श्री अशफाक उल्ला खां – मैं मुसलमान तुम काफिर ?

फ़रवरी 26, 2010 को 10:58 अपराह्न | Posted in 2.अशफ़ाक़ उल्ला खाँ, काकोरी के शहीद, फाँसी, विशेष परिचय | 5 टिप्पणियाँ
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इस तरह की अपनी कुर्बानियों से  वतन  की  मिट्टी – पानी  का  कर्ज़  अदा  करने  वाले  सिरफिरे  मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का परिचय जुड़ा दिखता है । अपने जीवनकाल में भी यह दोनों मित्रों ने एक नायाब दोस्ती की मिसाल कायम की थी । सँभवतः भाई  शिव  वर्मा  जी  ने  इसी कारण  मुख्य आरोपियों  की  परिचय श्रॄँखला  में  इन्हें  बिस्मिल  जी  के  बाद  दूसरा  स्थान  दिया  है । शहीद अशफ़ाक़ उल्ला को जीवनपर्यँन्त यह सवाल सता रहा और वह अपने सखा से यह पूछते रहते कि लोग आख़िर ऎसा क्यों सोचते ही हैं कि मैं मुसलमान तु्म क़ाफ़िर ! पढ़िये उनकी कहानी…

श्री अशफाक उल्ला खां पहिले मुसलमान है, जिन्हें  षडयन्त्र  के  मामले  में  फांसी  हुई  है । बीस पच्चीस वर्ष के इतिहास में, जब से राजनैतिक  षडयन्त्रों  की  चर्चा  सुनने  में  आई, अनेक आत्मायें फांसी और गोली का शिकार बना दी गयी । परन्तु आज तक किसी मुसलमान को यह शिकार बनते हुए नहीं सुना गया । इससे जनता में यह धारणा बैठ गयी थी कि मुसलमान लोग षडयन्त्रों में भाग नहीं ले सकते ।

किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे ।

वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी  बनाई  हुई  कविताएं  अदालत  आते-जाते  अक्सर  काकोरी  के अभियुक्त गाया करते थे ।

श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है ।

बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह  नवयुवक  और  कोई  न  था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब  श्री  रामप्रसाद  शाहजहांपुर  आये ।

श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।

उनके  निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है । मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है । अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था

एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु  उस  प्रेम  के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है । यह  एक  दूसरे  को  राम  और कृष्ण कहते है । अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते ।

जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये । स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया  कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया ।

अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले । शेष अगली कड़ी में समाप्य

कालकोठरी के गीत और अँतिम नोट

अगस्त 15, 2009 को 2:15 पूर्वाह्न | Posted in अंतिम समय की बातें, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था, फाँसी | 5 टिप्पणियाँ
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अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी में गाये जाने वाले गीतों का उल्लेख करते हुये एक अँतिम नोट राष्ट्रवासियों के नाम दिया है, जो कि स्वगत कथन जैसा ही है । – प्रस्तुतकर्ता : डा० अमर कुमार की टिप्पणी

अलीपुर बम्ब केस के अभियुक्तों के काले पानी जाते समय, श्री ओमप्रकाश जी  के उदगार जिनको मैं काल कोठरी के अन्दर गाया करता था । साथ ही अन्य कवितायें और अशरार मैं लिपिबद्ध कर रहा हूँapna kuchh am

हैफ जिस पै कि हम तैयार थे मर जाने को ।
यकायक हम से छुड़ाया उसी काशाने को ।।
आस्मां क्या यही बाकी था गजब ढाने को ।
लाके गुर्बत में जो रक्खा हमें तड़फाने को ।।
क्या कोई और बहाना न था तरसाने को ।। 1।।

फिर न गुलशन में हमें लायेगा सयाद कभी ।
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फरियाद कभी ।।
याद आयेगा किसे यह दिले नाशाद कभी ।
हम भी इस बाग में थे कैद से आजाद कभी ।।
अब तो काहे को मिलेगी यह हवा खाने को ।।2।।

दिल फिदा करते है कुर्बान जिगर करते हैं ।
पास जो कुछ है वह माता की नजर करते है ।।
खाने वीरान कों देखिये घर करते हैं ।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते है ।।
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को ।।3।।

देखिये कब यह असीराने मुसीबत छूटें ।
मादरेहिन्द के अब भाग खुलें या फूटें ।।
देश सेवक सभी अब जेल में मूंजे कूटें ।
आप यहां ऐश से दिन रात बहारें लूटें ।।
क्यों न तरजीह दें इस जीने से मर जाने को ।।4।।

कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी ।
जिन्दगी भर को हमें भेज दे कालेपानी ।।
मुंह में जल्लाद हुए जाते है छाले पानी ।।
आबे खंजर का पिला करके दुआले पानी ।।
मर न क्यों जाये हम इस उम्र के पैमाने को ।।5।।

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर ।
हमको भी पाला था मां बाप ने दुख सह सह कर ।।
वक्ते रूखसत उन्हें इतना भी न आये कहकर ।
गोद में आंसू कभी टपके जो रूख से बहकर ।।
तिफल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को ।।6।।

देश सेवा का ही बहता है लहू नस नस में ।
अब तो खा बैठे है चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ।।
सरफरोशी की अदा होती है यों ही रसमें ।
भाई खंजर से गले मिलते है सब आपस में ।।
बहिनें तैयार चिताओं में है जल जाने को ।।7।।

नौजवानों जो तबियत में तुम्हारी खट के ।
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ।।
आप के आज बदन होवें जुदा कट कट के ।
और सद चााक हो माता का कलेजा फटके ।।
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को ।।8।।

अपनी किस्मत में अजल से ही सितम रखा था ।
रंज रक्खा था महिन रक्खा था गम रक्खा था ।।
किसको परवाह थी और किसमें यह दम रक्खा था।
हमने जब बादिये गुरवत में कदम रखा था ।।
दूर तक यादे वतन आई थी समझाने को ।।9।।

अपना कुछ गम नहीं लेकिन यह ख्याल आता है ।
मादरे हिन्द पे कब तक जवाल आता है ।।
हरदयाल आता है योरूप से न अजीत आता है ।
कौम अपनी पै तो रो रो के मलाल आता है ।।
मुन्तजिर रहते है हम खाक में मिल जाने को ।।10।।

मैकदा किसका है यह जाने सबू किस का है ।
वार किसका है मेरी जां यह गुलू किसका है ।।
जो बहे कौम की खातिर वह लहू किस का है ।
आसमां साफ बता दे तू उदू किस का है ।।
क्यों नये रंग बदलता है यह तड़फाने को ।। 11।।

दर्द मन्दों से मुसीबत की हवालत पूछो ।
मरने वालों से जरा लुत्फ शहादत पूछो ।।
चश्में मुश्ताक से कुछ दीद की हसरत पूछो ।
सोज कहते हैं किसे पूछो तो परवाने को ।।12।।

बात तो जब है कि इस बात की जिदें ठाने ।
देश के वास्ते कुर्बान करें सब जाने ।।
लाख समझायें कोई एक न उसकी माने ।
कहता है खून से मत अपना गरेबां साने ।।
नासहा आग लगे तेरे इस समझाने को ।।13।।

न मयस्सर हुआ गहत में कभी मेल हमें ।
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें ।।
एक दिन को भी न मंजूर हुई बेल हमें ।
याद आयेगा बहुत लखनउ का जेल में ।।
लोग तो भूल ही जायेंगे इस अफसाने को ।।14।।

अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली ।
एक होती है फकीरों की हमेशा बोली ।।
खून से फाग रचायेगी हमारी टोली ।
जब से बंगाल में खेले है कन्हैया होली ।।
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को ।।15।।

नौजवानों यही मौका है उठो खुल खेलों ।
खिदमते कौम में जो आवे बला तुम झेलो ।।
देश के सदके में माता को जवानी दे दो ।
फिर मिलेगा न ये माता की दुआयें ले लो ।
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने की ।।16।।

aankh ka noor hoon

न किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का करार हूं ।
जो किसी के काम न आ सकूं वह मैं एक मुश्ते गुबार हूं ।।
न दवायें दर्दें जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नजर हूं मै ।
न इधर हूं मैं न उधर हूं मैं न शकेव हूं न करार हूं ।।
मैं नहीं हूं नरामये जां फिजां मेरा सुन के कोई करेगा क्या ।
मैं बड़े वियोगा की हूं सदा ओ बड़े दुखी की पुकार हूं ।।
न मैं किसी का हूं दिलरूबा न किसी के दिल में बसा हुआ ।
मैं जमीं की पीठ का बोझ हूं औ फलक के दिल का गुबार हूं ।।
मेरा बखत मुझ से बिछड़ गया मेरा रंग रूप बिगड़ गया ।
जो चमन खिजां से उजड़ गया  मैं उसी की फसले बहार हूं ।।
पये फातिहा कोई आये क्यों कोई खामा लाके जलाये क्यों ।
कोई चार फूल चढ़ाये क्योंकि मैं बेकसी का मजार हूं ।।
न अखतर से अपना हबीब हूं न अखतरों का रकीब हूं ।
जो बिगड़ गया वह नसीब हूं जो उजड़ गया वह दयार हूं ।।

इसके आगे श्रद्धेय हुतात्मा ने 11 अन्य रचनायें भी दी हैं, जो एक सँकलन के रूप में पृष्ठ चँद राष्ट्रीय अशआर और कवितायें पर दी जा रही हैं । ऎसा इस कड़ी के प्रवाह के दृष्टिगत किया गया है डा० अमर

Flying_bird परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है । मैं तो अपना कार्य कर चुका । मैने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकाल कर भारतवासियों को  दिखला  दिया, जो  सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ । अब किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिये कि मुसलमानों पर विश्वास न करना चाहिये । पहला तजर्बा था जो पूरी तौर से कामयाब हुआ ।

अब देशवासियों से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फांसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिये कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक दल एक हो कर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें । जो कांग्रेस तय करें, उसे  सब  पूरी  तौर  से  मानें  और  उस  पर  अमल करें । ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत दूर न होगा जब कि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की मांग के सामने  सिर  झुकाना  पड़े, और  यदि  ऐसा  करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों की मांग के सामने सिर झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तबतो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जावेगा ।

हिंदू-मुसलिम एकता ही हम लोगों की यादगार तथा अन्तिम इच्छा है, चाहे  वह  कितनी  कठिनता से क्यों न हो । जो मैं कह राहा हूं वही श्री अशफ़ाक उल्ला खां बारसी का भी मत है, क्योंकि  अपील  के समय हम दोनों लखनउ जेल में फांसी की कोठरियों में आमने सामने कई दिन तक रहे थे । आपस में हर तरह की बातें हुई थी । गिरफतारी के बाद से हम लोगों की सजा पड़ने तक श्री अशफ़ाक उल्ला खां की बड़ी उत्कट इच्छा यही थी, कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा ने पूरी कर दी ।

श्री अशफ़ाक उल्ला खां तो अंग्रेजी सरकार से दया प्रार्थना करने पर राजी ही न थे । उन का तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबन्द करीम के अलावा किसी दूसरे से दया की प्रार्थना न करना चाहिय, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने सरकार से दया प्रार्थना की थी । इसका  दोषी  मैं  ही  हूं, जो  अपने  प्रेम  के  पवित्र  अधिकारों  का  उपयोग  करके  श्री अशफ़ाकउल्ला खां को उन के दृढ़ निश्चय से विचलित किया । मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ द्वितीया के अवसर पर गोरखपुर जेल से श्री अशफ़ाक को पत्र लिख कर क्षमा प्रार्थना की थी । परमात्मा जाने  कि  वह  पत्र  उनके  हाथों  तक  पहुंचा भी या नही, खैर !

परमात्मा की  ऐसी  ही  इच्छा थी  कि  हम  लोगों  को  फांसी  दी  जावे, भारतवासियों  के जले हुये दिलों पर नमक पड़े, वे  बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उन के कार्य को देख कर सुखी हों । जब हम नवीन शरीर धारण कर के देशसेवा में योग देने को उद्यत हों, उस समय तक भारतवर्श की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई हो । जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जावे । ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जावें ।

प्रीवीकौंसिल में अपील भिजवा कर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया उसका भी एक विशेष अर्थ था । सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु दण्ड उपयुक्त दण्ड नहीं । क्योंकि न जाने किस की गोली से आदमी मारा गया । अगर डकैती डालने की जिम्मेवारी के ख्याल से मृत्युदण्ड दिया गया तो चीफ कोर्ट के फैसले के अनुसार भी मैं ही डकैतियों का  जिम्मेदार  तथा  नेता  था, और  प्रान्त  का  नेता  भी  मैं  ही  था  अतएव  मृत्यु दण्ड  तो अकेला मुझे ही मिलना चाहिए था । अतः तीन को फांसी नहीं देना चाहिये था । इसके अतिरिक्त दूसरी सजायें सब स्वीकार होती । पर ऐसा क्यों होने लगा ?

मैं विलायती न्यायालय की भी परीक्षा कर के स्वदेशवासियों के लिए उदाहरण छोड़ना चाहता  था, कि  यदि  कोई  राजनैतिक  अभियोग  चले  तो  वे  कभी  भूल  करके  भी  किसी अंग्रेजी अदालत का विश्वास न करें । तबियत आये तो जोरदार बयान दें । अन्यथा मेरी तो यही राय है कि अंग्रेजी अदालत के सामने न तो कभी कोई बयान दें और न कोई सफाई पेश करें । काकोरी षडयन्त्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें । इस अभियोग में सब प्रकार के उदाहरण मौजूद है ।

प्रीवीकौंसिल में अपील दाखिला कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख हटवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है, और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इस में मुझे बड़ी निराशा पूर्ण असफलता हुई । अन्त में मैने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूँ । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीनों फांसी वालों की फांसी की सजा माफ कर देनी पड़ेगी, और यदि न करते तो मैं करा लेता ।

मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु  बाहर  से  कोई   सहायता  न  मिल  सकी  यही   तो  हृदय  पर  आघात  लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी  दल खड़ा  किया  था, वहां  से  मुझे  प्राणरक्षा  के  लिये  एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं । फांसी  पाने  का  मुझे  कोई  भी  शोक  नहीं  क्योंकि  मैं  इस  नतीजे  पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था ।

मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो  अधिक  उपयोगी  सिद्ध हेागी ।

परिस्थिति  अनुकूल  न  होने  से  ऐसे  आन्दोलनों  से  अधिकतर  परिश्रम  व्यर्थ  जाता  है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।
देशवासियों  से  यही  अन्तिम  विनय  है  कि  जो  कुछ  करें, सब  मिल  कर  करें, और  सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।।

रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल
१५ दिसम्बर १९२७ ई०
 

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