गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।

जुलाई 21, 2009 को 11:30 अपराह्न | Posted in अंतिम समय की बातें, आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4 | 5 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा.. “ यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है । “  अब आगे..

शतरंज  के  खेलने  वाले  भली-भांति  जानते  है  कि  आवश्यकता  होने  पर  किस  प्रकार  अपने  मोहरे  भी मरवा  देना  पड़ते  है । बंगाल  आर्डिनेन्स  के  कैदियों  के  छोड़ने  या  उन  पर  खुली  अदालत  में  मुकदमा चलाने  के  प्रस्ताव  जब  एसेम्बली  में  पेश  किये  गये,  तो  सरकार   की   ओर   से   बड़े   जोरदार   शब्दों   में   कहा  गया   कि, सरकार  के   पास  सबूत   मौजूद   है । खुली   अदालत   में   अभियोग  चलाने   से   गवाहों  पर  आपत्ति  आ सकती है ।

आर्डिनेन्स के कैदियों के छोड़ने या उन पर खुली अदालत में मुकदमा चलाने के प्रस्ताव जब ऐसेम्बली में पेश किये गये, तो सरकार की ओर से बड़े जोरदार शब्दों में कहा गया कि सरकार के पास पूरा सबूत मौजूद है इसलिये खुली अदालत में अभियोग चलाने से गवाहों पर आपत्ति आ सकती है । यदि आर्डिनेन्स के कैदी लेखबद्ध प्रतिज्ञापत्र दाखिल कर दें कि वे भविष्य में क्रान्तिकारी आन्दोलन से कोई  सम्बन्ध न रखेंगे, तो सरकार उन्हें रिहाई देने के विषय में विचार कर सकती है । बंगाल में दक्षिणेश्वर तथा सोवा बाजार बम केस आर्डिनेन्स के बाद चले । खुफिया विभाग के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट के कत्ल का मुकदमा भी खुली अदालत में हुआ, और भी कुछ हथियारों के मुकदमें खुली अदालत में चलाये गये किन्तु कोई एक भी दुर्घटना या हत्या की सूचना पुलिस न दे सकी ।

काकोरी षडयन्त्र-केस पूरे डेढ़ साल तक खुली अदालतों में चलता रहा । सबूत की ओर से लगभग तीन सौ गवाह पेशकिये गये । कई मुखबिर तथा इकबाली खुली तौर से घूमते रहे, पर कहीं कोई दुर्घटना या किसी को धमकी देने की पुलिस ने कोई सूचना न दी । सरकार की इन बातों की पोल खोलने की गरज से ही मैंने एक लेखबद्ध बंधेज सरकार को दिया । यदि सरकार  के  कथनानुसार  जिस  प्रकार  बंगाल आर्डिनेन्स के कैदियों के सम्बन्ध में सरकार के पास पूरा सबूत था और सरकार उन में से अनेकों को भयंकार षडयन्त्रकारी दल का सदस्य तथा हत्याओं का जिम्मेदार समझती तथा कहती थी, तो इसी प्रकार काकोरी के षडयन्त्रकारियों के लेखबद्ध प्रतिज्ञा करने पर कोई गौर क्यों न किया ?

बात यह है कि जबरा मारे रोने न देय । मुझे तो भली भांति मालूम था कि संयुक्त प्रान्त में जितने राजनैतिक अभियोग चलाये जाते है, उनके  फैसले  खुफिया  पुलिस  के इच्छानुसार लिखे जाते है । बरेली पुलिस कान्स्टेबिलों की हत्या के अभियोग में नितान्त निर्दोष नवयुवकों को फंसाया गया और सी०आई०डी० वालों ने अपनी डायरी दिखला कर फैसला लिखाया । काकोरी  षडयन्त्र  में  भी  अन्त  में ऐसा  ही  हुआ । सरकार की सब चालों को जानते हुए भी मैने यह सब  कार्य  उस  की लम्बी -लम्बी बातों  की पोल खोलने के लिये ही किये ।

