गुरु सोमदेव व क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात

जनवरी 20, 2009 को 9:04 अपराह्न | आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे
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अबतक आपने पढ़ा….

डिप्टी कमिश्नर के पास रिपोर्ट हुईं उसने आप को दर्शनार्थ बुलाया । वह बड़ा क्रोधित था । लेख को पढ़ कर कांपता, और क्रोध में आकर मेज पर हाथ दे मारता था । किन्तु अन्तिम शब्दों को पढ़कर वह चुप हो जाता । उस लेख के शब्द यों थे, कि यदि अंग्रेज अब भी न समझेंगे तो वह दिन दूर नहीं कि सन 57 के दृश्य फिर दिखाई दें और अंग्रेजों के बच्चों का कतल किया जावे, उनकी रमणियों की बेइज्जती हो इत्यादिं, किन्तु क्या यह सब स्वप्न है ? यह सब स्वप्न है, इन्हीं शब्दों को पढ़ कर डिप्टी कमिश्नर कहता कि हम तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते । अब आगे पढ़ें…

स्वामी सोमदेव भ्रमण करते हुए बम्बई पहुंचे । वहां पर आप के उपदेशों को सुन कर जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा । एक व्यक्ति, जो श्रीयुत अबुलकलाम आजाद के बड़े भाई थे, आप के व्याख्यान को सुन कर मोहित हो गये । वह आप को अपने घर लिवा ले गये । इस समय तक आप गेरूआ कपड़ा न पहिनते थे । केवल एक लुंगी और कुरता पहनते थे और साफा बांधते थे ।

श्रीयुत अबुलकलाम आजाद के पूर्वज अरब के निवासी थे । आपके पिता के बम्बई में बहुत से मुरीद थे और कथा की तरह कुछ धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने पर हजारों रूपये चढ़ावें में आया करते थे । वह सज्जन इतने मोहित हो गये कि उन्होंने धार्मिक कथाओं का पाठ करने के लिए जाना छोड़ दिया । वह दिन रात आप के पास ही बैठे रहते । जब आप उनसे कहीं जाने को कहते तो वह रोने लगते ओर कहते कि मैं तो आपके आत्मिक ज्ञान के उपदेशों पर मोहित हूं । मुझे संसार में किसी वस्तु की भी इच्छा नही । आपने एक दिन क्रोधित होकर उन के धीरे से चपत मार दी जिससे वह दिन भर रोते रहे । उनको घर वालों तथा मज़हबी शिष्यों ने बहुत कुछ समझाया किन्तु वह धार्मिक कथा कहने न जाते ।

यह देख कर उनके मुरीदों को बड़ा क्रोध आया कि हमरे धर्मगुरू एक काफिर के चक्कर में फंस गये हैं । एक दिन संध्या को स्वामी जी अकेले समुद्र के तट पर भ्रमण करने गये थे कि कई मुरीद मकान पर बन्दूक ले कर स्वामी जी को मार डालने के लिए आये । यह समाचार जान कर उन्होंने स्वामी जी के प्राणों का भय देख स्वामी जी से बम्बई छोड़ देने की प्रार्थना की । प्रातःकाल एक स्टेशन पर स्वामी जी केा तार मिला कि आपके प्रेमी श्रीयुत अबुलकलाम आजाद के भाई साहब ने आत्महत्या कर ली । तार पा कर आप को बड़ा क्लेश हुआ । जिस समय आपको इन बातों का स्मरण हो आता था, तो बड़े दुखी होते थे ।

एक दिन संध्या के समय मैं आप के निकट बैठा हुआ था अंधेरा काफी हो गया था । स्वामी जी ने बड़ी गहरी ठण्डी सांस ली, मैंने चेहरे की ओर देखा तो आंखों से आंसू बह रहे थे । मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ मैंने कई घंटे कारण जानने की प्रार्थना की । तब आप ने उपरोक्त विवरण सुनाया ।

अंग्रेजी की योग्यता आप की बड़ी उच्च कोटि की थी । शास्त्र-विषयक आप का ज्ञान बड़ा गम्भीर था । आप बड़े निर्भीक वक्ता थे । आपकी योग्यता को देख कर एक बार मद्रास की कांग्रेस कमेटी ने अखिल भारतवर्षीय कांग्रेस का प्रतिनिधि चुन कर भेजा था । आगरा की आर्यमित्र सभा के वार्षिकोत्सव पर आप के व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप जी बड़े मुग्ध हुये थे । राज साहब ने आपके पैर छुये और अपनी कोठी पर लिवा ले गये । उस समय से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते और आप को अपना गुरू मानते थे । इतना साफ निर्भीक बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा । सन 1913 ई0 में मैंने आप का पहला व्याख्यान शाहज़हाँपुर में सुना था । आर्य समाज के वार्षिकोत्सव पर आप पधारे थे । उस समय आप बरेली में निवास करते थे ।

आपका शरीर बहुत ही कृ्श था क्योंकि आप को एक अद्भुत रोग हो गया था । आप जब शौच जाते थे, तब आप के खून गिरता था । कभी दो छटांक, कभी चार छटांक और कभी-कभी तो एक सेर तक खून गिरता था । आपको बवासीर नहीं थी । ऐसा कहते थे कि किसी प्रकार योग की क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आंत में कुछ विकार उत्पन्न हो गया । आंत सड़ गई । पेट चिरवा कर आंत कटवाना पड़ी और तभी से वह रोग हो गया था । बड़े -बड़े वैद्य डाक्टरों की औषधि की किन्तु कुछ लाभ न हुआ ।

इतने कमजोर होने पर भी जब व्याख्यान देते तब इतने जोर से बोलते कि तीन चार फरलांग से आपका व्याख्यान साफ सुनाई देता था । दो तीन वर्ष तक आप को हर साल आर्य समाज के वार्षिकोत्सव पर बुलाया जाता । सन् 1915 ई0 में कतिपय सज्जनों की प्रार्थना पर आप आर्य समाज मन्दिर शाहजहांपुर में ही निवास करने लगे । इसी समय से मैने आप की सेवा-सुश्रूषा में समय व्यतीत करना आरम्भ कर दिया ।

स्वामी जी मुझे धार्मिक तथा राजनैतिक उपदेश देते थे और इस प्रकार की पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश करते थें । राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि का था । लाला हरदयाल से आप से बहुत परामर्श होता था । एक बार महात्मा मुन्शीराम जी तथा स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानन्द जी को आपने पुलिस के प्रकोप से बचाया । आर्चाय रामदेव जी तथा श्रीयुत कृष्ण जी से आपका बड़ा स्नेह था । राजनीति में आप मुझ से अधिक खुलते न थें आप मुझसे बहुधा कहा करते थे कि इन्टेन्स पास कर लेने के बाद योरूप यात्रा अवश्य करना । इटली जा कर महात्मा मेजिनी की जन्मभूमि के दर्शन अवश्य करना ।

सन 1916 ई0 में लाहौर षड्यन्त्र का मामला चला । मैं समाचार पत्रों में उस का सब वृतान्त बड़े चाव से पढ़ा करता था । श्रीयुत भाई परमानन्द जी में मेरी बड़ी श्रद्धा थी क्योंकि उनकी लिखी हुए तवारीख हिन्द पढ़ कर मेरे हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा था । लाहौर षड़यन्त्र का फैसला अखबारों में छपा । श्री भाई परमानन्द जी को फांसी की सजा पढ़ कर मेरे शरीर में आग लग गई ।

मैने विचारा कि अंग्रेज बड़े अत्याचारी है । इनके राज्य में न्याय नहीं, जो इतने बड़े महानुभाव को फांसी की सजा का हुकम दे दिया । मैने सप्रतिज्ञा की कि इसका बदला अवश्य लूंगा । जीवन भर अंग्रेजी राज्य को विध्वंस करने का प्रयत्न करता रहूंगा । इस प्रकार की प्रतिज्ञा कर चुकने के पश्चात मैं स्वामी जी के पास आया । सब समाचार सुनाये और अखबार दिया । अखबार पढ़कर स्वामी जी भी बड़े दुखित हुये । तब मैने अपनी प्रतिज्ञा के सम्बन्ध में कहा । स्वामी जी कहने लगे कि प्रतिज्ञा करना सरल है, किन्तु उस पर दृढ़ रहना कठिन है ।  मैने स्वामी जी को प्रणाम कर उत्तर दिया कि यदि श्री चरणों की कृपा बनी रहेगी तो प्रतिज्ञा की पूर्ति में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं करूंगा ।

उस दिन से स्वामी जी कुछ-कुछ खुले । वे बहुत सी बातें बताया करते थे । उस ही दिन से मेरे क्रान्तिकारी जीवन का सूत्रपात हुआ । यद्यपि आप आर्य-समाज के सिद्धांतों को सर्वप्रकारेण मानते थे । किन्तु परमहंस राजकृश्ण, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ तथा महात्मा कबीरदास के उपदेशों का अधिकतर वर्णन करते थे ।

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