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	<title>काकोरी काँड  :  Kakori Conspiracy</title>
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	<description>अमर शहीद ' बिस्मिल ' द्वारा गोरखपुर जेल से 1927 में लिखी ज़ब्तशुदा आत्म-चरित्र</description>
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		<title>काकोरी काँड  :  Kakori Conspiracy</title>
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		<title>श्री अशफाक उल्ला खां &#8211; मैं मुसलमान तुम काफिर ?</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Feb 2010 17:28:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[2.अशफ़ाक़ उल्ला खाँ]]></category>
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		<description><![CDATA[इस तरह की अपनी कुर्बानियों से&#160; वतन&#160; की&#160; मिट्टी &#8211; पानी&#160; का&#160; कर्ज़&#160; अदा&#160; करने&#160; वाले&#160; सिरफिरे&#160; मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=871&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#e3f7ff">
<tbody>
<tr>
<td>
<p align="justify"><em><font color="#0000c1">इस तरह की अपनी कुर्बानियों से&#160; वतन&#160; की&#160; मिट्टी &#8211; पानी&#160; का&#160; कर्ज़&#160; अदा&#160; करने&#160; वाले&#160; सिरफिरे&#160; मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का परिचय जुड़ा दिखता है । अपने जीवनकाल में भी यह दोनों मित्रों ने एक नायाब दोस्ती की मिसाल कायम की थी । सँभवतः भाई&#160; शिव&#160; वर्मा&#160; जी&#160; ने&#160; इसी कारण&#160; मुख्य आरोपियों&#160; की&#160; परिचय श्रॄँखला&#160; में&#160; इन्हें&#160; बिस्मिल&#160; जी&#160; के&#160; बाद&#160; दूसरा&#160; स्थान&#160; दिया&#160; है । शहीद अशफ़ाक़ उल्ला को जीवनपर्यँन्त यह सवाल सता रहा और वह अपने सखा से यह पूछते रहते कि लोग आख़िर ऎसा क्यों सोचते ही हैं कि <strong>मैं मुसलमान तु्म क़ाफ़िर</strong> ! </font></em><em><font color="#0000c1">पढ़िये उनकी कहानी&#8230;</font></em></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p align="justify">श्री अशफाक उल्ला खां पहिले मुसलमान है, जिन्हें&#160; षडयन्त्र&#160; के&#160; मामले&#160; में&#160; फांसी&#160; हुई&#160; है । बीस पच्चीस वर्ष के इतिहास में, जब से राजनैतिक&#160; षडयन्त्रों&#160; की&#160; चर्चा&#160; सुनने&#160; में&#160; आई, अनेक आत्मायें फांसी और गोली का शिकार बना दी गयी । परन्तु आज तक किसी मुसलमान को यह शिकार बनते हुए नहीं सुना गया । इससे जनता में यह धारणा बैठ गयी थी कि मुसलमान लोग षडयन्त्रों में भाग नहीं ले सकते ।</p>
<p align="justify">किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे । </p>
<p align="justify">वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी&#160; बनाई&#160; हुई&#160; कविताएं&#160; अदालत&#160; आते-जाते&#160; अक्सर&#160; काकोरी&#160; के अभियुक्त गाया करते थे ।</p>
<p align="justify">श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है । </p>
<p align="justify">बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह&#160; नवयुवक&#160; और&#160; कोई&#160; न&#160; था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब&#160; श्री&#160; रामप्रसाद&#160; शाहजहांपुर&#160; आये । </p>
<p align="justify">श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।</p>
<p align="justify">उनके&#160; निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि <strong>मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है ।</strong> <strong><u>मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है ।</u></strong> अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था </p>
<p align="justify">एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु&#160; उस&#160; प्रेम&#160; के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है ।<font size="3"><strong> <font color="#0000c1" size="2">यह&#160; एक&#160; दूसरे&#160; को&#160; राम&#160; और कृष्ण कहते है ।</font></strong></font> अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते । </p>
<p align="justify">जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर <u><strong>अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये ।</strong></u> स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया&#160; कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया । </p>
<p align="justify">अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले । <strong><em><font color="#a60000">शेष अगली कड़ी में समाप्य</font></em></strong></p>
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		<title>मालिक तेरी रजा रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे</title>
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		<pubDate>Tue, 23 Feb 2010 18:20:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जहाँ&#160; तक&#160; मैं&#160; समझता&#160; हूँ&#160; कि&#160; पिछली सँदर्भित&#160; कड़ी&#160; सहित&#160; परिचय श्रृँखला&#160; की&#160; यह&#160; कड़ियाँ&#160; सँभवतः&#160; श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने या क्राँति-दल के साथियों ने सामूहिक रूप से मिलजुल कर तैयार की होगी । यह तो सर्वविदित है कि बिस्मिल जी ने यह [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=870&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#f2ffff">
<tbody>
<tr>
<td>
