सेशन कोर्ट का फैसला

जनवरी 12, 2009 को 1:17 पूर्वाह्न | Posted in काकोरी के शहीद, काकोरी षड़यंत्र, वन्दे मातरम, सरफ़रोशी की तमन्ना | 1 टिप्पणी
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अब तक आपने पढ़ा…

उस दिन के सवाल जवाब में यह भी मालूम हुआ कि काकोरी के मामले में सरकार दो लाख रूपये खर्च कर चुकी है । प्रान्त के कार्यकर्ताओं के पास यही एक अन्तिम अस्त्र था, जिससे वे काकोरी के अभियुक्तों के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते थे । किन्तु गवर्नर साहब की स्वेच्छाचारिता के कारण वह अस्त्र भी निष्फल हुआ। अनशन तो किसी प्रकार टूट गया, मगर विशेष अधिकार उन्हें अभी तक नसीब न हुये । पराधीन देश के पराधीन निवासियों के लिये जो कुछ हो जाय थोड़ा है । सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करने का निश्चय किया .. .. 

अब आगे..

सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करना निश्चय किया । इस निश्चय के अनुसार श्री बनवारी लाल, श्री भूपेन्द्रनाथ सन्याल और श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल  के अलावा अन्य अभियुक्त ने सेशन जज के फैसले के खिलाफ अपील दायर की । उधर सरकार की ओर से सजा बढ़ाने के लिए लिखा पढ़ी की गई । दोनों मामले साथ-साथ चीफ कोट में चीफ जस्टिस सर लुई स्टुवर्ट और जस्टिस मोहम्मद रजा के सामने पेश हुये । 18 जुलाई को अपील प्रारम्भ हुई । सरकार ने अपनी पैरवी के लिये तो यहाँ भी पं0 जगतनारायण को बुलाया किन्तु फांसी की सजा पाये हुये अभियुक्त श्री रामप्रसाद, श्री राजेन्द्र और श्री रोशन सिंह के मामले की पैरवी के लिए क्रमश: श्री लक्ष्मी शंकर मिश्र, श्री एच0 सी0 दत्त ओर श्री जयकरण नाथ मिश्र को नियुक्त किया । अभियुक्त चाहते थे कि उनके लिये किसी अच्छी वकील का प्रबन्ध किया जाय । उन्होंने अपना यह विचार  प्रकट भी किया किन्तु सुनता कौन है ?

उन्हें सख्त सजा दिलाने के लिये तो सरकार ने दो लाख रूपये खर्च कर दिये और इस अपील में और भी खर्च करने को तैयार हुई, किन्तु उन फांसी पर लटकने वालों के लिये उसने थोड़ी सी रकम भी खरचना मन्जूर नहीं किया । दिखावे के लिये एक बड़े वकील से, जिसे अभियुक्त चाहते थे, कुछ बात-चीत भी की गई किन्तु मेहनताना इतना कम दिया जा रहा था कि उन सज्जन को साफ-साफ शब्दों में सरकारी आदमी से यह कहना पड़ा कि तुम काकोरी के कैदियों के साथ किसी किस्म का सलूक करना नहीं चाहते, किन्तु चाहते यह भी हो कि बदनामी भी न हो । अभियुक्त पं. रामप्रसाद ने पं0 लक्ष्मीशंकर मिश्र की मारफत अपने मामले की पैरवी कराने से इनकार कर दिया । उन्होंने कहा कि या तो कोई अच्छा वकील नियुक्त किया जाये या मुझे स्वयं पैरवी करने दिया जाये । किन्तु चीफ कोर्ट का हुक्म हुआ कि दो में से एक भी न मानी जायेगी और पं0 लक्ष्मीशंकर ही मामले की पैरवी करेंगे, यह भी सरकारी रिआयत है जो वह अपने खर्च से उनके लिये वकील दे रही है । गरज यह कि जिस प्रकार सरकार ने चाहा, उसी प्रकार अपील की सुनवाई हुई । दौरान अपील में अभियुक्त श्री प्रणवेश चैटर्जी के भाई ने अपने भाई की ओर से एक दरख्वास्त दी जिसमें बहुत से अपराध स्वीकार कर लिये ओर अपील वापिस लेते हुये अपनी गलतियों पर अफसोस किया और मामला चीफ कोर्ट के हाथों में दीन भाव से सौंप दिया । इस अपील की सुनवाई 2 अगस्त को खतम हो गई । किन्तु फैसला उस दिन नहीं सुनाया गया ।

इसी बीच में श्री अशफाकउल्ला खां की अपील की भी सुनवाई हुई ।  श्रीशचीन्द्रनाथ बख्षी ने अपील नहीं की थीं 12 अगस्त को सबका फैसला एक साथ ही सुना दिया गया । इसमें सेशन जज द्वारा दी गई सजाओं में परिवर्तन किया गया । श्री रामप्रसाद, श्री राजेन्द्र लहरी, श्री रोशनसिंह और श्री अशफाकउल्ला की फांसी की सजायें कायम रहीं । श्री जोगेश चटर्जी, श्री गोविंद चरणकार, श्री मुन्दीलाल की सजाएं बढ़ाकर दस-दस वर्ष की कैद से आजन्म कालापानी की कर दी गईं । श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य और श्री विष्णुशरण दुबलिस की सजाएं सात-सात वर्ष से बढ़ाकर दस-दस वर्ष की कर कर दी गईं । श्री रामनाथ पाण्डेय की सजा घटा कर 5 वर्ष से 3 वर्ष कर दी गई और श्री प्रणवेश की सजा घटा कर 5 वर्ष से 4 वर्ष की गई । शेष अभियुक्तों की सजाएं पूर्ववत् ही बनी रहीं ।

इस फैसले से प्रान्त के कार्यकर्ताओं में और भी असंतोष और रोष हुआ । ठा० मनजीत सिंह एम० एल० सी० ने कौंसिल के आगामी अधिवेशन में इस आशय का प्रस्ताव पेश करने की सूचना दी कि फ़ाँसी की सजा पाये हुए लोगों की सजाएं कम करके आजन्म काले पानी की सजाएं कर दी जायें । फांसी 16 सितम्बर को हाने वाली थी इस बीच में कौंसिल का अधिवेशन नहीं हो रहा था । यह आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो कि कौंसिल में प्रस्ताव पे्श करने के पहिले ही इनको फांसी  पर टांग दिया जायेगा ।  इसलिए ठाकुर मनजीतसिंह ने एसेम्बली के सदस्यों को भी एक पत्र लिखा, जिसमें सजा घटवाने का उद्योग करने की प्रार्थना की और यह भी कहा कि आगामी बैठक तक उन की फांसी रूक जाये, ताकि मैं अपना प्रस्ताव कौंसिल में पेश कर सकूं । एक ओर तो यह उद्योग किया गया और दूसरी ओर प्रान्तीय कौंसिल के मेम्बरों ने गवर्नर साहब के पास एक आवेदन-पत्र भेज कर फांसी पाये अभियुक्तों पर, उनकी युवावस्था के नाम पर, दया दिखाने की प्रार्थना की । गवर्नर साहब का शासनकाल समाप्त हो चुका था । वे शीघ्र ही जाने वाले थे । इसलिए मेम्बरों को आस थी कि शायद वे चलते-चलते इतना सलूक कर जायें । किन्तु उनकी सब आशायें दुराशा मात्र साबित हुईं और गवर्नर महोदय ने दया प्रार्थना अस्वीकार कर दी । इस प्रकार की एक दया-प्रार्थना एसेम्बली और स्टेट कौंसिल के सदस्यों ने वायसराय से भी की थी किन्तु उन्होंने भी इसी निर्दयता के साथ उसे अस्वीकार कर दिया । हां, इस लिखा पढ़ी में इतना जरूर हुआ कि फांसी की पहिली तिथि 16 सितम्बर टल गई और उस दिन अभिुक्तों को फांसी नहीं हुई ।

इसके बाद फांसी देने के लिये 11 अक्टूबर की तारीख नियत की गई । अभियुक्तों ने सरकार के मनोभाव जान ही लिये थे, इस लिये यहां से कुछ होता न देख उन्होंने प्रीवी-कौसिंल में अपने मामले की अपील करने का विचार किया। उन्होंने अपना यह विचार सरकार पर प्रकट किया और इसलिये उन्हें अपील का मौका देने के लिए फांसी की दूसरी तारीख भी टल गई । अंग्रेजी सल्तनत में न्याय कितना महंगा पड़ता है, यह किसी से छिपा नही । इतने ही मामले में अभियुक्त बहुत बड़ी आर्थिक हानि उठा चुके थे । घर के लोग सगे-सम्बन्धी सब परेशान हो  गए थे । फिर भी इस आशा से कि शायद वहां न्याय हो, इन्होंने लम्बा खर्च बर्दाश्त करके भी अपील करने का ही निश्चय किया । येन-केन प्रकारेण धन का प्रबन्ध कर के श्री पोलक महाशय को, जो इंग्लैण्ड में थे, मामले के काग़जा़त सौंपे गए । वहां पर एक बैरिस्टर की मारफत यह अपील प्रीवी-कौंसिल में दायर की गई, किन्तु प्रीवी-कौंसिल के न्यायधीशों ने इसे इस योग्य भी न समझा कि इसकी सुनवाई की जाये । उन्होंने उस पर विचार करना अस्वीकार कर दिया । 29 अक्टूबर को प्रान्तीय कौंसिल में भी काकोरी के कैदियों का प्रश्न आया ।

पं०  गोविन्द बल्लभपन्त ने सरकार को खूब आड़े हाथों लिया । बहुत देर तक प्रश्नोत्तर होते रहे । किन्तु बेहया सरकारर टस से मस नहीं हुई । अब सारा खेल खतम हो चुका था । अपीलें की जा चुकी थी, कौंसिल में प्रश्न छेड़े जा चुके थे । गवर्नर से दया-प्रार्थना की जा चुकी थी, वायसराय से भी सजा घटाने की प्रार्थना की जा चुकी थी, सम्राट के पास भी प्रार्थना पत्र भेजे जा चुके थे, जो उपाय शक्ति के अन्दर थे, वे सब किये जा चुके थे । किन्तु सभी जगह केवल शून्य ही हाथ आया । 19 दिसम्बर को अभियुक्तों को फांसी पर लटका देना निश्चय हो गया । प्रान्त भर में बड़ी बेचैनी पैदा हो गई  ।       17 दिसम्बर को प्रान्तीय कौंसिल में पं. गोविन्दबल्लभ पन्त ने इस मामले को फिर उठाया । उन्होंने प्रेसीडेण्ट से प्रार्थना की कि सब काम बन्द करके इस मामले पर विचार किया जाये । पहिले प्रसिडेण्ट महाशय इस प्रार्थना को अस्वीकार किये देते थे, किन्तु तीन बजे के करीब जब मेम्बरों ने उन से फिर प्रार्थना की, तब वे राजी हुए, किन्तु उस दिन तीन बजे के कुछ बाद ही सरकारी काम समाप्त हो जाने पर डिप्टी प्रसिडेण्ट ने, जो उस समय प्रसिडेण्ट का काम कर रहे थे, कौंसिल की बैठक सोमवार तक लिए स्थगित कर दी । सोमवार को सबेरे ही फांसी का समय था । इस लिए मेम्बरों में बड़ी खलबली मच गई । उन्होंने होम मेम्बर नवाब साहब छतारी तक के दरे-दौलत की ख़ाक छानी, किन्तु कोई सुनवाई न हुई और प्रान्तीय कौंसिल में, एक शब्द कहने का मौक़ा दिये बिना ही प्रान्त के चार होनकार नवयुवक फांसी के तख्ते पर टांग दिये गये !

अन्त में सोमवार 19 दिसम्बर 1927 के हत्यारे दिन ने अपना मुंह दिखायां श्री राजेन्द्र लहरी अपने साथियों से दो दिन पहिले ही-17 दिसम्बर को ही अपने अमूल्य प्राण-दान से गोंडा के रक्त-पिपासु फांसी के तख्ते की तृष्णा बुझा चुके थे । 19 दिसम्बर को शेष तीनों वीरों ने भी मातृ-मंदिर की बलिवेदी पर अपने-अपने बहुमूल्य शीश चढ़ा दिये । सब में एक अवर्णनीय गम्भीरता थी । जननी-जन्मभूमि के वक्ष का स्तनपान करने की उन में अलौकिक उत्सुकता थी, अपनी इस उत्सुकता में उन्होंने एक दिन पहिले ही से बाहर का दूध पीना छोड़ दिया था । उनमें मृत्यु का भय नहीं था ।

साधारण लोगों की भांति वे बेहोशी की अवस्था में, घसीट कर फांसी के तख्ते पर नहीं लाये गये थे । वे अपने आप ही तैयारी कर रहे थे । प्रातःकाल होते ही वे अपनी अनन्त यात्रा के उद्योग में लग गये थे और मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे ।

मुहूर्त की सूचना मिलते ही मुस्काराये और गम्भीर स्वर में वन्दे-मातरम और भारतमाता की जयघोष किया और फिर हंसते खेलते उस भयानक प्रेताकार फांसी के तख्ते पर चढ़ गये ।

थोड़ी ही देर में उनका शरीर उस फन्दे में झूलने लगा और स्वयं के साथ उनकी पवित्र प्राणवायु उनकी प्राणप्रिय भारतमाता की वायु से मिल गयी । थोड़ी देर बार उनके स्थूल शरीर भी भारतमाता की छाती पर लेटते हुये पाये गयें चारों ओर शान्ति छा गई

इस प्रकार इन वीरात्माओं की जीवन-यज्ञ की पूर्णाहुति समाप्त हुई । देष भर में शोक और विषाद की लहर फैल गई । सबों ने अपनी-अपनी श्रद्धांजलि चढ़ा  कर उनका तर्पण किया और माता के वह पागल पुजारी अपनी जीवन लीला समाप्त कर अनन्त की गोद में विलीन हो गये । फांसी के दिवस समस्त देश भर में बड़ा शोक मनाया गया । लोगों ने व्रत रखें और शोक तथा सहानुभूति सूचक सभायें हुईं । कहीं-कहीं विद्यालयों और कालेजों के छात्रों ने भी व्रत रखें । दिल्ली के इस्लामी स्कूल के सभी छात्र तथा शिक्षकों ने व्रत रख कर दुख प्रकट किया । देश भर में सरकार के इस कृत्य की आज निन्दा हो रही थी, सभी शोकातुर थे । बड़ा अन्धकारमय दिन था !

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कार्यकर्ताओं में बड़ी खलबली मच गयी…

जनवरी 9, 2009 को 11:33 अपराह्न | Posted in काकोरी के शहीद, काकोरी षड़यंत्र, रंग दे बसंती चोला, सरफ़रोशी की तमन्ना | 3 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा..

इनके साथ राजनैतिक कैदियों का सा ही बर्ताव किया जाना चाहिए था, किन्तु ऐसा न कर के इन को मामूली कपड़े जबर्दस्ती छीन कर जेल की पोशाक पहनाई गई ।  जेल के कर्मचारियों का व्यवहार भी इनके प्रति अच्छा नहीं था । इनके स्वाभिमान ने इन्हें ये बातें नहीं सहने दीं और सब अभियुक्तों ने अनशन व्रत कर दिया । अभियुक्तों के बल को कम करने के अभिप्राय से ही वे भिन्न-भिन्न जेलों को भेज दिये गये थें मगर उन्होंने अलग-अलग रह कर भी स्वाभिमान के लिए यह व्रत चालू रखा, इस अनशन के समाचार छिपाने की भी कोशिश पहिले ही की तरह की गयी । सगे सम्बन्धी तक अभियुक्तों से नहीं मिलने दिये गये । जब यह समाचार बाहर फैला तब प्रान्त के कार्यकर्ताओं में बड़ी खलबली मच गयी… और आगे 

कुछ कौंसिल सदस्यों ने जो जेल विज़िटर थे, जेलों में जाकर अभियुक्तों से मिलना चाहा, परन्तु उन्हें भी मिलने की इजाज़त नहीं दी गयी । इस पर एक सदस्य ने तो इस पद से इस्तीफ़ा तक दे दिया । अस्तु मामला दिन व दिन संगीन होता गया । दिन के बाद हफ़्ते और हफ़्ते के बाद महीने समाप्त होने लगे । अनशन करने वालों की दशा अधिकाधिक कमजोर होने लगी, एक-एक आदमी का वज़न 43-43 और 44-44 पौंड कम हो गया, किन्तु फिर भी उनकी बातों की कोई परवाह नहीं थी । स्थिति बड़ी चिन्ताजनक होती जा रही थी । जिद्दी सरकार जिद छोड़ने के लिए राज़ी नहीं थी और स्वाभिमानी अभियुक्त अपने बात पर अटल थे । यह चिन्ताजनक स्थिति देख कर श्री गणेष शंकर विद्यार्थी ने प्रान्तीय होम मेम्बर आनरेबुल मोहम्मद अहमद सईद खां साहब, नवाब छतारी को एक तार और एक लम्बा पत्र भेजा, जिस में अभियुक्तों की तमाम दशा का वर्णन करते हुए और यह दिखलाते हुए कि अभियुक्तों को राजनैतिक कैदियों जैसा विशेष व्यवहार पाने का हक़ है, यह कहा कि शीघ्र से शीघ्र दस्तान्दाजी़ करके इस मामले का समझौता कराइये । होम मेम्बर साहब इस तार और इस लम्बे पत्र को साफ़ पी गये । जवाब में इतना तो जरूर लिखा कि पत्र मिल गया, मगर इसके आगे उसका क्या हुआ सो आज तक न मालूम हुआ । जिस समय मुकद्मा चल रहा था उस समय भी जब अभियुक्तों ने विशेष व्यवहार पाने की बात कही थी, तब यह कह कर टाल दिया गया था कि विचाराधीन कैदियों के साथ विशेष व्यवहार का् प्रश्न नहीं उठता । मामला ख़तम हो जायेगा तब देखा जायेगा ।

मगर अब, जब मामला खतम हो गया और सेशनजज ने भी साफ़ तौर से यह कह दिया कि अभियुक्तों पर डकैतियों का जो अभियोग है, वह राजनैतिक समझा जाने योग्य है, क्योंकि उन्होंने स्वार्थ कि लिये डाके नहीं डाले, तब यह सलूक कि उनको बन्दर की शकल बना कर जेलों में रखा गया, सब बातों में मामूली डकैतों जैसा बर्ताव किया जाने लगा और विरोध करने पर अभियुक्त कालकोठरियों में बन्द किये जाने लगे काकोरी के अभियुक्त शिक्षित सभ्य और भले घरों के नवयुवक हैं । उनकी स्थिति के अनुसार उनके साथ जेल में व्यवहार किया जाना नितान्त आवश्यक था । स्वयं होम मेम्बर साहब तक हैसियत के अनुसार सुविधा देने की बात पहिले स्वीकार कर चुके थे, किन्तु जब समय आया तो गोता लगा गये अथवा थूककर चाट गये । बंगाल आदि प्रान्तों में ऐसे कैदियों के साथ विशेष बर्ताव करने का प्रबन्ध है, मगर संयुक्त प्रान्त की एक बात ही निराली है । यहां इन दलीलों और अपीलों की कोई सुनवाई न हुई । इस इधर-उधर की कोशिश में लगभग डेढ़ महीना बीत गया । सरकार टस से मस न हुई ।

