नौकरी, व्यवसाय तथा वृहत् संगठन

फ़रवरी 6, 2009 को 3:17 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना | 2 टिप्पणियाँ
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इन चालबाजारियों के चलते….  अब सब ओर से चित्त को हटा कर बड़े मनोयोग से नौकरी में समय व्यतीत करने लगा । कुछ रूपया इकट्ठा करने के विचार से, कुछ कमीशन इत्यादि का प्रबन्ध कर लेता था । इस प्रकार थोड़ा सा पिताजी का भार घटाया । सब से छोटी बहिन का विवाह नहीं हुआ था । पिता जी के सामर्थ्य के बाहर था कि उस बहिन का विवाह किसी भले घर में कर सकते । मैंने रूपया जमा करके बहिन का विवाह एक अच्छे जमींदार के यहां कर दिया । पिता जी का भार उतर गया । अब केवल माता, पिता, दादी तथा छोटे भाई थे, जिन के भोजनों का प्रबन्ध हेाना अधिक कठिन व्यापार न था ।

अब माताजी की उत्कट इच्छा हुई कि मैं भी विवाह कर लूं । कई अच्छे-अच्छे विवाह सम्बन्ध सुयोग एकत्रित हुए । किन्तु मैं विचारता था कि जब तक पर्याप्त धन पास न हो, विवाह बन्धन में फंसना ठीक नहीं । मैंने स्वतंत्र कार्य आरम्भ किया, नौकरी छोड़ दी । एक मित्र ने सहायाता दी । मैंने एक निजी रेशमी कपड़ा बुनने का कारखाना खोल दिया । बड़े मनोयोग तथा परिश्रम से कार्य किया । परमात्मा की दया से अच्छी सफलता हुई । एक डेढ़ साल में ही मेरा कारखाना चमक गया ।

तीन हजार की पूँजी से कार्य आरम्भ किया था । एक साल बाद सब खर्च निकाल कर लगभग दो हजार रूपये लाभ हुए । मेरा उत्साह और भी बढ़ा । मैंने एक दो व्यवसाय और प्रारम्भ किये । उसी समय मालूम हुआ कि संयुक्त प्रान्त के क्रान्तिकारी दल का पुर्नसंगठन हो रहा है । कार्यारम्भ हो गया  है । मैने ने भी योग देने का वचन दिया । किन्तु उस समय मैं अपने व्यवसाय में बुरी तरह फंसा हुआ था । मैंने छः मास का समय लिया कि छः मास में मैं अपने व्यवसाय अपने साझी को सौंप दूंगा और अपने आपको उसमें से निकाल लूंगा । तब स्वतन्त्रता पूर्वक क्रान्तिकारी कार्य में योग दे सकूंगा । छः मास तक मैंने अपने कारखाने का सब काम साफ करके अपने साझी को सब काम समझा दिया ।

तत्पश्चात अपने बचनानुसार कार्य में योग देने का उद्योग किया । यद्यपि मैं अपना निश्चय कर चुका था, कि अब इस प्रकार के कार्यों में भाग न लूंगा । किन्तु मुझे पुनः क्रान्तिकारी आन्दोलन में हाथ डालना पड़ा । जिस का कारण यह था कि मेरी तृष्णा न बुझी थी, मेरे दिन के अरमान न निकले थें असहयोग आन्दोलन शिथिल हो चुका था । पूर्ण आशा थी कि जितने देश के नवयुवक उस आन्दोलन में भाग लेते थे, उन में अधिकतर क्रान्तिकारी आन्दोलन में सहायता देंगे और पूर्ण प्रीति से कार्य करेंगे । जब कार्य आरम्भ हो गया और असहयागियों को टटोला तो वे आन्दोलन से कहीं अधिक शिक्षित हो चुके थे ।

