पुनःआरँभ बिस्मिल आत्मकथ्य- और इसके पहले

फ़रवरी 22, 2010 को 2:03 पूर्वाह्न | Posted in 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, अंतिम समय की बातें, विशेष परिचय | 6 टिप्पणियाँ
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इससे पहले कि मैं आत्मकथा की कड़ियों का पुनःप्रकाशन आरँभ करूँ, मैं  देश  के  गौरव  अमर  हुतात्मा के सम्मुख क्षमादान माँगते हुये नतमस्तक हूँ । उस  समय  जबकि  इस  आत्मकथा का  प्रवाह अपने  अँतिम  चरण  में  था, इसका अनायास रुक जाना क्षम्य नहीं है । 25 अगस्त  2009 के बाद से आज तक इनका प्रकाशन बाधित रहा है, इस  अँतराल के बढ़ते जाने के साथ ही मैं अहर्निश एक अपराध बोध से ग्रसित रहता आया हूँ । कई कारण स्वयँ ही जुड़ते गये, साथ ही एक महत्वपूर्ण चीज जो मुझे निरँतर उद्वेलित करती रहती  उसे मैंनें इन कड़ियों के नियमित पाठक श्री अनुराग शर्मा से साझा किया है । अस्तु,उसे यहाँ दोहराना प्रसँगान्तर या कहिये कि प्रत्यारोप होगा । उसे इस मँच पर न रखते हुये अब आगे बढ़ते हैं । आपको स्मरण होगा कि पिछली कड़ी बिस्मिल जी द्वारा प्रारँभिक असफ़लता के उपराँत दल के पुनर्गठन के प्रयासों पर ठहर गयी थी, देखें

पिछले सोपान पर ……… चोट लगने के कारण उस समय हमारे नायक की आंख से काफी खून निकल चुका था, किन्तु फिर भी और लोगों से आगे चलने को कहकर आपने उसे अपनी पीठ पर उठाया और ज्यों त्यों कर चल दिये । जिस स्थान पर गाड़ी खड़ी थी, उसके थोड़ी दूर रह जाने पर आपने विद्यार्थी को एक पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं गाड़ी के पास जाकर जो एक आदमी उसकी निगरानी के लिये रह गया था उसे साथी को लेने के लिये भेजा मकान पर पिता के पूछने पर कह दिया बैल बिगड़ गये, गाड़ी  उलट  गई  और मेरे चोट आ गई ।

जिस समय फरार होकर आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते फिर रहे थे, उस समय की कथा भी बड़ी करूणाजनक है । उस बीच में कई बार आपको मौत का सामना करना पड़ा था । उस दिन तो पास में पैसा न रह जाने के कारण आपने घास तथा पत्तियां खाकर ही अपने जीवन का  निर्वाह किया था । नेपाल तथा आगरा तथा राजपूताना आदि स्थानों में घूमते रहने के बाद एक दिन अखबार में देखा कि सरकारी ऐलान में आप पर से भी वारण्ट हटा लिया गया था, बस  फिर  आप  घर  वापस  आ गए  और रेशम के सूत का कारखाना खोलकर कुछ दिन तक आप घर का काम काज देखते रहे । किन्तु जिस हृदय में एक बार आग लग चुकी, उसे फिर चैन कहां । अस्तु – फिर  से  दल  का  संगठन  प्रारम्भ  कर दिया । अब आगे का वृताँत-.

एक बार किसी स्टेशन पर जा रहे थे । कुली बक्स लेकर पीछे-पीछे चल रहा था ठोकर खाकर गिर पड़ा । बहुत सी कारतूसों के साथ कई एक रिवाल्वर बक्स में से निकल कर प्लेटफार्म पर गिर पड़े कुली पर एक सूट-बूट धारी साहब बहादुर द्वारा बुरी तौर मार पड़ती देख कर पास खड़े दरोगा साहब को दया आ गई । कुली को क्षमा करने की प्रार्थना कर, बेचारे स्वयं ही सारा सामान बक्स के अन्दर भरने लगे । उस दिन यदि आप तनिक बी डर जाते और इस बुद्धिमानी से काम न लेते तो निश्चय ही गिरफतार हो गये थे ।

