प्रलोभन, शिनाख़्त तथा बनवारीलाल

फ़रवरी 13, 2009 को 2:33 पूर्वाह्न | आत्म-चरित, काकोरी षड़यंत्र, खण्ड-4 में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ
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बनारसीलाल के सम्बन्ध में सब मित्रों ने कहा था कि इस से अवश्य धोखा होगा, पर मेरी बुद्धि में कुछ न समाया था । प्रत्येक जानकार ने बनारसीलाल के सम्बन्ध में यही भविष्यवाणी की थी कि वह आपत्ति पड़ने पर अटल न रह सकेगा । इस कारण सब ने उसे किसी प्रकार के गुप्त कार्य में लेने की मनाही की थी । अब तो जो होना था सो हो ही गया । अब आगे..

थोड़े दिनों के बाद जिला कलेक्टर मिले । कहने लगे फांसी हो जावेगी । बचना हो तो बयान दे दो । मैंने कुछ उत्तर न दिया । तत्पश्चात खुफिया पुलिस के कप्तान साहब मिले, बहुत सी बातें की । कई कागज दिखलाये । मैनें कुछ कुछ अन्दाजा लगाया कि कितनी दूर तक वे लोग पहुंच गये है । मैंने कुछ बातें बनाई ताकि पुलिस का ध्यान दूसरी ओर चला जावे,  परन्तु उन्हें तो विश्वसनीय सूत्र हाथ लग चुका था, वे बनावटी बातों पर क्यों विश्वास करते ? अन्त में उन्होंने अपनी यह इच्छा प्रकट की कि यदि मैं बंगाल का सम्बन्ध बताकर कुछ बोलशेविक सम्बन्ध के विषय में अपना बयान दे दूं ।

तो वह मुझे थोड़ी सी सजा करा देंगे,  और सजा के थोड़े दिनों बाद ही जेल से निकाल कर इंग्लैण्ड भेज देंगे । और पन्द्रह हजार रूपये पारितोषिक सरकार से दिला देंगे । मैं मन ही मन बहुत हंसता था । अन्त में एक दिन फिर मुझसे जेल में मिलने को गुप्तचर विभाग के कप्तान साहब आये । मैंने अपनी कोठरी में से निकलने से ही इन्कार कर दिया । वह कोठरी पर आकर बहुत सी बातें करते रहें ।

अन्त में परेशान होकर चले गये । शिनाख्तें कराई गई पुलिस को जितने आदमी मिल सके उतने आदमी लेकर शिनाख्तें कराई । भाग्यवश श्री अइनुद्दीन साहब मुकदमें के मजिस्टेट मुकर्रर हुए,  जी भर कर के पुलिस की मदद की । शिनाख्तों में अभियुक्तों को साधारण मजिस्टेटों की भांति भी सुविधायें न दी । दिखाने के लिये कागजी कार्यवाई खूब साफ रखी । जबान के बड़े मीठे थे । प्रत्येक अभियुक्त से बड़े प्रेम से मिलते थे । बड़ी मीठी मीठी बातें करते थे । सब समझतें थे कि हम से सहानुभूति रखते है ।

कोई न समझ सका कि अन्दर ही अन्दर घाव कर रहे हैं । इतना चालाक अफसर शायद ही केाई दूसरा हो । जब तक मुकद्दमा उनकी अदालत में रहा किसी को कोई शिकायत का मौका ही न दिया । अगर कभी कोई बात भी हो जाती तो वह ऐसे ढ़ंग से उसे टालने की कोशिश करता कि किसी को बुरा भी न लगता । बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में अभियुक्तों से क्षमा तक मांगने में संकोच न किया । किन्तु कागजी कार्रवाई में इतना होशियार था कि जो कुछ लिखा सदैव अभियुक्तों के विरूद्ध । जब मामला सेशन सुपुर्द किया और आज्ञापत्र में युक्तियां दीं, तब जाकर सब की आंखें खुलीं कि कितना गहरा घाव मार दिया । मुकद्मा अदालत में न आया था ।

उसी समय रायबरेली में बनवारीलाल की गिरफतारी हुई । मुझे हाल मालूम हुआ । मैंने पंडित हरकरननाथ से कहा कि सब काम छोड़कर सीधे रायबरेली जावें और बनवारीलाल से मिलें, किन्तु उन्होंने मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान दिया । मुझे बनवारी लाल पर पहले से ही सन्देह था, क्योंकि उसका रहन-सहन इस प्रकार का था कि जो ठीक न था । जब दूसरे सदस्यों के साथ रहता, तब उनसे कहा करता कि मैं जिला-संगठनकर्ता हूं मेरी गणना अधिकारियों में है । मेरी आज्ञा पालन किया करो । मेरे जूठे बर्तन मला करो । कुछ विलासिता प्रिय भी था । प्रत्येक समय शीशा, कन्घा तथा साबुन साथ रखता था ।