उन की आशाओं पर पानी फिर चुका था । घर की पूंजी समाप्त हेा चुकी थी । घर में व्रत हो रहे थे । आगे की भी कोई विशेष आ्शा न थी । कांग्रेस में भी स्वराज्य दल का जोर हो गया था । जिन के पास कुछ धन तथा इष्ट मित्रों का संगठन था, वे कौन्सिलों तथा एसेम्बली के सदस्य बन गये । ऐसा अवस्था में यदि क्रान्तिकारी संगठनकर्ताओं के पास पर्याप्त धन होता तो वे असहयोगियों को हाथ में ले कर उन से काम ले सकते थे । कितना भी सच्चा काम करने वाला हो किन्तु पेट तो सब के हैं । दिन भर में थोड़ा सा अन्न क्षुधा निवृत्ति के लिये मिलना परमावश्यक है । फिर शरीर ढकने को भी आवश्यकता होती है । अतएव कुछ प्रबन्ध ही ऐसा होना चाहिये जो नित्य की आवश्यकतायें पूरी हो जावें ।

जितने धनी मानी स्वदेशप्रेमी थे उन्होंने असहयोग आन्दोलन में पूर्ण सहायता दी थी । फिर भी कुछ ऐसे कृपालू सज्जन थे जो थोड़ी बहुत आर्थिक सहायता देते । किन्तु प्रान्त भर के प्रत्येक जिले में संगठन करने का विचार था । पुलिस की दृष्टि बचाने के लिये भी पूर्ण प्रयत्न करना पड़ता था । ऐसी परिस्थिति में साधारण नियमों को काम लाते हुये कार्य करना बड़ा कठिन  था । अनेकों  उद्योग के पश्चात  कुछ  सफलता न होती थी ।  दो  चार जिलों  में संगठनकर्ता नियत किये गये थे, जिन को कुछ मासिक गुजारा दिया जाता था । पांच दस मास तक तो इस प्रकार कार्य चलता रहा । बाद को जो सहायक कुछ आर्थिक सहायता देते थे, उन्होंने हाथ खींच लिया । अब हमलोंगों की अवस्था बहुत खराब हो गई ।

सब कार्यभार मेरे उपर ही आ चुका था । कोई भी किसी प्रकार की सहायता न देता था । जहां तहां से पृथक-पृथक जिलों में कार्य करने वाले मासिक व्यय की मांग कर रहे थे । कई मेरे पास आये । मैंने कुछ रूपया कर्ज लेकर उन लोगों को एक मास का खर्च दिया । कइयों पर कुछ कर्ज भी हो चुका था । मैं कर्ज न निपटा सका । एक केन्द्र के कार्यकर्ता को जब पर्याप्त धन न मिल सका तो वे कार्य छोड़ कर चले गये । मेरे पास क्या प्रबन्ध था जो मैं सब की उदरपूर्ति कर सकता ? अद्भुत समस्या थी । किसी तरह उन लोगों को समझाया ।

थोड़े दिनों में क्रान्तिकारी पर्चें आये । सारे देश में निश्चित तिथि पर पर्चें बांटे गये । बम्बई, रंगून, लाहौर, अमृतसर, कलकत्ता तथा बंगाल के मुख्य शहरों तथा संयुक्त प्रान्त के सभी मुख्य जिलों में पर्याप्त संख्या में पर्चा का वितरण हुआ । भारत सरकार  बड़ी सशंक हुई कि इतनी बड़ी सुसंगठित समिति है जो एक ही दिन सकल भारतवर्ष में पर्चें बंट गये । उसी के बाद मैंने कार्यकारिणी की एक बैठक कर के जो केन्द्र खाली हो गया था, उस के लिये एक महाशय को नियुक्त किया । केन्द्रों में कुछ परिवर्तन हुआ क्योंकि सरकार के पास संयुक्त प्रान्त के सम्बन्ध में बहुत सी सूचनायें पहुंच गई थी । भविष्य की कार्यकारिणी का निर्णय किया गया ।

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2 टिप्पणियाँ »

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  1. यह हमारे लिए सुरुचि भोज जैसा लग रहा है. आभार.

  2. कितना भी सच्चा काम करने वाला हो किन्तु पेट तो सब के हैं। दिन भर में थोड़ा सा अन्न क्षुधा निवृत्ति के लिये मिलना परमावश्यक है । फिर शरीर ढकने को भी आवश्यकता होती है। अतएव कुछ प्रबन्ध ही ऐसा होना चाहिये जो नित्य की आवश्यकतायें पूरी हो जावें।
    शरीर की इन मूलभूत सीमाओं से ऊपर उठ पाना असंभव न सही मगर बहुत कठिन तो है ही. इसीलिये निस्वार्थ और बहुजन हिताय बहुजन सुखाय काम करने वाले विरले ही होते हैं.


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