श्री रामप्रसाद बिस्मिल

अगस्त 25, 2009 को 1:12 पूर्वाह्न | 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, विशेष परिचय में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ
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अमर शहीद की अँतिम नोट से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड ’ विशेष परिचय’ का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि, स्व० बिस्मिल के बलिदान के उपराँत यह खण्ड उनके मित्र श्री शिव वर्मा ने अपने अग्रज श्री भगवतीचरण वर्मा के सहयोग से इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व लिखा होगा । वर्णित घटनाक्रम की जीवँतता को देखते हुये, ऎसा प्रतीत होता है  कि  बिस्मिल जी  के  दल  के  सँग  जुड़े किसी  अज्ञात  सहयोगी ने  भी  इसे  प्रस्तुत  करने  में  भरपूर मार्गदर्शन किया है ।  टिप्पणी निवेदन – डा. अमर कुमार

पराधीनता के इस युग में दिव्य आलोक को धारण कर न जाने वे कहां से आये, अपने कल्पना राज्य में स्वर्गलोक की वीथियों का निर्माण किया और अन्त में विश्व को आभा की एक झलक दिखा कर अपने प्यारे मालिक के पास चले गये | उस दिन विश्व ने विमुग्ध नेत्रों से उनकी ओर देखा, श्रद्धा और भक्ति के फूल भी चढ़ाये । उस दिन जब उस मोहिनी मूर्ति की मद भरी आंखें सदा के लिये बन्द हो गई थीं, तो  उनकी  एक  झलक  मात्र  के  लिये  जनसमूह  पागल  सा  हो  उठा  था । धनिकों ने रूपये लुटायें, मेवे वालों ने मेवा से सत्कार किया, माता ओर बहिनों ने छतों पर से फूलों की वर्षा की और जनता ने वन्दे मातरम के उच्च निनाद के  साथ  उसका  स्वागत  किया, उस  प्यारे  के  उस  दिन  वाले उसके  निराले  वेष  को  देख  कर  मातायें  रो पड़ी, वृद्ध  सिसकियां  लेने  लगे, युवकों  के  तरूण  हृदय प्रतिहिंसा की आग से जल उठे और बालक झुक-झुक कर प्रणाम करने लगे ।

मैनपुरी जिले के किसी गांव में संवत 1954 के लगभग आप का जन्म हुआ था, किन्तु बाद में आप के पिता मुरलीधर सपरिवार शाहजहांपुर में आकर रहने लगे और अन्त तक यही स्थान हमारे चरित्र बालक का लीला क्षेत्र रहा । अस्तु उर्दू की शिक्षा पाने के बाद माता -पिता ने स्थानीय अंग्रेजी स्कूल में भर्ती करा दिया था । उन दिनों आपका जीवन कुछ विषेश अच्छा न था, किन्तु इसी बीच में आर्य समाज के प्रसिद्ध स्वामी सोमदेव से आपका परिचय हो गया । बस यहीं से जीवन ने पलटा खाया और वे स्वामी जी के साथ-साथ आर्यसमाज के भी भक्त बन गए । आप स्वामी जी को गुरूजी कहा करते थे । यह भी कहा था कि देश सेवा के भाव पहले-पहल आपको स्वामी जी से ही मिले थे । अस्तु सन 1915 के विराट  विप्लवायोजन  में  विफल  हो  जाने  के  बाद  भी  क्रान्तिकारी  लोग  एकदम निरा्श  न  हुए, वरन उन्होंने मैनपुरी में केन्द्र बनाकर फिर से कार्य आरम्भ कर दिया । श्री गेंदालाल दीक्षित की अध्यक्षता में बहुत दिनों तक काम होते रहने के बाद अन्त में इसका भी भेद खुल गया और फिर गिरफतारियों का बाजार गर्म हो उठा । दल के बहुत से लोगों के पकड़े जाने पर भी मुख्य कार्यकर्ताओं में से कोई भी हाथ न आ सका ।  उस  समय  आप  अंग्रेजी  की  दसवीं  कक्षा  में  थे, जोरों  से  धरपकड़  होते  देख  अपनी गिरफ़्तारी का हाल सुनकर आप फरार हो गये ।