अभियुक्तों की हालत बहुत ही गिर गयी । अनेक अभियुक्त मृत्यु शैय्या पर पड़ गये । अब शिथिलता करने का समय न था । अभियुक्तों के रिश्तेदारों में बड़ी चिन्ता थी । अभियुक्त राजकुमार सिंह की माता ने तो जब से अनशन का हाल सुना तब से उन्होंनें भी खाना ही छोड़ दिया । इससे वे बहुत कमजोर हो गयी । एक दिन तो वे बेहोश हो गयीं और कई घण्टे तक उसी अवस्था में रहीं । वह दशा देख कर श्री गणेष शंकर विद्यार्थी जेलों में अभियुक्तों से मिल कर उनको अनशन तोड़ने के लिए समझाने लगे । पहिले तो कुछ जेलों के अधिकारियों ने यह समझा कि कहीं ये अभियुक्तों को और न भड़कायें, इसलिए इजाज़त नहीं दी । परन्तु एकाध जगह का उदाहरण उन के सामने आया, तब इन्हें जेलों में अभियुक्तों से मिलने की इजाज़त मिल गयी । फिर भी एकाध स्थान में ये नहीं जा सके । किन्तु इनके इतने ही परिश्रम ने काफ़ी काम किया । इन्होंने बरेली, फतेहगढ़ नैनी आदि कई जेलों के अभियुक्तों से बातचीत की और उन्हें राजी कर लिया । इस प्रकार अनशन का अन्त करा कर श्री गणेष शंकर जी अभियुक्तों को स्थायी रूप से विषेश व्यवहार की सुविधा दिलाने का फिर प्रयत्न करते रहें इसी बीच में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने यह प्रस्ताव पास किया कि काकोरी के कैदियों के साथ विशेष व्यवहार किया जाये । बाद को मद्रास के कांग्रेस अधिवेशन में भी इस आशय का एक प्रस्ताव पास हुआ था । इस प्रस्ताव से इस मामले ने, जो अभी तक केवल प्रान्तीय रूप धारण किये था, सार्वदेशिक रूप धारण कर लिया ।

22 जून को यह मामला युक्त प्रांतीय कौंसिल में जोरों के साथ उठाया गया । सवालों का तांता बांध दिया गया । किन्तु सरकार की ओर से किसी बात का उचित और सन्तोषजनक उत्तर नहीं दिया गया । होम मेम्बर ने इन सवाल-जवाबों में साफ तौर से यह एलान कर दिया कि उनके साथ दुबारा कैदियों का सा ही बर्ताव किया जायेगा, वे उसी श्रेणी में रखे गये है । इस बात से कौंसिल के स्वराजी सदस्यों को बड़ा असन्तोष हुआ । एक स्वराजी सदस्य ने यह प्रस्ताव पेश करना चाहा कि काकोरी के कैदियों के साथ विशेष बर्ताव किया जाये । परन्तु गर्वनर महोदय ने इस प्रस्ताव के पेश करने की इजाज़त ही नहीं दी । उस दिन के सवाल जवाब में यह भी मालूम हुआ कि काकोरी के मामले में सरकार दो लाख रूपये खर्च कर चुकी है । प्रान्त के कार्यकर्ताओं के पास यही एक अन्तिम अस्त्र था, जिससे वे काकोरी के अभियुक्तों के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते थे । किन्तु गवर्नर साहब की स्वेच्छाचारिता के कारण वह अस्त्र भी निष्फल हुआ। अनशन तो किसी प्रकार टूट गया, मगर विशेष अधिकार उन्हें अभी तक नसीब न हुये । पराधीन देश के पराधीन निवासियों के लिये जो कुछ हो जाय थोड़ा है । सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करने का निश्चय किया .. ..  जारी है 

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