तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये

फ़रवरी 16, 2009 को 1:03 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, काकोरी के शहीद, खण्ड-4 | 10 टिप्पणियाँ
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उसने अपना बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया गया । यह कुछ अधिक जानता था ।

उसके बयान से क्रान्तिकारी पत्र के पार्सलों का पता चला । बनारस के डाकखाने से जिन-जिन के पास पार्सल भेजे गये थे उन को पुलिस ने गिरफतार किया । कानपुर में गोपीनाथ ने जिस के पास पारसल गया था गिरफतार होते ही पुलिस को बयान दे दिया और सरकारी गवाह बना लिया गया ।

इसी प्रकार रायबरेली में स्कूल के विद्यार्थी कुंवर बहादुर के पास पार्सल आया था, उसने भी गिरफ़्तार होते ही बयान दे दिया और सरकारी गवाह बना लिया गया । इसके पास मनीआर्डर भी आया करते थे, क्योंकि यह बनवारीलाल का पोस्ट बाक्स डाक पाने वाला था । इस ने बनवारी लाल  के एक रिश्तेदार का पता बताया, जहां पर तलाशी लेने से बनवारी लाल का एक ट्रँक मिला ।

इस ट्रँक में एक कारतूसी पिस्तौल, एक कारतूसी फौजी रिवाल्वर तथा कुछ जिन्दा कारतूस पुलिस के हाथ लगे । श्री बनवारी लाल की खोज हुई । बनवारीलाल भी पकड़ लिये गये । श्रीयुत बनवारीलाल ने काकोरी डकैती में अपना सम्मिलित होना बताया था । गिरफतारी के थोड़े दिनों बाद ही पुलिस वाले मिले, उल्टा सीधा सुझाया और बनवारीलाल ने भी अपना बयान दे दिया |

वह इकबालिया मुलजिम बनाये गये ।उधर कलकत्ते में दक्षिणेश्वर में एक मकान में बम बनाने का सामान, एक बना हुआ बम, 7 रिवाल्वर, पिस्तौल तथा कुछ राजद्रोही साहित्य पकड़ा गया । इसी मकान में श्रीयुत राजेन्द्रनाथ लहरी बी0 ए0 जो इस मुकद्दमें में फरार थे गिरफतार हुए । इन्द्रभूषण के गिरफ़्तार हो जाने के बाद उसके हेडमास्टर को एक पत्र मध्यप्रान्त से मिला, जिसे उसने हार्टन साहब के पास वैसा ही भेज दिया । इस पत्र से एक व्यक्ति मोहनलाल खत्री का चन्दा में पता चला ।

वहां से पुलिस ने खोज लगा कर पूना में श्रीयुत रामकृष्ण खत्री को गिरफ़्तार करके लखनउ भेजा । बनारस में भेजे हुये पार्सलों के सम्बन्ध में से जबलपुर में श्रीयुत प्रणवेश कुमार चटर्जी को गिरफ़्तार कर के लखनउ भेजा गया । कलकत्ता से श्रीयुत शचीन्द्रनाथ सान्याल जिन्हें बनारस षड़यन्त्र में आजन्म कालेपानी की सजा हुई थी और जिन्हें बांकुरा में क्रान्तिकारी पर्चें बांटने के कारण दो वर्ष की सजा हुई और वह इस मुकद्दमें में लखनउ भेजे गये ।

श्रीयुत योगेशचन्द्र चटर्जी बंगाल आर्डीनेन्स के कैदी हजारी बाग जेल से भेजे गये । आप अक्तूबर सन 1924 ई0 में कलकत्ता में गिरफ़्तार हुये थे । आप के पास दो कागज पाये गये थे, जिन में संयुक्त प्रान्त के सब जिलों का नाम था, और लिखा था कि बाईस जिलों में समिति का कार्य हो रहा है । ये कागज इस षड़यन्त्र के सम्बन्ध के समझे गये ।

