मालिक तेरी रजा रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे

फ़रवरी 23, 2010 को 11:50 अपराह्न | 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, विशेष परिचय में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ
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जहाँ  तक  मैं  समझता  हूँ  कि  पिछली सँदर्भित  कड़ी  सहित  परिचय श्रृँखला  की  यह  कड़ियाँ  सँभवतः  श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने या क्राँति-दल के साथियों ने सामूहिक रूप से मिलजुल कर तैयार की होगी । यह तो सर्वविदित है कि बिस्मिल जी ने यह पाँडुलिपि जेल में उनकी माता के सँग आये हुये मित्र श्री शिव वर्मा को ही अपने बलिदान-दिवस से ठीक एक दिन पहले 18 दिसम्बर को सौंपी थी । श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा इसे पुस्तकाकार रूप  दिये  जाने  के  मध्य  ही  यह  परिचय  श्रृँखला  सम्मिलित  की  गयी  होगी । चूँकि यह पुस्तक अपने प्रकाशन  के  चौथे  दिन  ही  ज़ब्त  कर  ली  गयी  थी, इसलिये  कालाँतर  में  इससे  किसी  छेड़-छाड़  की सँभावना कम ही  दिखती है । निवेदन- डा. अमर कुमार                                          अस्तु आगे बढ़ते हैं.. पढ़िये बकौल श्री शिवप्रसाद वर्मा जी

इन पंक्तियों के लेखक ने उन्हें तथा अन्तिम बार मृत्यु के केवल एक दिन पहले फांसी की कोठरी में देखा था और उनका यह सब हाल जाना था । उस सौम्य मूर्ति की मस्तानी अदा आज भी भूली नहीं है- जब कभी किसी को उनका नाम लेते सुनता हूं तो एक दम उस प्यारे का वही स्वरूप आंखों के सामने नाचने लगता है । लोगों को उन्हें गालियां देते देख, हृदय कह उठता है, क्या वह डाकू का स्वरूप था अन्तस्तल में छिपकर न जाने कौन बार-बार यही प्रश्न करने लगता है-क्या वे हत्यारे की आंखें थी ? भाई दुनियां के सभ्य लोग कुछ भी क्यों न कहें, किन्तु मैं तो उसी दिन से उनका पुजारी हुं । दास हूँ । भक्त हूँ ।।

उस दिन मां को देखकर उस मातृभूमि-भक्त पुजारी की आंखों में आंसू आ गए । उस समय पर जननी के हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था, वह  भी  भूलना  नहीं  है । वह एक स्वर्गीय दृश्य था और उसे देखकर जेल कर्मचारी भी दंग रह गये थे । माता ने कहा-मैं तो समझती थी तुमने अपने पर विजय पाई है किन्तु यहां तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है । जीवन पर्यन्त देश के लिये आंसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिये रोने बैठे हो – इस  कायरता  से  अब  क्या  होगा  तुम्हें  वीर  की भांति हंसते हुए प्राण देते देखकर मैं अपने आपको धन्य समझूंगी । मुझे गर्व है कि इस गये-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश की वेदी पर प्राण दे रहा है । मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था, इसके बाद तुम देश की चीज थे, और  उसी के काम आ गए । मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है । उत्तर में उसने कहा मां, तुम  तो  मेरे  हृदय  को  भली-भांति  जानती हो । क्या तुम समझती हो कि मैं तुम्हारे लिये रो रहा हूं अथवा इसलिये रो रहा हूं कि मुझे कल फांसी हो जायेगी यदि ऐसा है तो मैं कहूंगा कि तुमने जननी होकर भी मुझे समझ न पायी, मुझे अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है । हां, यदि  घी  को  आग  के  पास  लाया जायेगा तो उसका पिघलना स्वाभाविक है । बस उसी प्राकृतिक सम्बन्ध से दो चार आंसू आ गए । आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत सन्तुष्ट हूं ।

प्रातःकाल नित्य कर्म, सन्ध्या वन्दन आदि से निवृत हो, माता को एक पत्र लिखा जिस में देशवासियों के नाम सन्देश भेजा और फिर फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गये । जब फांसी के तख्ते पर ले जाने वाले आये तो वन्दे मातरम और भारत माता की जय कहते हुए तुरन्त उठ चल दिये । चलते समय उन्होंने यह कहा –

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे ।

जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,
तेरा ही जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे ।।

