यह कैसा भारतवर्ष है

जुलाई 9, 2009 को 5:07 पूर्वाह्न | आत्मकथा, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा …मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो  हमारा  उद्योग  क्रान्तिकारी  आन्दोलन  से  कहीं  अधिक  लाभदायक होता, जिसका  परिणाम  स्थायी  होता । अति उत्तम होगा कि भारत की भावी सन्तान तथा नवयुवक वृन्द क्रान्तिकारी संगठन करने की अपेक्षा जनता की प्रवृत्ति को देश सेवा की ओर लगाने का प्रयत्न करें और श्रमजीवियों तथा कृ्षकों का संगठन कर के उन को जमींदारों तथा रईसों के अत्याचारों से बचावें । अब इसके आगे..

भारतवर्ष के रईस तथा जमींदार सरकार के पक्षपाती है । मध्य श्रेणी के लोग किसी न किसी प्रकार इन्हीं तीनों के आश्रित हैं उन्हें भी इन्हीं के मुंह की ओर ताकना पड़ता है । रह गये श्रमजीवी तथा कृषक सो उनको उदर पूर्ति के उद्योग से ही समय नहीं मिलता, जो धर्म, समाज तथा राजनीति की ओर कुछ ध्यान दे सकें । मद्यपानादि दुर्व्यसनों के कारण उनका आचारण भी ठीक नहीं रह सकता । व्यभिचार, सन्तान-वृद्धि, अल्पायु में मृत्यु तथा अनेक प्रकार के रोगों से जीवन भर उनकी मुक्ति नहीं हो सकती ।

कृषकों में उद्योग का तो नाम भी नहीं पाया जाता । यदि एक किसान को जमींदार की मजदूरी करने या हल चलाने की नौकरी करने पर ग्राम में आज से बीस वर्ष पूर्व दो आने रोज या चार रूपये मासिक मिलते थे, तो आज भी वही वेतन बंधा चला आ रहा है । बीस वर्ष पूर्व वह अकेला था, अब उसकी स्त्री तथा चार सन्तान भी है । पर उसी वेतन में उसे निर्वाह करना पड़ता है । उसे उसी पर सन्तोष करना पड़ता है । सारे दिन जेठ की लू तथा धूप में गन्ने के खेत में पानी देते देते उसको रतौंधी आने लगती है , अंधेरा होते ही आंख से दिखाई नहीं देता, पर उसके उपलक्ष्य में आध सेर सड़े हुये शीरे तथा शरबत या आध सेर चना तथा छः पैसे रोज मजदूरी मिलती है,जिसमें ही उसे अपने परिवार का पेट पालना पड़ता है ।

जिस के हृदय में भारतवर्ष की सेवा के  भाव उपस्थित हों, या जो भारतभूमि को स्वतन्त्र देखने या स्वाधीन बनाने की इच्छा रखता हो, उसको उचित है कि ग्रामीण संगठन कर के कृषकों की दशा सुधार कर, उनके हृदय से भाग्य-निर्भरता को हटा कर उद्योगी बनाने की शिक्षा दें । कल, कारखाने, रेलवे, जहाज तथा खानों में जहां कहीं श्रमजीवी हों, उन की दशा को सुधारने के लिये श्रमजीवियों के संगठन की स्थापना की जावे ताकि उनको उनकी अवस्था का ज्ञान हो सके और कारखानों के मालिक मनमाने अत्याचार न कर सकें और अछूतों को, जिनकी संख्या इस देश में लगभग छः करोड़ है, पर्याप्त शिक्षा प्राप्त कराने का प्रबन्ध हो, उनको सामाजिक अधिकारों में समानता हो ।

जिस देश में छः करोड़ मनुष्य अछूत समझे जाते हों, उस देशवासियों को स्वाधीन बनने का अधिकार ही क्या है ? इसी के साथ ही साथ स्त्रियों की दशा भी इतनी सुधारी जावे कि वे अपने आप को मनुष्यजाति का अंग समझने लगे । वे पैर की जूती तथा घर की गुड़ियां न समझी जावें । इतने कार्य हो जाने के बाद जब भारत की जनता का अधिकांश शिक्षित हो जावेगा,वे अपनी भलाई-बुराई समझने के योग्य हो जायेंगे, उस समय प्रत्येक आन्दोलन, जिस का शिक्षित जनता समर्थन करेगी, अवश्य सफल होगा । संसार की बड़ी से बड़ी् शक्ति भी उस के दबाने में समर्थ न हो सकेगी ।