मैनपुरी विप्लव दल के नेता श्री गेंदालाल के ग्वालियर में गिरफ़्तारी हो जाने पर, उन्हें जेल  से  छुड़ाने के विचार से आपने 19 वर्ष  की  अवस्था  में  अपने  साथ  के  पन्द्रह  और  विद्यार्थियों को लेकर पहली डकैती की थी । इस पहले ही प्रयास में उन्होंने जिस दृढ़ता तथा साहस से काम लिया था, उसे देख कर यह कहना पड़ता है कि वे स्वभाव से ही मनु्ष्यों के नेता थे । प्रायः  सभी  अनुभवी  सदस्य  पकड़े  जा चुके थे । अस्तु स्कूल के पन्द्रह विद्यार्थियों को लेकर ही आप अपने निश्चय पर चल दिये, पिता  से  कहा-मेरे एक मित्र की शादी है, वे गाड़ी लेकर जाना चाहते है । गाड़ीवान उन्हीं का रहेगा और मुझे भी उसमें जाना पड़ेगा । सरल स्वभाव पिता ने गाड़ी दे दी । उन्हें क्या पता कि यह कैसी शादी है ।

सन्ध्या समय प्रस्थान कर कुछ रात बीतने पर एक स्थान पर गाड़ी रोक दी गई । निश्चित स्थान वहां से करीब 10 मील की दूरी पर था । एक आदमी को गाड़ी पर छोड़कर शेष सभी ही साथी पैदल ही चल दिये । किन्तु उस दिन अंधेरे में मार्ग भूल जाने से वह गांव न मिला । निराश हो सब के सब गाड़ी के पास वापस आए, दूसरे दिन थोड़े ही प्रयास के बाद वह स्थान मिल गया ।  अंधेरी  रात  में  चारों ओर  निस्तब्धता का  राज्य था । निद्रा के  मोहक  जाल  में  सारा  संसार  वेसुध  सोया  पड़ा  था, तीन  लड़कों  को  मकान  की  छत  पर चढ़ने की आज्ञा हुई । लाड़ प्यार से पाले गये स्कूल के उन लड़कों ने कभी भी ऐसे भयानक कार्य में भाग लिया था देर करते देख कप्तान ने जोर से कहा – यदि ऐसा ही था तो चले ही क्यों थे । इस बार साहस कर वे लोग मकान की छत पर चढ़ गये आज्ञा हुई अन्दर कूद कर दरवाजा खोल दो । किन्तु यह काम और भी कठिन था । कप्तान ने फिर कहा जल्दी करो देर करने से विपद की सम्भावना है । इसी प्रकार तीन बार कहने पर भी कोई नीचे न उतर सका ।

वे लोग इधर-उधर देख ही रहे थे कि एक जोर की आवाज के साथ बन्दूक की गोली से एक का साफा नीचे आ गिरा । इस बार तीनों बिना कुछ सोचे विचारे मकान में कूद पड़े और अन्दर से मकान का दरवाजा खोल दिया । सब लोगों को यथा स्थान खड़ा कर स्वयं छत पर आदेश देने लगे । डकैती समाप्त भी न हो पाई थी कि गांव में खबर हो गई और चारों ओर से ईंटे चलने लगी । यह देख कर लड़के घबरा गए ।  आप ने पुकार कर कहा तुम लोग अपना काम करते रहो, यदि कोई भी काम से हटा तो मेरी गोली का निशाना बनेगा । इस में एक ने नीचे से पुकार कर कहा – कप्तान ईंटों के कारण कुछ करते नहीं बनता है । आप ने जिस ओर से ईंटें आ रही थी, उधर जाकर कहा-ईटें बन्द कर दो वरना गोली से मारे जाओगे । इतने में एक ईंट आंख पर आकर लगी, देखते -देखते कपड़े खून से तर हो गए उस समय उस साहसी वीर ने आंख की कुछ परवा न कर गोली चलाना षुरू कर दिया, फायरों के बाद ईंटे बन्द हो गई । इधर डकैती भी खत्म हो चुकी थी । अस्तु सब लोग वापस चल दिये ।

