संसार अन्धकारमय दिखाई देता था

फ़रवरी 1, 2009 को 2:59 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-3, सरफ़रोशी की तमन्ना | 3 टिप्पणियाँ
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bismil_बिस्मिल राजकीय घोषणा के पश्चात जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की अदभुत दशा देखी । कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था । जिसके पास मैं जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था । पुलिस वालों का बड़ा प्रकोप था । प्रत्येक समय छाया की भांति पीछे-पीछे फिरा करती थी । इस प्रकार का जीवन कब तक व्यतीत किया जावे । मैंने कपड़ा बिनने का काम सीखना आरम्भ किया । जुलाहे बड़ा कष्ट देते थे । कोई काम सिखाना न चाहता था । कड़ी कठिनता से मैंने कुछ काम सीखा । उसी समय एक कारखाने में मैनेजरी का स्थान खाली हुआ । मैंने भी उस स्थान के लिये प्रयत्न किया । मुझसे 500 रूपये की जमानत मांगी गई ।              

उन दिनों मेरी बड़ी सोचनीय दशा थी । तीन-तीन दिवस तक भोजन प्राप्त नहीं होता था । क्योंकि मैने प्रतिज्ञा की थी, कि किसी से कुछ सहायता न लूंगा । पिता जी से बिना कुछ कहे मैं चला आया था । मैं पांच सौ रूपये कहां से लाता ? मैनें दो एक मित्रों से केवल दो सौ रूपये की जमानत देने की प्रार्थना की । उन्होने साफ इन्कार कर दिया । मेरे हृदय पर बज्रपात हुआ । संसार अन्धकारमय दिखाई देता था ! पर बाद को एक मित्र की कृपा से नौकरी मिल गई । अब अवस्था सुधरी । मैं भी सभ्य पुरूषों की भांति समय व्यतीत करने लगा । मेरे पास भी चार पैसे हो गये ।

वे ही मित्र जिनसे मैंने दो सौ रूपये जमानत देने की प्रार्थना की थी, अब मेरे पास अपने चार-चार हजार रूपयों की थैली, अपनी बन्दूक, लाइसेन्स इत्यादि सब डाल जाते थे कि मेरे यहां उनकी वस्तुएं सुरक्षित रहेंगी । समय के इस फेर को देखकर मुझे हंसी आती थी । इस प्रकार कुछ काल व्यतीत हुआ । दो चार ऐसे पुरूषों से भेंट हुई, जिनको पहले मैं बड़ी श्रृद्धा की दृष्टि से देखता था । उन लोगों ने मेरी पलायनावस्था के सम्बन्ध में कुछ समाचार सुने थे । मुझसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए । मेरी लिखी हुई पुस्तकें भी देखी ।

इस समय मैं तीसरी पुस्तक केथोराइन लिख चुका था । मुझे पुस्तकों के व्यवसाय में बहुत घाटा हो चुका था । मैने माला का प्रकाशन स्थगित कर दिया ।   केथोराइन   एक प्रकाशक को दे दी । उन्होंने बड़ी कृपा की । उस पुस्तक को थोड़े से हेर-फेर के साथ  प्रकाशित करा दिया  । उन्होंने मुझे पुस्तक लिखते रहने के लिए बड़ा उत्साहित किया । मैंने स्वदेशी रंग नामक एक और पुस्तक लिख कर एक पुस्तक प्रकाशक को दी । वह भी प्रकाशित हो गई ।

बड़े परिश्रम के साथ मैने एक पुस्तक क्रान्तिकारी जीवन लिखी । क्रान्तिकारी जीवन को कई पुस्तक प्रकाशकों ने देखा, पर किसी का साहस न हो सका कि उसको प्रकाशित करे । वह आगरा,  कानपुर,  कलकत्ता इत्यादि कई स्थानों में घूम-घाम कर पुस्तक मेरे पास लौट आई ।

कई मासिक पत्रिकाओं में राम तथा अज्ञात नाम से मेरे लेख प्रकाशित हुआ करते थें । लोग बड़े चाव से उन लेखों का पाठ करते थे । मैंने किसी स्थान पर लेखन शैली का नियम पूर्वक अध्ययन किया था । बैठे-बैठे खाली समय में कुछ लिखा करता और प्रकाशनार्थ भेज दिया करता था । अधिकतर बंगला तथा अंगरेजी की पुस्तकों से अनुवाद करने का ही विचार था । थोड़े समय के पश्चात श्रीयुत अरविन्द घोष की बंगला पुस्तक योगिन साधन का अनुवाद किया । दो एक पुस्तक प्रकाशकों को दिखाया, पर वे अति अल्प पारितोषिक देकर पुस्तक लेना चाहते थे ।

आज कल के समय में हिन्दी के लेखकों तथा अनुवादकों की अधिकता के कारण पुस्तक प्रकाशकों को भी बड़ा मान हो गया है । बड़ी कठिनता से बनारस के एक प्रकाशक ने योगिन साधन प्रकाशित करने का वचन दिया । पर थोड़े दिनों में वह स्वयं ही अपने साहित्य मन्दिर में ताला डाल कर कहीं पधार गये । पुस्तक का अब तक कोई भी पता न लगा । पुस्तक अति उत्तम थी ।

प्रकाशित हो जाने से हिन्दी सेवियों को शायद अच्छा लाभ होता । मेरे पास जो बोलशेविक करतूत तथा मन की लहर की प्रतियां बची थीं, वे मैने लागत से भी कम मूल्य पर कलकत्ता के एक व्यक्ति श्रीयुत दीनानाथ सगतिया को दे दीं । बहुत थोड़ी पुस्तकें मैंने बेची थी ।

दीनानाथ महाशय पुस्तकें हड़प कर गये । उनको  मैंने नोटिस दिया । नालिश की लगभग 400 रू. की डिग्री भी हुई । किन्तु दीनानाथ महाशय का कहीं अनुसन्धान न मिला । वे कलकत्ता छोड़ कर पटना गये । पटना से भी कई गरीबों का रूपया मार कहीं अन्तरध्यान हो गये । अनुभवहीनता से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ी । कोई पथ प्रदर्शक तथा सहायक नहीं, जिस से परामर्श करता । व्यर्थ के उद्योग धन्धों तथा स्वतन्त्र कार्यों में शक्ति का व्यय करता रहा ।

मेरा बाल्यकाल और कुमारावस्था

जनवरी 15, 2009 को 9:52 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | 1 टिप्पणी
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अबतक आपने पढ़ा …

औ्षधि तीन प्रकार की होती है  1- दैविक, 2- मानुषिक, 3- पैशाचिक । पैशाचिक औषधियों में अनेक प्रकार के पशु या पक्षियों के मांस अथवा रूधिर का व्यवहार होता है, जिन का उपयोग वैद्यक के ग्रन्थों में पाया जाता है । इनमें से एक प्रयोग बड़ा ही कौतुहलोत्पादक तथा आश्चर्यजनक है  कि जिस बच्चे को जमोखे सूखा की बीमारी हो गई हो यदि उसके सामने चिमगादड़ को चीर कर के लाया जावे तो एक दो मास का बालक चिमगादड़ को पकड़ कर के उसका खून चूस लेगा और बीमारी जाती रहेगी । यह बड़ी उपयोगी औषधि है और एक महात्मा की बतलाई हुई है ।

अब आगे..

जब मैं सात वर्ष का हुआ तो पिताजी ने स्वयं ही मुझे हिन्दी अक्षरों का बोध कराया और एक मौलवी साहब के मकतब में उर्दू पढ़ने के लिये भेज दिया । मुझे भली-भाति स्मरण है कि पिता जी अखाड़े में कुश्ती लड़ने जाते थे और अपने से बलिष्ठ तथा शरीर में डेढ गुने पट्ठे को पटक देते थे । उसी के कुछ दिनों बाद पिताजी का एक बंगाली महाशय श्री चटर्जी से प्रेम हो गया । चटर्जी महाशय की अंग्रेजी दवा की दुकान थी । आप बड़े नशाबाज थे । एक समय में आध छटांक-एक छटांक चरस की चिलम उड़ाया करते थें उन्हीं की संगति में पिताजी ने भी चरस पीना सीख लिया । जिसके कारण उनका शरीर नितान्त नष्ट हो गया । दस वर्ष में ही सम्पूर्ण शरीर मानों सूख कर हड्डियां निकल आईं । चटर्जी महाशय सुरापान भी करने लगे । अतएव उनका कलेजा बढ़ गया और उसी से उन का शरीरांत हो गया । मेरे बहुत कुछ समझाने पर पिता जी ने अपनी चरस पीने की आदत को छोड़ा किन्तु बहुत दिनों के बाद ।

मेरे बाद पांच बहनों और तीन भाइयों का जन्म हुआ । दादी जी ने बहुत कहा कि कुल की प्रथा के अनुसार कन्याओं को मार डाला जावे किन्तु माता जी ने इस का विरोध किया  और कन्याओं के प्राणों की रक्षा की । मेरे कुल में यह पहला ही समय था कि कन्याओं का पोषण हुआ । पर इन में दो बहिनों और भाइयों का देहान्त हो गया । शेष एक भाई जो इस समय 1927 ई में दस वर्ष का है और तीन बहिनें बचीं । माता जी के प्रयत्न से तीनों बहिनों को अच्छी शिक्षा दी गई और उन के विवाह बड़ी धूमधाम से किये गयें इसके पूर्व हमारे कुल की कन्यायें किसी को नहीं व्याही गईं क्योकि वे जीवित ही नहीं रखी जाती थी ।

दादा जी बड़े सरल प्रकृति के मनुष्य थें । जब तक आप जीवित रहे पैसे बेचने का ही व्यवसाय करते रहे । आप को गाय पालने का बड़ा शौक था । स्वयं ग्वालियर जा कर बड़ी-बड़ी गायें खरीद कर लाया करते थे । वहां की गायें काफी दूध देती है । अच्छी गाय दस-पन्द्रह सेर दूध देती है । ये गायें बड़ी सीधी भी होती है । दूध दोहन करते समय उन की टागें बांधने की आवश्यकता नहीं होती और जब जिस का जी चाहे बिना बच्चे के दूध दोहन कर सकता है । बचपन में मैं बहुधा जाकर गाय के थन में मुंह लगा कर दूध पिया करता था । वास्तव में वहां की गायें दर्शनीय होती हैं ।

दादा जी मुझे खूब दूध पिलाया करते थे । आप को अठारह गोटी बधिया बग्धा का खेल खेलने का बड़ा शौक था । सायंकाल के समय नित्य शिव-मन्दिर में जाकर दो घण्टा तक परमात्मा का भजन किया करते थे । आप का लगभग पचपन वर्ष की आयु में स्वर्गारोहण हुआ ।

बाल्यकाल से ही पिता जी मेरी शिक्षा का अधिक ध्यान रखते थे और जरा सी भूल करने पर बहुत पीटते थे । मुझे अब भी भलीभांति स्मरण है कि जब मैं नागरी के अक्षर लिखना सीख रहा था तो मुझे लिखना न आया मैंने बहुत प्रयत्न किया पर जब पिता जी कचहरी से आकर मुझसे लिखवाया मैं न लिख सका । उन्हें मालूम हो गया कि मैं खेलने चला गया था । इस पर उन्होंने मुझे बन्दूक के लोहे के गज से इतना पीटा कि गज टेढ़ा पड़ गया । मैं भाग कर दादा जी के पास चला गया तब जान बचाई ।

