श्री अशफाक उल्ला खां – मैं मुसलमान तुम काफिर ?

फ़रवरी 26, 2010 को 10:58 अपराह्न | Posted in 2.अशफ़ाक़ उल्ला खाँ, काकोरी के शहीद, फाँसी, विशेष परिचय | 5 टिप्पणियाँ
टैग: , , , , ,

इस तरह की अपनी कुर्बानियों से  वतन  की  मिट्टी – पानी  का  कर्ज़  अदा  करने  वाले  सिरफिरे  मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का परिचय जुड़ा दिखता है । अपने जीवनकाल में भी यह दोनों मित्रों ने एक नायाब दोस्ती की मिसाल कायम की थी । सँभवतः भाई  शिव  वर्मा  जी  ने  इसी कारण  मुख्य आरोपियों  की  परिचय श्रॄँखला  में  इन्हें  बिस्मिल  जी  के  बाद  दूसरा  स्थान  दिया  है । शहीद अशफ़ाक़ उल्ला को जीवनपर्यँन्त यह सवाल सता रहा और वह अपने सखा से यह पूछते रहते कि लोग आख़िर ऎसा क्यों सोचते ही हैं कि मैं मुसलमान तु्म क़ाफ़िर ! पढ़िये उनकी कहानी…

श्री अशफाक उल्ला खां पहिले मुसलमान है, जिन्हें  षडयन्त्र  के  मामले  में  फांसी  हुई  है । बीस पच्चीस वर्ष के इतिहास में, जब से राजनैतिक  षडयन्त्रों  की  चर्चा  सुनने  में  आई, अनेक आत्मायें फांसी और गोली का शिकार बना दी गयी । परन्तु आज तक किसी मुसलमान को यह शिकार बनते हुए नहीं सुना गया । इससे जनता में यह धारणा बैठ गयी थी कि मुसलमान लोग षडयन्त्रों में भाग नहीं ले सकते ।

किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे ।

वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी  बनाई  हुई  कविताएं  अदालत  आते-जाते  अक्सर  काकोरी  के अभियुक्त गाया करते थे ।

श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है ।

बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह  नवयुवक  और  कोई  न  था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब  श्री  रामप्रसाद  शाहजहांपुर  आये ।

श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।

उनके  निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है । मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है । अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था

एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु  उस  प्रेम  के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है । यह  एक  दूसरे  को  राम  और कृष्ण कहते है । अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते ।

जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये । स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया  कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया ।

अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले । शेष अगली कड़ी में समाप्य

Advertisements

अशफ़ाकउल्ला ख़ाँ वारसी : अन्तिम समय में दो शब्द

मई 18, 2009 को 5:30 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, काकोरी के शहीद, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना | 11 टिप्पणियाँ
टैग: , , , ,
नमस्कार ! एक  अँतराल  के  पश्चात  यह  कड़ियाँ  प्रारँभ  करने  का  मन बनाया है । किसी हुतात्मा की अवमानना सहन न कर पाना,एक प्रमुख कारण रहा था । न जाने कब, हम इन सिरफिरों को गँभीरता से ले पायेंगे ?यदि इनके स्थान पर कोई स्वयँ का सम्बन्धी शहीद हो गया होता.. तो ?             
इस प्रस्तुति पर होली की शुभकामनायें, और फ़ोलो-मी जैसे सँदेश क्या दर्शाते हैं ?
मेरी  धर्मपत्नी  श्रीमती  रूबी  मज़ूमदार,  सहयोगिनी अमिता  श्रीवास्तव  एवँ  कतिपय  अन्य  मित्रों  का  मानना है, कि  अपनों  से  ऎसी  खिन्नता  के  चलते  हिन्दी जगत  और  विश्व समुदाय  को  क्षति पहुँचाने का मेरा अधिकार नहीं बनता है । किंवा यह चूक अनजाने में होने जा रही थी । अस्तु
, आत्मकथा की शेष कड़ियाँ आज से प्रारँभ हो रहीं हैं । यह सुनिश्चित कर लिया गया है, कि पाठ का क्रम मूल पुस्तक का ही रहे ।  सुधी पाठक अबतक की अनुपस्थिति एवँ पीड़ा के लिये क्षमा करें –

तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये ।
बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।।

….. उनकी बला से कि कोई तकलीफ उठावें । यदि कोई एक दो चालाक हुए भी तो थोड़े दिन बड़े ओहदे की फिराक में काम दिखाया,  दौड़ धूप की,  कुछ पदवृद्धि हो गई और सब काम बन्द । इस प्रान्त में कोई बाकायदा पुलिस का गुप्तचर विभाग नहीं, जिस को नियमित रूप से शिक्षा दी जाती हो । फिर काम करते-करते अनुभव हो ही जाता है । इसके आगे ’ बिस्मिल ’ जी  लिखते हैं :

