इतिहास को हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा
May 20, 2009 at 4:45 AM | In अंतिम समय की बातें, आत्म-चरित, इतिहास में हमारे प्रयत्न, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना | 6 CommentsTags: अराजकता, कार्यकारिणी, क्रान्तिकारी आन्दोलन, भारतवर्ष, राजनीति
ऐतिहासिक दृष्टि से हम लोगों के कार्य का बहुत बड़ा मूल्य है । जिस प्रकार भी हो, यह तो मानना ही पड़ेगा कि इस गिरी हुई अवस्था में भी, अधिकाँश भारतवासी युवकों के हृदय में स्वाधीन होने के भाव विराजमान हैं । वे यथा शक्ति स्वतंत्र होने की चेष्टा भी करते है । यदि परिस्थितियां अनुकूल होती तो यही इने गिने नवयुवक अपने चेष्टाओं से संसार को चकित कर देते । उस समय भारतवासियों को भी फ्रांसीसियों की भांति कहने का सौभाग्य प्राप्त होता, जो कि उस जाति के नवयुवकों ने फ्रांसीसी प्रजातंत्र की स्थापना करते हुए कहा था, “स्वाधीनता का जो स्मारक निर्माण किया गया है वह अत्याचारियों के लिये शिक्षा का कार्य करे और अत्याचार पीड़ितों के लिये उदाहरण बने “
ग़ाज़ी मुस्तफा कमालपाशा जिस समय तुर्की से भागे थे, उस समय केवल इक्कीस युवक आपके साथ थे कोई साजोसामान न था, मौत का वांरट पीछे-पीछे घूम रहा था । पर समय ने ऐसा पलटा खाया कि उसी कमाल ने अपने कमाल से संसार को आश्चर्यान्वित कर दिया । वही कातिल कमालपाशा टर्की का भाग्य निर्माता बन गया । लेनिन को एक दिन शराब के पीपों में छिप कर भागना पड़ा था, नहीं तो मृत्यु में कुछ देर न थी । वही लेनिन रूस के भाग्य विधाता बने ।
श्री शिवाजी डाकू एवँ लुटेरे समझे जाते थे । पर समय आया जब कि हिन्दू जाति ने उन्हें अपना शिरमौर बना,गौ एवँ ब्राह्मण-रक्षक छत्रपति शिवाजी बना दिया । भारत सरकार को भी अपने स्वार्थ के लिये छत्रपति के स्मारक निर्माण कराने पड़े । क्लाइव एक उददण्ड विद्यार्थी था । जो अपने जीवन से निराश हो चुका था । समय के फेर ने उसी उददण्ड विद्यार्थी को अंग्रेज जाति का राज्य स्थापनाकर्ता लार्ड क्लाइव बना दिया । श्री सनयात सैन चीन के अराजकवादी पलायक भागे हुये थे । समय ने उसी पलायक को चीनी प्रजातन्त्र का सभापति बना दिया ।
सफलता ही हृदय एवँ मनुष्य के भाग्य का निर्माण करती है । असफल होने पर उसी को बर्बर, डाकू, अराजक, राज्यद्रोही तथा हत्यारे के नामों से विभूषित किया जाता है । सफलता उन्हीं सब नामों को बदल कर दयालु, प्रजापालक, न्यायकारी, प्रजातन्त्रवादी तथा महात्मा बना देती है ।
भारतवर्ष के इतिहास में हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा । किन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि भारतवर्ष की राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक किसी प्रकार की परिस्थिति इस समय क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में नहीं है । जिस का कारण यही है कि भारतवासियोंमें शिक्षा का अभाव है । वे साधारण सामाजिक उन्नति करने से भी असमर्थ है ।
फिर राजनैतिक क्रान्ति की बात कौन कहे ? राजनैतिक क्रान्ति के लिये सर्वप्रथम क्रान्तिकारियों का संगठन ऐसा होना चाहिये कि अनेक विध्न तथा बाधाओं के उपस्थित होने पर भी संगठन में किसी प्रकार की त्रुटि न आवे । सब कार्य यथावत चलते रहें । कार्यकर्ता इतने योग्य तथा पर्याप्त संख्या में होने चाहिये कि एक की अनुपस्थिति में दूसरा स्थान-पूर्ति के लिये सदा उद्यत रहे । भारतवर्ष में कई बार कितने षड़यन्त्रों का संगठन हुआ । किन्तु थोड़ा सा भेद खुलते ही, पूर्ण षडयन्त्र का भण्डा फूट गया और सब किया कराया ना्श को प्राप्त हो गया । जब क्रान्तिकारी दलों की यह अवस्था है तो फिर क्रान्ति के लिये उद्योग कौन करे ?
देशवासी इतने शिक्षित हों कि वे वर्तमान सरकार की नीति को समझ कर अपने हानि-लाभ को जानने में समर्थ हो सकें । वे यह भी पूर्णतया समझते हों कि वर्तमान सरकार को हटाना आवश्यक है या नहीं । साथ ही साथ उन में इतनी बुद्धि भी होनी चाहिये कि किस रीति से सरकार को हटाया जा सकता है ।
क्रान्तिकारी दल क्या है ? वह क्या करना चाहता है ? क्यों करना चाहता है ? इन सारी बातों को जनता अधिक संख्या में समझ सके, क्रान्तिकारियों के साथ जनता की पूर्ण सहानुभूति हो, तब कहीं क्रान्तिकारी दल को दे्श में पैर रखने का स्थान मिल सकता है । यह तो क्रान्तिकारी दल की स्थापना की प्रारम्भिक बातें है । रह गई, क्रान्ति, सो तो बहुत दूर की बात है ।
क्रान्ति का नाम ही बड़ा भयंकर है । प्रत्येक प्रकार की क्रान्ति विपक्षियों को भयभीत कर देती है जैसे कि जहां पर रात्रि होती है तो दिन का आगमन होने से निशिचरों को दुख होता है । ठंडे जलवायं में रहने वाले पशुपक्षी गरमी के आने पर उस देश को भी त्याग देते हैं । फिर राजनैतिक क्रान्ति की बात ही बड़ी भयावनी होती है ।
मनु्ष्य अभ्यासों का समूह है । अभ्यासों के अनुसार ही उस की प्रकृति भी बन जाती है । उस के विपरीत जिस समय कोई बाधा उपस्थित होती है, तो उनको भय प्रतीत होता है, इसके अतिरिक्त प्रत्येक सरकार के सहायक अमीर और जमीदार होते हैं । ये लोग कभी नहीं चाहते कि उन के ऎशो-आराम में किसी प्रकार की बाधा पड़े । इसलिये वे हमेशा क्रान्तिकारी आन्दोलन को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं ।
यदि किसी प्रकार दूसरे दे्शों की सहायता लेकर समय पाकर क्रान्तिकारी दल क्रान्ति के उद्योग में सफल हो जावे, देश में क्रान्ति हो जावे, तो भी योग्य नेता न होने से अराजकता फैल कर व्यर्थ की नर हत्या होती है, और उस प्रयत्न में अनेकों सुयोग्य वीरों तथा विद्वानों का ना्श हो जाता है । जिसका ज्वलन्त उदाहरण सन 1857 ई0 का गदर है । यदि फ्रांस तथा अमेरिका की भांति क्रान्ति द्वारा राजतंत्र को पलट कर प्रजा तंत्र स्थापित भी कर लिया जावे तो बड़े-बड़े धनी पुरूष अपने धन-बल से सब प्रकारों के अधिकारों को दबा बैठते है । कार्यकारिणी समितियों में बड़े-बड़े अधिकार धनियों को प्राप्त हो जाते है ।
दे्श के शासन में धनिकों का मत ही उच्च आदर पाता है । धन-बल से देश के समाचार पत्रों, कल कारखानों तथा खानों पर उनका ही अधिकार होता है । मजबूरन जनता की अधिक संख्या धनियों का समर्थन करने का बाध्य हो जाती है । जो दिमाग वाले होते है, वह भी समय पाकर बुद्धिबल से जनता की खरी-कमाई से प्राप्त किये अधिकारों को हड़प बैठते है ।
स्वार्थ के वशीभूत जन श्रमजीवियों तथा कृषकों को उन्नति के अवसर नहीं देते । अन्त में ये लोग भी धनिकों के पक्षपाती हो कर राजतंत्र के स्थान में धनिक तंत्र की स्थापना करते है । रूसी क्रान्ति के पश्चात यही हुआ था। रूस के क्रान्तिकारी इस बात को पहले से ही जानते थे । अतएव उन्होंने राजसत्ता के विरूद्ध युद्ध कर के राजतंत्र की समाप्ति की । इसके बाद जैसे ही धनी तथा बुद्धिमानों ने अडंगा लगाना चाहा कि उसी समय उन से भी युद्ध कर के उन्होंने वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना की ।
अब विचारने की बात यह कि भारतवर्ष में क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ?
मैं मन ही मन घुटा करता
February 14, 2009 at 12:55 AM | In आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4 | 5 CommentsTags: अनशन व्रत, कविवर रवीन्द्र नाथ, काकोरी षड़यन्त्र, कैदियों का भोजन, क्रान्तिकारी दल, चतुर्थ खण्ड, दुश्मन, पुलिस के कप्तान, प्रान्तीय भाव, बंगला, भारतवर्ष, वकीलों की जिरह, संयुक्त प्रान्त, सी0आई0डी0, स्वतन्त्र
जब से काकोरी षड़्यन्त्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से उनमें एक अद्भुत परिवर्तन का समावेश हुआ, जिसका अवलोकन कर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही । जेल में सब से बड़ी बात तो यह थी कि प्रत्येक आदमी अपनी अपनी नेतागिरी की दुहाई देता था । कोई भी बड़े छोटे का भेद न रहा । बड़े अनुभवी पुरूषों की बातों की अवहेलना होने लगी । डिसप्लिन का नाम भी न रहा । बहुधा उल्टे जवाब मिलने लगे । छोटी सी छोटी बातों पर मतभेद हो जाता । इस प्रकार का मतभेद कभी-कभी वैमनस्य तक का रूप धारण कर लेता । आपस में झगड़ा भी हो जाता ।
खैर ! जहां चार बर्तन रहते हैं वहां खटकाते ही हैं । ये लोग तो मनुष्य देहधारी थे । परन्तु लीडरी की धुन ने पार्टी बन्दी का ख्याल पैदा कर दिया । जो नवयुवक जेल के बाहर अपने से बड़ों की आज्ञा को वेद-वाक्य के समान मानते थे वे ही उन लोगों का तिरस्कार तक करने लगे । इसी प्रकार आपस का वादा विवाद कभी-कभी भयंकर रूप धारण कर लिया करता । प्रान्तीय प्रश्न छिड़ जाता । बंगाली तथा संयुक्त प्रान्त वासियों के कार्य की आलोचना होने लगती । इसमें कोई सन्देह नहीं कि, बंगाल ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में दूसरे प्रान्तों से अधिक कार्य किया है ।
किन्तु बंगालियों की हालत यह है कि जिस कार्यालय या दफतर में एक भी बंगाली पहुंच जावेगा थोड़े ही दिनों में ही उस स्थान पर बंगाली ही बंगाली दिखाई देंगे । जिस शहर में बंगाली रहते हैं उनकी बस्ती अलग ही बसती है । बोली भी अलग । खान-पान भी एकदम अलग । यही सब जेल में अनुभव हुआ । जिन महानुभावों में त्याग की मूर्ति समझता था, उनके अन्दर बंगालीपने का भाव देखा ।
मैंने जेल से बाहर कभी स्वप्न में भी यह विचार न किया था कि क्रान्तिकारी दल के सदस्यों में भी प्रान्तीय भावों का समावेश होगां । मैं तो यही समझता रहा कि क्रान्तिकारी तो समस्त भारतवर्ष को स्वतन्त्र करने का प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें किसी प्रान्त विशेष से क्या सम्बन्ध । परन्तु साक्षात् अनुभव कर लिया कि प्रत्येक बंगाली के दिमाग में कविवर रवीन्द्र नाथ का गीत आमार सोनार बांगला, आमितोमा के भालो वासी मेरे सोने का बंगाल मैं तुझ से मुहब्बत करता हूं इत्यादि ठूंस-ठूंस कर भरा था, जिसका उनके नेमित्तिक जीवन में पग-पग पर प्रकाश होता था ।
अनेक प्रयत्न करने पर भी जेल के बाहर इस प्रकार का अनुभव कदापि न प्राप्त हो सकता था । बड़ी भयंकर से भयंकर आपत्ति में भी मेरे मुंह से कभी आह न निकली । प्रिय सहोदर का देहान्त होने पर भी आंख से आंसू न गिरा, किन्तु इस दल के कुछ व्यक्ति ऐसे थे जिनक आज्ञा को मैं संसार में सब से श्रेष्ठ मानता था, जिनकी जरा से कड़ी दृष्टि भी मैं सहन न कर सकता था, जिन के कटु वचनों के कारण मेरे हृदय पर चोट लगती थी, और अश्रुओं का श्रोत उबल पड़ता था । मेरी इस अवस्था को देख कर दो चार मित्रों को जो मेरी प्रकृति को जानते थे बड़ा आश्चर्य होता था ।
लिखते हुये हृदय कम्पित होता है कि उन्हीं सज्जनों में बंगाली तथा अबंगाली का भाव इस प्रकार भरा था कि बंगालियों की बड़ी से बड़ी भूल, हठधर्मी तथा भीरूता की अवहेलना की गई । यह देखकर पुरूषों का साहस बढ़ता था, नित्य नई चालें चलीं जाती थी । आपस में ही एक दूसरे के विरूद्ध षड़्यन्त्र रचे जाते थे । बंगालियों का न्याय अन्याय सब सहन कर लिया जाता था । इन सारी बातों ने मेरे हृदय को टूक-टूक कर डाला । सब कृत्यों को देख मैं मन ही मन घुटा करता ।