<p align="justify"><font color="#0000e8" size="2">जहाँ&#160; तक&#160; मैं&#160; समझता&#160; हूँ&#160; कि&#160; पिछली सँदर्भित&#160; कड़ी&#160; सहित&#160; परिचय श्रृँखला&#160; की&#160; यह&#160; कड़ियाँ&#160; सँभवतः&#160; श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने या क्राँति-दल के साथियों ने सामूहिक रूप से मिलजुल कर तैयार की होगी । यह तो सर्वविदित है कि बिस्मिल जी ने यह पाँडुलिपि जेल में उनकी माता के सँग आये हुये मित्र श्री शिव वर्मा को ही अपने बलिदान-दिवस से ठीक एक दिन पहले 18 दिसम्बर को सौंपी थी । श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा इसे पुस्तकाकार रूप&#160; दिये&#160; जाने&#160; के&#160; मध्य&#160; ही&#160; यह&#160; परिचय&#160; श्रृँखला&#160; सम्मिलित&#160; की&#160; गयी&#160; होगी । चूँकि यह पुस्तक अपने प्रकाशन&#160; के&#160; चौथे&#160; दिन&#160; ही&#160; ज़ब्त&#160; कर&#160; ली&#160; गयी&#160; थी, इसलिये&#160; कालाँतर&#160; में&#160; इससे&#160; किसी&#160; छेड़-छाड़&#160; की सँभावना कम ही&#160; दिखती है ।</font> <font color="#5b5bff"><em><font size="2">निवेदन- डा. अमर कुमार&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160; </font></em></font><font color="#5b5bff"></font><font color="#0000e6"><strong>अस्तु आगे बढ़ते हैं..</strong> पढ़िये बकौल श्री शिवप्रसाद वर्मा जी</font> </p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p align="justify">इन पंक्तियों के लेखक ने उन्हें तथा अन्तिम बार मृत्यु के केवल एक दिन पहले फांसी की कोठरी में देखा था और उनका यह सब हाल जाना था । उस सौम्य मूर्ति की मस्तानी अदा आज भी भूली नहीं है- जब कभी किसी को उनका नाम लेते सुनता हूं तो एक दम उस प्यारे का वही स्वरूप आंखों के सामने नाचने लगता है । लोगों को उन्हें गालियां देते देख, हृदय कह उठता है, क्या वह डाकू का स्वरूप था अन्तस्तल में छिपकर न जाने कौन बार-बार यही प्रश्न करने लगता है-क्या वे हत्यारे की आंखें थी ? भाई दुनियां के सभ्य लोग कुछ भी क्यों न कहें, किन्तु मैं तो उसी दिन से उनका पुजारी हुं । दास हूँ । भक्त हूँ ।। </p>
<blockquote><p align="justify"><strong>उस दिन मां को देखकर उस मातृभूमि-भक्त पुजारी की आंखों में आंसू आ गए । उस समय पर जननी के हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था, वह&#160; भी&#160; भूलना&#160; नहीं&#160; है । वह एक स्वर्गीय दृश्य था और उसे देखकर जेल कर्मचारी भी दंग रह गये थे । माता ने कहा-मैं तो समझती थी तुमने अपने पर विजय पाई है किन्तु यहां तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है । जीवन पर्यन्त देश के लिये आंसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिये रोने बैठे हो &#8211; इस&#160; कायरता&#160; से&#160; अब&#160; क्या&#160; होगा&#160; तुम्हें&#160; वीर&#160; की भांति हंसते हुए प्राण देते देखकर मैं अपने आपको धन्य समझूंगी । मुझे गर्व है कि इस गये-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश की वेदी पर प्राण दे रहा है । मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था, इसके बाद तुम देश की चीज थे, और&#160; उसी के काम आ गए । मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है । उत्तर में उसने कहा मां, तुम&#160; तो&#160; मेरे&#160; हृदय&#160; को&#160; भली-भांति&#160; जानती हो । क्या तुम समझती हो कि मैं तुम्हारे लिये रो रहा हूं अथवा इसलिये रो रहा हूं कि मुझे कल फांसी हो जायेगी यदि ऐसा है तो मैं कहूंगा कि तुमने जननी होकर भी मुझे समझ न पायी, मुझे अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है । हां, यदि&#160; घी&#160; को&#160; आग&#160; के&#160; पास&#160; लाया जायेगा तो उसका पिघलना स्वाभाविक है । बस उसी प्राकृतिक सम्बन्ध से दो चार आंसू आ गए । आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत सन्तुष्ट हूं ।</strong></p>
</blockquote>
<p align="justify">प्रातःकाल नित्य कर्म, सन्ध्या वन्दन आदि से निवृत हो, माता को एक पत्र लिखा जिस में देशवासियों के नाम सन्देश भेजा और फिर फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गये । जब फांसी के तख्ते पर ले जाने वाले आये तो वन्दे मातरम और भारत माता की जय कहते हुए तुरन्त उठ चल दिये । चलते समय उन्होंने यह कहा &#8211; </p>
<p align="justify"><strong>मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे,      <br />बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे । </strong></p>
<p align="justify"><strong>जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,      <br />तेरा ही जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे ।।</strong> </p>
<p align="justify">फांसी के दवाजे पर पहुंच कर उन्होंने अँतिम इच्छा स्वरूप कहा -मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । इस के बाद तख्ते पर खड़े होकर प्रार्थना के बाद विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि&#8230;आदि मन्त्र का जाप करते हुए गोरखपुर के जेल में वे फन्दे पर झूल गये ।फांसी के वक्त जेल के चारों ओर बहुत बड़ा पहरा था । गोरखपुर की जनता ने उनके ‘शव को लेकर आदर के साथ ’शहर में घुमाया । बाजार में अर्थी पर इत्र तथा फूल बरसाये गये, और पैसे लुटाये गये । बड़ी धूमधाम से उन की अन्त्येष्टि क्रिया की गई । उनकी इच्छा के अनुसार सब संस्कार वैदिक ढंग से किये गये थे ।</p>
<p align="justify">अपनी माता के द्वारा जो सन्देश उन्होंने देशवासियों के नाम भेजा है, उसमें उत्तेजित युवक समुदाय को ‘शाँत करते हुए यह कहा कि यदि किसी के हृदय में जोश, उमंग तथा उत्तेजना उत्पन्न हुई है तो उन्हें उचित है कि अति ‘शीघ्र ग्रामों में जा कर कृषकों की दशा सुधारे, श्रम-जीवियों&#160;&#160; की&#160; उन्नति की चेष्टा करें, जहां तक हो सके साधारण जन समूह को शिक्षा दें, कांग्रेस के लिये कार्य करें, और यथा साध्य दलितोद्धार के लिये प्रयत्न करें । मेरी यही विनती है कि किसी को भी घृणा तथा उपेक्षा की दृष्टि से न देखा जावे, किन्तु सब के साथ करूणा सहित प्रेम भाव का बर्ताव किया जावे ।</p>