श्रीयुत् राजेन्द्रलाहिरी दक्षिणेश्वर बम केस में दस वर्ष के दीपान्तर की सजा पाने के बाद, इस मुकद्दमें में लखनउ भेजे गये । अब लगभग छत्तीस मनुष्य गिरफ़्तार हुये थे । बाकी अठ्ठाइस मनुष्यों पर मजिस्टेट की अदालत में मुकद्दमा चला ।

तीन व्यक्ति 1- श्रीयुत शचीन्द्रनाथ बख़्शी 2- श्रीयुत चन्द्रशेखर आजाद 3- श्रीयुत अशफाक उल्ला खां फरार रहे, बाकी मुकद्दमें के अदालत में आने से पहले ही छोड़ दिये गये । अठ्ठाइस में से दो पर से मजिस्टेट की अदालत में मुकद्दमा उठा लिया गया । दो सरकारी गवाह बनाकर उन्हें माफी दी गई । अन्त में मजिस्टेट ने इक्कीस व्यक्तियों को सेशन सुपुर्द किया । सेशन में मुकद्दमा आने पर श्रीयुत सेठ दामोदर स्वरूप बहुत बीमार हो गये । अदालत न आ सकते थे ।

अतः अन्त में बीस व्यक्ति रह गये । बीस में से दो व्यक्ति श्रीयुत शचीन्द्रनाथ विश्वास तथा श्रीयुत हरगोविन्द सेशन की अदालत से मुक्त हुये । बाकी अट्ठारह को सजाएं हुई ।

श्री बनवारीलाल इकबाली मुलजिम हो गये । वे पहले रायबरेली जिला कांग्रेस कमेटी के मन्त्री भी रह चुके है । उन्होंने असहयोग आन्दालन में छः मास का कारावास भी भोगा था । इस पर भी पुलिस की धमकी से प्राण संकट में पड़ गये । आप ही हमारी समिति के ऐसे सदस्य थे कि जिन पर सबसे अधिक धन व्यय किया गया । प्रत्येक मास आपको पर्याप्त धन भेजा जाता था ।

मर्यादा की रक्षा के लिये हम लोग यथाशक्ति बनवारी लाल को मासिक शुल्क दिया करते थे । अपने पेट काट कर इनको मासिक व्यय दिया गया । फिर भी इन्होंने अपने सहायकों की गर्दन पर छुरी चलाई । अधिक से अधिक द्स वर्ष की सजा हुई । जिस प्रकार का सबूत इनके विरूद्ध था, वैसा ही, इसी प्रकार के दूसरे अभियुक्तों पर था, जिन्हें दस-दस वर्ष की सजा हुई ।

यही नहीं पुलिस के बहकाने से सेशन में बयान देते समय जो नई बातें इन्होंने जोड़ी, उन में मेरे सम्बन्ध में कहा कि मालूम हुआ कि रामप्रसाद डकैतियों के इन रूपये से अपने परिवार का निर्वाह करता है । इस बात को सुन कर मुझे हंसी भी आई, पर हृदय पर बड़ा आघात लगा, कि जिनकी उदर पूर्ति के लिये प्राणों को संकट में डाला, दिन को दिन और रात को रात न समझा, बुरी तरह से मार खाई, माता पिता का कुछ भी ख्याल न किया, वही इस प्रकार आक्षेप करें ।
तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये ।
बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।। 

अंतर्जाल प्रकाशकीय नोट:
यह कड़ी आज यहीं रोकता हूँ । मन विचलित हो चला है । श्रद्धेय बिस्मिल बारंबार बनवारीलाल एवं रायबरेली का उल्लेख कर अपने ठगे जाने के क्षोभ को जैसे छिपा नहीं पा रहे हैं । संयमित भाषा में अंतिम दो पंक्तियाँ उनके हृदय के हाहाकार को प्रतिबिम्बित कर रही हैं । मन खिन्न हो चला है । क्या यह संयोग मात्र है, कि उत्तरी बिहार के सूदूरवर्ती गाँव से मैं इस शहर पर लगे कलंक के टीके को पोंछने का निमित्त बनने को ही आ बसा हूँ ?  डा. अमर कुमार .

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10 टिप्पणियाँ »

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  1. डाक्टर साहब,
    इस श्रृंखला को पढते हुये रोंगटे खडे हुये जाते हैं। इसको पढते पढते उस समय के सामाजिक जीवन की परतें सी खुलती जाती हैं। स्कूल में इतिहास में आजादी की जंग पढते हुये इन दीवानों का जीवन फ़ेंटेसी सरीखा लगता था और अब एक एक परत खुलती जा रही है। एक तरफ़ आजादी की लडाई लडी जा रही है और दूसरी तरफ़ उस समय के समाज के द्वन्द, झूठ, मक्कारी, धोखा जैसी मानवीय प्रवत्तियों की सूक्ष्म जानकारी मिल रही है।

    बहुत आभार इस प्रस्तुति का,

    नीरज


  2. धन्यवाद रोहिल्ला जी,
    मैं समझता था कि ऎसा मेरे साथ ही होता रहा है ।
    वस्तुतः सरल भाषा में निष्कलुष बयानी इस रचना को उत्कृष्ट बना देती है ।
    यूँ ही नहीं कहते, कि म्रूत्यु के सम्मुख मनुष्य हर मिथ्या भुला देता है,
    फिर पण्डित बिस्मिल जी तो अपनी सत्यनिष्ठा के लिये प्रसिद्ध थे ।

    तत्कालीन समाज ने उनको जीवनकाल में ठगा होगा,
    पर, उनका समुचित सम्मान न करके,
    अपने वर्तमान समाज ने भी उनको मृत्यु-उपरांत ठगा ही तो है !

  3. क्या आप ककोरी के रहने वाले हैं?

  4. “जिनकी उदर पूर्ति के लिये प्राणों को संकट में डाला, दिन को दिन और रात को रात न समझा, बुरी तरह से मार खाई, माता पिता का कुछ भी ख्याल न किया, वही इस प्रकार आक्षेप करें”
    निःस्वार्थ सेवा सम्मानित ही हो, आवश्यक नही.ऐसा तो होता आया है. लेकिन याद तो किए ही जाते हैं. आप की यह प्रस्तुति ही इसका प्रमाण है. आभार.

  5. तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये।
    बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये।।

    अफ़सोस की बात है कि बनवारीलाल जैसा बेपेंदी का लोटा सीमित संसाधनों वाले इन नौजवानों से तब तक जोंक की तरह चिमटा रहा जब तक की वह इनका रुधिरपान कर सकता था और बाद मैं उस जैसे मौकापरस्तों की गवाही ही इन शहीदों के प्राणांत का माध्यम बनी.
    धन्यवाद!

  6. इस लेखमाला में आज शायद पहली बार चंद्रशेखर आजाद का नाम आया. बिस्मिल जी के दर्द को सहज ही समझा जा सकता है.

  7. बहुत उतकृष्ट कोटि की रचना को आप अन्तर्जाल पर साकार रुप दे रहे हैं. उस समय की परिस्थिति और इतिहास को समझने के लिये और उन शहीदों के बारे मे जानने का बहुत बढिया
    मौका आपने उपलब्ध करवाया, उसके लिये आपका बहुत २ आभार और शुभकामनाएं.

    रामराम.

  8. बहुत बढिया. जारी रहिए.

  9. गद्दार या गद्दारी अपने आप में उतने खतरनाक नहीं होते । यदि जनता का उन्हें समर्थन न मिले तो वे इतिहास में बेमतलब साबित हो जाते हैं । खतरा तब होता है जब गद्दार को जनता का समर्थन मिल जाए। आप कलंक कैसे दूर कर रहे हैं- यह नहीं समझ सका ।

  10. Bisimil ji, Azad ji ki sena ke senapati hone ke sath maa bharti ke sapoot bhi thae


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