रूस में जब तक किसान संगठन नहीं हुआ, रूस सरकार की ओर से देश सेवकों पर मनमाने अत्याचार होते रहे। जिस समय से केथोराइन ने ग्रामीण संगठन का कार्य अपने हाथ में लिया, स्थान – स्थान पर कृषक सुधाकर संगठनों की स्थापना की, घूम-घूम कर रूस के युवक तथा युवतियों ने जारशाही के विरूद्ध प्रचार आरम्भ किया । फिर किसानों को अपनी वास्तविक अवस्था का ज्ञान होने लगा । वे अपने मित्र तथा शत्रु को समझने लगे, उसी समय से जारशाही की नींव हिलने लगी । श्रमजीवियों के संगठन भी स्थापित हुए । रूस में हड़तालों का आरम्भ हुआ । उसी समय से जनता की प्रवृति को देख कर मदान्धों के नेत्र खुल गये ।

भारतवर्षमें सब से बड़ी कमी यही है कि इस देश के युवकों में शहरी जीवन व्यतीत करने की बान पड़ गई है । युवक वृंद साफ-सुथरे कपड़े पहनने, पक्की सड़कों पर चलने, मीठा-खटटा तथा चटपटा भोजन करने, विदेशी सामग्री से सुसज्जित बाजारों में घूमने, मेज-कुर्सी पर बैठने तथा विलासिता में फंसे रहने के आदी हो गये हैं । ग्रामीण-जीवन को वे नितान्त नीरस तथा शुष्क समझते हैं । उनकी समझ में ग्रामों में अर्ध सभ्य या जंगली लोग निवास करते है। यदि कभी किसी अंगेजी स्कूल या कालेज में पढ़ने वाला विद्यार्थी किसी कार्यवश अपने किसी सम्बन्धी के यहां ग्राम में पहुंच जाता है, तो उसे वहां दो-चार दिन काटना बड़ा कठिन हो जाता है, वे या तो कोई उपन्यास साथ ले जाते है, जिसे अलग बैठे पढ़ा करते है, या पड़े-पड़े सोया करते है । किसी ग्रामवासी से बात-चीत करने से उन का दिमाग थक जाता है । या उन से बात-चीत करना अपनी शान के खिलाफ समझते है ।

ग्रामवासी जमींदार या रईस जो अपने लड़कों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं, उनकी भी यही इच्छा रहती है कि जिस प्रकार हो सके उनके लड़के कोई सरकारी नौकरी पा जायें । ग्रामीण बालक जिस समय शहर में पहुंच कर शहरी शान देखते है, इतनी बुरी तरह से उन पर फैशन का भूत सवार होता है कि उन के समान फैशन बनाने की चिन्ता किसी को भी नहीं रहती । थोड़े दिनों में उनके आचरण पर भी इस का प्रभाव पड़ता है और वे स्कूल के गन्दे लड़कों के हाथ में पड़ कर बड़ी बुरी-बुरी कुटेवों के घर बन जाते हैं । उनसे जीवन पर्यन्त अपना ही सुधार नहीं हो पाता, फिर वे ग्रामवासियों का सुधार क्या खाक कर सकेंगे ?

असहयोग आन्दोलन में कार्यकर्ताओं की इतनी अधिक संख्या होने पर भी सब के सब शहर के प्लेटफार्मों पर लेक्चरबाजी करना ही अपना कर्तव्य समझते थे । ऐसे बहुत थोड़े कार्यकर्ता थे, जिन्होंने ग्रामों में कुछ कार्य किया । उन में भी अधिकतर ऐसे थे जो केवल हुल्लड़ कराने में ही देशोद्धार समझते थे । परिणाम यह हुआ कि आन्दोलन में थोड़ी सी शिथिलता आते ही सब कार्य अस्त-व्यस्त हो गया ।

इसी कारण महामना देशबन्धु चितरंजन दास ने अन्तिम समय ग्राम संगठन ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था । मेरे विचार से ग्राम संगठन का सब से सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़ कर ग्रामीण जीवन से प्रीति उत्पन्न हो । जो युवक मिडिल, इटेंस, एफ0 ए0, बी0ए0 पास करने में हजारों रूपये नष्ट करके दस, पन्द्रह, बीस या तीस रूपये की नौकरी के लिये ठोकरें खाते फिरते है, उन्हें नौकरी का आसरा छोड़कर कोई उद्योग जैसे बढ़ईगिरी, लुहारगिरी, दर्जी का काम, धोबी का काम, जूते बनाना, कपड़ा बुनना, मकान बनाना, राजगीरी का इत्यादि सीख लेना चाहिए ।

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नौकरी, व्यवसाय तथा वृहत् संगठन

फ़रवरी 6, 2009 को 3:17 पूर्वाह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ
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इन चालबाजारियों के चलते….  अब सब ओर से चित्त को हटा कर बड़े मनोयोग से नौकरी में समय व्यतीत करने लगा । कुछ रूपया इकट्ठा करने के विचार से, कुछ कमीशन इत्यादि का प्रबन्ध कर लेता था । इस प्रकार थोड़ा सा पिताजी का भार घटाया । सब से छोटी बहिन का विवाह नहीं हुआ था । पिता जी के सामर्थ्य के बाहर था कि उस बहिन का विवाह किसी भले घर में कर सकते । मैंने रूपया जमा करके बहिन का विवाह एक अच्छे जमींदार के यहां कर दिया । पिता जी का भार उतर गया । अब केवल माता, पिता, दादी तथा छोटे भाई थे, जिन के भोजनों का प्रबन्ध हेाना अधिक कठिन व्यापार न था ।

अब माताजी की उत्कट इच्छा हुई कि मैं भी विवाह कर लूं । कई अच्छे-अच्छे विवाह सम्बन्ध सुयोग एकत्रित हुए । किन्तु मैं विचारता था कि जब तक पर्याप्त धन पास न हो, विवाह बन्धन में फंसना ठीक नहीं । मैंने स्वतंत्र कार्य आरम्भ किया, नौकरी छोड़ दी । एक मित्र ने सहायाता दी । मैंने एक निजी रेशमी कपड़ा बुनने का कारखाना खोल दिया । बड़े मनोयोग तथा परिश्रम से कार्य किया । परमात्मा की दया से अच्छी सफलता हुई । एक डेढ़ साल में ही मेरा कारखाना चमक गया ।

तीन हजार की पूँजी से कार्य आरम्भ किया था । एक साल बाद सब खर्च निकाल कर लगभग दो हजार रूपये लाभ हुए । मेरा उत्साह और भी बढ़ा । मैंने एक दो व्यवसाय और प्रारम्भ किये । उसी समय मालूम हुआ कि संयुक्त प्रान्त के क्रान्तिकारी दल का पुर्नसंगठन हो रहा है । कार्यारम्भ हो गया  है । मैने ने भी योग देने का वचन दिया । किन्तु उस समय मैं अपने व्यवसाय में बुरी तरह फंसा हुआ था । मैंने छः मास का समय लिया कि छः मास में मैं अपने व्यवसाय अपने साझी को सौंप दूंगा और अपने आपको उसमें से निकाल लूंगा । तब स्वतन्त्रता पूर्वक क्रान्तिकारी कार्य में योग दे सकूंगा । छः मास तक मैंने अपने कारखाने का सब काम साफ करके अपने साझी को सब काम समझा दिया ।

तत्पश्चात अपने बचनानुसार कार्य में योग देने का उद्योग किया । यद्यपि मैं अपना निश्चय कर चुका था, कि अब इस प्रकार के कार्यों में भाग न लूंगा । किन्तु मुझे पुनः क्रान्तिकारी आन्दोलन में हाथ डालना पड़ा । जिस का कारण यह था कि मेरी तृष्णा न बुझी थी, मेरे दिन के अरमान न निकले थें असहयोग आन्दोलन शिथिल हो चुका था । पूर्ण आशा थी कि जितने देश के नवयुवक उस आन्दोलन में भाग लेते थे, उन में अधिकतर क्रान्तिकारी आन्दोलन में सहायता देंगे और पूर्ण प्रीति से कार्य करेंगे । जब कार्य आरम्भ हो गया और असहयागियों को टटोला तो वे आन्दोलन से कहीं अधिक शिक्षित हो चुके थे ।

उन की आशाओं पर पानी फिर चुका था । घर की पूंजी समाप्त हेा चुकी थी । घर में व्रत हो रहे थे । आगे की भी कोई विशेष आ्शा न थी । कांग्रेस में भी स्वराज्य दल का जोर हो गया था । जिन के पास कुछ धन तथा इष्ट मित्रों का संगठन था, वे कौन्सिलों तथा एसेम्बली के सदस्य बन गये । ऐसा अवस्था में यदि क्रान्तिकारी संगठनकर्ताओं के पास पर्याप्त धन होता तो वे असहयोगियों को हाथ में ले कर उन से काम ले सकते थे । कितना भी सच्चा काम करने वाला हो किन्तु पेट तो सब के हैं । दिन भर में थोड़ा सा अन्न क्षुधा निवृत्ति के लिये मिलना परमावश्यक है । फिर शरीर ढकने को भी आवश्यकता होती है । अतएव कुछ प्रबन्ध ही ऐसा होना चाहिये जो नित्य की आवश्यकतायें पूरी हो जावें ।

जितने धनी मानी स्वदेशप्रेमी थे उन्होंने असहयोग आन्दोलन में पूर्ण सहायता दी थी । फिर भी कुछ ऐसे कृपालू सज्जन थे जो थोड़ी बहुत आर्थिक सहायता देते । किन्तु प्रान्त भर के प्रत्येक जिले में संगठन करने का विचार था । पुलिस की दृष्टि बचाने के लिये भी पूर्ण प्रयत्न करना पड़ता था । ऐसी परिस्थिति में साधारण नियमों को काम लाते हुये कार्य करना बड़ा कठिन  था । अनेकों  उद्योग के पश्चात  कुछ  सफलता न होती थी ।  दो  चार जिलों  में संगठनकर्ता नियत किये गये थे, जिन को कुछ मासिक गुजारा दिया जाता था । पांच दस मास तक तो इस प्रकार कार्य चलता रहा । बाद को जो सहायक कुछ आर्थिक सहायता देते थे, उन्होंने हाथ खींच लिया । अब हमलोंगों की अवस्था बहुत खराब हो गई ।

सब कार्यभार मेरे उपर ही आ चुका था । कोई भी किसी प्रकार की सहायता न देता था । जहां तहां से पृथक-पृथक जिलों में कार्य करने वाले मासिक व्यय की मांग कर रहे थे । कई मेरे पास आये । मैंने कुछ रूपया कर्ज लेकर उन लोगों को एक मास का खर्च दिया । कइयों पर कुछ कर्ज भी हो चुका था । मैं कर्ज न निपटा सका । एक केन्द्र के कार्यकर्ता को जब पर्याप्त धन न मिल सका तो वे कार्य छोड़ कर चले गये । मेरे पास क्या प्रबन्ध था जो मैं सब की उदरपूर्ति कर सकता ? अद्भुत समस्या थी । किसी तरह उन लोगों को समझाया ।

थोड़े दिनों में क्रान्तिकारी पर्चें आये । सारे देश में निश्चित तिथि पर पर्चें बांटे गये । बम्बई, रंगून, लाहौर, अमृतसर, कलकत्ता तथा बंगाल के मुख्य शहरों तथा संयुक्त प्रान्त के सभी मुख्य जिलों में पर्याप्त संख्या में पर्चा का वितरण हुआ । भारत सरकार  बड़ी सशंक हुई कि इतनी बड़ी सुसंगठित समिति है जो एक ही दिन सकल भारतवर्ष में पर्चें बंट गये । उसी के बाद मैंने कार्यकारिणी की एक बैठक कर के जो केन्द्र खाली हो गया था, उस के लिये एक महाशय को नियुक्त किया । केन्द्रों में कुछ परिवर्तन हुआ क्योंकि सरकार के पास संयुक्त प्रान्त के सम्बन्ध में बहुत सी सूचनायें पहुंच गई थी । भविष्य की कार्यकारिणी का निर्णय किया गया ।

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