उनमें असाधारण शारीरिक बल था । घोड़ा चढ़ने, साइकिल चलाने और तैरने में वे पूरे पण्डित थे । थकना किसे कहते है, सो तो वे जानते ही न थे । साठ-साठ मील बराबर चल कर भी आगे चलने की हिम्मत रखते   थे ।   व्यायाम और प्राणायाम वे इतना करते थे कि देखने वाले दंग रह जाते थे । हिन्दी और उर्दू के अतिरिक्त वे अंग्रेजी तथा बंगला भी जानते थे । उन्होंने कई किताबें भी हिन्दी में लिखी तथा प्रभा आदि मासिक पत्रों में अज्ञात के नाम से इनके कई लेख भी निकले । इन्होंने मैनपुरी षड़यन्त्र के सम्बन्ध में एक पुस्तक लिखी थी, परन्तु कुछ कारणों से वह पुस्तक प्रकाशित होने के पहिले ही जला दी गई । लिखने की अपेक्षा इन में व्याख्यान देने की ‘शक्ति और भी अधिक अच्छी थी ।

इनका व्याख्यान बड़ा जोशीला और प्रभावोत्पादक होता था । असहयोग के जमाने में श्री अशफाक के साथ हरदोई, ‘शाहजहांपुर, बरेली और पीलीभीत जिलों में घूम घूम कर इन्होंने पचासों जगह व्याख्यान दिये थे । क्रान्तिकारी आन्दोलन एक प्रकार से इनके जीवन का आधार था । हवालात के समय अगर कोई व्यक्ति बाहर से मिलने आता तो ये अकसर पूछ बैठते, क्यों जी क्रान्तिकारी आन्दोलन जोरों पर है या नहीं ? क्रान्तिकारी कार्य उन्हें कितना प्रिय था, उसमें कितनी दिलचस्पी थी, वह इससे भी अनुमान किया जा सकता है, ये यों रोज नियमित रूप  से हवन अवश्य करते थे, और कामों के कारण उनके हवन-कार्य में कभी व्यक्तिक्रम नहीं होने पाली, परन्तु क्रान्तिकारी कामों के सामने गायत्री और हवन तक को वह झट छोड़ देते थे ।

श्री रामप्रसाद जी को यों गुस्सा कम आता था, जब जब वे क्राधित होते, तो इनका क्रोध प्रलयानल का रूप धारण कर लेता ! अभागे खुफिया के चर ही अधिकतर इनके क्रोध के शिकार होते थे । एक दफे, तो इन्होंने ने एक खुफिया को इतना पीटा  कि वे बेचारा बहुत दिनों तक बिछावन से उठ नहीं सका । एक बार एक दूसरे खुफिया की डण्डे से ऐसी मरम्मत की कि वह नौकरी से इस्तीफा देकर चला गया ।

माताओं के लिये भी उस भावुक हृदय में कम श्रद्धा न थी । उनके तनिक भी अपमान को देख कर वह पागल सा हो उठता था । एक समय की बात है ।  पेशेवर डाकुओं के एक सरदार ने आपके पास आकर अपने आपको क्रान्तिकारी दल का सदस्य बतलाया और उसके द्वारा की जाने वाली डकैतियों में सहयोग देने की प्रार्थना की । निश्चय हुआ कि पहली डकैती में हमारे नायक केवल दर्शक की भांति रहेगें और उनके कार्य संचालन का ढ़गं देख कर उसी के अनुसार अपना निश्चय करेंगे । स्थान और दिन नियत होने पर डकैती वाले गांव में पहुचें । मकान देख कर आपने कहा-इस झोपड़ी में क्या मिलेगा आप लोग व्यर्थ ही इन लोगों को तंग करने आये है यह सुन सब लोग हंस पड़े ।

एक ने कहा आप ‘शहर के रहने वाले हैं, गांव का हाल क्या जाने यहां ऐसे ही मकानों में रूपया रहता है, गांव  का  हाल  क्या  जाने  यहां  ऐसे  ही मकानों में रूपया रहता है । खैर ? अन्दर घुसने पर सब लोग अपनी मनमानी करने लगे । मकान में उस समय पुरूष न थे। उन लोगों ने स्त्रियों को बुरी तरह तंग करना ‘शुरू कर दिया । मना करने पर फिर वही जवाब मिला तुम क्या जानों अधिक अत्याचार  देख, आपने एक से थोड़ी देर के लिये बन्दूक तथा कुछ कारतूस मांग लिये और कूद कर छत पर आ गये । वहां से पुकार कर कहा, खबरदार, यदि किसी ने भी स्त्रियों की ओर आंखे उठाई तो गोली का निशाना बनेगा कुछ देर तो काम ठीक तौर से होता रहा किन्तु बाद में एक दुष्ट ने फिर किसी स्त्री का हाथ पकड़ कर रूपया पूछने के बहाने कोठरी की ओर खींचा ! इस बार नायक ने जवान से कुछ भी न कहा उस पर फायर कर दिया ।

