मैजिक लालटेन द्वारा तस्वीरें दिखाकर या…

जुलाई 10, 2009 को 10:59 अपराह्न | Posted in आत्मकथा, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था | 6 टिप्पणियाँ
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अब तक आपने पढ़ा… “ इसी कारण महामना देशबन्धु चितरंजन दास ने अन्तिम समय ग्राम संगठन ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था । मेरे विचार से ग्राम संगठन का सब से सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़ कर ग्रामीण जीवन से प्रीति उत्पन्न हो । जो युवक मिडिल, इटेंस, एफ0 ए0, बी0ए0 पास करने में हजारों रूपये नष्ट करके दस, पन्द्रह, बीस या तीस रूपये की नौकरी के लिये ठोकरें खाते फिरते है, उन्हें नौकरी का आसरा छोड़कर कोई उद्योग जैसे बढ़ईगिरी, लुहारगिरी, दर्जी का काम, धोबी का काम, जूते बनाना, कपड़ा बुनना, मकान बनाना, राजगीरी का इत्यादि सीख लेना चाहिए । अब आगे पढ़िये… 

यदि जरा साफ सुथरे रहना हो तो वैद्यक सीखे । किसी बड़े ग्राम या कस्बे में जाकर काम शुरू करें । उपरोक्त कामों में से कोई काम भी ऐसा नहीं है, जिस में चार या पांच घण्टा मेहनत करके तीस रूपये मासिक की आय न हो जावे । ग्राम में तीस रूपये मासिक शहर के साठ रूपये से अधिक है । क्योंकि ग्राम में लकड़ी या कण्ड़ा का मूल्य बहुत कम होता है और यदि किसी जमींदार की कृपा हो गई तो एक सूखा हुआ वृक्ष कटवा दिया तो छः महीने के लिए के लिए ईंधन की छुटटी हो गई ।

शुद्ध घी, दूध सस्ते दामों में मिल जाता है और यदि स्वयं एक या दो गाय या भैंस पाल ली, तब तो आम के आम गुठलियों के दाम ही मिल गये। चारा सस्ता मिलता है । घी दूध बाल-बच्चे खाते हैं । कण्डों का ईंधन होता है । और यदि किसी की कृपा हो गई तो फसल पर एक दो भुस की गाड़ी बिना मूल्य ही मिल जाती है । अधिकतर कामकाजियेां को गांव में चारा लकड़ी के लिये पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। हजारों अच्छे-अच्छे ग्राम है, जिनमें वैद्य, दर्जी, धोबी निवास ही नहीं करते । उन ग्रामों के लोगों को दस, बीस कोस दूर दौड़ना पड़ता है । वे इतने दुखी हेाते है कि जिस का अनुमान करना बड़ा कठिन है । विवाह आदि अवसरों पर यथा समय कपड़े नहीं मिलते । काष्ठादि  औषधियां बड़े-बड़े कस्बों में नहीं मिलती । यदि मामूली अत्तार बन ही कस्बें में बैठ जावे, और दो चार किताबें देखकर ही औषधि दिया करे तेा भी तीस, चालीस रूपये मासिक की आय तो कहीं गई ही नहीं ।

इस प्रकार उदर-निर्वाह तथा परिवार का प्रबन्ध हो जाता है । ग्रामों में अधिक जन संख्या से परिचय हो जाता है । परिचय ही नहीं, जिसका एक समय आवश्यकता पर कार्य निकल गया, वह आभारी हो जाता है , उसकी आंख नीची रहती है । जरूरत पड़ने पर तुरन्त सहायक होता है।  ग्राम में कौन ऐसा पुरूष है जिसका लुहार, बढ़ई, धोबी, दर्जी, कुम्हार या वैद्य से काम नहीं पड़ता । मेरा पूर्ण अनुभव है कि इन लोगों की भले-भले ग्रामवासी खु्शामद करते रहते है ।