मैनपुरी षडयन्त्र तथा इस षडयन्त्र से इसका पूरा पता लग गया, कि थोड़ी सी कुशलता से कार्य करने पर पुलिस के लिये पता पाना बड़ा कठिन है । वास्तव में उनके कुछ भाग्य ही अच्छे होते है । जब से इस मुकदमें की जांच शुरू हुई, पुलिस ने इस प्रान्त के सन्दिग्ध क्रान्तिकारी व्यक्तियों पर दृष्टि डाली, उनसे मिली, बातचीत की । एक दो को कुछ धमकी दी । चोर की दाढ़ी में तिनका वाली जनश्रुति के अनुसार एक महाशय से पुलिस को सारा भेद मालूम हो गया । हम सबके सब बड़े चक्कर में थे, कि इतनी जल्दी पुलिस ने मामले का पता कैसे लगा लिये। उक्त महाशय की ओर तो ध्यान भी न जा सकता था ।

पर गिरफतारी के समय मुझसे तथा पुलिस के अफसर से जो बातें हुई, उनमें पुलिस अफसर ने वे सब बातें मुझ से कहीं जिन को मेरे तथा उक्त महाशय के  अतिरिक्त कोई भी दूसरा जान ही न सकता था । और भी बड़े पक्के तथा बुद्धि गम्य प्रमाण मिल गये, कि जिन बातों को उक्त महाशय जान सके थे, वे ही पुलिस जान सकी । जो बातें आप को मालूम न थी, वे पुलिस को किसी प्रकार न मालूम हो सकी । उन बातों से यह निश्चय हो गया कि यह काम उन्हीं महाशय का है । यदि ये महाशय पुलिस के हाथ न आते और भेद न खोल देते, तो पुलिस सिर पटक कर रह जाती, कुछ भी पता न चलता ।

बिना दृढ़ प्रमाणों के भयकंर से भयंकर व्यक्ति पर भी हाथ रखने का साहस नहीं होता, क्योंकि जनता में आन्दोलन फैलने से बदनामी हो जाती है । सरकार पर जवाबदेही आती है । अधिक से अधिक दो चार मनुष्य पकड़े जाते, और अन्त में उन्हें भी छोड़ना पड़ता । परन्तु जब पुलिस को वास्तविक सूत्र हाथ आ गया, उसने अपने सत्यता को प्रमाणित करने के लिये लिखा हुआ प्रमाण पुलिस कोदिया, उस अवस्था में भी यदि पुलिस गिरफतारियां न करती, तो फिर कब करती ? जो  भी  हुआ, परमात्मा  उन  का  भी  भला करे ।  अपना तो जीवन भर यही उसूल रहा-

सताये तुझ को जो कोई बे वफ़ा बिस्मिल ।
तो मुंह से कुछ न कहना आह! कर लेना ।।
हम शहीदा ने वफा का दीनो ईमां और है ।
सिजदा करते हैं हमेशा पांव पर जल्लाद ।।

मैंने इस अभियोग में जो भाग लिया अथवा जिनको जिन्दगी की जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी, उन में से सब से ज्यादा हिस्सा श्रीयुत अशफाकउल्ला खां वारसी का है । मैं अपनी कलम से उन के लिये भी अन्तिम समय में दो शब्द लिख देना अपना कर्तव्य समझता हूं ।

अशफ़ाक
मुझे भली भांति याद है कि मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहांपुर आया था, तो तुम से स्कूल में भेंट हुई थी । तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी।  तुम ने मुझ से मैनपुरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करना चाही थी । मैंने यह समझा कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझ से इस प्रकार की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि से दिया था । तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था । तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों का प्रकाश हो रहा था ।

तुम ने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने इरादे पर डटे रहे । जिस प्रकार हो सका कांग्रेस में बातचीत की । अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का वि्श्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नही, तुम्हारे दिल में मुल्क की खिदमत करने की ख्वाहि्श थी । अन्त में तुम्हारी विजय हुई । तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली । तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे । यह जान कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे भाई बन कर तुम्हें संतोष न हुआ ।

तुम समानता के अधिकार चाहते थे, तुम मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे । वही हुआ ? तुम मेरे सच्चे मित्र थे । सब को  आश्चर्य  था  कि  एक  कटटर  आर्य  समाजी  और  मुसलमान  का  मेल  कैसा ? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था । आर्यसमाज मन्दिर में मेरा निवास था,किन्तु तुम इन बातों की किंचितमात्र चिन्ता न करते थे । मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे । मेरे पास आर्यसमाज मन्दिर में आते-जाते थे । हिंदू-मुसलिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लम खुल्ला गालियां देते थे, काफिर  के  नाम  से पुकारते थे, पर तुम कभी भी उन के विचारों से सहमत न हुये ।

सदैव हिन्दू मुसलिम ऐक्य के पक्षपाती रहे । तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त थे । तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही था कि मुसलमानों को खुदा अकल देता कि वे हिन्दुओं के साथ मेल कर के हिन्दोस्तांन की भलाई करते । जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी पढ़ सकें ?

तुमने स्वदेश भक्ति के भावों को भी भली भांति समझाने के लिये ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया । अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुंह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे, जिससे सबको बड़ा आ्श्चर्य होता था । तुम्हारी इस प्रकार की प्रकृति देख कर बहुतों को संदेह होता था, कि कहीं इस्लाम-धर्म त्याग कर शुद्धि न करा ले । पर तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार से अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली । बहुधा  मित्र मण्डली में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विष्वास करके धोखा न खाना ।

तुम्हारी जीत हुई, मुझ में तुम में कोई भेद न था । बहुधा मैंने तुमने एक थाली में भोजन किये । मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि हिन्दू मुसलमान में कोई भेद है । तुम मुझ पर अटल विश्वास तथा अगाध प्रीति रखते थे, हां ! तुम मेरा नाम लेकर नहीं पुकार सकते थे । तुम तो सदैव राम कहा करते थे । एक समय जब तुम्हें हृदय-कम्प का दौरा हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुंह से बारम्बार राम, हाय राम ! के शब्द निकल रहे थे । पास खड़े हुए भाई बान्धवों को आष्चर्य था कि राम, राम कहता है ।

कहते थे कि अल्लाह, अल्लाह कहो, पर तुम्हारी राम-राम की रट थी । उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को जानते थे । तुरन्त मैं बुलाया गया । मुझसे मिलने पर तुम्हें षान्ति हुई,  तब सब लोग राम-राम के भेद को समझे । अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथा मित्रता का परिणाम क्या हुआ ? मेरे विचारों के रंग में तुम भी रंग गये । तुम भी एक कट्टर क्रान्तिकारी बन गये ।  अब तो तुम्हारा दिन-रात प्रयत्न यही था, कि जिस प्रकार हो सके मुसलमान नवयुवकों में भी क्रान्तिकारी भावों का प्रवेष हो सके। वे भी क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दे ।

जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे, सब  पर  तुमने  अपने  विचारों  का  प्रभाव  डालने  का  प्रयत्न  किया । बहुधा क्रान्तिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैने कैसे एक मुसलमान को क्रान्तिकारी दल का प्रतिश्ठित सदस्य बना लिया । मेरे साथ तुमने जो कार्य किये, वे सराहनीय है !  तुम ने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना न की । एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर रहते थे । तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था । तुम्हारे भाव बड़े उच्च थे ।

मुझे यदि शान्ति है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुंह उज्जवल कर दिया । भारत के इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गई, कि अशफाकउल्ला ख़ाँ ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दिया । अपने भाई बन्धु तथा सम्बन्धियों के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया । गिरफतार हो जाने पर भी अपने विचारों में दृढ़ रहा ! जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे, वैसे ही मानसिक वीर तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए । इन सबके  परिणाम  स्वरूप अदालत  में तुमको  मेरा सहकारी ठहराया गया, और जज ने हमारे मुकदमें का फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में भी जयमाल फांसी की रस्सी पहना दी ।

प्यारे भाई तुम्हे यह समझ कर सन्तोष होगा कि जिसने अपने माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश-सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट कर दिया, जिसने अपना तन मन धन सर्वस्व मातृसेवा में अर्पण करके अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया,  उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया ।

असगर हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है ।
रखना कभी न पांव, यहां सर लिये हुये ।।
सहायक काकोरी शडयन्त्र का भी फैसला जज साहब की अदालत से हो गया। श्री अशफाकउल्ला खां वारसी को तीन फांसी और दो काले पानी की आज्ञायें हुईं । श्रीयुत शचीन्द्रनाथ बख़्शी को पांच काले पानी की आज्ञायें हुई । एक सन्देश
वे मरते समय देशवासियों के नाम एक सन्दे्श भी छोड़ गये । सन्दे्श का सारांश यहां दिया जाता है –

भारतमाता के रंग-मंच पर अपना पार्ट अब हम अदा कर चुके । हम ने गलत सही जो कुछ किया, वह स्वतन्त्रता प्राप्त की भावना से किया । हमारे इस काम की कोई प्रशंसा करेंगे और कोई निन्दा । किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ी है । क्रान्तिकारी बड़े वीर योद्धा और बड़े अच्छे वेदान्ती होते है । वे सदैव अपने देश की भलाई सोचा करते है । लोग कहते हैं कि हम देश को भय त्रस्त करते है,किन्तु बात ऐसी नहीं है । इतनी लम्बी मियाद तक हमारा मुकदमा चला मगर हम ने किसी एक गवाह तक को भयत्रस्त करने की चेष्टा नहीं की,न किसी मुखबिर को गोली मारी । हम चाहते तो किसी गवाह,या किसी खुफिया पुलिस के अधिकारी या किसी अन्य ही आदमी को मार सकते थे । किन्तु हमारा यह उदेश्य नहीं था । हम तो कन्हाई लाल दत्त,खुदीराम बोस, गोपी मोहन साहा आदि की स्मृति में फांसी पर चढ़ जाना चाहते थे ।
अगला पृष्ठ »

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .
Entries और टिप्पणियाँ feeds.