मैनपुरी षड़यन्त्र और विश्वासघात

जनवरी 28, 2009 को 2:47 पूर्वाह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-2 में प्रकाशित किया गया | 7 टिप्पणियाँ
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हथियारों की खरीद के आगे पढ़ें…

इधर तो हम लोग अपने कार्य में व्यस्त थे, उधर मैनपुरी के एक सदस्य पर लीडरी का भूत सवार हुआ । उन्होंने अपना पृथक संगठन किया । कुछ अस्त्र-षस्त्र भी एकत्रित किये । धन की कमी पूर्ति के लिए एक सदस्य से कहा कि तुम अपने किसी कुटुम्बी के यहां डाका डलवाओं । उस सदस्य ने कोई उत्तर न दिया । उसे आज्ञापत्र दिया गया और मार देने की धमकी दी गई । वह पुलिस के पास गया । मामला खुला ।

Sarfaroshi

मैनपुरी में धर-पकड़ शुरू हो गई । हम लोगों को भी समाचार मिला ।  यह भी समाचार मिला देहली में कांग्रेस होने वाली थी । विचार किया गया कि अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली नामक पुस्तक जो यू0 पी0 सरकार ने जब्त कर ली थी, कांग्रेस के अवसर पर बेच दी जावें कांग्रेस के उत्सव पर मैं शाहजहांपुर की सेवा समिति के साथ अपनी एम्बुलेंस की टोली लेकर गया था । एम्बुलेन्स वालों को प्रत्येक स्थान पर बिना रोक जाने की आज्ञा थी ।

कांग्रेस पंडाल के बाहर खुले रूप में नवयुवक कह कह कर पुस्तक बेंच रहे थे कि ‘ यू0 पी0 में जब्त किताब अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली ‘ लीजिये । खुफिया पुलिस वालों ने कांग्रेस का कैम्प घेर लिया । सामने ही आर्यसमाज का कैम्प था । वहां पर पुस्तक विक्रेताओं की पुलिस ने तलाशी लेना आरम्भ कर दी । मैंने कांग्रेस कैम्प पर अपने स्वयंसेवक इसलिये छोड़ दिये थे कि वे बिना स्वागतकारिणी समिति के मंत्री या प्रधान की आज्ञा पाये किसी पुलिस वाले को कैम्प में न घुसने दें । आर्य समाज के कैम्प में गया । सब पुस्तकें एक टेंट में जमा थीं ।

मैंने अपने ओवरकोट में सब पुस्तकें लपेंटी, जो लगभग दो सौ के होंगी, और उसे कन्धे पर डाल कर पुलिस वालों के सामने से निकला । मैं वर्दी पहने था, टोप लगाये हुये था एम्बुलेन्स का बड़ा सा लाल बिल्ला मेरे हाथ पर लगा हुआ था, किसी ने कोई सन्देह भी न किया और पुस्तकें बच गईं । देहली कांग्रेस से लौट कर शाहजहांपुर आये ।

वहां भी पकड़-धकड़ शुरु हुई । हम लोग वहां से चल कर दूसरे शहर के एक मकान में ठहरे हुये थे । रात्रि के समय मकान मालिक ने बाहर से ताला डाल दिया । ग्यारह बजे के लगभग हमारा एक साथी बाहर से आया । उस ने बाहर से ताला पड़ा देख पुकारा । हम लोगों को भी सन्देह हुआ । हम सब के सब दीवार पर से उतर कर मकान छोड़ कर चल दिये । अंधेरी रात थी । थोड़ी दूर गये थे कि हठात् आवाज आई खड़े हो जाओ ? कौन जाता है ? हम लोग सात आठ आदमी थे । समझे कि घिर गये । कदम उठाना ही चाहते थे, कि फिर आवाज आई खड़े हो जाओ नहीं तो गोली मारते हैं । हम लोग खड़े हो गये ।

थोड़ी देर में एक पुलिस के दारोगा बन्दूक हमारी तरफ किये हुए रिवाल्वर कंधे पर लटकाए कई सिपाहियों को लिये हुए आ पहुंचे । पूछा- कौन हो, कहां जाते हो ?  हमलोगों ने कहा – विद्यार्थी हैं, स्टेशन जा रहे । कहां जाओगे ? लखनउ उस समय दो बजे थे । लखनउ की गाड़ी पांच बजे जाती थी । दरोगा को शक हुआ । लालटेन आई । हम लोगों के चेहरे रोशनी में देखकर शक जाता रहा । कहने लगे रात के समय लालटेन लेकर चला कीजिये । गलती हुई मुआफ़ कीजिये । हम लोग भी सलाम झाड़ कर चलते बने ।