मैं छोटेपन से ही बहुत उद्दण्ड था । पिता जी के पर्याप्त शासन रखने पर भी बहुत उद्दण्डता करता था । एक समय किसी के बाग में जाकर आंडू के वृक्षों में सब आंडू तोड़ डाले माली पीछे दौड़ा किन्तु मैं उसके हाथ न आया । माली ने सब आंडू पिता जी के सामने ला रखे । उस दिन पिता जी ने मूझे इतना पीटा कि मैं दो दिन तक उठ न सका । इसी प्रकार खूब पिटता था, किन्तु उद्दण्डता अवश्य करता था । शायद उस बचपन की मार से ही मेरा यह शरीर बहुत कठोर तथा सहनशील बन गया है !

मेरी कुमारावस्था

जब मैं उर्दू चौथा दर्जा का पास कर के पांचवें में आया उस समय मेरी अवस्था लगभग चौदह वर्ष की होगी । इसी बीच मुझे पिताजी की सन्दूक से रूपये-पैसे चुराने की आदत पड़ गई थी । इन पैसों से उपन्यास खरीद कर खूब पढ़ता । पुस्तक विक्रेता महाशय पिता जी की जान पहचान के थे । उन्होंने पिता जी से मेरी शिकायत की । अब मेरी कुछ जांच होने लगी । मैंने उस महाशय के यहां से किताबें खरीदना ही छोड़ दिया । मुझमें दो एक खराब आदतें भी पड़ गईं । मैं सिगरेट पीने लगा । कभी-कभी भंग भी जमा लेता था । कुमारावस्था में स्वतन्त्रता पूर्वक पैसे का हाथ में आ जाना और उर्दू के प्रेमरस पूर्ण उपन्यासों तथा गजलों की पुस्तकों ने आचरण पर भी अपना कुप्रभाव दिखाना आरम्भ कर दिया । घुन लगना अभी आरम्भ ही हुआ था कि परमात्मा ने मेरी बड़ी सहायता की ।

मैं एक रोज भंग पीकर पिता जी की सन्दूकची में से रूपये निकालने लगा । नशे की हालत में होश ठीक न रहने के कारण सन्दूकची खटक गई । माता जी को सन्देह हुआ । उन्होंने मुझे पकड़ लिया । चाबी पकड़ी गई । मेरे सन्दूक की तलाशी ली गई, बहुत से रूपये निकले और सारा भेद खुल गया । मेरी किताबों में अनेक उपन्यासादि पाये गये जो उसी समय फाड़ डाले गये ।

परमात्मा की कृपा से मेरी चोरी पकड़ ली गई नही तो दो चार वर्ष में न दीन का रहता न दुनिया का । इसके बाद भी मैंने बहुत घातें लगाईं किन्तु पिता जी ने संदूकची का ताला बदल दिया मेरी कोई चाल न चल सकी । अब जब कभी मौका मिल जाता तो माता जी के रूपयों पर हाथ फेर देता था । इसी प्रकार की कुटेवों के कारण दो साल बाद उर्दू मिडिल की परीक्षा में उत्तीर्ण न हो सका तब मैंने अंगरेजी पढ़ने की इच्छा प्रकट की । पिताजी मुझे अंग्रेजी पढ़ाना नहीं चाहते थे और किसी व्यवसाय में लगाना चाहते थे, किन्तु माता जी की कृपा से मैं अंग्रेजी पढ़ने भेजा गया ।

दूसरे वर्ष जब मैं उर्दू मिडिल की परीक्षा में फेल हुआ उसी समय पड़ोस के देव मन्दिर में जिसकी दीवार मेरे मकान से मिली थी एक पुजारी जी आ गये आप बड़े ही सत्चरित्र व्यक्ति थे । मैं आपके पास उठने-बैठने लगा ।

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