फांसी की कोठरी है या, साधना की गुफा

मई 19, 2009 को 12:17 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, खण्ड-4, चँद शेर, फाँसी, सरफ़रोशी की तमन्ना | 11 टिप्पणियाँ
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फांसी की कोठरी
अन्तिम समय निकट है । दो फांसी की सजायें सिर पर झूल रहा है । पुलिस को साधारण जीवन में और समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी भर के कोसा है । खुली  अदालत  में  जज  साहब, खुफिया पुलिस  के  अफसर, मजिस्टेट, सरकारी  वकील  तथा  सरकार  को  खूब  आड़े  हाथों लिया है । हर एक के दिल में मेरी बातें चुभ रही है । कोई दोस्त अपना अथवा यार मददगार नहीं जिसका सहारा हो । एक परमपिता परमात्मा की याद है । गीता का पाठ करते हुए सन्तोष है कि

जो कुछ किया सो तै किया, मैं कुछ कीन्हा नाहिं ।
जहां कहीं कुछ मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ।।

ब्रह्मरण्या धाय कर्माणि संगंत्यक्त्वा करोति यः ।
लिश्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा ।।
  भगवद्गीता । 5।10
जो फल की इच्छा को त्यागकर के कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार जल में रहकर भी कमलपत्र जल में लिप्त नहीं होता । जीवन पर्यन्त जो कुछ किया, स्वदेश की भलाई समझ कर किया । यदि शरीर की पालना की तो इसी विचार से कि सु्दृढ़ शरीर से भले प्रकार स्वदेश सेवा हो सके । बड़े प्रयत्नों से यह शुभ दिन प्राप्त हुआ ।

संयुक्त प्रान्त में इस तुच्छ शरीर का ही सौभाग्य होगा, जो सन 1857 के गदर की घटनाओं के पश्चात क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्बन्ध में इस प्रान्त के निवासी का पहला बलिदान मातृवेदी पर होगा । सरकार की इच्छा है कि मुझे घोट-घोट कर मारें इसी कारण से इस गरमी की ऋतु में साढ़े तीन महीने बाद अपील की तारीख नियत की गई ।

साढ़े तीन महीने तक फांसी की कोठरी में भूंजा गया । यह कोठरी प़क्षी के पिंजरे से भी खराब हैं गोरखपुर जेल की फांसी की कोठरी मैदान में बनी है । किसी प्रकार की छाया निकट नहीं । प्रातःकाल आठ बजे से रात्रि के आठ बजे तक सूर्य देवता की कृपा से तथा चारों ओर रेतीली जमीन होने से अग्नि वर्षण होता है । नौ फीट लम्बी तथा नौ फीट चैड़ी कोठरी में केवल एक छः फीट लम्बा तथा दो फीट चौड़ा द्वार है । पीछे की ओर जमीन से आठ या नौ फीट की उंचाई पर, एक 2 फीट लम्बी 1 फीट चैड़ी खिड़की है । इसी कोठरी में भोजन, स्नान, मल-मूत्र तथा शयानादि होता है । मच्छड़ अपनी मधुर ध्वनि रात भर सुनाया करते है । बड़े प्रयन्त से रात्रि में तीन या चार घंटे निद्रा आती है, किसी किसी दिन एक दो घण्टे ही सो कर निर्वाह करना पड़ता है । मिटटी के पात्रों में भोजन दिया जाता है । ओढ़ने बिछाने को दो कम्बल मिले हैं । बड़े त्याग का जीवन है । साधना के सब साधन एकत्रित है । प्रत्येक क्षण शिक्षा दे रहा है – अन्तिम समय के लिये तैयार हो जाओ, परमात्मा का भजन करो ।

मुझे तो इस कोठरी में बड़ा आनन्द आ रहा है । मेरी इच्छा थी कि किसी साधु की गुफा पर कुछ दिन निवास कर के योगाभ्यास किया जाता । अन्तिम समय वह इच्छा भी पूर्ण हो गई साधु की गुफा न मिली तो क्या साधना की गुफा तो मिल गई, इसी  कोठरी  में  यह  सुयोग  प्राप्त  हो गया, कि  अपनी  कुछ  अन्तिम  बात  लिख  कर  देशवासियों  के  अर्पण  कर  दूं । सम्भव है मेरे जीवन के अध्ययन से किसी आत्मा का भला हो जावे । बड़ी कठिनता से यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ ।

महसूस हो रहे है वादे फना के झोकें ।
खुलने लगे हैं मुझ पर इसरार जिन्दगी के ।।
बारे अलम उठाया रंगे निशात देखा ।
आये नहीं हैं यूं ही अंदाज बेहिसी के ।।

वफ़ा पर दिल को सदके जान को नज़रे ज़फा कर दे ।
मुहब्बत में यह लाज़िम है कि जो कुछ हो फिदा कर दे ।।

अब तो यही इच्छा है-

बहे बहरे फ़ना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की।
कि भूखी मछलियां है जौहरे शमशीर कातिल की।।

किन्तु
समझ कर फूँकना इस को जरा ऐ दागे नाकामी ।
बहुत से घर भी हैं आबाद इस उजड़े हुये दिल से ।।

परिणाम
ग्यारह वर्ष पर्यन्त यथाशक्ति प्राणपण से चेष्टा करने पर भी हम अपने उद्देश्य में कहां तक सफल हुये ? क्या लाभ हुआ ? इस का विचार करने से कुछ अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा, क्योंकि हम ने लाभ हानि अथवा जय पराजय के विचार से क्रान्तिकारी दल में योग नहीं दिया था । हम ने जो कुछ किया वह अपना कर्तव्य समझ कर किया । कर्तव्य निर्णय  में  हमने  कहां  तक  बुद्धिमत्ता  से  काम  लिया, इस का विवेचन करना उचित जान पड़ता है । राजनैतिक दृष्टि से हमारे कार्यों का इतना ही मूल्य है कि कतिपय होनहार नवयुवकों के जीवन को कष्टमय बना कर नीरस कर दिया और उन्हीं में से कुछ ने व्यर्थ में जाने गंवाईं । कुछ धन भी खर्च किया ।

हिन्दू शास्त्र के अनुसार किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती, जिसका जिस विधि से जो काल होता है, वह उसी विधि समय पर ही प्राण त्याग करता है । केवल निमित्त मात्र कारण उपस्थित हो जाते हैं ।

लाखों भारतवासी महामारी, हैजे, ताउन इत्यादि अनेक प्रकार के रोगों में मर जाते हैं । करोड़ों दुर्भिक्ष में अन्न बिना प्राण त्यागते हैं तो उस का उत्तरदायित्व किस पर है ? रह गया धन का व्यय, सो इतना धन तो भले आदमियों के विवाहोत्सवों में व्यय हो जाता है । गणमान्य व्यक्तियों की तो केवल विलासिता की सामग्री  का  मासिक  व्यय  इतना  होगा, जितना  कि  हमने  एक  षडयन्त्र  के  निर्माण  में  व्यय  किया । हमलोगों को डाकू बता कर फांसी और काले पानी की सजायें दी गयी है ।
किन्तु हम समझते हैं कि वकील और डाक्टर हम से कहीं बड़े डाकू है । वकील डाक्टर दिन दहाड़े बड़े-बड़े तालुकेदारों की जायदादें लूट कर खा गये । वकीलों के चाटे हुये अवध के ताल्लुकेदारों को ढूंढ़े रास्ता भी नहीं दिखाई देता, और वकीलों को उंची अटटालिकायें उन पर खिलखिला कर हंस रही है । इसी प्रकार लखनउ में डाक्टरों के भी उंचे-उंचे महल बन गये । किन्तु इस समय राज्य  में  दिन  के  डाकुओं  की प्रतिष्ठा है । अन्यथा रात के साधारण डाकुओं में और दिन के इन डाकुओं वकीलों तथा डाक्टरों में कोई भेद नहीं है । दोनों अपने-अपने मतलब के लिये बुद्धि की कुशलता से प्रजा का धन लूटते है ।

 

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11 टिप्पणियाँ »

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  1. Don’t think that people are not following this post. You are doing a great service to nation by publishing this “Atma Katha”.

    There are thousands silent followers. Just go on…

    Jai Hind

  2. समझ कर फूँकना इस को जरा ऐ दागे नाकामी ।
    बहुत से घर भी हैं आबाद इस उजड़े हुये दिल से ।।

    बिस्मिल की मनोस्थिति की झलक मिल रही है इस पोस्ट से.

  3. बिस्मिल अमर है….

  4. कभी कभी सोचता हूँ…कैसे निष्काम इच्छाशक्ति वाले लोग थे ये. इन्हें नमन.

  5. कई पोस्ट नहीं पढ़ी इस ब्लॉग की… एक दो पढूंगा नहीं. जब पढूंगा पूरा. सारी समाग्री एक साथ पीडीऍफ़ मैं मिल सकती है क्या? नहीं तो मैं ही तैयार करके भेजता हूँ आपको भी.


  6. @ अभिषेक जी
    धैर्य रखें अभिषेक जी ,
    पहले यह आत्मकथा पूरी तो हो जाने दें,
    फिर इसका पी.डी.एफ़. स्वरूप यहीं एक लिंक के रूप में दिखेगा ।
    यह मुक्त सामग्री हम सभी की धरोहर है !

  7. किन्तु हम समझते हैं कि वकील और डाक्टर हम से कहीं बड़े डाकू है। वकील डाक्टर दिन दहाड़े बड़े-बड़े तालुकेदारों की जायदादें लूट कर खा गये। वकीलों के चाटे हुये अवध के ताल्लुकेदारों को ढूंढ़े रास्ता भी नहीं दिखाई देता, और वकीलों को उंची अटटालिकायें उन पर खिलखिला कर हंस रही है।
    अफ़सोस कि आज़ादी के ६२ साल बाद इन डाकुओं की संख्या में बेशुमार वृद्धि हुई है. छोटा शकील, दाऊद इब्राहीम और वीरप्पन सरीखे तो हैं ही – अनगिनत नेता, IAS और IPS आदि भी जोड़े जा सकते हैं.

    अजब सा इत्तेफाक है कि जहां विनोबा जैसे ज्ञानयोगी भक्त गीता के पंडित थे वहीं देश पर जान दे देने बिस्मिल जैसे कर्मयोगियों ने भी गीता से प्रेरणा ली. आर्श्चय है कि अंग्रेजों ने इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया – शायद यह काम मओवादिओं के लिए छोडा हो.

    नोट – 1827 को १८५७ कर दें – शायद टाइपिंग में छोटा होगा.

  8. स्मार्ट इंडियन ने तो सब कुछ कह ही दिया .

    भवानी प्रसाद जी की कुछ पंक्तियाँ याद आती है ….स्मरण से , भूल हो तो कोई सुधार भी दे .

    जिस मुल्क में , जो लिख सके ‘ गीता ‘, कोई पैदा हुआ .
    उस मुल्क में कोई कभी क्यूं ‘ मार्क्स ‘ पर शैदा हुआ .

    गीता को मिटाया जा सकता तो मिट गयी होती . हजारों साल के प्रयत्न तो मिट गए , गीता पर मर मिटने वाले नहीं मिटे .

  9. I am not able to write anything. My eyes are full of tears. Log kahte hai dila dee hame azadi bina khadag bina dhall xyz tune kar diya kamaal. Jooth bolte hai vo. Kitne Bankure Naujwano ne iss desh ki azadi ke liye apne pran nyochhavar kar diye. Ye hame ahsaas tak nahi hai. Inn Jabajo ke liye veerta, tyag etc words bahut chhote lagte hai. They were really extraordinary. Mera dandvat pranam hai in veero ko.

    You have done a wonderfuljob by putting this material on the web. Jai Hind

  10. mujhe bismil ji ki atma katha padkar apane ap me garv hota hai ki mai bharat me paida hua hu bismil ji ke sambandh me maine KRANTI KATHAIN”SRIKRISHNASHARAL” ki kitabo me padha hai unki our asfaq ji ki dosti garv karne yogya hai……..

  11. इस धरोहर को हम सबों तक पहुँचाने हेतु कोटि कोटि आभार!


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