फांसी के दवाजे पर पहुंच कर उन्होंने अँतिम इच्छा स्वरूप कहा -मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । इस के बाद तख्ते पर खड़े होकर प्रार्थना के बाद विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि…आदि मन्त्र का जाप करते हुए गोरखपुर के जेल में वे फन्दे पर झूल गये ।फांसी के वक्त जेल के चारों ओर बहुत बड़ा पहरा था । गोरखपुर की जनता ने उनके ‘शव को लेकर आदर के साथ ’शहर में घुमाया । बाजार में अर्थी पर इत्र तथा फूल बरसाये गये, और पैसे लुटाये गये । बड़ी धूमधाम से उन की अन्त्येष्टि क्रिया की गई । उनकी इच्छा के अनुसार सब संस्कार वैदिक ढंग से किये गये थे ।

अपनी माता के द्वारा जो सन्देश उन्होंने देशवासियों के नाम भेजा है, उसमें उत्तेजित युवक समुदाय को ‘शाँत करते हुए यह कहा कि यदि किसी के हृदय में जोश, उमंग तथा उत्तेजना उत्पन्न हुई है तो उन्हें उचित है कि अति ‘शीघ्र ग्रामों में जा कर कृषकों की दशा सुधारे, श्रम-जीवियों   की  उन्नति की चेष्टा करें, जहां तक हो सके साधारण जन समूह को शिक्षा दें, कांग्रेस के लिये कार्य करें, और यथा साध्य दलितोद्धार के लिये प्रयत्न करें । मेरी यही विनती है कि किसी को भी घृणा तथा उपेक्षा की दृष्टि से न देखा जावे, किन्तु सब के साथ करूणा सहित प्रेम भाव का बर्ताव किया जावे ।

मैं एक ओर बैठकर विमुग्ध नेत्रों से उस छवि का स्वाद ले रहा था कि किसी ने कहा-समय हो गया । बाहर आकर दूसरे दिन सुना कि उन्हें फांसी दे दी गई । उसी समय यह भी सुना कि तख्ते पर खड़े होकर उस प्रेम-पुजारी ने अपने आपको गिरधारी के चरणों में समर्पित करते हुए यह कहा था-मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । जान देना सहज है  युद्ध  में  वीर  जान  देते  ही  है और दुनिया उनका आदर करती ही है । लोग बुरे काम में भी जान देते है, रंडी के लिये भी जान देते है और लेते भी है । भाई को सम्पत्ति से वंचित करने के लिये जान ली और दी जाती है । पर एक ऐसे काम के लिये जिस में अपना कोई स्वार्थ भी न हो दो साल के करीब जेल में सड़कर भारत की आजादी के लिये वह वीर हंसते-हंसते फांसी के फन्दे पर भूल गया भाई राम प्रसाद यह तुम्हारा ही काम था, सत्य धर्म का मर्म तुमने ही जान पाया था । वह वीर जहां से आया था वहीं को चला गया ।

प्यारे बिस्मिल की प्यारे बातें
यह चारीगर उल्फत गाफिल नजर आता है ।
बीमार का बच जाना मुश्किल नजर आता है ।।
है दर्द बड़ी नयामत देता है जिसे खालिक।
जी दरदे मुहब्बत के काबिल नजर आता है ।।
जिस दिल में उतर जाये उस दिल को मिटा डाले ।
हर तीर तेरा जालिम कातिल नजर आता है ।।
मजरूह न थी जब तक दिल दिल ही न था मेरा ।
सदके तेरे तीरों का बिस्मिल नजर आता है ।।

अदालत में जज से
जज साहब हम जानते हैं कि आप हमें क्या सजा देंगे । हम जानते है कि आप हमें फांसी की सजा देंगे, और हम जानते है कि यह ओठ जो अब बोल रहे है वह कुछ दिनों बाद बन्द हो जायेंगे । हमारा बोलना, सांस लेना और काम करना यहां कि हिलना और जीना सभी इस सरकार के स्वार्थ के विरूद्ध है । न्याय के नाम पर ‘शीघ्र ही मेरा गला घूंट दिया जायेगा ? मैं जानता हूं कि मैं मरूंगा मरने से नहीं घबराता । किन्तु क्या जनता  और  इससे सरकार का उदेश्य पूर्ण हो जायेगा ?  क्या  इसी  तरह  हमेशा भारत मां के  वक्षस्थल पर विदेशियों का तांडव नृत्य होता रहेगा ? कदापि नहीं, इतिहास इसका प्रमाण है । मैं मरूंगा किन्तु कब्र से फिर निकल आउंगा और मातृभुमि का उद्धार करूंगा ।….

एक दिन वह सहसा बोल पड़े-
उदय काल के सूर्य का सौन्दर्य डूबते हुए सूर्य की छटा को कभ्ीा नहीं पा सकता है। और :-
प्रेम का पंथ कितना कठिन है संसार की सारी आपत्तियां मानों प्रेमी ही के लिये बनी हों।
उफ! कैसा व्यापार है कि हम सब कुछ देदे और हमें आपकी सहानुभूति या फिर कुछ भी नही । लेकिन फिर भी हम कभी मानेंगे नहीं – स्वाधीनता की कीमत कुछ भी नहीं
फांसी के कुछ दिन पहिले उन्होंने अपने एक मित्र के पास एक पत्र भेजा था उसमें उन्होंने लिखा थाः
19 तारीख को जो कुछ होने वाला है उसके लिये मैं अच्छी तरह तैयार हूं। यह है ही क्या ? केवल शरीर का बदलना मात्र है । मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातृभूमि तथा उसकी दीन सन्तति के लिये नये उत्साह और ओज के साथ काम करने के लिए ‘शीघ्र ही फिर लौट आयेगी ।
यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी,
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान मैं लाउं कभी ।
हे ईश, भारतवर्ष में ‘शतबार मेरा जन्म हो,
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।
मरते बिसमिल रोशन, लहरी, अशफाक, अत्याचार से,
होंगे पैदा सैकड़ों उनके रूधिर की धार से ।।
उनके प्रबल उद्योग से उद्धार होगा देश का,
तब नाश होगा सर्वथा दुख ‘शोक के लवकेश का ।।

सब से मेरा नमस्ते कहिये । कृपा करके इतना कष्ट और उठाइये कि मेरा अन्तिम नमस्कार पूजनीय पं० जगतनारायण  मुल्ला  की  सेवा  तक भी पहुंचा दीजिये । उन्हें हमारी कुर्बानी और खून से सने हुए रूपये की कमाई से सुख की नींद आवे । बुढ़ापे में भगवान पं0 जगतनारायण को ‘शान्ति प्रदान करें ।

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पुनःआरँभ बिस्मिल आत्मकथ्य- और इसके पहले

फ़रवरी 22, 2010 को 2:03 पूर्वाह्न | 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, अंतिम समय की बातें, विशेष परिचय में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ
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इससे पहले कि मैं आत्मकथा की कड़ियों का पुनःप्रकाशन आरँभ करूँ, मैं  देश  के  गौरव  अमर  हुतात्मा के सम्मुख क्षमादान माँगते हुये नतमस्तक हूँ । उस  समय  जबकि  इस  आत्मकथा का  प्रवाह अपने  अँतिम  चरण  में  था, इसका अनायास रुक जाना क्षम्य नहीं है । 25 अगस्त  2009 के बाद से आज तक इनका प्रकाशन बाधित रहा है, इस  अँतराल के बढ़ते जाने के साथ ही मैं अहर्निश एक अपराध बोध से ग्रसित रहता आया हूँ । कई कारण स्वयँ ही जुड़ते गये, साथ ही एक महत्वपूर्ण चीज जो मुझे निरँतर उद्वेलित करती रहती  उसे मैंनें इन कड़ियों के नियमित पाठक श्री अनुराग शर्मा से साझा किया है । अस्तु,उसे यहाँ दोहराना प्रसँगान्तर या कहिये कि प्रत्यारोप होगा । उसे इस मँच पर न रखते हुये अब आगे बढ़ते हैं । आपको स्मरण होगा कि पिछली कड़ी बिस्मिल जी द्वारा प्रारँभिक असफ़लता के उपराँत दल के पुनर्गठन के प्रयासों पर ठहर गयी थी, देखें

पिछले सोपान पर ……… चोट लगने के कारण उस समय हमारे नायक की आंख से काफी खून निकल चुका था, किन्तु फिर भी और लोगों से आगे चलने को कहकर आपने उसे अपनी पीठ पर उठाया और ज्यों त्यों कर चल दिये । जिस स्थान पर गाड़ी खड़ी थी, उसके थोड़ी दूर रह जाने पर आपने विद्यार्थी को एक पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं गाड़ी के पास जाकर जो एक आदमी उसकी निगरानी के लिये रह गया था उसे साथी को लेने के लिये भेजा मकान पर पिता के पूछने पर कह दिया बैल बिगड़ गये, गाड़ी  उलट  गई  और मेरे चोट आ गई ।

जिस समय फरार होकर आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते फिर रहे थे, उस समय की कथा भी बड़ी करूणाजनक है । उस बीच में कई बार आपको मौत का सामना करना पड़ा था । उस दिन तो पास में पैसा न रह जाने के कारण आपने घास तथा पत्तियां खाकर ही अपने जीवन का  निर्वाह किया था । नेपाल तथा आगरा तथा राजपूताना आदि स्थानों में घूमते रहने के बाद एक दिन अखबार में देखा कि सरकारी ऐलान में आप पर से भी वारण्ट हटा लिया गया था, बस  फिर  आप  घर  वापस  आ गए  और रेशम के सूत का कारखाना खोलकर कुछ दिन तक आप घर का काम काज देखते रहे । किन्तु जिस हृदय में एक बार आग लग चुकी, उसे फिर चैन कहां । अस्तु – फिर  से  दल  का  संगठन  प्रारम्भ  कर दिया । अब आगे का वृताँत-.

एक बार किसी स्टेशन पर जा रहे थे । कुली बक्स लेकर पीछे-पीछे चल रहा था ठोकर खाकर गिर पड़ा । बहुत सी कारतूसों के साथ कई एक रिवाल्वर बक्स में से निकल कर प्लेटफार्म पर गिर पड़े कुली पर एक सूट-बूट धारी साहब बहादुर द्वारा बुरी तौर मार पड़ती देख कर पास खड़े दरोगा साहब को दया आ गई । कुली को क्षमा करने की प्रार्थना कर, बेचारे स्वयं ही सारा सामान बक्स के अन्दर भरने लगे । उस दिन यदि आप तनिक बी डर जाते और इस बुद्धिमानी से काम न लेते तो निश्चय ही गिरफतार हो गये थे ।

उनमें असाधारण शारीरिक बल था । घोड़ा चढ़ने, साइकिल चलाने और तैरने में वे पूरे पण्डित थे । थकना किसे कहते है, सो तो वे जानते ही न थे । साठ-साठ मील बराबर चल कर भी आगे चलने की हिम्मत रखते   थे ।   व्यायाम और प्राणायाम वे इतना करते थे कि देखने वाले दंग रह जाते थे । हिन्दी और उर्दू के अतिरिक्त वे अंग्रेजी तथा बंगला भी जानते थे । उन्होंने कई किताबें भी हिन्दी में लिखी तथा प्रभा आदि मासिक पत्रों में अज्ञात के नाम से इनके कई लेख भी निकले । इन्होंने मैनपुरी षड़यन्त्र के सम्बन्ध में एक पुस्तक लिखी थी, परन्तु कुछ कारणों से वह पुस्तक प्रकाशित होने के पहिले ही जला दी गई । लिखने की अपेक्षा इन में व्याख्यान देने की ‘शक्ति और भी अधिक अच्छी थी ।

इनका व्याख्यान बड़ा जोशीला और प्रभावोत्पादक होता था । असहयोग के जमाने में श्री अशफाक के साथ हरदोई, ‘शाहजहांपुर, बरेली और पीलीभीत जिलों में घूम घूम कर इन्होंने पचासों जगह व्याख्यान दिये थे । क्रान्तिकारी आन्दोलन एक प्रकार से इनके जीवन का आधार था । हवालात के समय अगर कोई व्यक्ति बाहर से मिलने आता तो ये अकसर पूछ बैठते, क्यों जी क्रान्तिकारी आन्दोलन जोरों पर है या नहीं ? क्रान्तिकारी कार्य उन्हें कितना प्रिय था, उसमें कितनी दिलचस्पी थी, वह इससे भी अनुमान किया जा सकता है, ये यों रोज नियमित रूप  से हवन अवश्य करते थे, और कामों के कारण उनके हवन-कार्य में कभी व्यक्तिक्रम नहीं होने पाली, परन्तु क्रान्तिकारी कामों के सामने गायत्री और हवन तक को वह झट छोड़ देते थे ।

श्री रामप्रसाद जी को यों गुस्सा कम आता था, जब जब वे क्राधित होते, तो इनका क्रोध प्रलयानल का रूप धारण कर लेता ! अभागे खुफिया के चर ही अधिकतर इनके क्रोध के शिकार होते थे । एक दफे, तो इन्होंने ने एक खुफिया को इतना पीटा  कि वे बेचारा बहुत दिनों तक बिछावन से उठ नहीं सका । एक बार एक दूसरे खुफिया की डण्डे से ऐसी मरम्मत की कि वह नौकरी से इस्तीफा देकर चला गया ।

