प्रवास और दुर्दिन

जनवरी 12, 2009 को 11:56 अपराह्न | Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-1 | 1 टिप्पणी
टैग: , , , , , , , ,

प्रवासकथा

तोमरघर में चम्बल नदी के किनारे पर जो ग्राम आबाद है जो ग्वालियर राज्य में बहुत ही प्रसिद्ध हैं क्योंकि इन ग्रामों के निवासी बड़े उदण्ड है । वह राज्य की सत्ता की कोई चिन्ता नहीं करते । जमींदारों का यह हाल है कि जिस साल उनके मन में आता है राज्य को भूमि-कर देते हैं ओर जिस साल उनकी इच्छा होती है मालगुजारी देने से साफ इन्कार कर जाते हैं । यदि तहसीलदार या कोई और राज्य का अधिकारी आता है तो जमीदार बीहड़ में चले जाते हैं । और महीनों बीहड़ों में ही पड़े रहते हैं, उन के पशु भी वहीं रहते हैं और भोजनादि भी बीहड़ों में ही होता है घर पर कोई ऐसा मूल्यवान पदार्थ नहीं छोड़ते जिसे नीलाम करके मालगुजारी वसूल की जा सके ।

निज जीवन की एक छटा एक जमीदार के सम्बन्ध में कथा प्रचलित है कि मालगुजारी न देने के कारण ही उनकी कुछ भूमि माफी मिल गई । पहिले तो कई साल तक भागे रहे एक बार धोखे से पकड़ लिये गये फिरतो तहसील के अधिकारियों ने उन्हें बहुत सताया । कई दिन तक बिना खाना-पानी बंधा रहने दिया । अन्त में जलाने की धमकी दे पैरों पर सूखी घास डालकर आग लगवा दी । किन्तु उन जमीदार महोदय ने भूमि-कर देना स्वीकार न किया और यही उत्तर दिया कि ग्वालियर महाराज के कोष में मेरे कर न देने से ही घटी न पड़ जायेगी । संसार क्या जानेगा कि अमुक व्यक्ति उदण्डता के कारण ही अपना समय व्यतीत करता है । राज्य को लिखा गया जिसका परिणाम यह हुआ कि उतनी भूमि उन महाशय को माफी में दे दी गई ।

इसी प्रकार एक समय इन ग्रामों के निवासियों को एक अद्भुत खेल सूझा । उन्होंने महाराज के रिसाले के साठ उंट चुराकर बीहड़ों में छुपा दिये । राज्य को लिख गया जिस पर राज्य की ओर से आज्ञा हुई कि दोनों ग्राम तोप लगाकर उड़ा दिये जावें । न जाने किस प्रकार समझाने बुझाने से उंट वापस किये गये और अधिकारियों को समझाया गया कि इतने बड़े राज्य में थोड़े से वीर लोगों का निवास है, इनका विध्वंस न करना ही उचित होगा । तब तोपें लौटाई गईं और ग्राम उड़ाये जाने से बचे । ये लोग अब राज्य निवासियों को तो अधिक नहीं सताते किन्तु बहुधा अंग्रेजी राज्य में आकर उपद्रव कर जाते हैं और अमीरों के मकानों पर छापा मारकर रात ही रात बीहड़ में दाखिल हो जाते हैं । बीहड़ में पहुंच जाने पर पुलिस या फौज कोई भी उनका बाल बांका नहीं कर सकती । ये दोनों ग्राम अंग्रेजी राज्य की सीमा से लगभग पन्द्रह मील की दूरी पर चम्बल नदी के तट पर हैं ।

यहीं के एक प्रसिद्ध वंश में मेरे पितामह श्री नारायणलाल जी का जन्म हुआ था । वे अपने कौटुम्बिक और अपनी भाभी के असहनीय दुर्व्यवहार के कारण मजबूर हो अपनी जन्मभूमि से चले आये और उनके दो पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र श्री मुरलीधर जी मेरे पिता हैं । उस समय इनकी अवस्था आठ वर्ष और उनके छोटे पुत्र-मेरे चाचा श्री कल्याणमल की उम्र छः वर्ष की थी । इस समय यहां दुर्भिक्ष का भयंकर प्रकोप था ।