<p align="justify">मैं एक ओर बैठकर विमुग्ध नेत्रों से उस छवि का स्वाद ले रहा था कि किसी ने कहा-समय हो गया । बाहर आकर दूसरे दिन सुना कि उन्हें फांसी दे दी गई । उसी समय यह भी सुना कि तख्ते पर खड़े होकर उस प्रेम-पुजारी ने अपने आपको गिरधारी के चरणों में समर्पित करते हुए यह कहा था-मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं । जान देना सहज है&#160; युद्ध&#160; में&#160; वीर&#160; जान&#160; देते&#160; ही&#160; है और दुनिया उनका आदर करती ही है । लोग बुरे काम में भी जान देते है, रंडी के लिये भी जान देते है और लेते भी है । भाई को सम्पत्ति से वंचित करने के लिये जान ली और दी जाती है । पर एक ऐसे काम के लिये जिस में अपना कोई स्वार्थ भी न हो दो साल के करीब जेल में सड़कर भारत की आजादी के लिये वह वीर हंसते-हंसते फांसी के फन्दे पर भूल गया <strong><font color="#0000e6">भाई राम प्रसाद यह तुम्हारा ही काम था,</font></strong> सत्य धर्म का मर्म तुमने ही जान पाया था । वह वीर जहां से आया था वहीं को चला गया ।</p>
<p><strong><font color="#0000e6">प्यारे बिस्मिल की प्यारे बातें</font></strong>     <br /><font color="#070707">यह चारीगर उल्फत गाफिल नजर आता है ।      <br />बीमार का बच जाना मुश्किल नजर आता है ।।       <br />है दर्द बड़ी नयामत देता है जिसे खालिक।       <br />जी दरदे मुहब्बत के काबिल नजर आता है ।।       <br />जिस दिल में उतर जाये उस दिल को मिटा डाले ।       <br />हर तीर तेरा जालिम कातिल नजर आता है ।।       <br />मजरूह न थी जब तक दिल दिल ही न था मेरा ।       <br />सदके तेरे तीरों का बिस्मिल नजर आता है ।।</font> </p>
<p align="justify"><strong><font color="#0000e6">अदालत में जज से</font></strong>     <br />जज साहब हम जानते हैं कि आप हमें क्या सजा देंगे । हम जानते है कि आप हमें फांसी की सजा देंगे, और हम जानते है कि यह ओठ जो अब बोल रहे है वह कुछ दिनों बाद बन्द हो जायेंगे । हमारा बोलना, सांस लेना और काम करना यहां कि हिलना और जीना सभी इस सरकार के स्वार्थ के विरूद्ध है । न्याय के नाम पर ‘शीघ्र ही मेरा गला घूंट दिया जायेगा ? मैं जानता हूं कि मैं मरूंगा मरने से नहीं घबराता । किन्तु क्या जनता&#160; और&#160; इससे सरकार का उदेश्य पूर्ण हो जायेगा ?&#160; क्या&#160; इसी&#160; तरह&#160; हमेशा भारत मां के&#160; वक्षस्थल पर विदेशियों का तांडव नृत्य होता रहेगा ? कदापि नहीं, इतिहास इसका प्रमाण है । मैं मरूंगा किन्तु कब्र से फिर निकल आउंगा और मातृभुमि का उद्धार करूंगा ।&#8230;.</p>
<p align="justify"><strong><font color="#0000e6">एक दिन वह सहसा बोल पड़े-</font></strong>     <br />उदय काल के सूर्य का सौन्दर्य डूबते हुए सूर्य की छटा को कभ्ीा नहीं पा सकता है। और :-     <br />प्रेम का पंथ कितना कठिन है संसार की सारी आपत्तियां मानों प्रेमी ही के लिये बनी हों।     <br />उफ! कैसा व्यापार है कि हम सब कुछ देदे और हमें आपकी सहानुभूति या फिर कुछ भी नही । लेकिन फिर भी हम कभी मानेंगे नहीं &#8211; स्वाधीनता की कीमत कुछ भी नहीं     <br />फांसी के कुछ दिन पहिले उन्होंने अपने एक मित्र के पास एक पत्र भेजा था उसमें उन्होंने लिखा थाः     <br />19 तारीख को जो कुछ होने वाला है उसके लिये मैं अच्छी तरह तैयार हूं। यह है ही क्या ? केवल शरीर का बदलना मात्र है । मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातृभूमि तथा उसकी दीन सन्तति के लिये नये उत्साह और ओज के साथ काम करने के लिए ‘शीघ्र ही फिर लौट आयेगी ।     <br /><strong>यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी,      <br />तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान मैं लाउं कभी ।       <br />हे ईश, भारतवर्ष में ‘शतबार मेरा जन्म हो,       <br />कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।       <br />मरते बिसमिल रोशन, लहरी, अशफाक, अत्याचार से,       <br />होंगे पैदा सैकड़ों उनके रूधिर की धार से ।।       <br />उनके प्रबल उद्योग से उद्धार होगा देश का,       <br />तब नाश होगा सर्वथा दुख ‘शोक के लवकेश का ।।</strong> </p>
<p align="justify">सब से मेरा नमस्ते कहिये । कृपा करके इतना कष्ट और उठाइये कि मेरा अन्तिम नमस्कार पूजनीय पं० जगतनारायण&#160; मुल्ला&#160; की&#160; सेवा&#160; तक भी पहुंचा दीजिये । उन्हें हमारी कुर्बानी और खून से सने हुए रूपये की कमाई से सुख की नींद आवे । बुढ़ापे में भगवान पं0 जगतनारायण को ‘शान्ति प्रदान करें ।</p>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>पुनःआरँभ बिस्मिल आत्मकथ्य- और इसके पहले</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Feb 2010 20:33:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल]]></category>
		<category><![CDATA[अंतिम समय की बातें]]></category>
		<category><![CDATA[विशेष परिचय]]></category>
		<category><![CDATA[19 दिसम्बर 1927]]></category>
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		<category><![CDATA[फांसी की सजा]]></category>
		<category><![CDATA[रामप्रसाद 'बिस्मिल']]></category>
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		<category><![CDATA[हिन्दी और उर्दू]]></category>

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		<description><![CDATA[इससे पहले कि मैं आत्मकथा की कड़ियों का पुनःप्रकाशन आरँभ करूँ, मैं&#160; देश&#160; के&#160; गौरव&#160; अमर&#160; हुतात्मा के सम्मुख क्षमादान माँगते हुये नतमस्तक हूँ । उस&#160; समय&#160; जबकि&#160; इस&#160; आत्मकथा का&#160; प्रवाह अपने&#160; अँतिम&#160; चरण&#160; में&#160; था, इसका अनायास रुक जाना क्षम्य नहीं है । 25 अगस्त&#160; 2009 के बाद से आज तक इनका प्रकाशन [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=868&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
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<p align="justify"><strong><font color="#ca0000">इससे पहले कि</font></strong> मैं आत्मकथा की कड़ियों का पुनःप्रकाशन आरँभ करूँ, मैं&#160; देश&#160; के&#160; गौरव&#160; अमर&#160; हुतात्मा के सम्मुख क्षमादान माँगते हुये नतमस्तक हूँ । उस&#160; समय&#160; जबकि&#160; इस&#160; आत्मकथा का&#160; प्रवाह अपने&#160; अँतिम&#160; चरण&#160; में&#160; था, इसका अनायास रुक जाना क्षम्य नहीं है । 25 अगस्त&#160; 2009 के बाद से आज तक इनका प्रकाशन बाधित रहा है, इस&#160; अँतराल के बढ़ते जाने के साथ ही मैं अहर्निश एक अपराध बोध से ग्रसित रहता आया हूँ । कई कारण स्वयँ ही जुड़ते गये, साथ ही <a href="http://kuchh.amarhindi.com/?p=409#comment-2995" target="_blank">एक महत्वपूर्ण चीज जो मुझे निरँतर उद्वेलित करती रहती</a>&#160; उसे मैंनें इन कड़ियों के नियमित पाठक श्री अनुराग शर्मा से साझा किया है । अस्तु,उसे यहाँ दोहराना प्रसँगान्तर या कहिये कि प्रत्यारोप होगा । उसे इस मँच पर न रखते हुये <strong><font color="#ca0000">अब आगे बढ़ते हैं ।</font> आपको स्मरण होगा कि पिछली कड़ी बिस्मिल जी द्वारा प्रारँभिक असफ़लता के उपराँत दल के पुनर्गठन के प्रयासों पर ठहर गयी थी, देखें</strong> </p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table></div>
<blockquote><p align="justify"><font size="4"></font><font size="2"><a href="http://onlooker.amarhindi.com/index.php/2009/08/25/ram-pasad-bismil-discription-1/" target="_blank"><strong>पिछले सोपान पर</strong></a><strong>&#160;<font size="3">╓</font></strong><a href="http://onlooker.amarhindi.com/index.php/2009/08/25/ram-pasad-bismil-discription-1/" target="_blank"><strong>&#8230;&#8230;&#8230;</strong></a></font> चोट लगने के कारण उस समय हमारे नायक की आंख से काफी खून निकल चुका था, किन्तु फिर भी और लोगों से आगे चलने को कहकर आपने उसे अपनी पीठ पर उठाया और ज्यों त्यों कर चल दिये । जिस स्थान पर गाड़ी खड़ी थी, उसके थोड़ी दूर रह जाने पर आपने विद्यार्थी को एक पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं गाड़ी के पास जाकर जो एक आदमी उसकी निगरानी के लिये रह गया था उसे साथी को लेने के लिये भेजा मकान पर पिता के पूछने पर कह दिया बैल बिगड़ गये, गाड़ी&#160; उलट&#160; गई&#160; और मेरे चोट आ गई । </p>
<p align="justify">
<p align="justify">जिस समय फरार होकर आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते फिर रहे थे, उस समय की कथा भी बड़ी करूणाजनक है । उस बीच में कई बार आपको मौत का सामना करना पड़ा था । उस दिन तो पास में पैसा न रह जाने के कारण आपने घास तथा पत्तियां खाकर ही अपने जीवन का&#160; निर्वाह किया था । नेपाल तथा आगरा तथा राजपूताना आदि स्थानों में घूमते रहने के बाद एक दिन अखबार में देखा कि सरकारी ऐलान में आप पर से भी वारण्ट हटा लिया गया था, बस&#160; फिर&#160; आप&#160; घर&#160; वापस&#160; आ गए&#160; और रेशम के सूत का कारखाना खोलकर कुछ दिन तक आप घर का काम काज देखते रहे । किन्तु जिस हृदय में एक बार आग लग चुकी, उसे फिर चैन कहां । अस्तु – फिर&#160; से&#160; दल&#160; का&#160; संगठन&#160; प्रारम्भ&#160; कर दिया । <strong>अब आगे का वृताँत-</strong><font color="#808000">.</font></p>
</blockquote>
<p align="justify">एक बार किसी स्टेशन पर जा रहे थे । कुली बक्स लेकर पीछे-पीछे चल रहा था ठोकर खाकर गिर पड़ा । बहुत सी कारतूसों के साथ कई एक रिवाल्वर बक्स में से निकल कर प्लेटफार्म पर गिर पड़े कुली पर एक सूट-बूट धारी साहब बहादुर द्वारा बुरी तौर मार पड़ती देख कर पास खड़े दरोगा साहब को दया आ गई । कुली को क्षमा करने की प्रार्थना कर, बेचारे स्वयं ही सारा सामान बक्स के अन्दर भरने लगे । उस दिन यदि आप तनिक बी डर जाते और इस बुद्धिमानी से काम न लेते तो निश्चय ही गिरफतार हो गये थे । </p>
<p align="justify">उनमें असाधारण शारीरिक बल था । घोड़ा चढ़ने, साइकिल चलाने और तैरने में वे पूरे पण्डित थे । थकना किसे कहते है, सो तो वे जानते ही न थे । साठ-साठ मील बराबर चल कर भी आगे चलने की हिम्मत रखते&#160;&#160; थे ।&#160;&#160; व्यायाम और प्राणायाम वे इतना करते थे कि देखने वाले दंग रह जाते थे । हिन्दी और उर्दू के अतिरिक्त वे अंग्रेजी तथा बंगला भी जानते थे । उन्होंने कई किताबें भी हिन्दी में लिखी तथा प्रभा आदि मासिक पत्रों में अज्ञात के नाम से इनके कई लेख भी निकले । इन्होंने मैनपुरी षड़यन्त्र के सम्बन्ध में एक पुस्तक लिखी थी, परन्तु कुछ कारणों से वह पुस्तक प्रकाशित होने के पहिले ही जला दी गई । लिखने की अपेक्षा इन में व्याख्यान देने की ‘शक्ति और भी अधिक अच्छी थी । </p>
<p align="justify">इनका व्याख्यान बड़ा जोशीला और प्रभावोत्पादक होता था । असहयोग के जमाने में श्री अशफाक के साथ हरदोई, ‘शाहजहांपुर, बरेली और पीलीभीत जिलों में घूम घूम कर इन्होंने पचासों जगह व्याख्यान दिये थे । क्रान्तिकारी आन्दोलन एक प्रकार से इनके जीवन का आधार था । हवालात के समय अगर कोई व्यक्ति बाहर से मिलने आता तो ये अकसर पूछ बैठते, क्यों जी क्रान्तिकारी आन्दोलन जोरों पर है या नहीं ? क्रान्तिकारी कार्य उन्हें कितना प्रिय था, उसमें कितनी दिलचस्पी थी, वह इससे भी अनुमान किया जा सकता है, ये यों रोज नियमित रूप&#160; से हवन अवश्य करते थे, और कामों के कारण उनके हवन-कार्य में कभी व्यक्तिक्रम नहीं होने पाली, परन्तु क्रान्तिकारी कामों के सामने गायत्री और हवन तक को वह झट छोड़ देते थे । </p>
<p align="justify">श्री रामप्रसाद जी को यों गुस्सा कम आता था, जब जब वे क्राधित होते, तो इनका क्रोध प्रलयानल का रूप धारण कर लेता ! अभागे खुफिया के चर ही अधिकतर इनके क्रोध के शिकार होते थे । एक दफे, तो इन्होंने ने एक खुफिया को इतना पीटा&#160; कि वे बेचारा बहुत दिनों तक बिछावन से उठ नहीं सका । एक बार एक दूसरे खुफिया की डण्डे से ऐसी मरम्मत की कि वह नौकरी से इस्तीफा देकर चला गया ।</p>
<p align="justify">माताओं के लिये भी उस भावुक हृदय में कम श्रद्धा न थी । उनके तनिक भी अपमान को देख कर वह पागल सा हो उठता था । एक समय की बात है ।&#160; पेशेवर डाकुओं के एक सरदार ने आपके पास आकर अपने आपको क्रान्तिकारी दल का सदस्य बतलाया और उसके द्वारा की जाने वाली डकैतियों में सहयोग देने की प्रार्थना की । निश्चय हुआ कि पहली डकैती में हमारे नायक केवल दर्शक की भांति रहेगें और उनके कार्य संचालन का ढ़गं देख कर उसी के अनुसार अपना निश्चय करेंगे । स्थान और दिन नियत होने पर डकैती वाले गांव में पहुचें । मकान देख कर आपने कहा-इस झोपड़ी में क्या मिलेगा आप लोग व्यर्थ ही इन लोगों को तंग करने आये है यह सुन सब लोग हंस पड़े । </p>
<p align="justify">एक ने कहा आप ‘शहर के रहने वाले हैं, गांव का हाल क्या जाने यहां ऐसे ही मकानों में रूपया रहता है, गांव&#160; का&#160; हाल&#160; क्या&#160; जाने&#160; यहां&#160; ऐसे&#160; ही मकानों में रूपया रहता है । खैर ? अन्दर घुसने पर सब लोग अपनी मनमानी करने लगे । मकान में उस समय पुरूष न थे। उन लोगों ने स्त्रियों को बुरी तरह तंग करना ‘शुरू कर दिया । मना करने पर फिर वही जवाब मिला तुम क्या जानों अधिक अत्याचार&#160; देख, आपने एक से थोड़ी देर के लिये बन्दूक तथा कुछ कारतूस मांग लिये और कूद कर छत पर आ गये । वहां से पुकार कर कहा, खबरदार, यदि किसी ने भी स्त्रियों की ओर आंखे उठाई तो गोली का निशाना बनेगा कुछ देर तो काम ठीक तौर से होता रहा किन्तु बाद में एक दुष्ट ने फिर किसी स्त्री का हाथ पकड़ कर रूपया पूछने के बहाने कोठरी की ओर खींचा ! इस बार नायक ने जवान से कुछ भी न कहा उस पर फायर कर दिया । </p>
<p align="justify">छर्रों के पैर में लगते ही वह तो रोता चिल्लाता अलग जा गिरा और बाकी लोगों के होश बन्द हेा गये । आपने उंची आवाज से कहा जो कुछ मिला हो उसे लेकर बाहर आओ केाई मिठाई की भेली सर पर लादकर और कोई घी का बर्तन हाथ में लटकाए बाहर निकला । जिसे कुछ भी न&#160; मिला उसने फटे पुराने कपड़े ही बांध लिये, यह तमाशा देखकर उस सौम्य सुन्दर मूर्ति ने उस समय जो उग्र रूप धारण किया था उसका वर्णन करना मेरी लेखनी की ‘शक्ति के परे हैं । बन्दूक सीधी कर सब सामान वहीं पर रखवा दिया और सरदार की ओर देखकर कहा अगर यदि भविष्य में तूने फिर कभी अपनी स्वार्थ सिद्धि के नाम पर क्रान्तिकारियों को कलंकित करने का साहस किया तो अच्छा न होगा, जा&#160; आज&#160; तुझे&#160; क्षमा&#160; करता&#160; हूं । उस समय सरदार सहित दल के सभी लोग डरकर कांप रहे थे । <strong>इस डकैती में केवल साढ़े चैदह आने पैसे इन लोगों के हाथ लगे थे ।</strong> डकैती जैसे भीषण कार्य में सम्मिलित होने पर भी रामप्रसाद का हृदय कितना भावुक कितना पवित्र कितना महान था । यह बात इस वक्त की घटना से स्पष्ट है ।</p>
<p align="justify">एक दिन 9 अगस्त 1924 ई0 को सन्ध्या के आठ बजे 9 नम्बर की गाड़ी हरदोई से लखनउ जा रही थी एकाएक काकोरी तथा आलम नगर के बीच 52 नम्बर खम्भे के पास गाड़ी खड़ी हो गई । कुछ लोगों ने पुकार कर मुसाफिरों से कह दिया कि हम केवल सरकारी खजाना लूटने आये हैं । गार्ड से चाबी लेकर तिजोरी बाहर निकाली गई ।&#160; इसी बीच में एक व्यक्ति नीचे उतरा और गोली से घायल होकर गिर गया । लगभग पौन घण्टा के बाद लूटने वाले चले&#160; गये ।&#160; इस बार करीब दस हजार रूपया इन लोगों के हाथ लगा । 25 सितम्बर से गिरफतारियां प्रारम्भ हो गई और उसी में हमारे नायक भी पकड़े गये । डेढ़ साल तक अभियोग चलने के बाद आपको फांसी की सजा हुई । बहुत कुछ प्रयत्न किया गया, किन्तु फांसी की सजा कम न हुई और 19 दिसम्बर सन्1927 को गोरखपुर में आपको फांसी की रस्सी से लटका दिया गया । </p>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>श्री रामप्रसाद बिस्मिल</title>
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		<pubDate>Mon, 24 Aug 2009 19:42:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल]]></category>
		<category><![CDATA[विशेष परिचय]]></category>
		<category><![CDATA[गेंदालाल दीक्षित]]></category>
		<category><![CDATA[पहली डकैती]]></category>
		<category><![CDATA[मैनपुरी षड़यंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[शाहज़हाँपुर]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रामप्रसाद बिस्मिल]]></category>

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		<description><![CDATA[अमर शहीद की अँतिम नोट से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड ’ विशेष परिचय’ का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि, स्व० [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=853&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#fff6ff">
<tbody>
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<td>
<p align="justify"><span style="color:#808080;"><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/08/15/last-note-from-solitary-cell/" target="_blank"><strong>अमर शहीद की अँतिम नोट</strong></a></span><span style="color:#808080;"> से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड <strong>’ विशेष परिचय’</strong> का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि, स्व० बिस्मिल के बलिदान के उपराँत यह खण्ड उनके मित्र श्री शिव वर्मा ने अपने अग्रज श्री भगवतीचरण वर्मा के सहयोग से इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व लिखा होगा । वर्णित घटनाक्रम की जीवँतता को देखते हुये, ऎसा प्रतीत होता है  कि  बिस्मिल जी  के  दल  के  सँग  जुड़े किसी  अज्ञात  सहयोगी ने  भी  इसे  प्रस्तुत  करने  में  भरपूर मार्गदर्शन किया है ।</span>  <em><span style="color:#a2a2a2;">टिप्पणी निवेदन &#8211; डा. अमर कुमार</span></em></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p align="justify">पराधीनता के इस युग में दिव्य आलोक को धारण कर न जाने वे कहां से आये, अपने कल्पना राज्य में स्वर्गलोक की वीथियों का निर्माण किया और अन्त में विश्व को आभा की एक झलक दिखा कर अपने प्यारे मालिक के पास चले गये | उस दिन विश्व ने विमुग्ध नेत्रों से उनकी ओर देखा, श्रद्धा और भक्ति के फूल भी चढ़ाये । उस दिन जब उस मोहिनी मूर्ति की मद भरी आंखें सदा के लिये बन्द हो गई थीं, तो  उनकी  एक  झलक  मात्र  के  लिये  जनसमूह  पागल  सा  हो  उठा  था । धनिकों ने रूपये लुटायें, मेवे वालों ने मेवा से सत्कार किया, माता ओर बहिनों ने छतों पर से फूलों की वर्षा की और जनता ने वन्दे मातरम के उच्च निनाद के  साथ  उसका  स्वागत  किया, उस  प्यारे  के  उस  दिन  वाले उसके  निराले  वेष  को  देख  कर  मातायें  रो पड़ी, वृद्ध  सिसकियां  लेने  लगे, युवकों  के  तरूण  हृदय प्रतिहिंसा की आग से जल उठे और बालक झुक-झुक कर प्रणाम करने लगे ।</p>
<p align="justify">मैनपुरी जिले के किसी गांव में संवत 1954 के लगभग आप का जन्म हुआ था, किन्तु बाद में आप के पिता मुरलीधर सपरिवार शाहजहांपुर में आकर रहने लगे और अन्त तक यही स्थान हमारे चरित्र बालक का लीला क्षेत्र रहा । अस्तु उर्दू की शिक्षा पाने के बाद माता -पिता ने स्थानीय अंग्रेजी स्कूल में भर्ती करा दिया था । उन दिनों आपका जीवन कुछ विषेश अच्छा न था, किन्तु इसी बीच में आर्य समाज के प्रसिद्ध स्वामी सोमदेव से आपका परिचय हो गया । बस यहीं से जीवन ने पलटा खाया और वे स्वामी जी के साथ-साथ आर्यसमाज के भी भक्त बन गए । आप स्वामी जी को गुरूजी कहा करते थे । यह भी कहा था कि देश सेवा के भाव पहले-पहल आपको स्वामी जी से ही मिले थे । अस्तु सन 1915 के विराट  विप्लवायोजन  में  विफल  हो  जाने  के  बाद  भी  क्रान्तिकारी  लोग  एकदम निरा्श  न  हुए, वरन उन्होंने मैनपुरी में केन्द्र बनाकर फिर से कार्य आरम्भ कर दिया । श्री गेंदालाल दीक्षित की अध्यक्षता में बहुत दिनों तक काम होते रहने के बाद अन्त में इसका भी भेद खुल गया और फिर गिरफतारियों का बाजार गर्म हो उठा । दल के बहुत से लोगों के पकड़े जाने पर भी मुख्य कार्यकर्ताओं में से कोई भी हाथ न आ सका ।  उस  समय  आप  अंग्रेजी  की  दसवीं  कक्षा  में  थे, जोरों  से  धरपकड़  होते  देख  अपनी गिरफ़्तारी का हाल सुनकर आप फरार हो गये ।</p>
<p align="justify">मैनपुरी विप्लव दल के नेता श्री गेंदालाल के ग्वालियर में गिरफ़्तारी हो जाने पर, उन्हें जेल  से  छुड़ाने के विचार से आपने 19 वर्ष  की  अवस्था  में  अपने  साथ  के  पन्द्रह  और  विद्यार्थियों को लेकर<strong><span style="color:#0000d9;"> पहली डकैती</span></strong> की थी । इस पहले ही प्रयास में उन्होंने जिस दृढ़ता तथा साहस से काम लिया था, उसे देख कर यह कहना पड़ता है कि वे स्वभाव से ही मनु्ष्यों के नेता थे । प्रायः  सभी  अनुभवी  सदस्य  पकड़े  जा चुके थे । अस्तु स्कूल के पन्द्रह विद्यार्थियों को लेकर ही आप अपने निश्चय पर चल दिये, पिता  से  कहा-मेरे एक मित्र की शादी है, वे गाड़ी लेकर जाना चाहते है । गाड़ीवान उन्हीं का रहेगा और मुझे भी उसमें जाना पड़ेगा । सरल स्वभाव पिता ने गाड़ी दे दी । उन्हें क्या पता कि यह कैसी शादी है ।</p>
<p align="justify">सन्ध्या समय प्रस्थान कर कुछ रात बीतने पर एक स्थान पर गाड़ी रोक दी गई । निश्चित स्थान वहां से करीब 10 मील की दूरी पर था । एक आदमी को गाड़ी पर छोड़कर शेष सभी ही साथी पैदल ही चल दिये । किन्तु उस दिन अंधेरे में मार्ग भूल जाने से वह गांव न मिला । निराश हो सब के सब गाड़ी के पास वापस आए, दूसरे दिन थोड़े ही प्रयास के बाद वह स्थान मिल गया ।  अंधेरी  रात  में  चारों ओर  निस्तब्धता का  राज्य था । निद्रा के  मोहक  जाल  में  सारा  संसार  वेसुध  सोया  पड़ा  था, तीन  लड़कों  को  मकान  की  छत  पर चढ़ने की आज्ञा हुई । लाड़ प्यार से पाले गये स्कूल के उन लड़कों ने कभी भी ऐसे भयानक कार्य में भाग लिया था देर करते देख कप्तान ने जोर से कहा &#8211; यदि ऐसा ही था तो चले ही क्यों थे । इस बार साहस कर वे लोग मकान की छत पर चढ़ गये आज्ञा हुई अन्दर कूद कर दरवाजा खोल दो । किन्तु यह काम और भी कठिन था । कप्तान ने फिर कहा जल्दी करो देर करने से विपद की सम्भावना है । इसी प्रकार तीन बार कहने पर भी कोई नीचे न उतर सका ।</p>
<p align="justify">वे लोग इधर-उधर देख ही रहे थे कि एक जोर की आवाज के साथ बन्दूक की गोली से एक का साफा नीचे आ गिरा । इस बार तीनों बिना कुछ सोचे विचारे मकान में कूद पड़े और अन्दर से मकान का दरवाजा खोल दिया । सब लोगों को यथा स्थान खड़ा कर स्वयं छत पर आदेश देने लगे । डकैती समाप्त भी न हो पाई थी कि गांव में खबर हो गई और चारों ओर से ईंटे चलने लगी । यह देख कर लड़के घबरा गए ।  आप ने पुकार कर कहा तुम लोग अपना काम करते रहो, यदि कोई भी काम से हटा तो मेरी गोली का निशाना बनेगा । इस में एक ने नीचे से पुकार कर कहा &#8211; कप्तान ईंटों के कारण कुछ करते नहीं बनता है । आप ने जिस ओर से ईंटें आ रही थी, उधर जाकर कहा-ईटें बन्द कर दो वरना गोली से मारे जाओगे । इतने में एक ईंट आंख पर आकर लगी, देखते -देखते कपड़े खून से तर हो गए उस समय उस साहसी वीर ने आंख की कुछ परवा न कर गोली चलाना षुरू कर दिया, फायरों के बाद ईंटे बन्द हो गई । इधर डकैती भी खत्म हो चुकी थी । अस्तु सब लोग वापस चल दिये ।</p>
<p align="justify">पहले दिन के थके तो थे ही आधी दूर चलकर ही प्रायः सब लोग बैठने लगे । बहुत कुछ साहस बांधने पर उठकर चले ही थे कि एक विद्यार्थी बेहोश होकर गिर गया । कुछ देर बाद होश आने के बाद उसने सबसे कहा &#8211; मुझ में अब चलने की शक्ति नहीं है तुम लोग मेरे लिये अपने आपको संकट में क्यों फंसाते हो । मेरा सर काट कर लेते जाओ । अभी कुछ रात बाकी है तुम लोग आसानी से पहुंच सकते हो । सर काट लेने पर मुझे कोई भी पहचान न सकेगा । और इस प्रकार सब लोग बच सकोगे । साथी की इस बात से सबकी आंखों में आंसू आ गये ।</p>
<p align="justify">चोट लगने के कारण उस समय हमारे नायक की आंख से काफी खून निकल चुका था, किन्तु फिर भी और लोगों से आगे चलने को कहकर आपने उसे अपनी पीठ पर उठाया और ज्यों त्यों कर चल दिये । जिस स्थान पर गाड़ी खड़ी थी, उसके थोड़ी दूर रह जाने पर आपने विद्यार्थी को एक पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं गाड़ी के पास जाकर जो एक आदमी उसकी निगरानी के लिये रह गया था उसे साथी को लेने के लिये भेजा मकान पर पिता के पूछने पर कह दिया बैल बिगड़ गये, गाड़ी  उलट  गई  और मेरे चोट आ गई ।</p>
<p align="justify">जिस समय फरार होकर आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते फिर रहे थे, उस समय की कथा भी बड़ी करूणाजनक है । उस बीच में कई बार आपको मौत का सामना करना पड़ा था । उस दिन तो पास में पैसा न रह जाने के कारण आपने घास तथा पत्तियां खाकर ही अपने जीवन का  निर्वाह किया था । नेपाल तथा आगरा तथा राजपूताना आदि स्थानों में घूमते रहने के बाद एक दिन अखबार में देखा कि सरकारी ऐलान में आप पर से भी वारण्ट हटा लिया गया था, बस  फिर  आप  घर  वापस  आ गए  और रेशम के सूत का कारखाना खोलकर कुछ दिन तक आप घर का काम काज देखते रहे । किन्तु जिस हृदय में एक बार आग लग चुकी, उसे फिर चैन कहां । अस्तु – फिर  से  दल  का  संगठन  प्रारम्भ  कर दिया । <em><span style="color:#cc0000;"><strong>क्रमश:</strong> अगली कड़ी में</span></em></p>
