पुर्नसंगठन

फ़रवरी 3, 2009 को 1:04 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-3, सरफ़रोशी की तमन्ना | टिप्पणी करे
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पिछली बार.. अनुभवहीनता से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ी । कोई पथ प्रदर्शक तथा सहायक नहीं, जिस से परामर्श करता । व्यर्थ के उद्योग धन्धों तथा स्वतन्त्र कार्यों में शक्ति का व्यय करता रहा । अब आगे..

पुर्नसंगठन

जिन महानुभावों को मैं पूजनीय दृष्टि से देखता था, उन्होंने अपनी इच्छा प्रकट की कि मैं क्रान्तिकारी दल का पुनः संगठन करूं । गत जीवन के अनुभव से मेरा हृदय अत्यन्त दुखित था । मेरा साहस न देख कर, इन लोगों ने बहुत उत्साहित किया और कहा कि हम आप से केवल निरीक्षण का कार्य लेंगे । बाकी सब कार्य स्वयं ही करेंगे ।

कुछ मनुष्य हम ने पहले जुटा लिये हैं, धन की कमी न होगी, आदि । मान्य पुरूषों की प्रवृत्ति देख मैंने भी स्वीकृति दे दी । मेरे पास जो अस्त्र-शस्त्र थे मैंने दिये । जो दल उन्होंने एकत्रित किया था, उस के नेता से मुझे मिलाया । उस की वीरता की बड़ी प्रशंसा की । वह एक अ्शिक्षित ग्रामीण पुरूष था। मेरी समझ में आ गया कि बदमाशों का या स्वार्थी जनों का कोई संगठन है ।

मुझ से उस दल के नेता ने दल का कार्य निरीक्षण करने की प्रार्थना की । दल में कई फौज से आये हुये लड़ाई से वापिस किये गये व्यक्ति भी थे । मुझे इस प्रकार के व्यक्तियों से कभी कोई काम न पड़ा था । मै दो एक महानुभावों को साथ ले कर इन लोगों का कार्य देखने के लिये गया । थोड़़े दिनों बाद इस दल के नेता महाशय एक वेश्या को भी ले आये । उसे रिवाल्वर दिखाया कि यदि कहीं गई तो गोली से मारी जायेगी । यह समाचार सुन उसी दल के दूसरे सदस्य ने बड़ा क्रोध प्रकाशित किया और मेरे पास खबर भेजने का प्रबन्ध किया । उसी समय एक दूसरा आदमी पकड़ा गया, जो नेता महाशय को जानता था ।

नेता महाशय रिवाल्वर तथा कुछ सोने के आभूषणों सहित गिरफतार हो गये । उन की वीरता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, जो इस प्रकार प्रकट हुई कि कई आदमियों के नाम पुलिस को बतायें और इकबाल कर दिया लगभग तीस चालीस आदमी पकड़े गये । एक दूसरा व्यक्ति था जो बहुत वीर था । पुलिस उसके पीछे पड़ी हुई थी । एक दिन पुलिस कप्तान ने सवार तथा तीस चालीस बन्दूक वाले सिपाही लेकर उसके घर में उसे घेर लिया । उस ने छत पर चढ़ कर दोनाली कारतूसी बन्दूक से लगभग तीन सौ फायर किये बन्दूक गरम होकर गल गई । पुलिस वाले समझे कि घर में कई आदमी है ।

सब पुलिस वाले छिप कर आड़ में से सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगे। उसने मौका पाया । मकान के पीछे से कूद पड़ा, एक सिपाही ने देख लिया । उसने सिपाही की नाक पर रिवाल्वर का कुन्दा मारा । सिपाही चिल्लाया । सिपाही के चिल्लाते ही मकान में से फायर हुआ । पुलिस वाले समझे मकान में ही में है । सिपाही को धोखा हुआ होगा । बस तो वह जंगल में निकल गया । अपनी स्त्री को एक टोपीदार बन्दूक दे आया था कि यदि चिल्लाहट हो तो फायर कर देना । ऐसा ही हुआ और वह निकल गया । जंगल में जाकर एक दूसरे दल से मिला । जंगल में भी एक समय पुलिस कप्तान से सामना हो गया । गोली चली । उसके भी पैर में छर्रें लगे थे । अब यह बड़े साहसी हो गये थे ।

सभी समझ गये थे कि पुलिस वाले किस प्रकार समय पर आड़ में छिप जाते हैं । इन लोगों का दल छिन्न-भिन्न हो गया था । अतः उन्होंने मेरे पास आश्रय लेना चाहा । मैंने बड़ी कठिनता से अपना पीछा छुड़ाया । तत्पश्चात् यह लोग जंगल में जाकर ये दूसरे दल से मिल गये । वहां पर दुराचार के कारण जंगल के दल के नेता  ने इन्हें गोली से मार दिया । उस नेता को भी समय पाकर उसके साथी ने गोली से मार दिया । इस प्रकार से सब दल छिन्न-भिन्न हो गया । जो पकड़े गये उन पर कई डकैतियां चली, किसी का तीस साल, किसी को पचास साल, किसी को बीस साल की सजायें हुई । एक बेचारा जिसका किसी डकैती से कोई सम्बन्ध न था, केवल शत्रुता के कारण फंसा दिया गया । उसे फांसी हो गई

और जो सब प्रकार डकैतियों में सम्मिलित था,  जिसके पास डकैती का माल तथा कुछ अन्य हथियार पाये  गये ।  पुलिस से गोली भी चली उसे पहले फांसी की सजा की आज्ञा हुई पर पैरवी अच्छी हुई । अतएव हाईकोर्ट से फांसी की सजा माफ हो गई, केवल पांच वर्ष की सजा रह गई । जेल वालों से मिल कर उसने डकैतियों में शिनाख्त न होने दी थी । इस प्रकार इस दल की समाप्ति हुई ।  देव योग से हमारे अस्त्र बच गये । केवल एक ही रिवाल्वर पकड़ा गया ।

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