एक बाग में फूस की मडैया पड़ी थी । उसमें जा बैठे । पानी बरसने लगा । मूसलाधार पानी गिरा । सब कपड़े भीग गये । जमीन पर भी पानी भर गया । यह  जनवरी का महीना था । और खूब जाड़ा पड़ रहा था । रात भर भींगते और ठिठुरते रहे । बड़ा कष्ट हुआ । प्रातःकाल धर्मशाला में जाकर कपड़े सुखायें दूसरे दिन शाहजहांपुर आकर बन्दूकें जमीन में गाड़कर, प्रयाग पहुंचे ।

विश्वासघात
प्रयाग की एक धर्मशाला में दो तीन दिन निवास करके विचार किया गया कि एक व्यक्ति बहुत दुर्बलात्मा है यदि वह पकड़ा गया तो सब भेद खुल जावेगा । अतः उसे मार दिया जावे । मैंने कहा मनुष्य हत्या ठीक नही । पर अन्त में निश्चय हुआ कि कल चला जावे और उसकी हत्या कर दी जावे । मैं चुप हो गया । हम लोग चार सदस्य साथ थे । हम चारों तीसरे पहर झूंसी का किला देखने गये । जब लौटे तब सन्ध्या हो चुकी थी ।

उसी समय गंगा पार करके यमुना तट पर गये । शौचादि से निवृत होकर मैं संध्या समय उपासना करने के लिए रेती पर बैठ गया । एक महाशय ने कहा – यमुना के निकट बैठो । मैं तट से दूर एक उंचे स्थान पर बैठा था । मैं वहीं बैठा रहा । वह तीनों भी मेरे पास ही आकर बैठ गये । मैं आंखे बन्द किये ध्यान कर रहा था । थोड़ी देर में खट से कुछ आवाज हुई । समझा कि साथियों में से कोई कुछ कर रहा होगा ।

तुरन्त ही एक फायर हुआ । गोली सन से मेरे कान के पास निकल गई । मैं समझ गया कि मेरे उपर ही फायर हो रहे है । मैंने रिवाल्वर निकाला । तब  एक दूसरा फायर हुआ । मैं रिवाल्वर निकालता हुआ आगे को बढ़ा । पीछे फिर कर देखा, वह महाशय माउजर हाथ में लिये मेरे उपर गोली चला रहे हैं । कुछ दिन पहिले मुझसे उनसे कुछ झगड़ा हो चुका था, किन्तु बाद में समझौता भी हो गया था । फिर भी उन्होंने यह कार्य किया । मैं भी सामना करने को प्रस्तुत हुआ । तीसरा फायर करके वह भाग खड़े हुये । उनके साथ प्रयाग में ठहरे हुए दो सदस्य और भी थे । वे तीनों भाग गये ।

मुझे देर इसलिये हुई कि मेरा रिवाल्वर चमड़े के खोल में रखा था । यदि आधा मिनट और उन में कोई भी खड़ा रह जाता तो वह मेरी गोली का निशाना बन जाता । जब सब भाग गये, तब मैंने गोली चलाना व्यर्थ जान, वहां से चला आया । मैं बाल-बाल बच गया । मुझसे दो गज के फासले पर से माउजर पिस्तौल से गोलियां चलाईं गईं और उस अवस्था में जब कि मैं बैठा हुआ था । मेरी समझ में नहीं आया कि मैं बच कैसे गया ? पहला कारतूस फूटा नहीं । तीन फायर हुए । मैं गदगद् हो कर परमात्मा का स्मरण करने लगा । आनन्दोल्लास में मुझें मूर्छा आ गई ।

मेरे हाथ से रिवाल्वर तथा खोल दोनों गिर गये । यदि उस समय कोई निकट होता तो मुझे भली भांति मार सकता था । मेरी यह अवस्था लगभग एक मिनट तक रही होगी कि मुझसे किसी ने कहा, उठ ! मैं उठा । रिवाल्वर उठा लिया । खोल उठाने का स्मरण हीं न रहा । यह 22 जनवरी की घटना है । मैं केवल एक कोट और एक तहमद पहने था । बाल बढ़ रहे थे । नंगे सिर, पैर में जूता भी नहीं । ऐसी हालत में कहां जाउं ?  मेरे मन में अनेको विचार उठ रहे थे ।

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सिगरेट की कुटेव से कट्टर आर्यसमाजी तक

जनवरी 16, 2009 को 11:33 अपराह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ
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अबतक आपने पढ़ा..

दूसरे वर्ष जब मैं उर्दू मिडिल की परीक्षा में फेल हुआ उसी समय पड़ोस के देव मन्दिर में जिसकी दीवार मेरे मकान से मिली थी एक पुजारी जी आ गये आप बड़े ही सत्चरित्र व्यक्ति थे । मैं आपके पास उठने-बैठने लगा । अब आगे पढ़ें… .

मैं मन्दिर में जाने-आने लगा। कुछ पूजा-पाठ भी सीखने लगा । पुजारी जी के उपदेशों का बड़ा उत्तम प्रभाव हुआ । मैं अपना अधिकतर समय स्तुति पूजन तथा पढ़ने में व्यतीत करने लगा । पूजारी जी मुझे ब्रहमचर्य पालन का खूब उपदेश देते थें वे मेरे पथ प्रदर्शक बने । मैंने एक दूसरे सज्जन की देखा-देखी व्यायाम करना भी आरम्भ कर दिया । अब तो मुझे भक्ति मार्ग में कुछ आनन्द प्राप्त होने लगा और चार-पाचं महीने में ही व्यायाम भी खूब करने लगां । मेरी सब बुरी आदतें तथा अन्य कुभावनायें जाती रहीं । स्कूलों की छुट्टियां समाप्त होने पर मैंने मिशन स्कूल के अंग्रेजी के पांचवें दर्जें में नाम लिख लिया । इस समय तक मेरी सब कुटेवें तो छूट गई थी, किन्तु सिगरेट पीना न छूटता था । मैं सिगरेट बहुत पीता था । एक दिन में पचास-साठ सिगरेट पी डालता था । मुझे बड़ा दूख होता था कि मैं इस जीवन में शायद सिगरेट पीने की कुटेव को न छोड़ सकूंगा । स्कूल में भर्ती होने के थोडे़ दिनों बाद ही एक सहपाठी श्रीयुत सुशीलचन्द्र सेन से कुछ विशेष स्नेह हो गया । उन्हीं की दया के कारण मेरा सिगरेट पीना भी छूट गया ।

देव मन्दिर में स्तुति पूजा करने की प्रवृत्ति को देख कर श्रीयुत मुन्शी इन्द्रजीत जी ने मुझे संध्या करने का उपदेश दिया । आप उसी मन्दिर में रहने वाले किसी महाशय के पास आया करते थें व्यायामादि करने के कारण मेरा शरीर बड़ा सुगंठित हो गया था और रंग निखर आया था । मैने जानना चाहा कि संध्या क्या वस्तु है ? मुन्शी जी ने आर्य समाज सम्बन्धी कुछ उपदेश दिये । इसके बाद मैंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा । इससे तख्ता ही पलट गया । सत्यार्थ प्रकाश के अध्ययन ने मेरे जीवन के इतिहास में एक नवीन पृष्ठ खोल दिया । मैंने उसमें उल्लिखित ब्रम्हचर्य के कठिन नियमों का पालन करना आरम्भ कर दिया ।

मैं एक कम्बल को तख्त पर बिछाकर सोता व प्रातःकाल चार बजे से ही शैया त्याग कर देता । स्नान सन्ध्यादि से निवृत हो व्यायाम करता, किन्तु मन की वृत्तियां ठीक न होती । मैंने रात्रि के समय भोजन करना त्याग दिया । केवल थोड़ा सा दूध ही रात को पीने लगा । सहसा ही बुरी आदतों को छोड़ा था । शायद इस कारण कभी-कभी स्वप्न दोष हो जाता । तब किसी सज्जन के कहने से मैंने नमक खाना भी छोड़ दिया । केवल उबाल कर साग या दाल से एक समय भोजन करता । मिर्च-खटाई तो छूता भी न था । इस प्रकार पांच वर्ष तक बराबर नमक न खाया । नमक के न खाने से शरीर के सब दोष दूर हो गये और मेरा स्वास्थ्य दर्शनीय हो गया ।

