कार्यकर्ताओं में बड़ी खलबली मच गयी…

जनवरी 9, 2009 को 11:33 अपराह्न | Posted in काकोरी के शहीद, काकोरी षड़यंत्र, रंग दे बसंती चोला, सरफ़रोशी की तमन्ना | 3 टिप्पणियाँ
टैग: , , , , , , , ,

अब तक आपने पढ़ा..

इनके साथ राजनैतिक कैदियों का सा ही बर्ताव किया जाना चाहिए था, किन्तु ऐसा न कर के इन को मामूली कपड़े जबर्दस्ती छीन कर जेल की पोशाक पहनाई गई ।  जेल के कर्मचारियों का व्यवहार भी इनके प्रति अच्छा नहीं था । इनके स्वाभिमान ने इन्हें ये बातें नहीं सहने दीं और सब अभियुक्तों ने अनशन व्रत कर दिया । अभियुक्तों के बल को कम करने के अभिप्राय से ही वे भिन्न-भिन्न जेलों को भेज दिये गये थें मगर उन्होंने अलग-अलग रह कर भी स्वाभिमान के लिए यह व्रत चालू रखा, इस अनशन के समाचार छिपाने की भी कोशिश पहिले ही की तरह की गयी । सगे सम्बन्धी तक अभियुक्तों से नहीं मिलने दिये गये । जब यह समाचार बाहर फैला तब प्रान्त के कार्यकर्ताओं में बड़ी खलबली मच गयी… और आगे 

कुछ कौंसिल सदस्यों ने जो जेल विज़िटर थे, जेलों में जाकर अभियुक्तों से मिलना चाहा, परन्तु उन्हें भी मिलने की इजाज़त नहीं दी गयी । इस पर एक सदस्य ने तो इस पद से इस्तीफ़ा तक दे दिया । अस्तु मामला दिन व दिन संगीन होता गया । दिन के बाद हफ़्ते और हफ़्ते के बाद महीने समाप्त होने लगे । अनशन करने वालों की दशा अधिकाधिक कमजोर होने लगी, एक-एक आदमी का वज़न 43-43 और 44-44 पौंड कम हो गया, किन्तु फिर भी उनकी बातों की कोई परवाह नहीं थी । स्थिति बड़ी चिन्ताजनक होती जा रही थी । जिद्दी सरकार जिद छोड़ने के लिए राज़ी नहीं थी और स्वाभिमानी अभियुक्त अपने बात पर अटल थे । यह चिन्ताजनक स्थिति देख कर श्री गणेष शंकर विद्यार्थी ने प्रान्तीय होम मेम्बर आनरेबुल मोहम्मद अहमद सईद खां साहब, नवाब छतारी को एक तार और एक लम्बा पत्र भेजा, जिस में अभियुक्तों की तमाम दशा का वर्णन करते हुए और यह दिखलाते हुए कि अभियुक्तों को राजनैतिक कैदियों जैसा विशेष व्यवहार पाने का हक़ है, यह कहा कि शीघ्र से शीघ्र दस्तान्दाजी़ करके इस मामले का समझौता कराइये । होम मेम्बर साहब इस तार और इस लम्बे पत्र को साफ़ पी गये । जवाब में इतना तो जरूर लिखा कि पत्र मिल गया, मगर इसके आगे उसका क्या हुआ सो आज तक न मालूम हुआ । जिस समय मुकद्मा चल रहा था उस समय भी जब अभियुक्तों ने विशेष व्यवहार पाने की बात कही थी, तब यह कह कर टाल दिया गया था कि विचाराधीन कैदियों के साथ विशेष व्यवहार का् प्रश्न नहीं उठता । मामला ख़तम हो जायेगा तब देखा जायेगा ।

मगर अब, जब मामला खतम हो गया और सेशनजज ने भी साफ़ तौर से यह कह दिया कि अभियुक्तों पर डकैतियों का जो अभियोग है, वह राजनैतिक समझा जाने योग्य है, क्योंकि उन्होंने स्वार्थ कि लिये डाके नहीं डाले, तब यह सलूक कि उनको बन्दर की शकल बना कर जेलों में रखा गया, सब बातों में मामूली डकैतों जैसा बर्ताव किया जाने लगा और विरोध करने पर अभियुक्त कालकोठरियों में बन्द किये जाने लगे काकोरी के अभियुक्त शिक्षित सभ्य और भले घरों के नवयुवक हैं । उनकी स्थिति के अनुसार उनके साथ जेल में व्यवहार किया जाना नितान्त आवश्यक था । स्वयं होम मेम्बर साहब तक हैसियत के अनुसार सुविधा देने की बात पहिले स्वीकार कर चुके थे, किन्तु जब समय आया तो गोता लगा गये अथवा थूककर चाट गये । बंगाल आदि प्रान्तों में ऐसे कैदियों के साथ विशेष बर्ताव करने का प्रबन्ध है, मगर संयुक्त प्रान्त की एक बात ही निराली है । यहां इन दलीलों और अपीलों की कोई सुनवाई न हुई । इस इधर-उधर की कोशिश में लगभग डेढ़ महीना बीत गया । सरकार टस से मस न हुई ।

अभियुक्तों की हालत बहुत ही गिर गयी । अनेक अभियुक्त मृत्यु शैय्या पर पड़ गये । अब शिथिलता करने का समय न था । अभियुक्तों के रिश्तेदारों में बड़ी चिन्ता थी । अभियुक्त राजकुमार सिंह की माता ने तो जब से अनशन का हाल सुना तब से उन्होंनें भी खाना ही छोड़ दिया । इससे वे बहुत कमजोर हो गयी । एक दिन तो वे बेहोश हो गयीं और कई घण्टे तक उसी अवस्था में रहीं । वह दशा देख कर श्री गणेष शंकर विद्यार्थी जेलों में अभियुक्तों से मिल कर उनको अनशन तोड़ने के लिए समझाने लगे । पहिले तो कुछ जेलों के अधिकारियों ने यह समझा कि कहीं ये अभियुक्तों को और न भड़कायें, इसलिए इजाज़त नहीं दी । परन्तु एकाध जगह का उदाहरण उन के सामने आया, तब इन्हें जेलों में अभियुक्तों से मिलने की इजाज़त मिल गयी । फिर भी एकाध स्थान में ये नहीं जा सके । किन्तु इनके इतने ही परिश्रम ने काफ़ी काम किया । इन्होंने बरेली, फतेहगढ़ नैनी आदि कई जेलों के अभियुक्तों से बातचीत की और उन्हें राजी कर लिया । इस प्रकार अनशन का अन्त करा कर श्री गणेष शंकर जी अभियुक्तों को स्थायी रूप से विषेश व्यवहार की सुविधा दिलाने का फिर प्रयत्न करते रहें इसी बीच में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने यह प्रस्ताव पास किया कि काकोरी के कैदियों के साथ विशेष व्यवहार किया जाये । बाद को मद्रास के कांग्रेस अधिवेशन में भी इस आशय का एक प्रस्ताव पास हुआ था । इस प्रस्ताव से इस मामले ने, जो अभी तक केवल प्रान्तीय रूप धारण किये था, सार्वदेशिक रूप धारण कर लिया ।

22 जून को यह मामला युक्त प्रांतीय कौंसिल में जोरों के साथ उठाया गया । सवालों का तांता बांध दिया गया । किन्तु सरकार की ओर से किसी बात का उचित और सन्तोषजनक उत्तर नहीं दिया गया । होम मेम्बर ने इन सवाल-जवाबों में साफ तौर से यह एलान कर दिया कि उनके साथ दुबारा कैदियों का सा ही बर्ताव किया जायेगा, वे उसी श्रेणी में रखे गये है । इस बात से कौंसिल के स्वराजी सदस्यों को बड़ा असन्तोष हुआ । एक स्वराजी सदस्य ने यह प्रस्ताव पेश करना चाहा कि काकोरी के कैदियों के साथ विशेष बर्ताव किया जाये । परन्तु गर्वनर महोदय ने इस प्रस्ताव के पेश करने की इजाज़त ही नहीं दी । उस दिन के सवाल जवाब में यह भी मालूम हुआ कि काकोरी के मामले में सरकार दो लाख रूपये खर्च कर चुकी है । प्रान्त के कार्यकर्ताओं के पास यही एक अन्तिम अस्त्र था, जिससे वे काकोरी के अभियुक्तों के साथ विशेष व्यवहार करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते थे । किन्तु गवर्नर साहब की स्वेच्छाचारिता के कारण वह अस्त्र भी निष्फल हुआ। अनशन तो किसी प्रकार टूट गया, मगर विशेष अधिकार उन्हें अभी तक नसीब न हुये । पराधीन देश के पराधीन निवासियों के लिये जो कुछ हो जाय थोड़ा है । सेशन कोर्ट का फैसला हो चुकने के बाद अभियुक्तों ने अपील करने का निश्चय किया .. ..  जारी है 

Advertisements

3 टिप्पणियाँ »

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

  1. डाक्टर साहब,
    आप ने यह काम बहुत ही अच्छा किया है कि बिस्मिल जी की आत्मकथा को अन्तर्जाल पर उपलब्ध करवा दिया है। इस तरह यह ऐतिहासिक धरोहर न केवल सुरक्षित हो गई है और रुचि रखने वालों को सहज ही उपलब्ध भी।
    इस काम का कोई सानी नहीं है।


  2. आदरणीय पंडिज्जी, यह तो मेरा चिरसंचित स्वप्न था..
    विलम्ब से सही, साकार हो रहा है !
    ऎसे ही कुछ और संदर्भ भी हैं, जिनको अंतर्जाल पर लाने की अभिलाषा है,
    आशीर्वाद दें, कि सभी पूरे हों !
    अपुन तो हमेशा से… एकला चलो रे का अनुसरण करते आयें हैं !
    बस, आपसब गुरुजन सहारा दिये रहें !

  3. “पराधीन देश के पराधीन निवासियों के लिये जो कुछ हो जाय थोड़ा है।” दुखद बात यह है कि स्वाधीनता के बाद भी बहुत से भारतीयों की दुनिया बिल्कुल नहीं बदली है.


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .
Entries और टिप्पणियाँ feeds.

%d bloggers like this: