुच्छ शरीर का ही सौभाग्य होगा, जो सन 1857 के गदर की घटनाओं के पश्चात क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्बन्ध में इस प्रान्त के निवासी का पहला बलिदान मातृवेदी पर होगा । सरकार की इच्छा है कि मुझे घोट-घोट कर मारें इसी कारण से इस गरमी की ऋतु में साढ़े तीन महीने बाद अपील की तारीख नियत की गई ।

साढ़े तीन महीने तक फांसी की कोठरी में भूंजा गया । यह कोठरी प़क्षी के पिंजरे से भी खराब हैं गोरखपुर जेल की फांसी की कोठरी मैदान में बनी है । किसी प्रकार की छाया निकट नहीं । प्रातःकाल आठ बजे से रात्रि के आठ बजे तक सूर्य देवता की कृपा से तथा चारों ओर रेतीली जमीन होने से अग्नि वर्षण होता है । नौ फीट लम्बी तथा नौ फीट चैड़ी कोठरी में केवल एक छः फीट लम्बा तथा दो फीट चौड़ा द्वार है । पीछे की ओर जमीन से आठ या नौ फीट की उंचाई पर, एक 2 फीट लम्बी 1 फीट चैड़ी खिड़की है । इसी कोठरी में भोजन, स्नान, मल-मूत्र तथा शयानादि होता है । मच्छड़ अपनी मधुर ध्वनि रात भर सुनाया करते है । बड़े प्रयन्त से रात्रि में तीन या चार घंटे निद्रा आती है, किसी किसी दिन एक दो घण्टे ही सो कर निर्वाह करना पड़ता है । मिटटी के पात्रों में भोजन दिया जाता है । ओढ़ने बिछाने को दो कम्बल मिले हैं । बड़े त्याग का जीवन है । साधना के सब साधन एकत्रित है । प्रत्येक क्षण शिक्षा दे रहा है – अन्तिम समय के लिये तैयार हो जाओ, परमात्मा का भजन करो ।

मुझे तो इस कोठरी में बड़ा आनन्द आ रहा है । मेरी इच्छा थी कि किसी साधु की गुफा पर कुछ दिन निवास कर के योगाभ्यास किया जाता । अन्तिम समय वह इच्छा भी पूर्ण हो गई साधु की गुफा न मिली तो क्या साधना की गुफा तो मिल गई, इसी  कोठरी  में  यह  सुयोग  प्राप्त  हो गया, कि  अपनी  कुछ  अन्तिम  बात  लिख  कर  देशवासियों  के  अर्पण  कर  दूं । सम्भव है मेरे जीवन के अध्ययन से किसी आत्मा का भला हो जावे । बड़ी कठिनता से यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ ।

महसूस हो रहे है वादे फना के झोकें ।
खुलने लगे हैं मुझ पर इसरार जिन्दगी के ।।
बारे अलम उठाया रंगे निशात देखा ।
आये नहीं हैं यूं ही अंदाज बेहिसी के ।।

वफ़ा पर दिल को सदके जान को नज़रे ज़फा कर दे ।
मुहब्बत में यह लाज़िम है कि जो कुछ हो फिदा कर दे ।।

अब तो यही इच्छा है-

बहे बहरे फ़ना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की।
कि भूखी मछलियां है जौहरे शमशीर कातिल की।।

किन्तु
समझ कर फूँकना इस को जरा ऐ दागे नाकामी ।
बहुत से घर भी हैं आबाद इस उजड़े हुये दिल से ।।

परिणाम
ग्यारह वर्ष पर्यन्त यथाशक्ति प्राणपण से चेष्टा करने पर भी हम अपने उद्देश्य में कहां तक सफल हुये ? क्या लाभ हुआ ? इस का विचार करने से कुछ अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा, क्योंकि हम ने लाभ हानि अथवा जय पराजय के विचार से क्रान्तिकारी दल में योग नहीं दिया था । हम ने जो कुछ किया वह अपना कर्तव्य समझ कर किया । कर्तव्य निर्णय  में  हमने  कहां  तक  बुद्धिमत्ता  से  काम  लिया, इस का विवेचन करना उचित जान पड़ता है । राजनैतिक दृष्टि से हमारे कार्यों का इतना ही मूल्य है कि कतिपय होनहार नवयुवकों के जीवन को कष्टमय बना कर नीरस कर दिया और उन्हीं में से कुछ ने व्यर्थ में जाने गंवाईं । कुछ धन भी खर्च किया ।

हिन्दू शास्त्र के अनुसार किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती, जिसका जिस विधि से जो काल होता है, वह उसी विधि समय पर ही प्राण त्याग करता है । केवल निमित्त मात्र कारण उपस्थित हो जाते हैं ।

लाखों भारतवासी महामारी, हैजे, ताउन इत्यादि अनेक प्रकार के रोगों में मर जाते हैं । करोड़ों दुर्भिक्ष में अन्न बिना प्राण त्यागते हैं तो उस का उत्तरदायित्व किस पर है ? रह गया धन का व्यय, सो इतना धन तो भले आदमियों के विवाहोत्सवों में व्यय हो जाता है । गणमान्य व्यक्तियों की तो केवल विलासिता की सामग्री  का  मासिक  व्यय  इतना  होगा, जितना  कि  हमने  एक  षडयन्त्र  के  निर्माण  में  व्यय  किया । हमलोगों को डाकू बता कर फांसी और काले पानी की सजायें दी गयी है ।
किन्तु हम समझते हैं कि वकील और डाक्टर हम से कहीं बड़े डाकू है । वकील डाक्टर दिन दहाड़े बड़े-बड़े तालुकेदारों की जायदादें लूट कर खा गये । वकीलों के चाटे हुये अवध के ताल्लुकेदारों को ढूंढ़े रास्ता भी नहीं दिखाई देता, और वकीलों को उंची अटटालिकायें उन पर खिलखिला कर हंस रही है । इसी प्रकार लखनउ में डाक्टरों के भी उंचे-उंचे महल बन गये । किन्तु इस समय राज्य  में  दिन  के  डाकुओं  की प्रतिष्ठा है । अन्यथा रात के साधारण डाकुओं में और दिन के इन डाकुओं वकीलों तथा डाक्टरों में कोई भेद नहीं है । दोनों अपने-अपने मतलब के लिये बुद्धि की कुशलता से प्रजा का धन लूटते है ।

 

अगला पृष्ठ »

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .
Entries और टिप्पणियाँ feeds.