रोजाना काम पड़ते रहने से और अधिक सम्बन्ध होने से यदि थोड़ी सी चे्ष्टा की जावे और ग्रामवासियों को थोड़ा सा उपदेश दे कर उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया जावे तो बड़ी जल्दी काम बने । थोड़े से समय में ही वे सच्चे स्वदेश भक्त खद्दरधारी बन जावें, यदि उनमें एक दो शिक्षित हो तो उत्साहित करके उसके पास एक समाचार-पत्र मंगाने का प्रबन्ध कर दिया जावे । देश की दशा का भी उन्हें कुछ-कुछ ज्ञान होता रहे । इसी तरह सरल-सरल पुस्तकों की कथायें सुनाकर उनमें से कुप्रथाओं को भी छुड़ाया जा सकता है । कभी-कभी स्वयं रामायण या भागवत की कथा भी सुनाया करे ।  यदि नियमित रूप से कथा कहें तो पर्याप्त धन भी चढ़ावे में आ सकता है, जिससे एक पुस्तकालय स्थापित कर दें ।

कथा कहने के अवसर पर बीच-बीच में चाहे कितनी राजनीति का समावेश कर जावें, कोई खुफिया पुलिस का रिर्पोटर नहीं बैठा जो रिपोर्ट करें । वैसे यदि कोई खद्दरधारी ग्राम में पहुंचकर उपदेश करना चाहे्गा तो तुरन्त जमींदार पुलिस में खबर होगी और यदि कस्बें के वैद्य, लड़के पढ़ाने वाले, कथा कहने वाले पंडित कोई बात कहें तो सब चुपचाप सुनकर उस पर अमल करने की कोशिश करते है और उन्हें कोई पूछता भी नहीं । इस प्रकार अनेक सुविधायें मिल सकती है, जिनके सहारे ग्रामीणों की सामाजिक दशा सुधारी जा सकती है । रात्रि पाठशालायें खोलकर निर्धन तथा अछूत जातियों के बालकों को शिक्षा दे सकते हैं ।

श्रमजीवी संघ स्थापित करने में शहरी जीवन तो व्यतीत हो सकता है । किन्तु इसके लिये उनके साथ अधिक समय रहकर व्यतीत करना पड़गा जिस समय वे अपने-अपने काम से छुटटी पाकर आराम करते है, उस समय उनके साथ वार्तालाप करके मनोहर उपदेशों द्वारा उनको उनकी दशा का दिग्दर्शन कराने का अवसर मिल सकता है । इन लोगों के पास समय बहुत कम होता है, इस कारण से अति उत्तम हो यदि चित्ताकर्षक साधनों द्वारा कोई उपदेश करने की रीति से, जैसे मैजिक लालटेन द्वारा तस्वीरें दिखाकर  या किसी दूसरे उपाय  से उनको एक स्थान पर  एकत्रित किया जैसे गाना बजाना  वगैरा जा सके, तथा रात्रि पाठशालायें खोलकर उन्हें तथा उनके बच्चे को शिक्षा देने का भी प्रबन्ध किया जावे । जितने युवक उच्च शिक्षा प्राप्त करके व्यर्थ में धन व्यय करने की इच्छा रखते हैं, उनको  उचित  है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता  प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और  उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।

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6 टिप्पणियाँ »

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  1. आत्मकथा के इस अंश से यह स्पष्ट है की देश के लिए जान दे देना पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के उदात व्यक्तित्व का कितना छोटा सा अंश था. कितने महात्मा ऐसे होंगे जो फांसी चढ़ने से एकाध दिन पहले भी इतनी शान्ति से यह चिंतन कर रहे हों कि पीछे छूट रहे परतंत्र देशवासियों का जीवन कैसे उन्नत हो! अफ़सोस भी होता है कि हम लोग जीवित रहकर सब सुख-सुविधाएं भोगकर भी इन वीरों के अधूरे काम को पूरा करने की ओर कितना अग्रसर हैं.

  2. Gandhi ke na sahi in Amar Balidaniyon ke sapnon ka Bharat ke baare mein rahi soch se bhi hamare ‘Chadm Rashtrvadi’ avgat nahin honge. Kranti ke aage inke vicharon ki aaj kahin charcha hoti bhi nahin dikhti.

  3. आज भी फांसी ही मिलती इन्हें. शायद फासिस्ट या हिन्दू कट्टरपंथी बता दिया जाता.

  4. अभी तक के सारे एपिसोड़ बड़े ही रोचक हैं. बस मेरे कमेन्ट पर तस्वीर इतनी भयावह क्यों आती है, मैं समझ नहीं पाया.

  5. डा. साहब पढ़ रहे हैं अभिभूत होकर .देश के बारे में ही अन्तिक सांस तक जीने के उदहारण कितने हैं ?

  6. आप से देश की महान विभूतियो से मिलने का सोभाग्य प्राप्त हो रहा है , धन्यवाद


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