छर्रों के पैर में लगते ही वह तो रोता चिल्लाता अलग जा गिरा और बाकी लोगों के होश बन्द हेा गये । आपने उंची आवाज से कहा जो कुछ मिला हो उसे लेकर बाहर आओ केाई मिठाई की भेली सर पर लादकर और कोई घी का बर्तन हाथ में लटकाए बाहर निकला । जिसे कुछ भी न  मिला उसने फटे पुराने कपड़े ही बांध लिये, यह तमाशा देखकर उस सौम्य सुन्दर मूर्ति ने उस समय जो उग्र रूप धारण किया था उसका वर्णन करना मेरी लेखनी की ‘शक्ति के परे हैं । बन्दूक सीधी कर सब सामान वहीं पर रखवा दिया और सरदार की ओर देखकर कहा अगर यदि भविष्य में तूने फिर कभी अपनी स्वार्थ सिद्धि के नाम पर क्रान्तिकारियों को कलंकित करने का साहस किया तो अच्छा न होगा, जा  आज  तुझे  क्षमा  करता  हूं । उस समय सरदार सहित दल के सभी लोग डरकर कांप रहे थे । इस डकैती में केवल साढ़े चैदह आने पैसे इन लोगों के हाथ लगे थे । डकैती जैसे भीषण कार्य में सम्मिलित होने पर भी रामप्रसाद का हृदय कितना भावुक कितना पवित्र कितना महान था । यह बात इस वक्त की घटना से स्पष्ट है ।

एक दिन 9 अगस्त 1924 ई0 को सन्ध्या के आठ बजे 9 नम्बर की गाड़ी हरदोई से लखनउ जा रही थी एकाएक काकोरी तथा आलम नगर के बीच 52 नम्बर खम्भे के पास गाड़ी खड़ी हो गई । कुछ लोगों ने पुकार कर मुसाफिरों से कह दिया कि हम केवल सरकारी खजाना लूटने आये हैं । गार्ड से चाबी लेकर तिजोरी बाहर निकाली गई ।  इसी बीच में एक व्यक्ति नीचे उतरा और गोली से घायल होकर गिर गया । लगभग पौन घण्टा के बाद लूटने वाले चले  गये ।  इस बार करीब दस हजार रूपया इन लोगों के हाथ लगा । 25 सितम्बर से गिरफतारियां प्रारम्भ हो गई और उसी में हमारे नायक भी पकड़े गये । डेढ़ साल तक अभियोग चलने के बाद आपको फांसी की सजा हुई । बहुत कुछ प्रयत्न किया गया, किन्तु फांसी की सजा कम न हुई और 19 दिसम्बर सन्1927 को गोरखपुर में आपको फांसी की रस्सी से लटका दिया गया ।

श्री रामप्रसाद बिस्मिल

अगस्त 25, 2009 को 1:12 पूर्वाह्न | Posted in 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, विशेष परिचय | 6 टिप्पणियाँ
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अमर शहीद की अँतिम नोट से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड ’ विशेष परिचय’ का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि, स्व० बिस्मिल के बलिदान के उपराँत यह खण्ड उनके मित्र श्री शिव वर्मा ने अपने अग्रज श्री भगवतीचरण वर्मा के सहयोग से इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व लिखा होगा । वर्णित घटनाक्रम की जीवँतता को देखते हुये, ऎसा प्रतीत होता है  कि  बिस्मिल जी  के  दल  के  सँग  जुड़े किसी  अज्ञात  सहयोगी ने  भी  इसे  प्रस्तुत  करने  में  भरपूर मार्गदर्शन किया है ।  टिप्पणी निवेदन – डा. अमर कुमार

पराधीनता के इस युग में दिव्य आलोक को धारण कर न जाने वे कहां से आये, अपने कल्पना राज्य में स्वर्गलोक की वीथियों का निर्माण किया और अन्त में विश्व को आभा की एक झलक दिखा कर अपने प्यारे मालिक के पास चले गये | उस दिन विश्व ने विमुग्ध नेत्रों से उनकी ओर देखा, श्रद्धा और भक्ति के फूल भी चढ़ाये । उस दिन जब उस मोहिनी मूर्ति की मद भरी आंखें सदा के लिये बन्द हो गई थीं, तो  उनकी  एक  झलक  मात्र  के  लिये  जनसमूह  पागल  सा  हो  उठा  था । धनिकों ने रूपये लुटायें, मेवे वालों ने मेवा से सत्कार किया, माता ओर बहिनों ने छतों पर से फूलों की वर्षा की और जनता ने वन्दे मातरम के उच्च निनाद के  साथ  उसका  स्वागत  किया, उस  प्यारे  के  उस  दिन  वाले उसके  निराले  वेष  को  देख  कर  मातायें  रो पड़ी, वृद्ध  सिसकियां  लेने  लगे, युवकों  के  तरूण  हृदय प्रतिहिंसा की आग से जल उठे और बालक झुक-झुक कर प्रणाम करने लगे ।

