हथियारों की खरीद

जनवरी 26, 2009 को 9:05 अपराह्न | आत्म-चरित, खण्ड-2 में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ
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अबतक आपने पढ़ा…

उसी समय देशवासियों के नाम संदेश नामक एक पर्चा छपवाया गया । जिसका कारण था कि पंडित  गेंदालाल जी ब्रम्हचारी जी दल सहित ग्वालियर में गिरफतार हो गये थे । अब सब विद्यार्थियों ने अधिक उत्साह के साथ काम करने की प्रतिज्ञा की । पर्चें कई जिलों में लगाये गये, और बांटे भी गये । पर्चें तथा अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली संयुक्त प्रान्त की सरकार ने जब्त कर ली । इससे आगे पढ़ें …

Sarfaroshi

हथियारों की खरीद

अधिकतर लोगों का विचार है कि देशी राज्यों में हथियार रिवाल्वर, पिस्तौल तथा राइफलें इत्यादि सब कोई रखता है और बंदूक इत्यादि पर लाइसेन्स नहीं होता । अतएव इस प्रकार के अस्त्र बड़ी सुगमता से प्राप्त हो सकते हैं । देशी राज्यों में हथियारों पर कोई लाइसेन्स नहीं, यह बात बिल्कुल ठीक है । हर एक को बन्दूक इत्यादि रखने की आजादी है । किन्तु कारतूसी हथियार बहुत कम लोगों के पास रहते है, जिस का कारण यह है कि कारतूस या विलायती बारूद खरीदने पर पूलिस में सूचना देनी होती है । राज्य में तो कोई ऐसी दूकान नहीं होती जिस पर कारतूस या कारतूसी हथियार मिल सकें ।

यहां तक कि विलायती बारूद और बन्दूक की टोपी भी नहीं मिलती । क्योंकि ये सब चीजें बाहर से मंगानी पड़ती हैं । जो चीजें इस प्रकार की बाहर से मंगाई जाती है, उनके लिये रेजीडेण्ट गवर्नमेंट का प्रतिनिधि जो रियासतों में रहता है की आज्ञा लेनी पड़ती है ।

बिना रेजीडेण्ट की मंजूरी के हथियारों सम्बन्धी कोई चीज बाहर से रियासत में नहीं आ सकती । इस कारण इस खटखट से बचने के लिये रियासत में टोपीदार बन्दूकें बनती है, और देशी बारूद भी वहीं के लोग शोरा, गन्धक तथा कोयला मिला कर बना लेते हैं । बन्दूक की टोपी चुरा छिपाकर मंगा लेते है । नहीं तो टोपी के स्थान पर भी मनसल और पुटास अलग-अलग पीसकर दोनों को मिलाकर उसी से काम चलाते है । हथियार रखने की आजादी होने पर भी ग्रामों में किसी एक दो धनी या जमींदार के यहां टोपीदार बन्दूक या टोपीदार छोटे पिस्तौल होते हैं । जिनमें ये लोग रियासत की बनी हुई बारूद काम मे लाते हैं । यह बारूद बरसात में सील खा जाती है और काम में नहीं देती ।

एक बार मैं अकेला रिवाल्वर खरीदने गया । उस समय तक समझता था कि हथियारों की दूकान होगी, सीधे जाकर दाम देंगे और रिवाल्वर लेकर चले आवेंगे । प्रत्येक दूकान देखी, कहीं किसी पर बन्दूक इत्यादि का विज्ञापन या कोई दूसरा निशान न पाया । फिर एक तांगा पर सवार होकर, सब शहर घूमा । तांगे वाले ने पूछा क्या चाहिये । मैंने उसे डरते-डरते अपना उद्देश्य कहा । उसी ने दो तीन दिन घूम फिर कर एक टोपीदार रिवाल्वर खरीदवा दिया था, और देशी बनी हुए बारूद एक दूकान से दिला दी । मैं कुछ जानता तो था नहीं, एक दम दो सेर बारूद खरीदी । जो घर पर सन्दूक में रखे-रखे बरसात में सील खाकर पानी हो गई । मुझे बड़ा दुख हुआ ।

दूसरी बार जब मैं क्रान्तिकारी समिति का सदस्य हो चुका था, तब दूसरे सहयोगियों की सम्मति से दो सौ रूपया लेकर हथियार खरीदने गया । इस बार मैने बहुत प्रयत्न किया तो एक कबाड़ी जैसी दुकान पर कुछ तलवारें, खंजर, कटार तथा दो चार टोपीदार बन्दूकें रखी देखी । मैंने बड़ा साहस करके उससे पूछा कि क्या आप यह चीजें बेचते हैं, उसने जब हां में उत्तर दिया तो मैंने दो चार चीजें देखीं और दाम पूछे । इस प्रकार वार्तालाप करके पूछा, कि क्या आप कारतूसी हथियार नहीं बेचते या और कहीं नहीं बिकते ? तब उसने सब विवरण सुनाया ।

उस समय उसके पास टोपीदार एक नली के छोटे-छोटे दो पिस्तौल थे । मैने वे दोनों खरीद लियें एक कटार भी खरीदी । उसने वादा किया कि यदि आप फिर आवें तो कुछ कारतूसी हथियार जुटाने का प्रयत्न किया जावें । लालच बुरी बला है, वाली कहावत के अनुसार तथा इसलिये भी कि हम लोगों को कोई दूसरा ऐसा जरिया भी न था, जहां से हथियार मिल सकते, मैं कुछ दिनों बाद फिर गया । इस समय उसी ने एक बड़ा सुन्दर कारतूसी रिवाल्वर दिया । कुछ पुराने कारतूस दिये । रिवाल्वर था तो पुराना, किन्तु बड़ा ही उत्तम था । दाम उसने नये के बराबर देने पड़े ।

अब उसे विश्वास हो गया कि यह हथियारों के खरीदार है । उसने प्राणपण से चेष्टा की और कई रिवाल्वर तथा दो तीन रायफलें जुटाईं । उसे भी अच्छा लाभ हो जाता था । प्रत्येक वस्तु पर वह बीस तीस रूपये मुनाफा ले लेता था । बाज-बाज चीज पर दूना नफा खा लेता था । इसके बाद हमारी संस्था के दो तीन सदस्य मिल कर गये । दूकानदार ने भी हमारी उत्कट इच्छा को देखकर इधर-उधर से पुराने हथियारों को खरीद करके, उनकी मरम्मत की और नया सा कर के हमारे हाथ बेचना शुरू किया ।

हम लोग कुछ जानते थे नहीं, उसने खूब ठगा । इसी प्रकार अभ्यास करने से कुछ नया पुराना समझने लगे । एक दूसरे सिकलीगर से भेंट हुई । वह स्वयं कुछ नहीं जानता था, किन्तु उसने वचन दिया कि वह कुछ रईसों से हमारी भेंट करा देगा । उसने एक रईस से मुलाकात कराई जिनको एक  रिवाल्वर बेचना था । रिवाल्वर खरीदने की हमने इच्छा प्रकट की । उन महाशय ने उस रिवाल्वर के डेढ़ सौ रूपये मांगे । रिवाल्वर नया था । बड़े कहने सुनने पर सौ कारतूस उन्होंने दिये और 155 रूपये लिये । 150 उन्होंने स्वयं लिये 5 रू0 सिकलीगर को कमीशन के तौर देने पड़े ।  

रिवाल्वर चमकता हुआ नया था, समझे अधिक दामों का होगा । खरीद लिया । विचार हुआ कि इस प्रकार ठगे जाने से काम न चलेगा । किसी प्रकार कुछ जानने का प्रयत्न किया जावे । बड़ी कोशिश के बाद कलकत्ता, बम्बई से बन्दूक विक्रेताओं की लिस्टें मंगा कर देखी। देखकर आंखे खुल गईं। जितने रिवाल्वर या बन्दूकें हम ने खरीदीं थी, दो एक को छोड़ कर सब के दूने दाम दिये थे । 155 के रिवाल्वर के दाम केवल 30 रूपये ही थे और 10 के सौ कारतूस, इस प्रकार कुल सामान 40 रूपये का था, जिस के बदले 155 देने पड़े। बड़ा खेद हुआ।

करें तो क्या करें और कोई दूसरा जरिया भी तो न था । कुछ समय पश्चात कारखानों की लिस्टें ले कर तीन चार सदस्य मिल कर गये । खूब जांच तथा खोज की । किसी प्रकार रियासत की पुलिस को पता चल गया । एक खुफिया पुलिस वाला मुझे मिला, उसने कई हथियार दिलाने का वादा किया और वह मुझे पुलिस इंस्पेक्टर के घर पर ले गया । दैवात उस समय पुलिस इंस्पेक्टर घर पर मौजूद न थे । उनके द्वार पर एक पुलिस का सिपाही बैठा था, जिसे मैं भलीभांति जानता था । मुहल्ले में खुफिया पुलिसवाले की आंख बचा कर पूछा कि अमुक घर किस का है ?  मालूम हुआ पुलिस इंन्सपेक्टर का ।            मैं इतस्ततः करके जैसे तैसे निकल आया, और अति शीघ्र अपने ठहरने का स्थान बदला ।

उस समय हम लोगों के पास दो राइफलें, चार रिवाल्वर तथा दो पिस्तौल खरीदे हुये मौजूद थे । किसी प्रकार उस खुफिया पुलिस वाले को एक कारीगर से जहां पर कि हम लोग अपने हथियारों की मरम्मत कराते थे मालूम हुआ कि हम में से एक व्यक्ति उसी दिन जाने वाला था । उसने चारों ओर स्टेशन पर तार दिलवाये । रेल-गाड़ियों की तलाशी ली गई, पर पुलिस की असावधानी के कारण हम बाल-बाल बच गये । रूपये की चपत बुरी होती है ।