पहले दिन के थके तो थे ही आधी दूर चलकर ही प्रायः सब लोग बैठने लगे । बहुत कुछ साहस बांधने पर उठकर चले ही थे कि एक विद्यार्थी बेहोश होकर गिर गया । कुछ देर बाद होश आने के बाद उसने सबसे कहा – मुझ में अब चलने की शक्ति नहीं है तुम लोग मेरे लिये अपने आपको संकट में क्यों फंसाते हो । मेरा सर काट कर लेते जाओ । अभी कुछ रात बाकी है तुम लोग आसानी से पहुंच सकते हो । सर काट लेने पर मुझे कोई भी पहचान न सकेगा । और इस प्रकार सब लोग बच सकोगे । साथी की इस बात से सबकी आंखों में आंसू आ गये ।

चोट लगने के कारण उस समय हमारे नायक की आंख से काफी खून निकल चुका था, किन्तु फिर भी और लोगों से आगे चलने को कहकर आपने उसे अपनी पीठ पर उठाया और ज्यों त्यों कर चल दिये । जिस स्थान पर गाड़ी खड़ी थी, उसके थोड़ी दूर रह जाने पर आपने विद्यार्थी को एक पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं गाड़ी के पास जाकर जो एक आदमी उसकी निगरानी के लिये रह गया था उसे साथी को लेने के लिये भेजा मकान पर पिता के पूछने पर कह दिया बैल बिगड़ गये, गाड़ी  उलट  गई  और मेरे चोट आ गई ।

जिस समय फरार होकर आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते फिर रहे थे, उस समय की कथा भी बड़ी करूणाजनक है । उस बीच में कई बार आपको मौत का सामना करना पड़ा था । उस दिन तो पास में पैसा न रह जाने के कारण आपने घास तथा पत्तियां खाकर ही अपने जीवन का  निर्वाह किया था । नेपाल तथा आगरा तथा राजपूताना आदि स्थानों में घूमते रहने के बाद एक दिन अखबार में देखा कि सरकारी ऐलान में आप पर से भी वारण्ट हटा लिया गया था, बस  फिर  आप  घर  वापस  आ गए  और रेशम के सूत का कारखाना खोलकर कुछ दिन तक आप घर का काम काज देखते रहे । किन्तु जिस हृदय में एक बार आग लग चुकी, उसे फिर चैन कहां । अस्तु – फिर  से  दल  का  संगठन  प्रारम्भ  कर दिया । क्रमश: अगली कड़ी में

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कालकोठरी के गीत और अँतिम नोट

अगस्त 15, 2009 को 2:15 पूर्वाह्न | अंतिम समय की बातें, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था, फाँसी में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ
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अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी में गाये जाने वाले गीतों का उल्लेख करते हुये एक अँतिम नोट राष्ट्रवासियों के नाम दिया है, जो कि स्वगत कथन जैसा ही है । – प्रस्तुतकर्ता : डा० अमर कुमार की टिप्पणी

अलीपुर बम्ब केस के अभियुक्तों के काले पानी जाते समय, श्री ओमप्रकाश जी  के उदगार जिनको मैं काल कोठरी के अन्दर गाया करता था । साथ ही अन्य कवितायें और अशरार मैं लिपिबद्ध कर रहा हूँapna kuchh am

हैफ जिस पै कि हम तैयार थे मर जाने को ।
यकायक हम से छुड़ाया उसी काशाने को ।।
आस्मां क्या यही बाकी था गजब ढाने को ।
लाके गुर्बत में जो रक्खा हमें तड़फाने को ।।
क्या कोई और बहाना न था तरसाने को ।। 1।।

फिर न गुलशन में हमें लायेगा सयाद कभी ।
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फरियाद कभी ।।
याद आयेगा किसे यह दिले नाशाद कभी ।
हम भी इस बाग में थे कैद से आजाद कभी ।।
अब तो काहे को मिलेगी यह हवा खाने को ।।2।।

दिल फिदा करते है कुर्बान जिगर करते हैं ।
पास जो कुछ है वह माता की नजर करते है ।।
खाने वीरान कों देखिये घर करते हैं ।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते है ।।
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को ।।3।।

देखिये कब यह असीराने मुसीबत छूटें ।
मादरेहिन्द के अब भाग खुलें या फूटें ।।
देश सेवक सभी अब जेल में मूंजे कूटें ।
आप यहां ऐश से दिन रात बहारें लूटें ।।
क्यों न तरजीह दें इस जीने से मर जाने को ।।4।।

कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी ।
जिन्दगी भर को हमें भेज दे कालेपानी ।।
मुंह में जल्लाद हुए जाते है छाले पानी ।।
आबे खंजर का पिला करके दुआले पानी ।।
मर न क्यों जाये हम इस उम्र के पैमाने को ।।5।।

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर ।
हमको भी पाला था मां बाप ने दुख सह सह कर ।।
वक्ते रूखसत उन्हें इतना भी न आये कहकर ।
गोद में आंसू कभी टपके जो रूख से बहकर ।।
तिफल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को ।।6।।

देश सेवा का ही बहता है लहू नस नस में ।
अब तो खा बैठे है चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ।।
सरफरोशी की अदा होती है यों ही रसमें ।
भाई खंजर से गले मिलते है सब आपस में ।।
बहिनें तैयार चिताओं में है जल जाने को ।।7।।

नौजवानों जो तबियत में तुम्हारी खट के ।
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ।।
आप के आज बदन होवें जुदा कट कट के ।
और सद चााक हो माता का कलेजा फटके ।।
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को ।।8।।

अपनी किस्मत में अजल से ही सितम रखा था ।
रंज रक्खा था महिन रक्खा था गम रक्खा था ।।
किसको परवाह थी और किसमें यह दम रक्खा था।
हमने जब बादिये गुरवत में कदम रखा था ।।
दूर तक यादे वतन आई थी समझाने को ।।9।।

अपना कुछ गम नहीं लेकिन यह ख्याल आता है ।
मादरे हिन्द पे कब तक जवाल आता है ।।
हरदयाल आता है योरूप से न अजीत आता है ।
कौम अपनी पै तो रो रो के मलाल आता है ।।
मुन्तजिर रहते है हम खाक में मिल जाने को ।।10।।

मैकदा किसका है यह जाने सबू किस का है ।
वार किसका है मेरी जां यह गुलू किसका है ।।
जो बहे कौम की खातिर वह लहू किस का है ।
आसमां साफ बता दे तू उदू किस का है ।।
क्यों नये रंग बदलता है यह तड़फाने को ।। 11।।

दर्द मन्दों से मुसीबत की हवालत पूछो ।
मरने वालों से जरा लुत्फ शहादत पूछो ।।
चश्में मुश्ताक से कुछ दीद की हसरत पूछो ।
सोज कहते हैं किसे पूछो तो परवाने को ।।12।।

बात तो जब है कि इस बात की जिदें ठाने ।
देश के वास्ते कुर्बान करें सब जाने ।।
लाख समझायें कोई एक न उसकी माने ।
कहता है खून से मत अपना गरेबां साने ।।
नासहा आग लगे तेरे इस समझाने को ।।13।।

न मयस्सर हुआ गहत में कभी मेल हमें ।
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें ।।
एक दिन को भी न मंजूर हुई बेल हमें ।
याद आयेगा बहुत लखनउ का जेल में ।।
लोग तो भूल ही जायेंगे इस अफसाने को ।।14।।

अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली ।
एक होती है फकीरों की हमेशा बोली ।।
खून से फाग रचायेगी हमारी टोली ।
जब से बंगाल में खेले है कन्हैया होली ।।
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को ।।15।।

नौजवानों यही मौका है उठो खुल खेलों ।
खिदमते कौम में जो आवे बला तुम झेलो ।।
देश के सदके में माता को जवानी दे दो ।
फिर मिलेगा न ये माता की दुआयें ले लो ।
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने की ।।16।।

aankh ka noor hoon

न किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का करार हूं ।
जो किसी के काम न आ सकूं वह मैं एक मुश्ते गुबार हूं ।।
न दवायें दर्दें जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नजर हूं मै ।
न इधर हूं मैं न उधर हूं मैं न शकेव हूं न करार हूं ।।
मैं नहीं हूं नरामये जां फिजां मेरा सुन के कोई करेगा क्या ।
मैं बड़े वियोगा की हूं सदा ओ बड़े दुखी की पुकार हूं ।।
न मैं किसी का हूं दिलरूबा न किसी के दिल में बसा हुआ ।
मैं जमीं की पीठ का बोझ हूं औ फलक के दिल का गुबार हूं ।।
मेरा बखत मुझ से बिछड़ गया मेरा रंग रूप बिगड़ गया ।
जो चमन खिजां से उजड़ गया  मैं उसी की फसले बहार हूं ।।
पये फातिहा कोई आये क्यों कोई खामा लाके जलाये क्यों ।
कोई चार फूल चढ़ाये क्योंकि मैं बेकसी का मजार हूं ।।
न अखतर से अपना हबीब हूं न अखतरों का रकीब हूं ।
जो बिगड़ गया वह नसीब हूं जो उजड़ गया वह दयार हूं ।।

इसके आगे श्रद्धेय हुतात्मा ने 11 अन्य रचनायें भी दी हैं, जो एक सँकलन के रूप में पृष्ठ चँद राष्ट्रीय अशआर और कवितायें पर दी जा रही हैं । ऎसा इस कड़ी के प्रवाह के दृष्टिगत किया गया है डा० अमर

Flying_bird परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है । मैं तो अपना कार्य कर चुका । मैने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकाल कर भारतवासियों को  दिखला  दिया, जो  सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ । अब किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिये कि मुसलमानों पर विश्वास न करना चाहिये । पहला तजर्बा था जो पूरी तौर से कामयाब हुआ ।

अब देशवासियों से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फांसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिये कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक दल एक हो कर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें । जो कांग्रेस तय करें, उसे  सब  पूरी  तौर  से  मानें  और  उस  पर  अमल करें । ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत दूर न होगा जब कि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की मांग के सामने  सिर  झुकाना  पड़े, और  यदि  ऐसा  करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों की मांग के सामने सिर झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तबतो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जावेगा ।

हिंदू-मुसलिम एकता ही हम लोगों की यादगार तथा अन्तिम इच्छा है, चाहे  वह  कितनी  कठिनता से क्यों न हो । जो मैं कह राहा हूं वही श्री अशफ़ाक उल्ला खां बारसी का भी मत है, क्योंकि  अपील  के समय हम दोनों लखनउ जेल में फांसी की कोठरियों में आमने सामने कई दिन तक रहे थे । आपस में हर तरह की बातें हुई थी । गिरफतारी के बाद से हम लोगों की सजा पड़ने तक श्री अशफ़ाक उल्ला खां की बड़ी उत्कट इच्छा यही थी, कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा ने पूरी कर दी ।

