श्री रामप्रसाद बिस्मिल

अगस्त 25, 2009 को 1:12 पूर्वाह्न | Posted in 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, विशेष परिचय | 6 टिप्पणियाँ
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अमर शहीद की अँतिम नोट से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड ’ विशेष परिचय’ का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि, स्व० बिस्मिल के बलिदान के उपराँत यह खण्ड उनके मित्र श्री शिव वर्मा ने अपने अग्रज श्री भगवतीचरण वर्मा के सहयोग से इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व लिखा होगा । वर्णित घटनाक्रम की जीवँतता को देखते हुये, ऎसा प्रतीत होता है  कि  बिस्मिल जी  के  दल  के  सँग  जुड़े किसी  अज्ञात  सहयोगी ने  भी  इसे  प्रस्तुत  करने  में  भरपूर मार्गदर्शन किया है ।  टिप्पणी निवेदन – डा. अमर कुमार

पराधीनता के इस युग में दिव्य आलोक को धारण कर न जाने वे कहां से आये, अपने कल्पना राज्य में स्वर्गलोक की वीथियों का निर्माण किया और अन्त में विश्व को आभा की एक झलक दिखा कर अपने प्यारे मालिक के पास चले गये | उस दिन विश्व ने विमुग्ध नेत्रों से उनकी ओर देखा, श्रद्धा और भक्ति के फूल भी चढ़ाये । उस दिन जब उस मोहिनी मूर्ति की मद भरी आंखें सदा के लिये बन्द हो गई थीं, तो  उनकी  एक  झलक  मात्र  के  लिये  जनसमूह  पागल  सा  हो  उठा  था । धनिकों ने रूपये लुटायें, मेवे वालों ने मेवा से सत्कार किया, माता ओर बहिनों ने छतों पर से फूलों की वर्षा की और जनता ने वन्दे मातरम के उच्च निनाद के  साथ  उसका  स्वागत  किया, उस  प्यारे  के  उस  दिन  वाले उसके  निराले  वेष  को  देख  कर  मातायें  रो पड़ी, वृद्ध  सिसकियां  लेने  लगे, युवकों  के  तरूण  हृदय प्रतिहिंसा की आग से जल उठे और बालक झुक-झुक कर प्रणाम करने लगे ।

मैनपुरी जिले के किसी गांव में संवत 1954 के लगभग आप का जन्म हुआ था, किन्तु बाद में आप के पिता मुरलीधर सपरिवार शाहजहांपुर में आकर रहने लगे और अन्त तक यही स्थान हमारे चरित्र बालक का लीला क्षेत्र रहा । अस्तु उर्दू की शिक्षा पाने के बाद माता -पिता ने स्थानीय अंग्रेजी स्कूल में भर्ती करा दिया था । उन दिनों आपका जीवन कुछ विषेश अच्छा न था, किन्तु इसी बीच में आर्य समाज के प्रसिद्ध स्वामी सोमदेव से आपका परिचय हो गया । बस यहीं से जीवन ने पलटा खाया और वे स्वामी जी के साथ-साथ आर्यसमाज के भी भक्त बन गए । आप स्वामी जी को गुरूजी कहा करते थे । यह भी कहा था कि देश सेवा के भाव पहले-पहल आपको स्वामी जी से ही मिले थे । अस्तु सन 1915 के विराट  विप्लवायोजन  में  विफल  हो  जाने  के  बाद  भी  क्रान्तिकारी  लोग  एकदम निरा्श  न  हुए, वरन उन्होंने मैनपुरी में केन्द्र बनाकर फिर से कार्य आरम्भ कर दिया । श्री गेंदालाल दीक्षित की अध्यक्षता में बहुत दिनों तक काम होते रहने के बाद अन्त में इसका भी भेद खुल गया और फिर गिरफतारियों का बाजार गर्म हो उठा । दल के बहुत से लोगों के पकड़े जाने पर भी मुख्य कार्यकर्ताओं में से कोई भी हाथ न आ सका ।  उस  समय  आप  अंग्रेजी  की  दसवीं  कक्षा  में  थे, जोरों  से  धरपकड़  होते  देख  अपनी गिरफ़्तारी का हाल सुनकर आप फरार हो गये ।

मैनपुरी विप्लव दल के नेता श्री गेंदालाल के ग्वालियर में गिरफ़्तारी हो जाने पर, उन्हें जेल  से  छुड़ाने के विचार से आपने 19 वर्ष  की  अवस्था  में  अपने  साथ  के  पन्द्रह  और  विद्यार्थियों को लेकर पहली डकैती की थी । इस पहले ही प्रयास में उन्होंने जिस दृढ़ता तथा साहस से काम लिया था, उसे देख कर यह कहना पड़ता है कि वे स्वभाव से ही मनु्ष्यों के नेता थे । प्रायः  सभी  अनुभवी  सदस्य  पकड़े  जा चुके थे । अस्तु स्कूल के पन्द्रह विद्यार्थियों को लेकर ही आप अपने निश्चय पर चल दिये, पिता  से  कहा-मेरे एक मित्र की शादी है, वे गाड़ी लेकर जाना चाहते है । गाड़ीवान उन्हीं का रहेगा और मुझे भी उसमें जाना पड़ेगा । सरल स्वभाव पिता ने गाड़ी दे दी । उन्हें क्या पता कि यह कैसी शादी है ।

सन्ध्या समय प्रस्थान कर कुछ रात बीतने पर एक स्थान पर गाड़ी रोक दी गई । निश्चित स्थान वहां से करीब 10 मील की दूरी पर था । एक आदमी को गाड़ी पर छोड़कर शेष सभी ही साथी पैदल ही चल दिये । किन्तु उस दिन अंधेरे में मार्ग भूल जाने से वह गांव न मिला । निराश हो सब के सब गाड़ी के पास वापस आए, दूसरे दिन थोड़े ही प्रयास के बाद वह स्थान मिल गया ।  अंधेरी  रात  में  चारों ओर  निस्तब्धता का  राज्य था । निद्रा के  मोहक  जाल  में  सारा  संसार  वेसुध  सोया  पड़ा  था, तीन  लड़कों  को  मकान  की  छत  पर चढ़ने की आज्ञा हुई । लाड़ प्यार से पाले गये स्कूल के उन लड़कों ने कभी भी ऐसे भयानक कार्य में भाग लिया था देर करते देख कप्तान ने जोर से कहा – यदि ऐसा ही था तो चले ही क्यों थे । इस बार साहस कर वे लोग मकान की छत पर चढ़ गये आज्ञा हुई अन्दर कूद कर दरवाजा खोल दो । किन्तु यह काम और भी कठिन था । कप्तान ने फिर कहा जल्दी करो देर करने से विपद की सम्भावना है । इसी प्रकार तीन बार कहने पर भी कोई नीचे न उतर सका ।

वे लोग इधर-उधर देख ही रहे थे कि एक जोर की आवाज के साथ बन्दूक की गोली से एक का साफा नीचे आ गिरा । इस बार तीनों बिना कुछ सोचे विचारे मकान में कूद पड़े और अन्दर से मकान का दरवाजा खोल दिया । सब लोगों को यथा स्थान खड़ा कर स्वयं छत पर आदेश देने लगे । डकैती समाप्त भी न हो पाई थी कि गांव में खबर हो गई और चारों ओर से ईंटे चलने लगी । यह देख कर लड़के घबरा गए ।  आप ने पुकार कर कहा तुम लोग अपना काम करते रहो, यदि कोई भी काम से हटा तो मेरी गोली का निशाना बनेगा । इस में एक ने नीचे से पुकार कर कहा – कप्तान ईंटों के कारण कुछ करते नहीं बनता है । आप ने जिस ओर से ईंटें आ रही थी, उधर जाकर कहा-ईटें बन्द कर दो वरना गोली से मारे जाओगे । इतने में एक ईंट आंख पर आकर लगी, देखते -देखते कपड़े खून से तर हो गए उस समय उस साहसी वीर ने आंख की कुछ परवा न कर गोली चलाना षुरू कर दिया, फायरों के बाद ईंटे बन्द हो गई । इधर डकैती भी खत्म हो चुकी थी । अस्तु सब लोग वापस चल दिये ।

