मैं गिरफ़्तार हो गया

फ़रवरी 8, 2009 को 12:34 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, काकोरी षड़यंत्र, खण्ड-4 | 2 टिप्पणियाँ
टैग: , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

नवयुवकों का भी उत्साह बढ़ गया । जितना कर्जा था निपटा दिया । अस्त्रों की खरीद के लिये लगभग एक हजार रूपये भेज दिये । प्रत्येक केन्द्र के कार्यकर्ता को यथा स्थान भेज कर दूसरे प्रान्तों में भी कार्य विस्तार करने का निर्णय कर के कुछ प्रबन्ध किया । एक युवक दल ने बम बनाने का प्रबन्ध किया,  मुझसे भी सहायता चाही । मैंने आर्थिक सहायता देकर अपना एक सदस्य भेजने का वचन दिया । किन्तु कुछ त्रुटियां हुई, जिससे सम्पूर्ण दल अस्त-व्यस्त हो गया । मैं इस  विषय में  कुछ  भी  न  जान  सका  कि   दूसरे   देश  के क्रान्तिकारियों ने प्रारम्भिक अवस्था में हम लोगों की भांति प्रयत्न किया या नहीं । यदि पर्याप्त अनुभव होता तो इतनी साधारण भूलें न करे ।

यह अवस्था देख मुझे बड़ा खेद तथा आश्चर्य होता है क्योंकि नेतागिरी का भूत सबसे भयानक होता है । जिस समय से यह भूत खोपड़ी पर सवार होता है, उसी समय से सब काम चौपट हो जाता है, केवल एक दूसरे के दोष देखने में समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है ।

त्रुटियों के होते हुये भी कुछ भी न बिगड़ता और न कुछ भेद खुलता, न इस अवस्था को पहुंचते । क्योंकि मैंने जो संगठन किया था उसमें किसी ओर से मुझे कोई कमजोरी न दिखाई देती थी । कोई भी किसी प्रकार की कमजोरी न समझ सकता था । इसी कारण आंख बन्द किये बैठे रहे । किन्तु आस्तीन में सांप छिपा हुआ था ! ऐसा गहरा मुंह मारा कि चारों खाने चित्त कर दिया !  कहा है कि..

जिन्हें हम हार समझे थे गला अपना सजाने को।
वही अब नाग बन बैठे हमारे काट खाने को ।।

नवयुवकों में आपस की होड़ के कारण बहुधा कलह भी हो जाती थी, जो भयंकर रूप धारण कर लेती । मेरे पास जब मामला आता तो मैं प्रेमपूर्वक समिति की दशा का अवलोकन करके, सब को शान्ति कर देता । कभी नेतृत्व को लेकर वादाविवाद चल जाता । एक केन्द्र के निरीक्षक से वहां के कार्यकर्ता अत्यन्त असन्तुष्ट थे ।

क्योंकि निरीक्षक से अनुभवहीनता के कारण कुछ भूलें हो गई थीं । यह अवस्था देख मुझे बड़ा खेद तथा आश्चर्य होता है क्योंकि नेतागिरी का भूत सबसे भयानक होता है । जिस समय से यह भूत खोपड़ी पर सवार होता है, उसी समय से सब काम चौपट हो जाता है । केवल एक दूसरे के दोष देखने में समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है । इस प्रकार के समाचार सुन मैंने सबको एकत्रित कर खूब फटकारा । सब अपनी त्रुटि समझ कर पछतायें और प्रीति पूर्वक आपस में मिल कर कार्य करने लगे ।

पर ऐसी अवस्था हो गई थी कि दलबन्दी की नौबत आ गई थी । एक प्रकार से तो दलबन्दी हो ही गई थी पर मुझ पर सब की श्रद्धा थी और मेरे वक्तव्य को सब सदस्य  मान लेते थे । सब कुछ होने पर भी मुझे किसी ओर से किसी प्रकार का सन्देह न था । किन्तु परमात्मा को ऐसा ही स्वीकार था जो इस अवस्था का दर्शन कराना पड़ा ।                             