सब लोग मेरे स्वास्थ्य को आश्चर्य की दृष्टि से देखा करते । मैं थोड़े दिनों में ही बड़ा कट्टर आर्य समाजी हो गया । आर्य समाज के अधिवेशन में जाता आता । सन्यासी महात्माओं के उपदेशों को बड़ी श्रद्धा से सुनता । जब कोई सन्यासी आर्य समाज में आता तो उसकी हर प्रकार सेवा करता क्यों मेरी प्राणायाम सीखने की बड़ी उत्कट इच्छा थी । जिस सन्यासी का नाम सुनता शहर से तीन चार मील भी उसकी सेवा के लिये जाता फिर वह सन्यासी चाहे जिस मत का अनुयायी होता । जब मैं अंग्रेजी के सातवें दर्जें में था तब सनातन धर्मीं पण्डित जगतप्रसाद जी शाहजहांपुर पधारे ।

उन्होंने आर्य समाज का खण्डन करना प्रारम्भ किया, आर्य समाजियों ने भी उनका विरोध किया और पं अखिलानन्द जी को बुलाकर शास्त्रार्थ कराया । शास्त्रार्थ संस्कृत में हुआ  और जनता पर अच्छा प्रभाव हुआ । मेरे कामों को देख  कर मुहल्ले वालों ने पिता से शिकायत की । पिता जी ने मुझसे कहा कि आर्यसमाजी हार गये, अब तुम आर्य समाज से अपना नाम कटा दो, मैंने पिता जी से कहा कि आर्यसमाज के सिद्धान्त सार्वभौम है, उन्हें कौन हरा सकता है ? अनेक वाद-विवाद के पश्चात् पिता जी जिद पकड़ गये कि यदि आर्य समाज से त्यागपत्र न दोगे तो मैं तुम्हें रात में सोते समय मार दूंगा । या तो आर्य समाज से त्यागपत्र दे दो या घर छोड़ दो । मैंने भी बिचारा कि पिता जी का क्रोध यदि अधिक बढ़ गया और उन्होंने मुझ पर कोई वस्तु ऐसी दे पटकी कि जिससे बुरा परिणाम हुआ तो अच्छा न होगा । अतएव घर त्याग देना ही उचित है ।

मैं केवल एक कमीज पहने खड़ा था और पैजामा उतार कर धोती पहन रहा था । पैजामे के नीचे लंगोट बंधा था । पिताजी ने हाथ से धोती छीन ली और कहा घर से निकल । मुझे भी क्रोध आ गया । मैं पिता जी के पैर छूकर गृह त्याग कर चला गयां कहां जाउं कुछ समझ में न आया । शहर में किसी से जान-पहचान भी न थी । जहां छिप रहता । मैं जंगल की ओर चला गया । एक रात तथा एक दिन बाग में पेड़ पर बैठा रहा । क्षुधा लगने पर खेतों में से हरे चने तोड़ कर खाये नदी में स्नान किया और जलपान किया । दूसरे दिन संध्या समय पं0 अखिलानन्दजी का व्याख्यान आर्यसमाज मन्दिर में था । मैं आर्यसमाज मन्दिर में गया ।

एक पेड़ के नीचे एकान्त में खड़ा व्याख्यान सुन रहा था कि पिता जी दो मनुष्यों को लिये हुए आ पहुंचे और मैं पकड़ लिया गया । वह उसी समय पकड़ कर स्कूल के हेड मास्टर के पास ले गये । हेड मास्टर साहब ईसाई थे । मैंने उन्हें सब वृतान्त कह सुनाया । उन्होंने पिता को ही समझाया कि समझदार लड़के को मारना पीटना ठीक नहीं । मुझे भी बहुत कुछ उपदेश दिया, उस दिन से पिताजी ने कभी भी मुझ पर हाथ नहीं उठाया क्योंकि मेरे घर से निकल जाने पर घर में बड़ा क्षोभ रहा ।

एक रात एक दिन किसी ने भोजन नहीं किया, सब बड़े दुखी हुए कि अकेला पुत्र न जाने नदी में डूब गया या रेल से कट गया ? पिताजी के हृदय को भी बड़ा धक्का पहुंचा । उस दिन से वे मेरी प्रत्येक बात सहन कर लेते थे, अधिक विरोध न करते थे । मैं पढ़ने में भी बड़ा प्रयत्न करता था और अपने क्लास में प्रथम उत्तीर्ण होता था । यह अवस्था आठवें दर्जें तक रही ।

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