काकोरी के मृत्यु-दण्ड पाये हुओं की दया प्रार्थना न स्वीकार करने का कोई विशेष कारण सरकार के पास नही । सरकार ने बंगाल आर्डिनेन्स के कैदियों के सम्बन्ध में जो कुछ कहा था, वही  काकोरी  वालों  ने किया । मृत्यु दण्ड को रदद कर देने से देश में किसी प्रकार की शाति भंग होने अथवा किसी विप्लव हो जाने की सम्भावना न था । विशेषतया जब कि देश भर के सब प्रकार के हिन्दू मुसलमान एसेम्बली के सदस्यों ने इस की सिफारि्श की थी । षडयन्त्रकारियों की इतनी बड़ी सिफारि्श इस से पहले कभी नहीं हुई । किन्तु सरकार तो अपना पासा सीधा रखना चाहती है । उसे अपने बल पर विश्वास है ।

सर विलियम मेरिस ने ही स्वयं शाहजहांपुर तथा इलाहाबाद के हिन्दू-मुस्लिम दंगे के अभियुक्तों के मृत्यु-दण्ड रदद किये है, जिन को कि इलाहाबाद हाईकोर्ट से मृत्यु-दण्ड ही देना उचित समझा गया था और उन लोगों पर दिन दहाड़े हत्या करने के सीधे सबूत मौजूद थे । ये सजायें ऐसे समय माफ की गई थी, जब  कि  नित्य  नये  हिन्दू-मुसलिम  दंगे  बढ़ते  ही  जाते  हैं । यदि काकोरी के कैदियों को मृत्यु दण्ड माफ कर के, दूसरी  सजा देने से दूसरों का भी क्राँति के लिये उत्साह बढ़ता तो क्या इसी प्रकार मजहबी दंगों के सम्बन्ध में भी नहीं हो सकता था ?

मगर वहां तो मामला कुछ और ही है, जो अब भारतवासियों के नरम से नरम दल के नेताओं के भी शाही कमीशन के मुकर्रर होने और उस में एक भी भारतवासी के न चुने जाने, पार्लमेंट  में भारत सचिव लार्ड बर्कनहेड के तथा अन्य मजदूर दल के नेताओें के भा्षणों से भली-भांति समझ में आया है कि किस प्रकार भारतवर्ष को गुलामी की जंजीर में जकड़े रहने की चालें चली जा रही है ।

मुझे प्राण त्यागते समय निरा्श हो जाना नहीं पड़ रहा है कि हम लोगों के बलिदान व्यर्थ गये । मेरा तो विश्वास है कि हम लोगों की छिपी हुई आहों का ही यह नतीजा हुआ कि लार्ड वर्कनहेड के दिमाग में परमात्मा ने एक विचार उपस्थित किया कि हिन्दुस्तान के हिंदू-मुसलिम झगड़ों का लाभ उठाओ और भारतवर्ष की जंजीरें और कस दो । गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।

भारतवर्ष के प्रत्येक विख्यात राजनैतिक दल ने और हिन्दुओं के तो लगभग सभी तथा मुसलमानों के भी अधिकतर नेताओे ने एक स्वर हो कर रायल कमी्शन की नियुक्ति तथा उस के सदस्यों के विरूद्ध घोर विरोध किया है, और अगली मद्रास कांग्रेस सभा पर सब राजनैतिक दल के नेता तथा हिंदू मुसलमान एक होने जा रहे हैं । वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहिये ।

सरकार ने अ्शफाक उल्ला को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया । अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान हो कर पक्के आर्यसमाजी और रामप्रसाद  के क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बन सकते है, तब क्या भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते ?

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5 टिप्पणियाँ »

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  1. छॊटे-मोटे लाभ छोड़कर देश के लिये सोचना चाहिये!

  2. “अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान हो कर पक्के आर्यसमाजी और रामप्रसाद के क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बन सकते है, तब क्या भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते?”
    ज़रूर हो सकते हैं परन्तु उसके लिए अशफाक उल्लाह खान और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का चरित्र भी चाहिए. बहुत ह्रदय स्पर्शी कथा है, अफ़सोस इस बात का है की देश में इस ग्रन्थ जैसे रत्न मौजूद होने पर भी वे स्कूल/कॉलेज में नहीं पढाये जा रहे हैं.

  3. ह्रदयग्राही सत्य लिखा है. अनुराग जी ने सबकुछ अपनी टिप्पणी में लिख ही दिया है.

  4. […] का, शहीदों की चिताओं पर अब तक आपने पढ़ा.. “ वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्…  इसके आगे […]

  5. हिनदु मुसलमान एक होना उस वकत संभव जब हिनदुसतान के राज नेता सुधर जाये


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