मैनपुरी जिले के किसी गांव में संवत 1954 के लगभग आप का जन्म हुआ था, किन्तु बाद में आप के पिता मुरलीधर सपरिवार शाहजहांपुर में आकर रहने लगे और अन्त तक यही स्थान हमारे चरित्र बालक का लीला क्षेत्र रहा । अस्तु उर्दू की शिक्षा पाने के बाद माता -पिता ने स्थानीय अंग्रेजी स्कूल में भर्ती करा दिया था । उन दिनों आपका जीवन कुछ विषेश अच्छा न था, किन्तु इसी बीच में आर्य समाज के प्रसिद्ध स्वामी सोमदेव से आपका परिचय हो गया । बस यहीं से जीवन ने पलटा खाया और वे स्वामी जी के साथ-साथ आर्यसमाज के भी भक्त बन गए । आप स्वामी जी को गुरूजी कहा करते थे । यह भी कहा था कि देश सेवा के भाव पहले-पहल आपको स्वामी जी से ही मिले थे । अस्तु सन 1915 के विराट  विप्लवायोजन  में  विफल  हो  जाने  के  बाद  भी  क्रान्तिकारी  लोग  एकदम निरा्श  न  हुए, वरन उन्होंने मैनपुरी में केन्द्र बनाकर फिर से कार्य आरम्भ कर दिया । श्री गेंदालाल दीक्षित की अध्यक्षता में बहुत दिनों तक काम होते रहने के बाद अन्त में इसका भी भेद खुल गया और फिर गिरफतारियों का बाजार गर्म हो उठा । दल के बहुत से लोगों के पकड़े जाने पर भी मुख्य कार्यकर्ताओं में से कोई भी हाथ न आ सका ।  उस  समय  आप  अंग्रेजी  की  दसवीं  कक्षा  में  थे, जोरों  से  धरपकड़  होते  देख  अपनी गिरफ़्तारी का हाल सुनकर आप फरार हो गये ।

मैनपुरी विप्लव दल के नेता श्री गेंदालाल के ग्वालियर में गिरफ़्तारी हो जाने पर, उन्हें जेल  से  छुड़ाने के विचार से आपने 19 वर्ष  की  अवस्था  में  अपने  साथ  के  पन्द्रह  और  विद्यार्थियों को लेकर पहली डकैती की थी । इस पहले ही प्रयास में उन्होंने जिस दृढ़ता तथा साहस से काम लिया था, उसे देख कर यह कहना पड़ता है कि वे स्वभाव से ही मनु्ष्यों के नेता थे । प्रायः  सभी  अनुभवी  सदस्य  पकड़े  जा चुके थे । अस्तु स्कूल के पन्द्रह विद्यार्थियों को लेकर ही आप अपने निश्चय पर चल दिये, पिता  से  कहा-मेरे एक मित्र की शादी है, वे गाड़ी लेकर जाना चाहते है । गाड़ीवान उन्हीं का रहेगा और मुझे भी उसमें जाना पड़ेगा । सरल स्वभाव पिता ने गाड़ी दे दी । उन्हें क्या पता कि यह कैसी शादी है ।

सन्ध्या समय प्रस्थान कर कुछ रात बीतने पर एक स्थान पर गाड़ी रोक दी गई । निश्चित स्थान वहां से करीब 10 मील की दूरी पर था । एक आदमी को गाड़ी पर छोड़कर शेष सभी ही साथी पैदल ही चल दिये । किन्तु उस दिन अंधेरे में मार्ग भूल जाने से वह गांव न मिला । निराश हो सब के सब गाड़ी के पास वापस आए, दूसरे दिन थोड़े ही प्रयास के बाद वह स्थान मिल गया ।  अंधेरी  रात  में  चारों ओर  निस्तब्धता का  राज्य था । निद्रा के  मोहक  जाल  में  सारा  संसार  वेसुध  सोया  पड़ा  था, तीन  लड़कों  को  मकान  की  छत  पर चढ़ने की आज्ञा हुई । लाड़ प्यार से पाले गये स्कूल के उन लड़कों ने कभी भी ऐसे भयानक कार्य में भाग लिया था देर करते देख कप्तान ने जोर से कहा – यदि ऐसा ही था तो चले ही क्यों थे । इस बार साहस कर वे लोग मकान की छत पर चढ़ गये आज्ञा हुई अन्दर कूद कर दरवाजा खोल दो । किन्तु यह काम और भी कठिन था । कप्तान ने फिर कहा जल्दी करो देर करने से विपद की सम्भावना है । इसी प्रकार तीन बार कहने पर भी कोई नीचे न उतर सका ।

वे लोग इधर-उधर देख ही रहे थे कि एक जोर की आवाज के साथ बन्दूक की गोली से एक का साफा नीचे आ गिरा । इस बार तीनों बिना कुछ सोचे विचारे मकान में कूद पड़े और अन्दर से मकान का दरवाजा खोल दिया । सब लोगों को यथा स्थान खड़ा कर स्वयं छत पर आदेश देने लगे । डकैती समाप्त भी न हो पाई थी कि गांव में खबर हो गई और चारों ओर से ईंटे चलने लगी । यह देख कर लड़के घबरा गए ।  आप ने पुकार कर कहा तुम लोग अपना काम करते रहो, यदि कोई भी काम से हटा तो मेरी गोली का निशाना बनेगा । इस में एक ने नीचे से पुकार कर कहा – कप्तान ईंटों के कारण कुछ करते नहीं बनता है । आप ने जिस ओर से ईंटें आ रही थी, उधर जाकर कहा-ईटें बन्द कर दो वरना गोली से मारे जाओगे । इतने में एक ईंट आंख पर आकर लगी, देखते -देखते कपड़े खून से तर हो गए उस समय उस साहसी वीर ने आंख की कुछ परवा न कर गोली चलाना षुरू कर दिया, फायरों के बाद ईंटे बन्द हो गई । इधर डकैती भी खत्म हो चुकी थी । अस्तु सब लोग वापस चल दिये ।

पहले दिन के थके तो थे ही आधी दूर चलकर ही प्रायः सब लोग बैठने लगे । बहुत कुछ साहस बांधने पर उठकर चले ही थे कि एक विद्यार्थी बेहोश होकर गिर गया । कुछ देर बाद होश आने के बाद उसने सबसे कहा – मुझ में अब चलने की शक्ति नहीं है तुम लोग मेरे लिये अपने आपको संकट में क्यों फंसाते हो । मेरा सर काट कर लेते जाओ । अभी कुछ रात बाकी है तुम लोग आसानी से पहुंच सकते हो । सर काट लेने पर मुझे कोई भी पहचान न सकेगा । और इस प्रकार सब लोग बच सकोगे । साथी की इस बात से सबकी आंखों में आंसू आ गये ।

चोट लगने के कारण उस समय हमारे नायक की आंख से काफी खून निकल चुका था, किन्तु फिर भी और लोगों से आगे चलने को कहकर आपने उसे अपनी पीठ पर उठाया और ज्यों त्यों कर चल दिये । जिस स्थान पर गाड़ी खड़ी थी, उसके थोड़ी दूर रह जाने पर आपने विद्यार्थी को एक पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं गाड़ी के पास जाकर जो एक आदमी उसकी निगरानी के लिये रह गया था उसे साथी को लेने के लिये भेजा मकान पर पिता के पूछने पर कह दिया बैल बिगड़ गये, गाड़ी  उलट  गई  और मेरे चोट आ गई ।

जिस समय फरार होकर आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते फिर रहे थे, उस समय की कथा भी बड़ी करूणाजनक है । उस बीच में कई बार आपको मौत का सामना करना पड़ा था । उस दिन तो पास में पैसा न रह जाने के कारण आपने घास तथा पत्तियां खाकर ही अपने जीवन का  निर्वाह किया था । नेपाल तथा आगरा तथा राजपूताना आदि स्थानों में घूमते रहने के बाद एक दिन अखबार में देखा कि सरकारी ऐलान में आप पर से भी वारण्ट हटा लिया गया था, बस  फिर  आप  घर  वापस  आ गए  और रेशम के सूत का कारखाना खोलकर कुछ दिन तक आप घर का काम काज देखते रहे । किन्तु जिस हृदय में एक बार आग लग चुकी, उसे फिर चैन कहां । अस्तु – फिर  से  दल  का  संगठन  प्रारम्भ  कर दिया । क्रमश: अगली कड़ी में

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