माताओं के लिये भी उस भावुक हृदय में कम श्रद्धा न थी । उनके तनिक भी अपमान को देख कर वह पागल सा हो उठता था । एक समय की बात है ।  पेशेवर डाकुओं के एक सरदार ने आपके पास आकर अपने आपको क्रान्तिकारी दल का सदस्य बतलाया और उसके द्वारा की जाने वाली डकैतियों में सहयोग देने की प्रार्थना की । निश्चय हुआ कि पहली डकैती में हमारे नायक केवल दर्शक की भांति रहेगें और उनके कार्य संचालन का ढ़गं देख कर उसी के अनुसार अपना निश्चय करेंगे । स्थान और दिन नियत होने पर डकैती वाले गांव में पहुचें । मकान देख कर आपने कहा-इस झोपड़ी में क्या मिलेगा आप लोग व्यर्थ ही इन लोगों को तंग करने आये है यह सुन सब लोग हंस पड़े ।

एक ने कहा आप ‘शहर के रहने वाले हैं, गांव का हाल क्या जाने यहां ऐसे ही मकानों में रूपया रहता है, गांव  का  हाल  क्या  जाने  यहां  ऐसे  ही मकानों में रूपया रहता है । खैर ? अन्दर घुसने पर सब लोग अपनी मनमानी करने लगे । मकान में उस समय पुरूष न थे। उन लोगों ने स्त्रियों को बुरी तरह तंग करना ‘शुरू कर दिया । मना करने पर फिर वही जवाब मिला तुम क्या जानों अधिक अत्याचार  देख, आपने एक से थोड़ी देर के लिये बन्दूक तथा कुछ कारतूस मांग लिये और कूद कर छत पर आ गये । वहां से पुकार कर कहा, खबरदार, यदि किसी ने भी स्त्रियों की ओर आंखे उठाई तो गोली का निशाना बनेगा कुछ देर तो काम ठीक तौर से होता रहा किन्तु बाद में एक दुष्ट ने फिर किसी स्त्री का हाथ पकड़ कर रूपया पूछने के बहाने कोठरी की ओर खींचा ! इस बार नायक ने जवान से कुछ भी न कहा उस पर फायर कर दिया ।

छर्रों के पैर में लगते ही वह तो रोता चिल्लाता अलग जा गिरा और बाकी लोगों के होश बन्द हेा गये । आपने उंची आवाज से कहा जो कुछ मिला हो उसे लेकर बाहर आओ केाई मिठाई की भेली सर पर लादकर और कोई घी का बर्तन हाथ में लटकाए बाहर निकला । जिसे कुछ भी न  मिला उसने फटे पुराने कपड़े ही बांध लिये, यह तमाशा देखकर उस सौम्य सुन्दर मूर्ति ने उस समय जो उग्र रूप धारण किया था उसका वर्णन करना मेरी लेखनी की ‘शक्ति के परे हैं । बन्दूक सीधी कर सब सामान वहीं पर रखवा दिया और सरदार की ओर देखकर कहा अगर यदि भविष्य में तूने फिर कभी अपनी स्वार्थ सिद्धि के नाम पर क्रान्तिकारियों को कलंकित करने का साहस किया तो अच्छा न होगा, जा  आज  तुझे  क्षमा  करता  हूं । उस समय सरदार सहित दल के सभी लोग डरकर कांप रहे थे । इस डकैती में केवल साढ़े चैदह आने पैसे इन लोगों के हाथ लगे थे । डकैती जैसे भीषण कार्य में सम्मिलित होने पर भी रामप्रसाद का हृदय कितना भावुक कितना पवित्र कितना महान था । यह बात इस वक्त की घटना से स्पष्ट है ।

एक दिन 9 अगस्त 1924 ई0 को सन्ध्या के आठ बजे 9 नम्बर की गाड़ी हरदोई से लखनउ जा रही थी एकाएक काकोरी तथा आलम नगर के बीच 52 नम्बर खम्भे के पास गाड़ी खड़ी हो गई । कुछ लोगों ने पुकार कर मुसाफिरों से कह दिया कि हम केवल सरकारी खजाना लूटने आये हैं । गार्ड से चाबी लेकर तिजोरी बाहर निकाली गई ।  इसी बीच में एक व्यक्ति नीचे उतरा और गोली से घायल होकर गिर गया । लगभग पौन घण्टा के बाद लूटने वाले चले  गये ।  इस बार करीब दस हजार रूपया इन लोगों के हाथ लगा । 25 सितम्बर से गिरफतारियां प्रारम्भ हो गई और उसी में हमारे नायक भी पकड़े गये । डेढ़ साल तक अभियोग चलने के बाद आपको फांसी की सजा हुई । बहुत कुछ प्रयत्न किया गया, किन्तु फांसी की सजा कम न हुई और 19 दिसम्बर सन्1927 को गोरखपुर में आपको फांसी की रस्सी से लटका दिया गया ।

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