वो कवितायें, जो मुझे प्रिय रही हैं !

अगस्त 6, 2009 को 12:48 पूर्वाह्न | Posted in अंतिम समय की बातें, आत्मकथा, खण्ड-4, चँद शेर | 14 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा.. “ वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहिये ।
सरकार ने अ्शफाक उल्ला को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया । अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान हो कर पक्के आर्यसमाजी और रामप्रसाद  के क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बन सकते है, तब क्या भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते ? “
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प्रस्तुतिकर्ता टिप्पणी : आगे के साढ़े तीन पृष्ठ स्व० हुतात्मा अमर बिस्मिल जी ने अपनी कुछ प्रिय कविताओं का स्मरण किया है, और आने वाली पीढ़ियों को समर्पित करते हुये, इन्हें उनकी थाती बताया है । काश, इनको वह स्थान दिया जाता । – डा० अमर

इस अँतिम घड़ी में, मेरी  यह  इच्छा  हो  रही  है कि मैं उन कविताओं में से भी चन्द का यहां उल्लेख कर दूं, जो  कि  मुझे  प्रिय  मालूम  होती है और मैंने यथा-समय  कंठस्थ की थीं । यह नवयुवकों को प्रेरणा प्रदान करे, प्रभु से यही प्रार्थना है !
– रामप्रसाद बिस्मिल

भूखे प्राण, तजै भले, के हरि खरू नहिं खाहिं ।
चातक प्यासे ही रहै, बिन स्वांती न अघाहिं ।।
बिन स्वांती न अघाहिं हंस मोती ही खावे ।
सती नारि पतिव्रता नेक नाह चित्त डिगावे ।।
तिमि प्रताप नहिं डिगे होंहि चहें सब किन रूखे ।
अरि सन्मुख नहिं नवें फिरै चहें बन-बन भूखे ।।

1

चाह नहीं है सुर बाला के गहनों में गूंथा जाउं ।
चाह नहीं है प्यारी के गल पड़ू हार मैं ललचाउं ।।
चाह नहीं है राजाओं के शव पर मैं डाला जाउं ।
चाह नहीं है देवों के सिर चढूं भाग्य पर इतराउं ।।
मुझे तोड़ कर हे बनमाली उस पथ में तू देना फेंक ।
मातृभूमि हित शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक ।।

2

भारत जननि तेरी जय हो विजय हो ।
तू शुद्ध और बुद्ध ज्ञान की आगार,
तेरी विजय सूर्य माता उदय हो ।।
हों ज्ञान सम्पन्न जीवन सुफल होवे,
सन्तान तेरी अखिल प्रेममय हो ।।
आयें पुनः कृष्ण देखें द्शा तेरी,
सरिता सरों में भी बहता प्रणय हो ।।
सावर के संकल्प पूरण करें ईश,
विध्न और बाधा सभी का प्रलय हो ।।
गांधी रहे और तिलक फिर यहां आवें,
अरविंद, लाला महेन्द्र की जय हो ।।
तेरे लिये जेल हो स्वर्ग का द्वार,
बेड़ी की झन-झन बीणा की लय हो ।।
कहता खलल आज हिन्दू-मुसलमान,
सब मिल के गाओं जननि तेरी जय हो ।।

3

कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
सुन्दर कली सेमर की देखी, सुअनाने मन मोहा ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
मारी चोंच भुआ जब देखा पटक-पटक शिर रोया ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
सुन्दर कली कमल की देखी, भंवरा का मन मोहा ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
सारी रैन सम्पुट में बीती, तड़प-तड़प जी खोया ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति । करके प्रीति० ।।

4

तू बह मये खूबी है अय जलवये जमाना ।
हर गुल है तेरा बुलबुल हर शमा है परवाना ।।
सर मस्ती में भी अपना साकी के कदम पर हो ।
इतना तो करम करना अय लगजिशे मस्ताना ।।
या रब इन्हीं हाथों से पीते रहें मस्ताना ।
या रब वहीं साकी हो या रब वही पैमाना ।।
आंखे है तो उसकी है किस्मत है तो उसकी है ।
जिसने तुझे देखा है अय जलवये जमाना ।।
छेड़ो न फिरिश्ते तुम जिक्र गमें जमाना ।
क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसाना ।।
यह चश्में हकीकी भी क्या तेरे सिवा देखें ।
मयकदे  से हमें मतलब कावा हो या बुतखाना ।।
साकी को अब दिखा देंगे अन्दाज फकीराना ।
टूटी हुई बोतल है  या  टूटा हुआ पैमाना ।।

5

मुर्गे दिल मत रो यहां आंसु बहाना है मना ।
अंदलीवों को कफस में चहचहाना है मना ।।
हाय जल्लादों तो देखो कह रहा सयाद यह ।
वक्त जिबहा बुलबुलों को तड़फड़ाना है मना ।।
वक्त जिबहा जानवर को देते हैं पानी पिला ।
हजरते इन्सान को पानी पिलाना है मना ।।
मेरे खूं से हाथ रंग कर बोले क्या अच्छा है रंग ।
अब हमें तो उम्र भर मेंहदी लगाना है मना ।।
अय मेरे जख्में जिगर नासूर बनना है तो बन ।
क्या करूं इस जखम पर मरहम लगाना है मना ।।
खूने दिल पीते है असगर खाते हैं लख्ते जिगर ।
इस कफस में कैदियों केा आबो दाना है मना ।।

6

अरूजे कामयाबी पर कभी तो हिन्दुस्तां होगा ।
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियां हेागा ।।
चखायेगे मजा बरबादिये गुलशन का गुलची को ।
बहार आयेगी उस दिन जब कि अपना बागवां होगा ।।
वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है ।
सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा ।।
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दें वतन हरगिज ।
न जाने बाद मुर्दन मैं कहां.. और तू कहां होगा ।।
यह आये दिन को छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे कातिल !
बता कब फैसला उनके हमारे दरमियां होगा ।।
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगें हर बरस मेले ।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।।

इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज्य देखेंगे ।
जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा ।।

7

इम्तहां सब का कर लिया हम ने,
सारे आलम को आजमा देखा ।
नजर आया न कोई यार जमाने में अज़ीज़,
आंख जिस की तरफ उठा देखा ।।
कोई अपना न निकला महरमे राज,
जिस को देखा सो बेवफा देखा ।।
अलग़रज सब को इस जमाने में,
अपने मतलब का आशना देखा ।।

8

फांसी की कोठरी है या, साधना की गुफा

मई 19, 2009 को 12:17 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, खण्ड-4, चँद शेर, फाँसी, सरफ़रोशी की तमन्ना | 11 टिप्पणियाँ
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फांसी की कोठरी
अन्तिम समय निकट है । दो फांसी की सजायें सिर पर झूल रहा है । पुलिस को साधारण जीवन में और समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी भर के कोसा है । खुली  अदालत  में  जज  साहब, खुफिया पुलिस  के  अफसर, मजिस्टेट, सरकारी  वकील  तथा  सरकार  को  खूब  आड़े  हाथों लिया है । हर एक के दिल में मेरी बातें चुभ रही है । कोई दोस्त अपना अथवा यार मददगार नहीं जिसका सहारा हो । एक परमपिता परमात्मा की याद है । गीता का पाठ करते हुए सन्तोष है कि

जो कुछ किया सो तै किया, मैं कुछ कीन्हा नाहिं ।
जहां कहीं कुछ मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ।।

ब्रह्मरण्या धाय कर्माणि संगंत्यक्त्वा करोति यः ।
लिश्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा ।।
  भगवद्गीता । 5।10
जो फल की इच्छा को त्यागकर के कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार जल में रहकर भी कमलपत्र जल में लिप्त नहीं होता । जीवन पर्यन्त जो कुछ किया, स्वदेश की भलाई समझ कर किया । यदि शरीर की पालना की तो इसी विचार से कि सु्दृढ़ शरीर से भले प्रकार स्वदेश सेवा हो सके । बड़े प्रयत्नों से यह शुभ दिन प्राप्त हुआ ।

संयुक्त प्रान्त में इस तुच्छ शरीर का ही सौभाग्य होगा, जो सन 1857 के गदर की घटनाओं के पश्चात क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्बन्ध में इस प्रान्त के निवासी का पहला बलिदान मातृवेदी पर होगा । सरकार की इच्छा है कि मुझे घोट-घोट कर मारें इसी कारण से इस गरमी की ऋतु में साढ़े तीन महीने बाद अपील की तारीख नियत की गई ।

साढ़े तीन महीने तक फांसी की कोठरी में भूंजा गया । यह कोठरी प़क्षी के पिंजरे से भी खराब हैं गोरखपुर जेल की फांसी की कोठरी मैदान में बनी है । किसी प्रकार की छाया निकट नहीं । प्रातःकाल आठ बजे से रात्रि के आठ बजे तक सूर्य देवता की कृपा से तथा चारों ओर रेतीली जमीन होने से अग्नि वर्षण होता है । नौ फीट लम्बी तथा नौ फीट चैड़ी कोठरी में केवल एक छः फीट लम्बा तथा दो फीट चौड़ा द्वार है । पीछे की ओर जमीन से आठ या नौ फीट की उंचाई पर, एक 2 फीट लम्बी 1 फीट चैड़ी खिड़की है । इसी कोठरी में भोजन, स्नान, मल-मूत्र तथा शयानादि होता है । मच्छड़ अपनी मधुर ध्वनि रात भर सुनाया करते है । बड़े प्रयन्त से रात्रि में तीन या चार घंटे निद्रा आती है, किसी किसी दिन एक दो घण्टे ही सो कर निर्वाह करना पड़ता है । मिटटी के पात्रों में भोजन दिया जाता है । ओढ़ने बिछाने को दो कम्बल मिले हैं । बड़े त्याग का जीवन है । साधना के सब साधन एकत्रित है । प्रत्येक क्षण शिक्षा दे रहा है – अन्तिम समय के लिये तैयार हो जाओ, परमात्मा का भजन करो ।

मुझे तो इस कोठरी में बड़ा आनन्द आ रहा है । मेरी इच्छा थी कि किसी साधु की गुफा पर कुछ दिन निवास कर के योगाभ्यास किया जाता । अन्तिम समय वह इच्छा भी पूर्ण हो गई साधु की गुफा न मिली तो क्या साधना की गुफा तो मिल गई, इसी  कोठरी  में  यह  सुयोग  प्राप्त  हो गया, कि  अपनी  कुछ  अन्तिम  बात  लिख  कर  देशवासियों  के  अर्पण  कर  दूं । सम्भव है मेरे जीवन के अध्ययन से किसी आत्मा का भला हो जावे । बड़ी कठिनता से यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ ।

महसूस हो रहे है वादे फना के झोकें ।
खुलने लगे हैं मुझ पर इसरार जिन्दगी के ।।
बारे अलम उठाया रंगे निशात देखा ।
आये नहीं हैं यूं ही अंदाज बेहिसी के ।।

वफ़ा पर दिल को सदके जान को नज़रे ज़फा कर दे ।
मुहब्बत में यह लाज़िम है कि जो कुछ हो फिदा कर दे ।।

अब तो यही इच्छा है-

बहे बहरे फ़ना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की।
कि भूखी मछलियां है जौहरे शमशीर कातिल की।।

किन्तु
समझ कर फूँकना इस को जरा ऐ दागे नाकामी ।
बहुत से घर भी हैं आबाद इस उजड़े हुये दिल से ।।

परिणाम
ग्यारह वर्ष पर्यन्त यथाशक्ति प्राणपण से चेष्टा करने पर भी हम अपने उद्देश्य में कहां तक सफल हुये ? क्या लाभ हुआ ? इस का विचार करने से कुछ अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा, क्योंकि हम ने लाभ हानि अथवा जय पराजय के विचार से क्रान्तिकारी दल में योग नहीं दिया था । हम ने जो कुछ किया वह अपना कर्तव्य समझ कर किया । कर्तव्य निर्णय  में  हमने  कहां  तक  बुद्धिमत्ता  से  काम  लिया, इस का विवेचन करना उचित जान पड़ता है । राजनैतिक दृष्टि से हमारे कार्यों का इतना ही मूल्य है कि कतिपय होनहार नवयुवकों के जीवन को कष्टमय बना कर नीरस कर दिया और उन्हीं में से कुछ ने व्यर्थ में जाने गंवाईं । कुछ धन भी खर्च किया ।

हिन्दू शास्त्र के अनुसार किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती, जिसका जिस विधि से जो काल होता है, वह उसी विधि समय पर ही प्राण त्याग करता है । केवल निमित्त मात्र कारण उपस्थित हो जाते हैं ।

लाखों भारतवासी महामारी, हैजे, ताउन इत्यादि अनेक प्रकार के रोगों में मर जाते हैं । करोड़ों दुर्भिक्ष में अन्न बिना प्राण त्यागते हैं तो उस का उत्तरदायित्व किस पर है ? रह गया धन का व्यय, सो इतना धन तो भले आदमियों के विवाहोत्सवों में व्यय हो जाता है । गणमान्य व्यक्तियों की तो केवल विलासिता की सामग्री  का  मासिक  व्यय  इतना  होगा, जितना  कि  हमने  एक  षडयन्त्र  के  निर्माण  में  व्यय  किया । हमलोगों को डाकू बता कर फांसी और काले पानी की सजायें दी गयी है ।
किन्तु हम समझते हैं कि वकील और डाक्टर हम से कहीं बड़े डाकू है । वकील डाक्टर दिन दहाड़े बड़े-बड़े तालुकेदारों की जायदादें लूट कर खा गये । वकीलों के चाटे हुये अवध के ताल्लुकेदारों को ढूंढ़े रास्ता भी नहीं दिखाई देता, और वकीलों को उंची अटटालिकायें उन पर खिलखिला कर हंस रही है । इसी प्रकार लखनउ में डाक्टरों के भी उंचे-उंचे महल बन गये । किन्तु इस समय राज्य  में  दिन  के  डाकुओं  की प्रतिष्ठा है । अन्यथा रात के साधारण डाकुओं में और दिन के इन डाकुओं वकीलों तथा डाक्टरों में कोई भेद नहीं है । दोनों अपने-अपने मतलब के लिये बुद्धि की कुशलता से प्रजा का धन लूटते है ।

 

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