पहले दिन के थके तो थे ही आधी दूर चलकर ही प्रायः सब लोग बैठने लगे । बहुत कुछ साहस बांधने पर उठकर चले ही थे कि एक विद्यार्थी बेहोश होकर गिर गया । कुछ देर बाद होश आने के बाद उसने सबसे कहा – मुझ में अब चलने की शक्ति नहीं है तुम लोग मेरे लिये अपने आपको संकट में क्यों फंसाते हो । मेरा सर काट कर लेते जाओ । अभी कुछ रात बाकी है तुम लोग आसानी से पहुंच सकते हो । सर काट लेने पर मुझे कोई भी पहचान न सकेगा । और इस प्रकार सब लोग बच सकोगे । साथी की इस बात से सबकी आंखों में आंसू आ गये ।

चोट लगने के कारण उस समय हमारे नायक की आंख से काफी खून निकल चुका था, किन्तु फिर भी और लोगों से आगे चलने को कहकर आपने उसे अपनी पीठ पर उठाया और ज्यों त्यों कर चल दिये । जिस स्थान पर गाड़ी खड़ी थी, उसके थोड़ी दूर रह जाने पर आपने विद्यार्थी को एक पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं गाड़ी के पास जाकर जो एक आदमी उसकी निगरानी के लिये रह गया था उसे साथी को लेने के लिये भेजा मकान पर पिता के पूछने पर कह दिया बैल बिगड़ गये, गाड़ी  उलट  गई  और मेरे चोट आ गई ।

जिस समय फरार होकर आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते फिर रहे थे, उस समय की कथा भी बड़ी करूणाजनक है । उस बीच में कई बार आपको मौत का सामना करना पड़ा था । उस दिन तो पास में पैसा न रह जाने के कारण आपने घास तथा पत्तियां खाकर ही अपने जीवन का  निर्वाह किया था । नेपाल तथा आगरा तथा राजपूताना आदि स्थानों में घूमते रहने के बाद एक दिन अखबार में देखा कि सरकारी ऐलान में आप पर से भी वारण्ट हटा लिया गया था, बस  फिर  आप  घर  वापस  आ गए  और रेशम के सूत का कारखाना खोलकर कुछ दिन तक आप घर का काम काज देखते रहे । किन्तु जिस हृदय में एक बार आग लग चुकी, उसे फिर चैन कहां । अस्तु – फिर  से  दल  का  संगठन  प्रारम्भ  कर दिया । क्रमश: अगली कड़ी में

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6 टिप्पणियाँ »

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  1. बिस्मिल जी के पूर्ण परिचय की अगली कड़ी का इंतिजार रहेगा ..!!

  2. “होनहार बिरवान के होत चीकने पात” आगे की कथा का इंतज़ार है…

  3. वन्दे मातरम !

  4. inka ahsan hum kabhi nahi bhul sakte ,par phir bhi lagta hai ki aaj un jaise naujwan bahoot kam hai .ham to roye bina nahi rah pate ,jab unke bare me sochte hai.
    sabhi se pratna hai.apne baccho ko inke bare me jayda se jyada batae.aaj bacche spiderma superman adi ke bare me jante hai par kya in ke bare me bo utna jante hai jitna janna chaheye.

    gouri pandit

  5. कैसे थे वे लोग. और अब कहाँ पहुँच गए हम .खैर सरफरोसी गा लेते हैं यही क्या कम है ?
    आगे का हमेशा इन्तेज़ार रहता है .

  6. bismil ji ki pankityan…
    hef hum ki taiyar the jis pr mr jane ko,
    jite ji chhudaya humne usi kasane ko…..

    jinhone poora sesh chhuda dia….
    aaj hum apni seema nahi bandh pa rahe hain…
    ghar ghar miain aantanki janma le chike,
    poora desh wikash ki daur main laga hai,
    mahashakti banne wala hai…

    magar ghar baarood se bhar gaya hai…

    amar shaheedon ka swabhimaan roota hai,
    mere desh ka ek-ek jawan roota hai..
    ek taar bhee seema pr bandh na sake hum,
    shadeedon ka azaad hinduston rota hai..

    AMAR SHADEEDON KO SALAM.
    Madan Pandey ‘shikhar’


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