एक पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट के पास एक राइफल थी । मालूम हुआ वे बेंचते है । हम लोग पहुंचे अपने आपको रियासत का रहने वाला बताया था । उन्होंने निश्चय करने के लिए बहुत से प्रश्न पूछे, क्योंकि हम लोग लड़के तो थे ही । पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट  पेंशनयाफ़्ता  और  जाति के मुसलमान थे । हमारी बातों पर पूर्ण विश्वास न हुआ ।

उन्होंने कहा अपने थानेदार से लिखा लाओ कि वह तुम्हें जानता है । मैं गया जिस स्थान का रहने वाला बताया था , वहां के थानेदार का नाम मालूम किया और एक जो जमींदारों का नाम मालूम कर के एक पत्र लिखा कि मैं उस स्थान के रहने वाले अमुक जमीदार का पुत्र हूं और वे लोग मुझे भली भांति जाते हैं । उसी पत्र पर जमींदार के हिन्दी में और पुलिस के दरोगा के अंग्रेजी में हस्ताक्षर बना करके पत्र ले जाकर पुलिस कप्तान साहब को दिया । बड़े गौर से देखने के बाद वे बोले मैं थाने में दरियाफत कर लूं । तुम्हें भी थाने चल कर इत्तिला देनी होगी कि राइफलें खरीद रहें है । हम लोगों ने कहा कि हमने आप के इत्मीनान के लिए इतनी मुसीबत झेली, दस बारह रूपये खर्च किये, अगर अब भी इत्मीनान न हो तो मजबूरी है ।

हम पुलिस में न जावेंगे । राइफलों के दाम लिस्ट में 180 रूपये लिखे थे, वह 250 रूपये मांगते थे, साथ में दो सौ कारतूस भी दे रहे थे । कारतूस भरने का सामान भी देते थे, जो लगभग 50 रूपये का होता । इस प्रकार वह पुरानी राइफलें के नई के समान दाम मांगते थे । हम लोग भी 250 देते थे । पुलिस कप्तान ने भी विचारा कि पूरे दाम मिल रहे हैं । स्वयं वृद्ध हो चुके थे । कोई पुत्र भी न था । अतएव 250 रूपये लेकर राइफलें दे दी ! पुलिस में कुछ पूछने न गये ।

उन्हीं दिनों राज्य के एक उच्च पदाधिकारी के नौकर को मिला कर उनके यहां से रिवाल्वर चोरी कराया । जिसके दाम लिस्ट में 75 रूपये थे । उसे 100 रू0 में खरीदा । एक माउजर पिस्तौल भी चोरी कराया जिसके दाम लिस्ट में उस समय 200 रू0 दिये थें हमें माउजर पिस्तौल प्राप्ति की बड़ी उत्कट इच्छा थी । बड़े भारी प्रयत्न के बाद यह माउजर पिस्तौल मिला, जिसका मूल्य 300 रू0 देना पड़ा । कारतूस एक भी नहीं मिला । हमारे पुराने मित्र कबाड़ी महोदय के पास माउजर पिस्तौल के पचास कारतूस पड़े थे । उन्होंने बड़ा काम दिया ।

हममें से किसी ने भी पहले माउजर पिस्तौल देखा भी न था । कुछ न समझ सकें कि कैसे प्रयोग किया जाता है । बड़े कठिन परिश्रम से उसका प्रयोग समझ में आया । हमने  तीन राइफलें, एक बारह बोर की दोनली कारतूसी बन्दूक, दो टोपीदार बन्दूकें, तीन टोपीदार रिवाल्वर और पांच कारतूसी रिवाल्वर खरीदे । प्रत्येक हथियार के साथ पचास या सौ कारतूस भी ले लिये । इन सबमें लगभग चार हजार रूपये व्यय हुए । कुछ कटार तथा तलवारें इत्यादि भी खरीदें थे ।

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3 टिप्पणियाँ »

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  1. औजार खरीदी का किस्सा रोचक रहा. हमें याद आ रहा है कि हमने भी जंगलों में रहते समय चले हुए कारतूस में दुबारा बारूद भर कर उसे काम के लायक बना लेते थे. दीपावली में बच्चों के द्वारा प्रयुक्त होने वाले तमंचों में जो लाल रंग की टिकिया लगाई जाती है, उसे ही कारतूस में टोपी के लिए प्रयोग में लेते थे. आभार.

  2. इस्तेमाल हो चुके खोखों में बारूद भरकर खूब चलाया है. बाद मैं बन्दूक की नाली ख़राब होने के डर से दांत भी बहुत खाई है. आज आम समझी जाने वाली चीज़ें भी कितनी दुर्लभ और बेशकीमती थीं, यह जानकर उन वीरों की कठिनाई का बेहतर अंदाज़ लग पाता है.

  3. Inposts se un veeron ke utsah ki jhalak milti hai.


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