संक्षिप्त विवरण – नामित टोली-2

जनवरी 2, 2009 को 12:13 पूर्वाह्न | संक्षिप्त विवरण, सरफ़रोशी की तमन्ना में प्रकाशित किया गया | 1 टिप्पणी
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पिछले पृष्ठ से जारी…    

39-श्री राजेन्द्रनाथ लहरी, बनारस, 40- श्री शचीन्द्रनाथ सन्याल, इलाहाबाद, 41- श्री शचीन्द्र नाथ बख्सी, बनारस, 42-श्री अशफ़ाक उल्ला खां, शाहजहांपुर, 43-श्री चन्द्रषेखर ‘आजाद‘, बनारस, 44- श्री शिवचरण लाल, आगरा बाद में फिर आप पर मुक्दमा नहीं चलाया गया ।

गिरफतारशुदा लोगों में से वास्तविक मामला शुरू होने के पहिले निम्नलिखित सज्जन छोड़ दिये गये । शायद इन लोगों के विरूद्ध सरकार बहादुर को कोई प्रमाण न मिल सका । पुलिस का ध्येय था कि मुकदमों में जनता की सहानुभूति न रहे । अतः उस ने प्रतिष्ठित व्यक्तियों केा छोड़ देना ही नि्श्चित किया ।

1- श्री शीतलासहाय, 2- श्री चन्द्रधर जौहरी, 3-श्री मदन लाल, 4-श्री रामरत्न शुक्ल, 5- श्री मोहनलाल गौतम, 6-श्री चन्द्रभाल जौहरी, 7-श्री हरनाम सुन्दरलाल, 8-श्री डी0डी0 भट्टाचार्य, 9- श्री रामदत्त शुक्ल, 10-श्री बाबूराम वर्मा, 11- श्री गोपीमोहरा, 12-श्री शरदचन्द्र गुहा, 13-श्री भैरोसिंह, 14-श्री कालिदास बोस, 15-श्री इन्द्र विक्रमसिंह।

बाकी अभियुक्तों पर मामला चला । सब व्यक्ति लखनउ जेल लाये गये । जेल में पहुंचते ही खुफ़िया पुलिस वालों ने यह प्रबन्ध किया कि सब अभियुक्त एक दूसरे से अलग रखे जायें । अलग-अलग रखने से पुलिस को अनेक लाभ थें । सबको अलग रखने से पुलिस प्रत्येक आदमी से समय पर मिल कर बातें करती थी। कुछ भय दिखाती थीं,  कुछ इधर-उधर की बातों द्वारा भेद जानने का प्रयत्न करती थी । सारांश यह  कि इस समय पुलिस सरकारी गवाह बनाने का सरतोड़ परिश्रम कर रही थी । स्वयं खुफ़िया पुलिस के कप्तान साहब, पण्डित राम प्रसाद ‘विसमिल‘ से कई बार मिले, सहानुभूति दिखाई और प्रलोभन दिये,  किन्तु अकृतकार्य रहे । एक बार जिला कलेक्टर महोदय ने भी पण्डित जी से मिलकर अनेक धमकियां दीं और स्पष्टतया कहा कि तुम्हें फांसी हो जायेगी । किन्तु वे भी बैरंग लौटे, कुछ न पा सके। इस प्रकार की मुलाकातें प्रायः सभी अभियुक्तों से होती थीं । किसी को 15 हजार रूपये देने के वादे किये जाते थे, तो कोई इंग्लैण्ड भेजा जाने वाला था । यह बाज़ार इतना चढ़ा कि अन्त में पण्डित राम प्रसाद जी तथा अन्य अभियुक्तों ने खुफ़िया पुलिस के कप्तान साहब से न मिलने के हेतु अपनी -अपनी कोठरियों से बुलाये जाने पर न निकलने का निश्चय कर लिया । पुलिस वाले आते और परेशान हो कर चले जाते । किन्तु अन्त में उनका कुचक्र चल ही गया । अस्तु  शिनाख़्तें शुरू हुई ।  शिनाख़्तों में बड़ी धांधागर्दी से काम लिया गया । श्री अमीईउद्दीन साहब मुक़दमें में मजिस्टेट थे । उन्होंने जी भर के पुलिस महारानी की मदद की। अभियुक्त गिरफतार करके खुली गाड़ियों में पुलिस स्टेशनों पर लाये गये,  उनको किसी प्रकार भी छिपा कर नहीं रखा गया,  सादी वर्दी में पुलिस वाले उन के पास चक्कर लगाया करते थे । शिनाख़्त के समय भी अभियुक्त ऐसे आदमियों के साथ खड़े किये गये थे,  जो उनकी स्थिति के न थे और जिन से उनका बिल्कुल साम्य न था । पुलिस के पास प्रायः सभी अभियुक्तों की तस्वीरें मौजूद थी । इतना सब होते हुए भी शिनाख़्त की कार्यवाही सफल न हुई और पुलिस को मुंह की खानी पड़ी । शिनाख़्तें अधिकांश में गलत थी फिर भी इन लोगों पर मामला चला ही दिया गया । कोई व्यक्ति जमानत पर तक न छोड़ा गया ।

हां पुलिस अपने हथकण्डों में कृतकार्य हुई और बनारसी लाल तथा इन्द्रभूषण मुखबिर; सरकारी गवाहद बन गयें । उनको अन्य अभियुक्तों से अलग रखने का प्रबन्ध किया गया ।  बनारसी लाल तो हटा कर हज़रतगंज की अदालत में पुलिस की निगरानी में रखे गये और इन्दुभूषण अपने पिता की देख रेख में छोड़ दिये गये । मामला वाक़ायदा 4 जनवरी 1926 ई0 से शुरू हुआ । इस समय मुख़बिरों के बयान हो रहे थे । इस के बाद सरकारी गवाहों के बयान होते रहे । इन गवाहियों में पुलिस द्वारा लगाये गये इल्ज़ामों के तसदी़क कराने की भरसक कोशिश की गई । उपरोक्त गिरफतारशुदा व्यक्तियों में जो छूट चुके थे, उनके अतिरिक्त् 28 अभियुक्तों पर मामला चला था । इनमें से भी दो अभियुक्त श्री ज्योतिशंकर दीक्षित और श्री वीरभद्र तिवारी-स्पे्शल मजिस्टेट द्वारा छोड़ दिये गये थे। श्री ज्याति्शंकर दीक्षित बड़े खु्शदिल आदमी है । जेल कर्मचारी तो इनकी खुशहाली देख कर कुढ़ा करते थे । आप जब छोड़े जाने लगे तो आपने अनुरोधपूर्वक मजिस्टेट से कहा, “ तो क्या छोड़ ही दीजियेगा…  अरे, एक दिन तो और रह लेने दो ।” ….. आगे जारी रहेगा

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  1. यह पुस्तक ईश्वर ने इसीलिए आप तक दोबारा पहुंचवा दी ताकि आप इस धरोहर को हम तक भी पहुँचा सकें. साधुवाद.


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