अभियोग वा सन्देह

फ़रवरी 14, 2009 को 5:18 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, काकोरी षड़यंत्र, खण्ड-4 | 5 टिप्पणियाँ
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मैंने नमस्ते कर उत्तर दिया कि आप के चरणों की कृपा है । क्योंकि इस मुकद्में के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह को सुन कर मैंने भी साहस किया था ।  अब आगे.. इस के बाद सब से पहले मुख्य नेता महाशय के विषय में सरकारी वकील ने बहस करना शुरू की । खूब ही आड़े हाथों लिया ।

अब तो मुख्य नेता महाशय का बुरा हाल था । क्योंकि उन्हें आशा थी कि सम्भव है सबूत की कमी से वे छूट जावें या अधिक से अधिक पांच या दस वर्ष की सजा हो जावे । आखिर चैन न पड़ा । सी. आई. डी. अफसरों को बुला कर जेल में उन से एकान्त में डेढ़ घण्टे तक बातें हुई । युवक मण्डल को इसका पता चला । सब मिल कर मेरे पास आये । कहने लगे इस समय सी. आई. डी. अफसर से क्यों मुलाकात की जा रही है ? मेरी जिज्ञासा पर उत्तर मिला कि सजा होने के बाद जेल में क्या व्यवहार होगा, इस सम्बन्ध में बातचीत कर रहे हैं । मुझे सन्तोष न हुआ ।

दो या तीन दिन बाद मुख्य नेता महाशय एकान्त में बैठकर कई घण्टा तक कुछ लिखते रहे । लिख कर कागज जेल में रख कर भोजन करने गये । मेरी अन्तरात्मा ने कहा, उठ देख तो क्या हो रहा है ? मैंने जेब से कागज निकाल कर पढ़े । पढ़कर शोक तथा आश्चर्य की सीमा न रही ।

पुलिस द्वारा सरकार को क्षमा-प्रार्थना भेजी जा रही थी । भविष्य के लिये किसी प्रकार के हिंसात्मक आन्दोलन या कार्य में भाग न लेने की प्रतिज्ञा की गई थी । अण्डरटेकिंग दी गई थी । मैंने मुख्य कार्यकर्ताओं से सब विवरण कह कर इस सब का कारण पूछा कि क्या हम लोग इस योग्य भी नहीं रहे जो हम से किसी प्रकार का परामर्श किया जावे ?  तब तक उत्तर मिला कि व्यक्तिगत बात थी ।

मैंने बड़े जोर के साथ विरोध किया कि यह सब कदापि व्यक्तिगत बात नहीं हो सकती और खूब फटकार  बतलाई । मेरी बातों को सुन चारों ओर खलबली पड़ी | मुझे बड़ा क्रोध आया कि इनके द्वारा कितनी धूर्तता से काम लिया गया । मुझे चारो ओर से चढ़ाकर लड़ने के लिये प्रस्तुत किया गया ।

मेरे विरूद्ध षड़यन्त्र रचे गये । मेरे उपर अनुचित आक्षेप कियें | नवयुवकों के जीवनों का भार ले कर लीडरी की शान झाड़ी गई और थोड़ी सी आपत्ति पड़ने पर इस प्रकार बीस वर्ष के युवकों को बड़ी-बड़ी सजायें दिला,  जेल में सड़ने को डालकर स्वयं बंधेज दे निकल जाने का प्रयत्न किया गया । धिक्कार है ऐसे जीवन को, किन्तु सोच समझ कर चुप रहा ।

अभियोग
काकोरी में रेलवे टेन लुट जाने के बाद ही पुलिस का विशेष विभाग उक्त घटना का पता लगाने के लिये तैनात किया गया । एक विशेष व्यक्ति मि0 हार्टन इस विभाग के निरीक्षक थे । उन्होंने घटनास्थल तथा रेलवे पुलिस की रिर्पोटों को देख कर अनुमान किया कि सम्भव है कि यह कार्य क्रान्तिकारियों का हो ।

प्रान्त के क्रान्तिकारियों की जांच शुरू हुई । उसी समय शाहजहांपुर में रेलवे डकैती के तीन नोट मिले । चोरी गये नोटों की संख्या सौ से अधिक थी जिनका मूल्य लगभग एक हजार रूपये के होगा । इन में से लगभग सात सौ या आठ सौ रूपये के मूल्य के नोट सीधे सरकार के खजाने में पहुंच गयें |

अतः सरकार नोटों के मामले को चुपचाप पी गई । ये नोट लिस्ट में प्रकाशित होने से पूर्व ही सरकारी खजाने में पहुंच चुके थे । पुलिस का लिस्ट प्रकाशित करना व्यर्थ हुआ । सरकारी खजाने में से ही जनता के पास कुछ नोट लिस्ट प्रकाशित होने के पूर्व ही पहुंच गये थे |

इस कारण वे जनता के पास निकल आये । उन्हीं दिनों में जिला, खुफिया पुलिस को मालूम हुआ कि मैं 8, 9 तथा 10 अगस्त सन 1925  ई0  को शाहजहांपुर में नही था । मेरी अधिक जांच होने लगी ।