दुर्दिन

अनेक प्रयत्न करने के पश्चात शाहजहांपुर में एक अत्तार महोदय की दूकान पर श्रीयुत नारायणलाल जी को 3द्ध मासिक वेतन की नौकरी मिली । 3द्ध मासिक में दुर्भिक्ष के समय चार प्राणियों का किस प्रकार निर्वाह हो सकता था ? दादी जी ने बहुत प्रयत्न किया कि अपने आप केवल एक समय आधे पेट भोजन करके बच्चों का पेट पाला जावे किन्तु फिर भी निर्वाह न हो सका । बाजरा, कुकनी, सामा, ज्वार इत्यादि खाकर दिन काटना चाहे, किन्तु फिर भी गुजारा न हुआ तब आधा बथुआ चना व कोई दूसरा साग जो सबसे सस्ता हो उसको लेकर सबसे सस्ता अनाज उसमें आधा मिलाकर थोड़ा सा नमक डालकर उसे स्वयं खाती लड़कों को चना या जौ की रोटी देती और इसी प्रकार दादाजी भी अपना समय व्यतीत करते थे ।

बड़ी कठिनता से आधे पेट खाकर दिन तो कट जाता, किन्तु पेट में घोटू दबाकर रात काटना कठिन हो जाता यह तो भोजन की अवस्था थी, वस्त्र या रहने के स्थान का किराया कहां से आता ? दादी जी ने चाहा कि भले घरों में कोई मजदूरी ही मिल जावे, किन्तु अनजान व्यक्ति का जिसकी भाषा भी अपने देश की भाषा से न मिलती हो भले घरों में सहसा कौन विश्वास कर सकता था ? कोई मजदूरी पर अपना अनाज भी पीसने को न देता था । डर था कि दुर्भिक्ष का समय है खा लेगी । बहुत प्रयत्न करने के बाद दो एक महिलायें अपने घर पर अनाज पिसवाने को राजी हुईं किन्तु पुरानी काम करने वालियों को कैसे जवाब दें ?

इसी प्रकार अनेकों अड़चनों के बाद पांच सात सेर अनाज पीसने को मिल जाता जिसकी पिसाई उस समय एक पैसा फी पंसेरी थी । बड़ी कठिनता से आधे पेट एक समय भोजन करके तीन चार घण्टों तक पीसकर एक पैसा या डेढ़ पैसा मिला । फिर घर पर आकर बच्चों के लिये भोजन तैयार करना पड़ता । दो तीन वर्ष तक यही अवस्था रही । बहुधा दादा ती देश को लौट चलने का विचार करते किन्तु दादी जी का यही उत्तर होता कि जिनके कारण देश छूटा, धन सामग्री सब नष्ट हुई और ये दिन देखने पड़े अब उन्हीं के पैरों में सिर रखकर दासत्व स्वीकार करने से इसी प्रकार प्राण दे देना कहीं श्रे्ष्ठ हैं । ये दिन सदैव न रहेंगे, सब प्रकार के संकट सहे, किन्तु दादी जी देश को लौटकर न गईं ।

चार पांच वर्ष में जाकर जब कुछ सज्जन परिचित हो गये और जान लिया कि स्त्री भले घर की है, कुसमय पड़ने से दीन दशा को प्राप्त हुई है, तब बहुत सी महिलायें विश्वास करने लगीं, दुर्भिक्ष भी दूर हो गया था, कभी-कभी किसी सज्जन के यहां से कुछ दान भी मिल जाया करता, कोई ब्राम्हण भोजन करा देते इसी प्रकार समय व्यतीत होने लगा । कई महानुभावों ने जिनके कोई सन्तान न थी और धनादि पर्याप्त था, दादी जी को अनेकों प्रकार के प्रलोभन दिये कि वह अपना एक लड़का उन्हें दे दें और जितना धन मांगे उनको भेंट किया जावे ।

किन्तु दादी जी आदर्श माता थी, उन्होंने इस प्रकार के प्रलोभनों की किन्चित मात्र भी परवा न की और अपने बच्चों का किसी न किसी प्रकार पालन करती रहीं । मेहनत मजदूरी तथा ब्राम्हण वृत्ति द्वारा कुछ धन एकत्रित हुआ । कुछ महानुभावों के कहने से पिता जी के किसी पाठाशाला में शिक्षा पाने का प्रबन्ध कर दिया गया । श्री दादा जी ने भी कुछ प्रयत्न किया, उनका वेतन भी बढ़ गया और वे 7द्ध मासिक पाने लगे । इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़, पैसे तथा दुवन्नी, चवन्नी इत्यादि बेचने की दूकान की । पांच सात आने रोज पैदा होने लगे । जो दुर्दिन आये थे, प्रयत्न तथा साहस से दूर होने लगे । इसका सब श्रेय श्री दादी जी को ही है ।

 

Advertisements

1 टिप्पणी »

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

  1. इसे इन्टरनेट पर उपलब्ध कराने के लिये आपको और अमिता श्रीवास्तव जी को बहुत बहुत धन्यवाद.


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.
Entries और टिप्पणियाँ feeds.

%d bloggers like this: