श्री अशफाक उल्ला खां – मैं मुसलमान तुम काफिर ?

फ़रवरी 26, 2010 को 10:58 अपराह्न | Posted in 2.अशफ़ाक़ उल्ला खाँ, काकोरी के शहीद, फाँसी, विशेष परिचय | 5 टिप्पणियाँ
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इस तरह की अपनी कुर्बानियों से  वतन  की  मिट्टी – पानी  का  कर्ज़  अदा  करने  वाले  सिरफिरे  मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का परिचय जुड़ा दिखता है । अपने जीवनकाल में भी यह दोनों मित्रों ने एक नायाब दोस्ती की मिसाल कायम की थी । सँभवतः भाई  शिव  वर्मा  जी  ने  इसी कारण  मुख्य आरोपियों  की  परिचय श्रॄँखला  में  इन्हें  बिस्मिल  जी  के  बाद  दूसरा  स्थान  दिया  है । शहीद अशफ़ाक़ उल्ला को जीवनपर्यँन्त यह सवाल सता रहा और वह अपने सखा से यह पूछते रहते कि लोग आख़िर ऎसा क्यों सोचते ही हैं कि मैं मुसलमान तु्म क़ाफ़िर ! पढ़िये उनकी कहानी…

श्री अशफाक उल्ला खां पहिले मुसलमान है, जिन्हें  षडयन्त्र  के  मामले  में  फांसी  हुई  है । बीस पच्चीस वर्ष के इतिहास में, जब से राजनैतिक  षडयन्त्रों  की  चर्चा  सुनने  में  आई, अनेक आत्मायें फांसी और गोली का शिकार बना दी गयी । परन्तु आज तक किसी मुसलमान को यह शिकार बनते हुए नहीं सुना गया । इससे जनता में यह धारणा बैठ गयी थी कि मुसलमान लोग षडयन्त्रों में भाग नहीं ले सकते ।

किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे ।

वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी  बनाई  हुई  कविताएं  अदालत  आते-जाते  अक्सर  काकोरी  के अभियुक्त गाया करते थे ।

श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है ।

बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह  नवयुवक  और  कोई  न  था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब  श्री  रामप्रसाद  शाहजहांपुर  आये ।

श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।

उनके  निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है । मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है । अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था

एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु  उस  प्रेम  के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है । यह  एक  दूसरे  को  राम  और कृष्ण कहते है । अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते ।

जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये । स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया  कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया ।

अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले । शेष अगली कड़ी में समाप्य

मालिक तेरी रजा रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे

फ़रवरी 23, 2010 को 11:50 अपराह्न | Posted in 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, विशेष परिचय | 3 टिप्पणियाँ
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जहाँ  तक  मैं  समझता  हूँ  कि  पिछली सँदर्भित  कड़ी  सहित  परिचय श्रृँखला  की  यह  कड़ियाँ  सँभवतः  श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने या क्राँति-दल के साथियों ने सामूहिक रूप से मिलजुल कर तैयार की होगी । यह तो सर्वविदित है कि बिस्मिल जी ने यह पाँडुलिपि जेल में उनकी माता के सँग आये हुये मित्र श्री शिव वर्मा को ही अपने बलिदान-दिवस से ठीक एक दिन पहले 18 दिसम्बर को सौंपी थी । श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा इसे पुस्तकाकार रूप  दिये  जाने  के  मध्य  ही  यह  परिचय  श्रृँखला  सम्मिलित  की  गयी  होगी । चूँकि यह पुस्तक अपने प्रकाशन  के  चौथे  दिन  ही  ज़ब्त  कर  ली  गयी  थी, इसलिये  कालाँतर  में  इससे  किसी  छेड़-छाड़  की सँभावना कम ही  दिखती है । निवेदन- डा. अमर कुमार                                          अस्तु आगे बढ़ते हैं.. पढ़िये बकौल श्री शिवप्रसाद वर्मा जी

इन पंक्तियों के लेखक ने उन्हें तथा अन्तिम बार मृत्यु के केवल एक दिन पहले फांसी की कोठरी में देखा था और उनका यह सब हाल जाना था । उस सौम्य मूर्ति की मस्तानी अदा आज भी भूली नहीं है- जब कभी किसी को उनका नाम लेते सुनता हूं तो एक दम उस प्यारे का वही स्वरूप आंखों के सामने नाचने लगता है । लोगों को उन्हें गालियां देते देख, हृदय कह उठता है, क्या वह डाकू का स्वरूप था अन्तस्तल में छिपकर न जाने कौन बार-बार यही प्रश्न करने लगता है-क्या वे हत्यारे की आंखें थी ? भाई दुनियां के सभ्य लोग कुछ भी क्यों न कहें, किन्तु मैं तो उसी दिन से उनका पुजारी हुं । दास हूँ । भक्त हूँ ।।

उस दिन मां को देखकर उस मातृभूमि-भक्त पुजारी की आंखों में आंसू आ गए । उस समय पर जननी के हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था, वह  भी  भूलना  नहीं  है । वह एक स्वर्गीय दृश्य था और उसे देखकर जेल कर्मचारी भी दंग रह गये थे । माता ने कहा-मैं तो समझती थी तुमने अपने पर विजय पाई है किन्तु यहां तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है । जीवन पर्यन्त देश के लिये आंसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिये रोने बैठे हो – इस  कायरता  से  अब  क्या  होगा  तुम्हें  वीर  की भांति हंसते हुए प्राण देते देखकर मैं अपने आपको धन्य समझूंगी । मुझे गर्व है कि इस गये-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश की वेदी पर प्राण दे रहा है । मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था, इसके बाद तुम देश की चीज थे, और  उसी के काम आ गए । मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है । उत्तर में उसने कहा मां, तुम  तो  मेरे  हृदय  को  भली-भांति  जानती हो । क्या तुम समझती हो कि मैं तुम्हारे लिये रो रहा हूं अथवा इसलिये रो रहा हूं कि मुझे कल फांसी हो जायेगी यदि ऐसा है तो मैं कहूंगा कि तुमने जननी होकर भी मुझे समझ न पायी, मुझे अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है । हां, यदि  घी  को  आग  के  पास  लाया जायेगा तो उसका पिघलना स्वाभाविक है । बस उसी प्राकृतिक सम्बन्ध से दो चार आंसू आ गए । आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत सन्तुष्ट हूं ।

प्रातःकाल नित्य कर्म, सन्ध्या वन्दन आदि से निवृत हो, माता को एक पत्र लिखा जिस में देशवासियों के नाम सन्देश भेजा और फिर फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गये । जब फांसी के तख्ते पर ले जाने वाले आये तो वन्दे मातरम और भारत माता की जय कहते हुए तुरन्त उठ चल दिये । चलते समय उन्होंने यह कहा –

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे ।

जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,
तेरा ही जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे ।।

फांसी के दवाजे पर पहुंच कर उन्होंने अँतिम इच्छा स्वरूप कहा -मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । इस के बाद तख्ते पर खड़े होकर प्रार्थना के बाद विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि…आदि मन्त्र का जाप करते हुए गोरखपुर के जेल में वे फन्दे पर झूल गये ।फांसी के वक्त जेल के चारों ओर बहुत बड़ा पहरा था । गोरखपुर की जनता ने उनके ‘शव को लेकर आदर के साथ ’शहर में घुमाया । बाजार में अर्थी पर इत्र तथा फूल बरसाये गये, और पैसे लुटाये गये । बड़ी धूमधाम से उन की अन्त्येष्टि क्रिया की गई । उनकी इच्छा के अनुसार सब संस्कार वैदिक ढंग से किये गये थे ।

अपनी माता के द्वारा जो सन्देश उन्होंने देशवासियों के नाम भेजा है, उसमें उत्तेजित युवक समुदाय को ‘शाँत करते हुए यह कहा कि यदि किसी के हृदय में जोश, उमंग तथा उत्तेजना उत्पन्न हुई है तो उन्हें उचित है कि अति ‘शीघ्र ग्रामों में जा कर कृषकों की दशा सुधारे, श्रम-जीवियों   की  उन्नति की चेष्टा करें, जहां तक हो सके साधारण जन समूह को शिक्षा दें, कांग्रेस के लिये कार्य करें, और यथा साध्य दलितोद्धार के लिये प्रयत्न करें । मेरी यही विनती है कि किसी को भी घृणा तथा उपेक्षा की दृष्टि से न देखा जावे, किन्तु सब के साथ करूणा सहित प्रेम भाव का बर्ताव किया जावे ।