एक बार विचार हुआ कि सरकार से समझौता कर लिया जावे । बैरिस्टर साहब ने खुफिया पुलिस के कप्तान से परामर्श आरम्भ किया । किन्तु यह सोचकर कि इससे क्रान्तिकारी दल की निष्ठा न मिट जावे, यह विचार छोड़ दिया गया, युवकबृन्द की सम्मति हुई कि अनशन व्रत कर के सरकार से हवालाती की हालत में ही मांगें पूरी करा ली जावें । क्योंकि लम्बी-लम्बी सजायें होंगी । संयुक्त प्रान्त के जेलों में साधारण कैदियों का भोजन खाते हुये सजा काट कर जेल से जिन्दा निकलना कोई सरल कार्य नहीं ।
जितने राजनैतिक कैदी षड़यन्त्रों के सम्बन्ध में सजा पाकर इस प्रान्त के जेलों में रखे गये उनमें से पांच छः महात्माओं ने इस प्रान्त के जेलों के व्यवहार के कारण ही जेलों में प्राण त्याग किये । इस विचार के अनुसार काकोरी के लगभग सब हवालातियों ने अनशन व्रत आरम्भ कर दिया । दूसरे ही दिन सब पृथक कर दिये गये । कुछ व्यक्ति डिस्टिक्ट जेल में रखे गये, कुछ सेन्टल जेल भेजे गये । अनशन करते पन्द्रह दिवस व्यतीत हो गये, सरकार के कान पर जूं न रेंगी । उधर सरकार का काफी नुकसान हो रहा था ।
जज साहब तथा दूसरे कचहरी के कार्यकर्ताओं को घर बैठे का वेतन देना पड़ता था । सरकार को स्वयं चिन्ता थी कि किसी प्रकार अनशन छूटे । जेल अधिकारियों ने पहले आठ आने रोज तय किये थे । मैंने उस समझौते को अस्वीकार कर दिया । और बड़ी कठिनता से दस आने रोज पर ले आया । उस अनशन व्रत में पन्द्रह दिवस तक मैंने केवल जल पी कर निर्वाह किया था । मुझे सोलहवें दिन नाक से दूध पिलाया गया था । श्रीयुत् रोषनसिंह जी ने भी इसी प्रकार मेरा साथ दिया था । वे पन्द्रह दिन तक लगभग बराबर चलते फिरते रहे थे । स्नानादि करके अपने नैमित्तिक कर्म भी कर लिया करते थे ।
दस दिन तक तो मेरे मुंह को देखकर अनजान पुरूष यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि मैं अन्न नहीं खाता । समझौते के जिन खुफिया पुलिस के अधिकारियों से मुख्य नेता महोदय का वार्तालाप बहुधा एकान्त में हुआ करता था, समझौते की बात खत्म हो जाने पर भी आप उन लोगों से मिलते रहे । मैंने कुछ विशेष ध्यान न दिया । यदा कदा दो एक बात से पता चलता कि समझौते के अतिरिक्त कुछ दूसरी तरह की बातें भी होती है ।
मैंने इच्छा प्रकट की कि मैं भी एक समय सी0आई0डी0 के कप्तान से मिलूं, क्योंकि मुझ से पुलिस बहुत असंतुष्ट थी । मुझे पुलिस से न मिलने दिया गया । परिणाम स्वरूप सी0आईडी0 वाले मेरे पूरे दुश्मन हो गये । सब मेरे व्यवहार की ही शिकायत किया करते । पुलिस अधिकारियों से बातचीत करके मुख्य नेता महाशय को कुछ आशा बंध गई । आप का जेल से निकलने का उत्साह जाता रहा ।
जेल से निकलने के उद्योग में जो उत्साह था, वह बहुत ढीला हो गया । नवयुवकों की श्रद्धा को मुझसे हटाने के लिये अनेकों प्रकार की बातें की जाने लगीं । मुख्य नेता महोदय ने स्वयं कुछ कार्य कर्ताओं से मेरे सम्बन्ध में कहा कि ये कुछ रूपये खा गये । मैंने एक-एक पैसे का हिसाब रखा था । जैसे ही मैंने इस प्रकार की बातें सुनी, मैंने कार्यकारिणी के सदस्यों के सामने रख कर हिसाब देना चाहा, और अपने विरूद्ध आक्षेप करने वाले को दण्ड देने का प्रस्ताव उपस्थित किया ।
अब तो बंगालियों का साहस न हुआ कि मुझ से हिसाब समझें । मेरे आचरण पर भी आक्षेप किये गये । जिस दिन सफाई की बहस में मैंने समाप्त की, सरकारी वकील ने उठ कर मुक्त कंठ से मेरी बहस की प्रशंसा की कि सैकड़ों वकीलों से अच्छी बहस की । मैंने नमस्ते कर उत्तर दिया कि आप के चरणों की कृपा है । क्योंकि इस मुकद्में के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह को सुन कर मैंने भी साहस किया था ।