श्री अशफ़ाक उल्ला खां तो अंग्रेजी सरकार से दया प्रार्थना करने पर राजी ही न थे । उन का तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबन्द करीम के अलावा किसी दूसरे से दया की प्रार्थना न करना चाहिय, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने सरकार से दया प्रार्थना की थी । इसका  दोषी  मैं  ही  हूं, जो  अपने  प्रेम  के  पवित्र  अधिकारों  का  उपयोग  करके  श्री अशफ़ाकउल्ला खां को उन के दृढ़ निश्चय से विचलित किया । मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ द्वितीया के अवसर पर गोरखपुर जेल से श्री अशफ़ाक को पत्र लिख कर क्षमा प्रार्थना की थी । परमात्मा जाने  कि  वह  पत्र  उनके  हाथों  तक  पहुंचा भी या नही, खैर !

परमात्मा की  ऐसी  ही  इच्छा थी  कि  हम  लोगों  को  फांसी  दी  जावे, भारतवासियों  के जले हुये दिलों पर नमक पड़े, वे  बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उन के कार्य को देख कर सुखी हों । जब हम नवीन शरीर धारण कर के देशसेवा में योग देने को उद्यत हों, उस समय तक भारतवर्श की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई हो । जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जावे । ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जावें ।

प्रीवीकौंसिल में अपील भिजवा कर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया उसका भी एक विशेष अर्थ था । सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु दण्ड उपयुक्त दण्ड नहीं । क्योंकि न जाने किस की गोली से आदमी मारा गया । अगर डकैती डालने की जिम्मेवारी के ख्याल से मृत्युदण्ड दिया गया तो चीफ कोर्ट के फैसले के अनुसार भी मैं ही डकैतियों का  जिम्मेदार  तथा  नेता  था, और  प्रान्त  का  नेता  भी  मैं  ही  था  अतएव  मृत्यु दण्ड  तो अकेला मुझे ही मिलना चाहिए था । अतः तीन को फांसी नहीं देना चाहिये था । इसके अतिरिक्त दूसरी सजायें सब स्वीकार होती । पर ऐसा क्यों होने लगा ?

मैं विलायती न्यायालय की भी परीक्षा कर के स्वदेशवासियों के लिए उदाहरण छोड़ना चाहता  था, कि  यदि  कोई  राजनैतिक  अभियोग  चले  तो  वे  कभी  भूल  करके  भी  किसी अंग्रेजी अदालत का विश्वास न करें । तबियत आये तो जोरदार बयान दें । अन्यथा मेरी तो यही राय है कि अंग्रेजी अदालत के सामने न तो कभी कोई बयान दें और न कोई सफाई पेश करें । काकोरी षडयन्त्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें । इस अभियोग में सब प्रकार के उदाहरण मौजूद है ।

प्रीवीकौंसिल में अपील दाखिला कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख हटवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है, और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इस में मुझे बड़ी निराशा पूर्ण असफलता हुई । अन्त में मैने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूँ । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीनों फांसी वालों की फांसी की सजा माफ कर देनी पड़ेगी, और यदि न करते तो मैं करा लेता ।

मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु  बाहर  से  कोई   सहायता  न  मिल  सकी  यही   तो  हृदय  पर  आघात  लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी  दल खड़ा  किया  था, वहां  से  मुझे  प्राणरक्षा  के  लिये  एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं । फांसी  पाने  का  मुझे  कोई  भी  शोक  नहीं  क्योंकि  मैं  इस  नतीजे  पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था ।

मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो  अधिक  उपयोगी  सिद्ध हेागी ।

परिस्थिति  अनुकूल  न  होने  से  ऐसे  आन्दोलनों  से  अधिकतर  परिश्रम  व्यर्थ  जाता  है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।
देशवासियों  से  यही  अन्तिम  विनय  है  कि  जो  कुछ  करें, सब  मिल  कर  करें, और  सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।।

रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल
१५ दिसम्बर १९२७ ई०
 

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