मैं एक ओर बैठकर विमुग्ध नेत्रों से उस छवि का स्वाद ले रहा था कि किसी ने कहा-समय हो गया । बाहर आकर दूसरे दिन सुना कि उन्हें फांसी दे दी गई । उसी समय यह भी सुना कि तख्ते पर खड़े होकर उस प्रेम-पुजारी ने अपने आपको गिरधारी के चरणों में समर्पित करते हुए यह कहा था-मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । जान देना सहज है  युद्ध  में  वीर  जान  देते  ही  है और दुनिया उनका आदर करती ही है । लोग बुरे काम में भी जान देते है, रंडी के लिये भी जान देते है और लेते भी है । भाई को सम्पत्ति से वंचित करने के लिये जान ली और दी जाती है । पर एक ऐसे काम के लिये जिस में अपना कोई स्वार्थ भी न हो दो साल के करीब जेल में सड़कर भारत की आजादी के लिये वह वीर हंसते-हंसते फांसी के फन्दे पर भूल गया भाई राम प्रसाद यह तुम्हारा ही काम था, सत्य धर्म का मर्म तुमने ही जान पाया था । वह वीर जहां से आया था वहीं को चला गया ।

प्यारे बिस्मिल की प्यारे बातें
यह चारीगर उल्फत गाफिल नजर आता है ।
बीमार का बच जाना मुश्किल नजर आता है ।।
है दर्द बड़ी नयामत देता है जिसे खालिक।
जी दरदे मुहब्बत के काबिल नजर आता है ।।
जिस दिल में उतर जाये उस दिल को मिटा डाले ।
हर तीर तेरा जालिम कातिल नजर आता है ।।
मजरूह न थी जब तक दिल दिल ही न था मेरा ।
सदके तेरे तीरों का बिस्मिल नजर आता है ।।

अदालत में जज से
जज साहब हम जानते हैं कि आप हमें क्या सजा देंगे । हम जानते है कि आप हमें फांसी की सजा देंगे, और हम जानते है कि यह ओठ जो अब बोल रहे है वह कुछ दिनों बाद बन्द हो जायेंगे । हमारा बोलना, सांस लेना और काम करना यहां कि हिलना और जीना सभी इस सरकार के स्वार्थ के विरूद्ध है । न्याय के नाम पर ‘शीघ्र ही मेरा गला घूंट दिया जायेगा ? मैं जानता हूं कि मैं मरूंगा मरने से नहीं घबराता । किन्तु क्या जनता  और  इससे सरकार का उदेश्य पूर्ण हो जायेगा ?  क्या  इसी  तरह  हमेशा भारत मां के  वक्षस्थल पर विदेशियों का तांडव नृत्य होता रहेगा ? कदापि नहीं, इतिहास इसका प्रमाण है । मैं मरूंगा किन्तु कब्र से फिर निकल आउंगा और मातृभुमि का उद्धार करूंगा ।….

एक दिन वह सहसा बोल पड़े-
उदय काल के सूर्य का सौन्दर्य डूबते हुए सूर्य की छटा को कभ्ीा नहीं पा सकता है। और :-
प्रेम का पंथ कितना कठिन है संसार की सारी आपत्तियां मानों प्रेमी ही के लिये बनी हों।
उफ! कैसा व्यापार है कि हम सब कुछ देदे और हमें आपकी सहानुभूति या फिर कुछ भी नही । लेकिन फिर भी हम कभी मानेंगे नहीं – स्वाधीनता की कीमत कुछ भी नहीं
फांसी के कुछ दिन पहिले उन्होंने अपने एक मित्र के पास एक पत्र भेजा था उसमें उन्होंने लिखा थाः
19 तारीख को जो कुछ होने वाला है उसके लिये मैं अच्छी तरह तैयार हूं। यह है ही क्या ? केवल शरीर का बदलना मात्र है । मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातृभूमि तथा उसकी दीन सन्तति के लिये नये उत्साह और ओज के साथ काम करने के लिए ‘शीघ्र ही फिर लौट आयेगी ।
यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी,
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान मैं लाउं कभी ।
हे ईश, भारतवर्ष में ‘शतबार मेरा जन्म हो,
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।
मरते बिसमिल रोशन, लहरी, अशफाक, अत्याचार से,
होंगे पैदा सैकड़ों उनके रूधिर की धार से ।।
उनके प्रबल उद्योग से उद्धार होगा देश का,
तब नाश होगा सर्वथा दुख ‘शोक के लवकेश का ।।

सब से मेरा नमस्ते कहिये । कृपा करके इतना कष्ट और उठाइये कि मेरा अन्तिम नमस्कार पूजनीय पं० जगतनारायण  मुल्ला  की  सेवा  तक भी पहुंचा दीजिये । उन्हें हमारी कुर्बानी और खून से सने हुए रूपये की कमाई से सुख की नींद आवे । बुढ़ापे में भगवान पं0 जगतनारायण को ‘शान्ति प्रदान करें ।

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