इसी जांच पड़ताल में पुलिस को मालूम हुआ कि गवर्नमेंट स्कूल शाहजहांपुर के इन्द्रभूषण मित्र नामी एक विद्यार्थी के पास मेरे क्रान्तिकारी दल सम्बन्धी पत्र आते हैं तो वह मुझे दे आता है । स्कूल के हेड मास्टर द्वारा इन्द्रभूषण के पास आये हुये पत्रों की नकल करा के हार्टन साहब के पास भेजी जाती रही ।

इन्हीं पत्रों से हार्टन साहब को मालूम हुआ कि मेरठ में प्रान्त की क्रान्तिकारी समिति की बैठक होने वाली है । उन्होंने एक सब इन्स्पेक्टर को मेरठ अनाथालय में जहां पर मीटिंग होने का पता चला था, भेजा । उन्हीं दिनों हार्टन साहब को किसी विशेष सूत्र द्वारा मालूम हुआ कि शीघ्र ही कनखल में डाका डालने का प्रबन्ध क्रान्तिकारी समिति के सदस्य कर रहे हैं |

और सम्भव है कि किसी बड़े शहर में डाकखाने का आमदनी भी लूटी जावे । हार्टन साहब को एक सूत्र से एक पत्र मिला जो मेरे हाथ का लिखा था । इस पत्र में सितम्बर मे होने वाले श्राद्ध का जिक्र था जिस की 13 तारीख निश्चित की गई थी । पत्र में था कि दादा का श्राद्ध नं0 1 पर 13 सितम्बर हो होगा, अवश्य पधारिये । मैं अनाथालय में मिलूंगा । पत्र पर रूद्र के हस्ताक्षर थे ।

आगामी डकैतियों को रोकने के लिये हार्टन साहब ने प्रान्त भर में 26 सितम्बर सन्1925 ई0 को लगभग तीस मनुष्यों को गिरफतार किया । उन्हीं दिनों में इन्द्रभूषण के पास आये हुये पत्र से पता लगा कि कुछ वस्तुयें बनारस में किसी विद्यार्थी की कोठरी में बन्द हैं । अनुमान किया गया कि सम्भव है कि वे हथियार हों, अनुसंधान करने से हिंदू विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी की कोठरी से दो रायफलें निकलीं । उस विद्यार्थी को कानपुर में गिरफतार किया गया ।

इन्द्रभूषण ने मेरी गिरफतारी की सूचना एक पत्र द्वारा बनारस को भेजी । जिसके पास पत्र भेजा था उसे पुलिस गिरफतार कर चुकी थी, क्योंकि उसी श्री रामनाथ पाण्डेय के पते का पत्र मेरी गिरफतारी के समय मेरे मकान से पाया गया था । रामनाथ पाण्डेय के पत्र पुलिस के पास पहुंचे थे ।

अतः इन्द्रभूषण का पत्र देखकर इन्द्रभूषण को भी गिरफ़्तार किया । इन्द्रभूषण ने दूसरे दिन अपना बयान दे दिया । गिरफतार किये हुये व्यक्तियों में से कुछ से मिल मिला कर बनारसीलाल ने भी जो शाहजहांपुर के जेल में था, अपना बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया गया ।

यह कुछ अधिक जानता था ।

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5 टिप्पणियाँ »

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  1. नवयुवकों के जीवनों का भार ले कर लीडरी की शान झाड़ी गई और थोड़ी सी आपत्ति पड़ने पर इस प्रकार बीस वर्ष के युवकों को बड़ी-बड़ी सजायें दिला, जेल में सड़ने को डालकर स्वयं बंधेज दे निकल जाने का प्रयत्न किया गया।
    शर्मनाक! यह आस्तीन के साँप अपनी उंगली बचाने के लिए दूसरों की गर्दन काटने में भी गुरेज़ नहीं करते.

  2. निश्चित रूप से इन पोस्ट्स से उस युग को दोबारा जीने का अवसर मिल रहा है.

  3. सीधी कार्रवाई की इस विधि में अकेले मुख्य नेता का महत्व बढ़ जाता है । कितनी शर्मनाक स्थिति बनती हैं उसके कमजोर होने पर ?


  4. @ आदरणीय अफ़लातून जी,
    आपको यहाँ देख कर इस लघु प्रयास को विशेष मान मिल रहा है ।
    विद्वान ब्लागरों का इससे सहज जुड़ जाना रोमांचित तो करता ही है,
    श्रम सार्थक लगने लगता है, वह अलग से ।
    सादर धन्यवाद ।

    @ श्री अनुराग शर्मा जी,
    आपने और अभिषेक जी ने इस प्रयास को बहुत बल दिया है ।
    अपने मेल में आपका स्वागतयोग्य प्रस्ताव देखा,
    आप इसके वैधानिक पहलुओं की भी छान बीन कर लें,
    इस महती कार्य में मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ?
    यह रचना देश की धरोहर से इतर
    तत्कालीन लेखन की महत्वपूर्ण मिसाल भी है ।

  5. डॉक्टर साहेब,
    आपके बताये पहलुओं पर विचार करके आपसे मुखातिब होता हूँ.
    बहुत-बहुत धन्यवाद,
    अनुराग.


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