मुझे इस से भय था, किन्तु हमारे दल के एक खास आदमी का वह विश्वासपात्र रह चुका था । उन्होंने सैकड़ों रूपये देकर उस की सहायता की थी । इसी कारण हम लोग भी अन्त तक उसे मासिक सहायता देते रहे थे । मैने बहुत कुछ हाथ पैर मारे । पर कुछ भी न चली, और जिस का मैं भय करता था वहीं हुआ । भाड़े के टट्टू अधिक बोझ न सम्भाल सका, उस ने बयान दे ही दिये । जब तक वह गिरफतार न हुआ था कुछ सदस्यों ने इस के पास जो अस्त्र थे वे मांगे । पर इसने न दिये । जिला अफसर की शान में रहा । गिरफतार होते ही सब शान मिट्टी में मिल गई ।

बनवारी लाल के बयान दे देने से पुलिस का मुकद्मा मजबूती पकड़ गया । यदि वह अपना बयान न देता तो मुकद्मा बहुत कमजोर था । सब लोग चारों आर से एकत्रित कर के लखनउ जिला जेल में रखे गये । थोड़े समय तक अलग-अलग रहे, किन्तु अदालत में मुकद्मा आने से पहले ही एकत्रित कर दिये गये । मुकद्में में रूपये की जरूरत थी । अभियुक्तों के पास क्या था ?

उनके लिये धन संग्रह करना कितना दुस्तर था न जाने किस प्रकार निर्वाह करते थे । अधिकतर अभियुक्तों का कोई सम्बन्धी पैरवी भी न कर सकता था । जिस किसी के कोई था भी वह बाल बच्चों तथा घर को संभालता था, इतने समय तक घर बार छोड़ कर मुकद्मा करता । यदि चार अच्छे पैरवी करने वाले होते, तो पुलिस का तीन चैथाई मुकद्मा टूट जाता ।

लखउन ऐसे जनाने शहर में मुकद्मा हुआ, जहां अदालत में कोई भी शहर का आदमी न आता था । इतना भी तो न हुआ कि एक अच्छा प्रेस रिपोर्टर ही रहता, मुकद्में की सारी कार्यवाही को, जो कुछ अदालत में होता था, प्रेस में भेजता रहता । इण्डियन डेली टेलीग्राफ वालों ने कृपा की । यदि कोई अच्छा रिपोर्टर आ भी गया, और कुछ अदालत की कार्यवाही ठीक-ठीक प्रकाशित हुई तो पुलिस वालों ने जज साहब से मिल कर तुरन्त उस रिपोर्टर को निकलवा दिया । जनता की कोई सहानुभूति न थी ।

जो पुलिस के जी में आया करती रही, इन सारी बातों को देख कर जज का साहस बढ़ गया । उसने जैसा जी चाहा सब कुछ किया । अभियुक्त चिल्लाये हाय! हाय! पर कुछ भी सुनवाई न हुई । और बातें तो दूर, श्रीयुत दामोदर स्वरूप सेठ को पुलिस ने जेल में सड़ा डाला । लगभग एक वर्ष तक आप जेल में तड़पते रहे । एक सौ पाउण्ड से केवल 66 पाउण्ड वजन रहा गया । कई बार जेल में मरणासन्न हो गये ।

नित्य बेहोशी आ जाती थी । लगभग दस मास तक कुछ भी भोजन न कर सके । जो कुछ छटांक दो छटांक दूध किसी प्रकार पेट में पहुंच जाता था, उससे इस प्रकार की विकट वेदना होती थी कि कोई आप के पास खड़े होकर उस छटपटाने के दृश्य को देख न सकता था । एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया,  जिसमें तीन डाक्टर थे । उन बुद्धू की जब कुछ समझ में न आया, तो यह कह दिया गया कि सेठ जी को कोई भी बीमारी ही नहीं है ।

 

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2 टिप्पणियाँ »

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  1. मीडिया की उन क्रांतिकारियों को भी कितनी जरुरत थी यह स्पष्ट हो जाता है, साथ ही तात्कालिक उत्साह में उठाये भार को न सह पाने का दबाव भी.

  2. भाड़े के टट्टू अधिक बोझ न सम्भाल सका, उस ने बयान दे ही दिये।

    कितनी सच्ची बात है. मगर यह भाड़े के टट्टू भारत की हर थाली में छेद करते रहे है. सिर्फ़ अच्छा होना काफी नहीं है – बुराई को पहचानना भी बहुत ज़रूरी है.

    और ऊपर से सरकारी अमले की मक्कारी, समाज की उदासीनता और प्रेस का व्यवसायीकरण – इन सब ने मिलकर कितने वीरों के प्राण हरे हैं – कहा भी नहीं जा सकता है.


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