सिगरेट की कुटेव से कट्टर आर्यसमाजी तक

जनवरी 16, 2009 को 11:33 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | 2 टिप्पणियाँ
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अबतक आपने पढ़ा..

दूसरे वर्ष जब मैं उर्दू मिडिल की परीक्षा में फेल हुआ उसी समय पड़ोस के देव मन्दिर में जिसकी दीवार मेरे मकान से मिली थी एक पुजारी जी आ गये आप बड़े ही सत्चरित्र व्यक्ति थे । मैं आपके पास उठने-बैठने लगा । अब आगे पढ़ें… .

मैं मन्दिर में जाने-आने लगा। कुछ पूजा-पाठ भी सीखने लगा । पुजारी जी के उपदेशों का बड़ा उत्तम प्रभाव हुआ । मैं अपना अधिकतर समय स्तुति पूजन तथा पढ़ने में व्यतीत करने लगा । पूजारी जी मुझे ब्रहमचर्य पालन का खूब उपदेश देते थें वे मेरे पथ प्रदर्शक बने । मैंने एक दूसरे सज्जन की देखा-देखी व्यायाम करना भी आरम्भ कर दिया । अब तो मुझे भक्ति मार्ग में कुछ आनन्द प्राप्त होने लगा और चार-पाचं महीने में ही व्यायाम भी खूब करने लगां । मेरी सब बुरी आदतें तथा अन्य कुभावनायें जाती रहीं । स्कूलों की छुट्टियां समाप्त होने पर मैंने मिशन स्कूल के अंग्रेजी के पांचवें दर्जें में नाम लिख लिया । इस समय तक मेरी सब कुटेवें तो छूट गई थी, किन्तु सिगरेट पीना न छूटता था । मैं सिगरेट बहुत पीता था । एक दिन में पचास-साठ सिगरेट पी डालता था । मुझे बड़ा दूख होता था कि मैं इस जीवन में शायद सिगरेट पीने की कुटेव को न छोड़ सकूंगा । स्कूल में भर्ती होने के थोडे़ दिनों बाद ही एक सहपाठी श्रीयुत सुशीलचन्द्र सेन से कुछ विशेष स्नेह हो गया । उन्हीं की दया के कारण मेरा सिगरेट पीना भी छूट गया ।

देव मन्दिर में स्तुति पूजा करने की प्रवृत्ति को देख कर श्रीयुत मुन्शी इन्द्रजीत जी ने मुझे संध्या करने का उपदेश दिया । आप उसी मन्दिर में रहने वाले किसी महाशय के पास आया करते थें व्यायामादि करने के कारण मेरा शरीर बड़ा सुगंठित हो गया था और रंग निखर आया था । मैने जानना चाहा कि संध्या क्या वस्तु है ? मुन्शी जी ने आर्य समाज सम्बन्धी कुछ उपदेश दिये । इसके बाद मैंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा । इससे तख्ता ही पलट गया । सत्यार्थ प्रकाश के अध्ययन ने मेरे जीवन के इतिहास में एक नवीन पृष्ठ खोल दिया । मैंने उसमें उल्लिखित ब्रम्हचर्य के कठिन नियमों का पालन करना आरम्भ कर दिया ।

मैं एक कम्बल को तख्त पर बिछाकर सोता व प्रातःकाल चार बजे से ही शैया त्याग कर देता । स्नान सन्ध्यादि से निवृत हो व्यायाम करता, किन्तु मन की वृत्तियां ठीक न होती । मैंने रात्रि के समय भोजन करना त्याग दिया । केवल थोड़ा सा दूध ही रात को पीने लगा । सहसा ही बुरी आदतों को छोड़ा था । शायद इस कारण कभी-कभी स्वप्न दोष हो जाता । तब किसी सज्जन के कहने से मैंने नमक खाना भी छोड़ दिया । केवल उबाल कर साग या दाल से एक समय भोजन करता । मिर्च-खटाई तो छूता भी न था । इस प्रकार पांच वर्ष तक बराबर नमक न खाया । नमक के न खाने से शरीर के सब दोष दूर हो गये और मेरा स्वास्थ्य दर्शनीय हो गया ।

सब लोग मेरे स्वास्थ्य को आश्चर्य की दृष्टि से देखा करते । मैं थोड़े दिनों में ही बड़ा कट्टर आर्य समाजी हो गया । आर्य समाज के अधिवेशन में जाता आता । सन्यासी महात्माओं के उपदेशों को बड़ी श्रद्धा से सुनता । जब कोई सन्यासी आर्य समाज में आता तो उसकी हर प्रकार सेवा करता क्यों मेरी प्राणायाम सीखने की बड़ी उत्कट इच्छा थी । जिस सन्यासी का नाम सुनता शहर से तीन चार मील भी उसकी सेवा के लिये जाता फिर वह सन्यासी चाहे जिस मत का अनुयायी होता । जब मैं अंग्रेजी के सातवें दर्जें में था तब सनातन धर्मीं पण्डित जगतप्रसाद जी शाहजहांपुर पधारे ।

उन्होंने आर्य समाज का खण्डन करना प्रारम्भ किया, आर्य समाजियों ने भी उनका विरोध किया और पं अखिलानन्द जी को बुलाकर शास्त्रार्थ कराया । शास्त्रार्थ संस्कृत में हुआ  और जनता पर अच्छा प्रभाव हुआ । मेरे कामों को देख  कर मुहल्ले वालों ने पिता से शिकायत की । पिता जी ने मुझसे कहा कि आर्यसमाजी हार गये, अब तुम आर्य समाज से अपना नाम कटा दो, मैंने पिता जी से कहा कि आर्यसमाज के सिद्धान्त सार्वभौम है, उन्हें कौन हरा सकता है ? अनेक वाद-विवाद के पश्चात् पिता जी जिद पकड़ गये कि यदि आर्य समाज से त्यागपत्र न दोगे तो मैं तुम्हें रात में सोते समय मार दूंगा । या तो आर्य समाज से त्यागपत्र दे दो या घर छोड़ दो । मैंने भी बिचारा कि पिता जी का क्रोध यदि अधिक बढ़ गया और उन्होंने मुझ पर कोई वस्तु ऐसी दे पटकी कि जिससे बुरा परिणाम हुआ तो अच्छा न होगा । अतएव घर त्याग देना ही उचित है ।

मैं केवल एक कमीज पहने खड़ा था और पैजामा उतार कर धोती पहन रहा था । पैजामे के नीचे लंगोट बंधा था । पिताजी ने हाथ से धोती छीन ली और कहा घर से निकल । मुझे भी क्रोध आ गया । मैं पिता जी के पैर छूकर गृह त्याग कर चला गयां कहां जाउं कुछ समझ में न आया । शहर में किसी से जान-पहचान भी न थी । जहां छिप रहता । मैं जंगल की ओर चला गया । एक रात तथा एक दिन बाग में पेड़ पर बैठा रहा । क्षुधा लगने पर खेतों में से हरे चने तोड़ कर खाये नदी में स्नान किया और जलपान किया । दूसरे दिन संध्या समय पं0 अखिलानन्दजी का व्याख्यान आर्यसमाज मन्दिर में था । मैं आर्यसमाज मन्दिर में गया ।

एक पेड़ के नीचे एकान्त में खड़ा व्याख्यान सुन रहा था कि पिता जी दो मनुष्यों को लिये हुए आ पहुंचे और मैं पकड़ लिया गया । वह उसी समय पकड़ कर स्कूल के हेड मास्टर के पास ले गये । हेड मास्टर साहब ईसाई थे । मैंने उन्हें सब वृतान्त कह सुनाया । उन्होंने पिता को ही समझाया कि समझदार लड़के को मारना पीटना ठीक नहीं । मुझे भी बहुत कुछ उपदेश दिया, उस दिन से पिताजी ने कभी भी मुझ पर हाथ नहीं उठाया क्योंकि मेरे घर से निकल जाने पर घर में बड़ा क्षोभ रहा ।

एक रात एक दिन किसी ने भोजन नहीं किया, सब बड़े दुखी हुए कि अकेला पुत्र न जाने नदी में डूब गया या रेल से कट गया ? पिताजी के हृदय को भी बड़ा धक्का पहुंचा । उस दिन से वे मेरी प्रत्येक बात सहन कर लेते थे, अधिक विरोध न करते थे । मैं पढ़ने में भी बड़ा प्रयत्न करता था और अपने क्लास में प्रथम उत्तीर्ण होता था । यह अवस्था आठवें दर्जें तक रही ।

पिताजी का ग्राहस्थ और मेरा जन्म

जनवरी 13, 2009 को 10:51 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | 1 टिप्पणी
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अब तक आपने पढ़ा…

… दादी जी आदर्श माता थी, उन्होंने इस प्रकार के प्रलोभनों की किन्चित मात्र भी परवा न की और अपने बच्चों का किसी न किसी प्रकार पालन करती रहीं । मेहनत मजदूरी तथा ब्राम्हण वृत्ति द्वारा कुछ धन एकत्रित हुआ । कुछ महानुभावों के कहने से पिता जी के किसी पाठाशाला में शिक्षा पाने का प्रबन्ध कर दिया गया । श्री दादा जी ने भी कुछ प्रयत्न किया, उनका वेतन भी बढ़ गया और वे 7द्ध मासिक पाने लगे । इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़, पैसे तथा दुवन्नी, चवन्नी इत्यादि बेचने की दूकान की । पांच सात आने रोज पैदा होने लगे । जो दुर्दिन आये थे, प्रयत्न तथा साहस से दूर होने लगे । इसका सब श्रेय श्री दादी जी को ही है ।

अब आगे …

जिस साहस तथा धैर्य से उन्होंने काम लिया वह वास्तव में अशिक्षित ग्रामीण महिला की क्या सामर्थ्य है कि वह नितान्त अपरिचित स्थान में जा कर मेहनत मजदूरी करके अपना तथा अपने बच्चों का पेट पालन करते हुए उन को शिक्षित बनावे और फिर ऐसी परिस्थियों में जब कि उसने कभी अपने जीवन में घर से बाहर पैर न रखा हो ओर जो ऐसे कट्टर देश की रहने वाली हो कि जहां पर प्रत्येक हिन्दू प्रथा का पूर्णतया पालन किया जाता हो । जहां के निवासी अपनी प्रथाओं की रक्षा के लिये प्राणों की किन्चित मात्र भी चिन्ता नहीं करते हों । किसी ब्राम्हण, क्षत्री या वैश्य की कुल वधू का क्या साहस जो डेढ़ हाथ का घूंघट निकाले बिना एक घर से दूसरे घर चली जावें ।

शूद्र जाति की वधूओं के लिये भी यही नियम है कि वे रास्तें में बिना घूंघट निकाले न जावें । शूद्रों का पहनावा ही अलग है, ताकि उन्हें देख कर सही दूर से पहिचान लिया जावे कि यह किसी नीच जाति की स्त्री है । ये प्रथायें इतनी प्रचलित है कि उन्होंने अत्याचार का रूप धारण कर लिया है । एक समय किसी चमार वधू जो अंग्रेजी राज्य से विवाह करके के गई थी, कुल प्रथानुसार जमींदार के घर में पैर छूने के लिये गई । वह पैर में बिछवे नूपुर पहने हुई थी और सब पहनावा चमारों का पहने थी ।  जमींदार महोदय की निगाह उस के पैरों पर पड़ी । पूछने पर मालूम हुआ कि चमार की बहू है । जमींदार साहब जूता पहन कर आये और उस के पैरों पर खड़े हो कर इस जोर से दबाया कि उसकी उंगलियां कट गईं । उन्होंने कहा कि यदि चमारों की बहुयें बिछुवी पहनेंगी तो उंची जाति के घर की स्त्रियां क्या पहनेगी ?  नितान्त अशिक्षित तथा मूर्ख है, किन्तु जाति अभिमान में चूर रहा करते  हैं । गरीब से गरीब अशिक्षित ब्राम्हण या क्षत्रिय चाहे वह किसी आयु का हो यदि  शूद्र जाति की बस्ती से गुजरे तो चाहे कितना ही धनी या वृद्ध कोई  शूद्र क्यों न हो उस को उठ कर पालागन या जुहार करनी ही पड़ेगी । यदि ऐसा न करें तो उसी समय वह ब्राम्हण या क्षत्रीय उसे जूतों से मार सकता है और सब उस शूद्र का ही दोष बता कर उसका तिरस्कार करेंगे ।

यदि किसी कन्या या बहू पर व्यभिचारिणी होने का सन्देह किया जावे तो उसे बिना किसी विचार के मार चम्बल में प्रवाहित कर दिया जाता है । इसी प्रकार यदि किसी विधवा पर व्यभिचार या किसी प्रकार आचरण भ्रष्ट होने का दो्ष लगाया जावें तो चाहे वह गर्भवती ही क्यों न हो उसे तुरन्त ही काट कर चम्बल में पहुंचा दें और किसी को कानों कान भी खबर न होने दें । वहां के मनुष्य भी सदाचारी होते हैं वे सब की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझते हैं । स्त्रियों की मान मर्यादा की रक्षा के लिये प्राण देने में कोई चिन्ता नहीं करते । इस प्रकार के देश में विवाहित हो कर सब प्रकार की प्रथाओं को देखते हुए भी इतना साहस करना यह दादी जी का ही काम था ।

परमात्मा की दया से दुर्दिन समाप्त हुए । पिताजी कुछ शिक्षा पा गये और एक मकान भी श्री दादाजी ने खरीद लिया । दरवाजे-दरवाजे भटकने वाले कुटुम्ब को शान्ति पूर्वक बैठने का स्थान मिल गया और फिर श्री पिताजी के विवाह करने का विचार हुआ । दादी जी, दादाजी तथा पिता जी के साथ अपने मायके गयी । वहीं पिता जी का विवाह कर दिया । वहां दो चार मास रहकर सब लोग वधू को विदा कराके साथ लिवा लाये ।

विवाह हो जाने के पश्चात पिताजी म्यूनिसिपैलिटी में 15 रू० मासिक वेतन पर नौकर हो गये । उन्होंने कोई बड़ी शिक्षा प्राप्त न की थी । पिताजी को यह नौकरी पसन्द न आई । उन्होंने एक दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर स्वतन्त्र व्यवसाय आरम्भ करने का प्रयत्न किया और कचहरी में सरकारी स्टाम्प बेचने लगे । आप के जीवन का अधिक भाग इसी व्यवसाय में व्यतीत हुआ । साधारण श्रेणी का गृहस्थ बन कर उन्होंने इसी व्यवसाय द्वारा अपनी सन्तानों की शिक्षा दी, अपने कुटुम्ब का पालन किया और अपने मुहल्ले के गण्यमान्य व्यक्तियों में गिने जाने लगे । आप रूपये का लेन-देन भी करते थे । आपने तीन बैल गाड़ियां भी बनाई थी जो किराये पर चला करती थीं । पिता जी का व्यायाम से प्रेम था आप का शरीर बड़ा सुदृढ़ और सुडौल था । आप नियम पूर्वक अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे ।

पिता जी के गृह में एक पुत्र उत्पन्न हुआ, किन्तु वह मर गया । उसके एक साल बाद इस शहीदाने वतन लेखक राम प्रसाद ने श्री पिताजी के गृह में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 11 सम्वत् 1954 विक्रमी को जन्म लिया । बड़े प्रयत्नों से मानता मान कर अनेकों गंडे ताबीज तथा कवचों द्वारा श्री दादी जी ने इस शरीर की रक्षा का प्रयत्न किया । स्यात् बालकों का रोग गृह में प्रवेश कर गया था । अतएव जन्म लेने के एक या दो मास पश्चात ही मेरे शरीर की अवस्था भी पहले बालक वैसी होने लगी थी । किसी ने बताया कि सफेद खरगोश को मेरे शरीर पर से घुमा कर जमीन पर छोड़ दिया जावे, यदि बीमारी होगी तो खरगोश तुरन्त मर जावेगा । कहते हैं कि हुआ भी ऐसा ही । एक सफ़ेद खरगो्श मेरे् शरीर पर से उतार कर जैसे ही जमींन पर छोड़ा गया, वैसे ही उसने तीन चार चक्कर काटे और मर गया । मेरे विचार में किसी अंश में यह सम्भव भी है क्योंकि ऎसी जानकारी है ..

.. कि  औ्षधि तीन प्रकार की होती है  1- दैविक, 2- मानुषिक, 3- पैशाचिक पैशाचिक औषधियों में अनेक प्रकार के पशु या पक्षियों के मांस अथवा रूधिर का व्यवहार होता है, जिन का उपयोग वैद्यक के ग्रन्थों में पाया जाता है । इनमें से एक प्रयोग बड़ा ही कौतुहलोत्पादक तथा आश्चर्यजनक है  कि जिस बच्चे को जमोखे सूखा की बीमारी हो गई हो यदि उसके सामने चिमगादड़ को चीर कर के लाया जावे तो एक दो मास का बालक चिमगादड़ को पकड़ कर के उसका खून चूस लेगा और बीमारी जाती रहेगी । यह बड़ी उपयोगी औषधि है और एक महात्मा की बतलाई हुई है ।

 

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