गिरफ़्तारियाँ
काकोरी डकैती होने के बाद से ही पुलिस बहुत सचेत हुई ।
बड़े जोरों के साथ जांच आरम्भ हो गई । शाहजहांपुर में कुछ नई मूर्तियों के दर्शन हुये । कुछ पुलिस के विशेष सदस्य मुझसे भी मिले । चारों ओर शहर में यही चर्चा थी कि रेलवे डकैती किसने कर ली ? उन्हीं दिनों शहर में दो एक डकैती के नोट निकल आये ।

कुछ यह भी विचार था कि दे्श की सहानुभूति की परीक्षा की जावे । जिस दे्श पर हम अपना बलिदान देने को उपस्थित हैं, उस दे्श के वासी हमारे साथ कितनी सहानुभूति रखते हैं ?

अब तो पुलिस का अनुसन्धान और भी बढ़ने लगा । कई मित्रों ने मुझसे कहा कि सतर्क रहो । दो एक सज्जन ने निश्चित रूपेण  समाचार दिया कि मेरी गिरफ़्तारी जरूर हो जावेगी ।  मेरी कुछ समझ में न आयां मैंने विचार किया कि यदि  गिरफ़्तारी हो भी गई तो पुलिस को मेरे विरूद्ध कुछ भी प्रमाण न मिल सकेगा । bismil_बिस्मिल मेरे विचार में मुझे अपनी बुद्धिमता पर कुछ अधिक ही  विश्वास था । अपनी बुद्धि के सामने दूसरों की बुद्धि को तुच्छ समझता था । कुछ यह भी विचार था कि दे्श में लोगों की सहानुभूति की परीक्षा की जावे । जिस दे्श पर हम सदैव अपना   बलिदान देने  को उपस्थित हैं,  उस दे्श के वासी हमारे साथ कितनी सहानुभूति रखते हैं ? 

कुछ जेल का अनुभव भी प्राप्त करना था । वास्तव में मैं काम करते करते श्रान्त हो गया था । भविष्य के कार्यों में अधिक नर-हत्या का ध्यान कर के मैं हत्बुद्धि सा हो गया था । मैंने किसी के कहने की कोई भी चिन्ता न की । रात्रि के समय ग्यारह बजे के लगभग एक मित्र के यहा से अपने घर पर गया । रास्ते में खुफिया पुलिस के सिपाहियों से भेंट हुई । कुछ विशेष रूप से उस समय भी वे मेरी देखभाल कर रहे थे । मैंने कोई चिन्ता न की और घर पर जाकर सो गया । प्रातःकाल चार बजने पर जगा ।

मेरे  शौचादि  से  निवृत्त   होने   पर   बाहर   द्वार   पर  जैसे बन्दूक  के  कुन्दों  का  शब्द  सुनाई  दिया, मैं समझ गया कि पुलिस आ गई है । मैं तुरन्त ही द्वार खोलकर बाहर गया । एक पुलिस अफसर ने बढ़कर हाथ पकड़ लिया । मैं गिरफ़्तार हो गया । मैं केवल एक अंगोछा पहने हुये था । पुलिस वालों को अधिक भय न था । पूछा यदि घर में कोई अस्त्र हो,  तो दे दीजिये ।  

Advertisements

2 टिप्पणियाँ »

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

  1. जितना पढता जा रहा हूँ, उन लोगों की लगन, श्रम और क्षमता के साथ उनके अकेलेपन, बेबसी और कुंठा को भी समझ पा रहा हूँ. बिस्मिल जी जितने अच्छे सेनानी और रणनीतिकार थे उतने ही अच्छे लेखक भी रहे थे यह बात इस पुस्तक से सिद्ध होती है.

    धन्यवाद!

  2. आपकी पिछली पोस्ट्स आज ही देखीं. अनुभवहीन किंतु उत्साही नौजवानों की मनःस्थिति का जिवंत स्वरुप दिखता है बिस्मिल जी के शब्दों में. तत्कालीन दौर का जिवंत दस्तावेज है यह पुस्तक और आपका ब्लॉग.


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .
Entries और टिप्पणियाँ feeds.

%d bloggers like this: