पग पग विश्वासघात

जनवरी 30, 2009 को 1:19 पूर्वाह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-2, सरफ़रोशी की तमन्ना | 3 टिप्पणियाँ
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प्रतिज्ञा, पलायनावस्था व शाहजहांपुर में आप पढ़ चुके हैं…   जब राजकीय घोषणा हुई और राजनैतिक कैदी छोड़े गये, तब शाहजहांपुर आ कर कोई व्यवसाय करने का विचार हुआ, ताकि माता पिता की कुछ सेवा हो सके । विचार किया करता था कि इस जीवन में अब फिर कभी आजादी से शाहजहांपुर में विचरण न कर सकूंगा । पर परमात्मा की लीला अपार है । वे दिन आये । मैं पुनः शाहजहांपुर का निवासी हुआ ।   इसके आगे की कड़ी में.. … 

Sarfaroshi

पंडित गेंदालाल दीक्षित
आप का जन्म यमुना तट पर बटेश्वर के निकट मई नामक एक  ग्राम में हुआ था । आप ने मैटिक्यूलेशन दसवां दर्जें अंगरेजी का पास किया था । आप जब औरेया जिला इटावा में डी0ए0वी0 स्कूल के टीचर थे,  तब आप ने शिवाजी समिति की स्थापना की थीं जिस का उददेश्य था शिवा की भांति दल बना कर उससे लूटमार करवाना । उसमें से चौथ लेकर हथियार खरीदना और उसे दल में बांटना । इसी की सफलता के लिये आप रियासत से हथियार ला रहे थे,  जो कुछ नवयुवकों की असावधानी के कारण आगरा में स्टेशन के निकट पकड़ लिये गये थे ।

आप बड़े बीर तथा उत्साही थे । शान्त बैठना जानते ही न थे । नवयुवकों को सदैव कुछ न कुछ उपदेश करते रहते थे । एक-एक सप्ताह तक बूट तथा वर्दी न उतारते थे । जब आप ब्रम्हचारी जी के पास सहायता लेने गये,  तो दुर्भाग्यवश गिरफतार कर लिये गये । ब्रम्हचारी के दल ने अंगरेजी राज्य में कई डाके डाले थे । डाके डाल कर ये लोग चम्बल के बीहड़ों में छिप जाते थे । सरकार राज्य की ओर से ग्वालियर महाराज को लिखा गया । इस दल के पकड़ने का प्रबन्ध किया गया । सरकार ने तो हिन्दुस्तानी फौज भी भेजी थी, जो आगरा जिला में चम्बल के किनारे बहुत दिनों तक पड़ी रही । पुलिस सवार तैनात किये, किन्तु ये लोग तनिक भी भयभीत न हुये ।

विश्वासघात से पकड़े गये इन्हीं में से एक आदमी को पुलिस ने मिला लिया । डाका डालने के लिये दूर एक स्थान निश्चय किया गया । जहां तक जाने के लिये एक जगह पड़ाव देना पड़ता था । चलते-चलते सब थक गये । पड़ाव दिया गया । जो आदमी पुलिस से मिला हुआ था । उसने भोजन लाने को कहा, क्योंकि उसके किसी सम्बन्धी का मकान निकट ही था । वह पूरी करा के लाया । सब पड़ी खाने लग गये । ब्रम्हचारी जी जो सदैव अपने हाथ से बना कर भोजन करते थे, या आलू अथवा घुइंया भून कर खा लेते थे, उन्होंने भी उस दिन पूड़ी खाई । उनकी जबान ऐंठने लगी और जो अधिक खा गये थे, वे गिर गये । पूड़ी लाने वाला पानी लेने के बहाने चल दिया । पूड़ियों में विष मिला हुआ था । ब्रम्हचारी जी ने बन्दूक उठा कर पूड़ी लाने वाले पर गोली चलाई ।

ब्रम्हचारी की गोली का चलना था कि चारों ओर से गोली चलने लगी । पुलिस छिपी हुई थी । गोली चलने से ब्रम्हचारी जी के कई गोली लगी । तमाम शरीर घायल हो गया ।      पं. गेंदालाल जी की आंख में एक छर्रा लगा । बाईं आँख जाती रही । कुछ आदमी जहर के कारण मरे, कुछ गोली से मारे गये । सब पकड़ कर के ग्वालियर के किले में बन्द कर दिये गये । किले में हम लोग जब पण्डित जी से मिले तब चिट्ठी भेज कर उन्होंने हम को सब हाल बताया । एक दिन हम लोगों पर भी किले में सन्देह हो गया था, बड़ी कठिनता से एक अधिकारी की सहायता से हम लोग निकल सके ।

जब मैनपुरी षड्यन्त्र का अभियोग चला,  पंडित गेंदालाल जी को सरकार ने ग्वालियर राज्य से मंगाया । ग्वालियर के किले का जलवायु बड़ा ही हानिकारक था । पण्डित जी को क्षय रोग हो गया था । मैनपुरी स्टेशन से जेल जाते समय ग्यारह बार रास्ते में बैठकर जेल पहुंचे । पुलिस  से जब हाल पूछा तो उन्होंने कहा इन बालकों को क्यों गिरफतार किया है ?

मैं हाल बताउंगा । पुलिस को विश्वास हो गया। आप को जेल से निकाल कर दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रख दिया । वहां पर सब विवरण जान रात्रि के समय एक और सरकारी गवाह को लेकर पण्डित जी भाग खड़े हुये । भाग कर एक गांव में एक कोठरी में ठहरे । साथी कुछ काम के लिये बाजार गया और फिर लौट कर न आया । बाहर से कोठरी की जन्जीर बन्द कर गया था । पण्डित जी उसी कोठरी में तीन दिन बिना अन्न जल के बन्द रहे । समझे कि साथी किसी आपत्ति में फंस गया होगा, अन्त में किसी प्रकार से जन्जीर खुलवाई । रूपये वह सब साथ ही ले गया था । पास एक पैसा भी न था ।

कोटा से पैदल आगरा आये । किसी प्रकार अपने घर पहुंचे । बहुत रूग्ण हो रहे थे । पिता ने यह समझ कर कि घर वालों पर आपत्ति न आवें पुलिस को सूचना देनी चाही । पण्डित जी ने पिता से बड़ी विनय प्रार्थना की और दो तीन दिन में घर छोड़ दिया । हम लोगों की बहुत खोज की । किसी का कुछ अनुसंधान न पा देहली में एक प्याउ पर पानी पिलाने की नौकरी कर ली । अवस्था दिनों दिन बिगड़ रही थी । रोग भीषण रूप धारण कर रहा था । छोटे भाई तथा पत्नी को बुलाया ।

भाई किंकर्तव्य विमूढ़ !  क्या कर सकता था ? सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने ले गया । पण्डित जी की धर्मपत्नी को दूसरे स्थान में भेज कर जब वह अस्पताल आया, तो जो देखा उसे लिखते हुए लेखनी कम्पायमान होती है ! पण्डित जी शरीर त्याग चुके थे । केवल उनका मृत षरीर मात्र ही पड़ा हुआ था । स्वदेश की कार्यसिद्धि में पं. गेंदालाल दीक्षित ने जिस निःसहाय अवस्था में अन्तिम बलिदान दिया,  उस की स्वप्न में भी आशा न थी । पण्डित जी की प्रबल इच्छा थी, कि उनकी गोली लग कर मृत्यु हो ।

भारतवर्ष की एक महा्न आत्मा विलीन हो गई और देश में किसी ने जाना भी नहीं । आप की विस्तृत जीवनी प्रभा मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है । मैनपुरी षड्यन्त्र के मुख्य नेता आप ही समझे गये । इस षड्यन्त्र में विशेषतायें ये हुई कि नेताओं में से केवल दो व्यक्ति पुलिस के हाथ आये जिनमें पण्डित गेंदालाल दीक्षित एक सरकारी गवाह को लेकर भाग गये । तथा श्रीयुत  शिवकृष्ण जेल से भाग गये और फिर हाथ न आये । 

छः मास पश्चात जिन्हें सजा हुई थी वे भी राजकीय घोषणा से मुक्त कर दिये गये । किन्तु खुफिया पलिस विभाग का क्रोध पूर्णतया शान्ति न हो सका और उनकी बदनामी भी इस केस में बहुत हुई । पं. गेंदालाल जी दीक्षित कहा करते थे –

 
थाती नर तन पाय के,  क्यों करता है नेह । 
मुँह उज्जवल कर सौंप दे,  जिसको जिसकी देह।

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3 टिप्पणियाँ »

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  1. थाती नर तन पाय के, क्यों करता है नेह ।
    मुँह उज्जवल कर सौंप दे, जिसको जिसकी देह।

    क्या आदर्श थे।

  2. aapka ye pariaas bahut sunder laga aasha hai aisi anmol rachnaayen likhte rahenge parnaam

  3. are aapka ye blog to pahli baar dekha . bahut hi achcha laga .


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