<div id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:96bfa694-14ad-4f07-9703-521367e26b50" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+Indian+Struggle+for+Freedom">Martyrs of Indian Struggle for Freedom</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Ram+Prasad+Bismil">Ram Prasad Bismil</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Kakori+kand">Kakori kand</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2">बिस्मिल</a></div>
<br />Posted in 1.श्री रामप्रसाद बिस्मिल, विशेष परिचय Tagged: गेंदालाल दीक्षित, पहली डकैती, मैनपुरी षड़यंत्र, विशेष परिचय, शाहज़हाँपुर, श्री रामप्रसाद बिस्मिल <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/853/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/853/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/853/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/853/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/853/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/853/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/853/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/853/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/853/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/853/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/853/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/853/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/853/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/853/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=853&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>कालकोठरी के गीत और अँतिम नोट</title>
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		<pubDate>Fri, 14 Aug 2009 20:45:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतिम समय की बातें]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[देश की दुर्व्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[फाँसी]]></category>
		<category><![CDATA[अँतिम नोट]]></category>
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		<category><![CDATA[अशफ़ाकउल्ला खाँ]]></category>
		<category><![CDATA[काल कोठरी]]></category>
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		<category><![CDATA[राष्ट्र्वासी]]></category>

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		<description><![CDATA[अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी में गाये जाने वाले गीतों का उल्लेख करते हुये एक अँतिम नोट राष्ट्रवासियों के नाम दिया है, जो कि स्वगत कथन जैसा ही है । – प्रस्तुतकर्ता : डा० अमर कुमार की टिप्पणी अलीपुर बम्ब केस के अभियुक्तों के काले पानी जाते समय, [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=640&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/08/06/favorite-poems/" target="_blank">अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख</a></strong> के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी में गाये जाने वाले गीतों का उल्लेख करते हुये एक अँतिम नोट राष्ट्रवासियों के नाम दिया है, जो कि स्वगत कथन जैसा ही है । <em><font color="#acacac">– प्रस्तुतकर्ता : डा० अमर कुमार की टिप्पणी</font></em></p>
<p><strong>अलीपुर बम्ब केस</strong> के अभियुक्तों के काले पानी जाते समय, श्री ओमप्रकाश जी&#160; के उदगार जिनको मैं काल कोठरी के अन्दर गाया करता था ।<font color="#acacac"><em> </em></font><font color="#080808">साथ ही अन्य कवितायें और अशरार मैं लिपिबद्ध कर रहा हूँ</font><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/cooltext430993051.jpg"><img style="display:block;float:none;margin-left:auto;margin-right:auto;border-width:0;" title="apna kuchh am" border="0" alt="apna kuchh am" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/cooltext430993051_thumb.jpg?w=454&#038;h=54" width="454" height="54" /></a></p>
<p><strong><font color="#f47a00">हैफ जिस पै कि हम तैयार थे मर जाने को ।        <br />यकायक हम से छुड़ाया उसी काशाने को ।।         <br />आस्मां क्या यही बाकी था गजब ढाने को ।         <br />लाके गुर्बत में जो रक्खा हमें तड़फाने को ।।         <br />क्या कोई और बहाना न था तरसाने को ।। 1।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">फिर न गुलशन में हमें लायेगा सयाद कभी ।        <br />क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फरियाद कभी ।।         <br />याद आयेगा किसे यह दिले नाशाद कभी ।         <br />हम भी इस बाग में थे कैद से आजाद कभी ।।         <br />अब तो काहे को मिलेगी यह हवा खाने को ।।2।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#f47a00">दिल फिदा करते है कुर्बान जिगर करते हैं ।        <br />पास जो कुछ है वह माता की नजर करते है ।।         <br />खाने वीरान कों देखिये घर करते हैं ।         <br />खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते है ।।         <br />जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को ।।3।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">देखिये कब यह असीराने मुसीबत छूटें ।        <br />मादरेहिन्द के अब भाग खुलें या फूटें ।।         <br />देश सेवक सभी अब जेल में मूंजे कूटें ।         <br />आप यहां ऐश से दिन रात बहारें लूटें ।।         <br />क्यों न तरजीह दें इस जीने से मर जाने को ।।4।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#f47a00">कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी ।        <br />जिन्दगी भर को हमें भेज दे कालेपानी ।।         <br />मुंह में जल्लाद हुए जाते है छाले पानी ।।         <br />आबे खंजर का पिला करके दुआले पानी ।।         <br />मर न क्यों जाये हम इस उम्र के पैमाने को ।।5।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर ।        <br />हमको भी पाला था मां बाप ने दुख सह सह कर ।।         <br />वक्ते रूखसत उन्हें इतना भी न आये कहकर ।         <br />गोद में आंसू कभी टपके जो रूख से बहकर ।।         <br />तिफल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को ।।6।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#f47a00">देश सेवा का ही बहता है लहू नस नस में ।        <br />अब तो खा बैठे है चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ।।         <br />सरफरोशी की अदा होती है यों ही रसमें ।         <br />भाई खंजर से गले मिलते है सब आपस में ।।         <br />बहिनें तैयार चिताओं में है जल जाने को ।।7।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">नौजवानों जो तबियत में तुम्हारी खट के ।        <br />याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ।।         <br />आप के आज बदन होवें जुदा कट कट के ।         <br />और सद चााक हो माता का कलेजा फटके ।।         <br />पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को ।।8।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#f47a00">अपनी किस्मत में अजल से ही सितम रखा था ।        <br />रंज रक्खा था महिन रक्खा था गम रक्खा था ।।         <br />किसको परवाह थी और किसमें यह दम रक्खा था।         <br />हमने जब बादिये गुरवत में कदम रखा था ।।         <br />दूर तक यादे वतन आई थी समझाने को ।।9।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">अपना कुछ गम नहीं लेकिन यह ख्याल आता है ।        <br />मादरे हिन्द पे कब तक जवाल आता है ।।         <br />हरदयाल आता है योरूप से न अजीत आता है ।         <br />कौम अपनी पै तो रो रो के मलाल आता है ।।         <br />मुन्तजिर रहते है हम खाक में मिल जाने को ।।10।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#f47a00">मैकदा किसका है यह जाने सबू किस का है ।        <br />वार किसका है मेरी जां यह गुलू किसका है ।।         <br />जो बहे कौम की खातिर वह लहू किस का है ।         <br />आसमां साफ बता दे तू उदू किस का है ।।         <br />क्यों नये रंग बदलता है यह तड़फाने को ।। 11।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">दर्द मन्दों से मुसीबत की हवालत पूछो ।        <br />मरने वालों से जरा लुत्फ शहादत पूछो ।।         <br />चश्में मुश्ताक से कुछ दीद की हसरत पूछो ।         <br />सोज कहते हैं किसे पूछो तो परवाने को ।।12।।</font></strong></p>
<p><strong><font color="#f47a00">बात तो जब है कि इस बात की जिदें ठाने ।        <br />देश के वास्ते कुर्बान करें सब जाने ।।         <br />लाख समझायें कोई एक न उसकी माने ।         <br />कहता है खून से मत अपना गरेबां साने ।।         <br />नासहा आग लगे तेरे इस समझाने को ।।13।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">न मयस्सर हुआ गहत में कभी मेल हमें ।        <br />जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें ।।         <br />एक दिन को भी न मंजूर हुई बेल हमें ।         <br />याद आयेगा बहुत लखनउ का जेल में ।।         <br />लोग तो भूल ही जायेंगे इस अफसाने को ।।14।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#f47a00">अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली ।        <br />एक होती है फकीरों की हमेशा बोली ।।         <br />खून से फाग रचायेगी हमारी टोली ।         <br />जब से बंगाल में खेले है कन्हैया होली ।।         <br />कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को ।।15।।</font> </strong></p>
<p><strong><font color="#008000">नौजवानों यही मौका है उठो खुल खेलों ।        <br />खिदमते कौम में जो आवे बला तुम झेलो ।।         <br />देश के सदके में माता को जवानी दे दो ।         <br />फिर मिलेगा न ये माता की दुआयें ले लो ।         <br />देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने की ।।16।।</font></strong></p>
<p><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/cooltext430993243.jpg"><img style="display:block;float:none;margin-left:auto;margin-right:auto;border-width:0;" title="aankh ka noor hoon" border="0" alt="aankh ka noor hoon" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/cooltext430993243_thumb.jpg?w=454&#038;h=53" width="454" height="53" /></a> </p>
<p><strong><font color="#227584">न किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का करार हूं ।        <br />जो किसी के काम न आ सकूं वह मैं एक मुश्ते गुबार हूं ।।         <br />न दवायें दर्दें जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नजर हूं मै ।         <br />न इधर हूं मैं न उधर हूं मैं न शकेव हूं न करार हूं ।।         <br />मैं नहीं हूं नरामये जां फिजां मेरा सुन के कोई करेगा क्या ।         <br />मैं बड़े वियोगा की हूं सदा ओ बड़े दुखी की पुकार हूं ।।         <br />न मैं किसी का हूं दिलरूबा न किसी के दिल में बसा हुआ ।         <br />मैं जमीं की पीठ का बोझ हूं औ फलक के दिल का गुबार हूं ।।         <br />मेरा बखत मुझ से बिछड़ गया मेरा रंग रूप बिगड़ गया ।         <br />जो चमन खिजां से उजड़ गया&#160; मैं उसी की फसले बहार हूं ।।         <br />पये फातिहा कोई आये क्यों कोई खामा लाके जलाये क्यों ।         <br />कोई चार फूल चढ़ाये क्योंकि मैं बेकसी का मजार हूं ।।         <br />न अखतर से अपना हबीब हूं न अखतरों का रकीब हूं ।         <br />जो बिगड़ गया वह नसीब हूं जो उजड़ गया वह दयार हूं ।।</font></strong></p>
<p><font color="#000011"><em><font color="#656f74">इसके आगे श्रद्धेय हुतात्मा ने 11 अन्य रचनायें भी दी हैं, जो एक सँकलन के रूप में पृष्ठ</font></em> <a href="http://kakorikand.wordpress.com/poems/" target="_blank">चँद राष्ट्रीय अशआर और कवितायें</a> </font><font color="#656f74"><em>पर दी जा रही हैं । ऎसा इस कड़ी के प्रवाह के दृष्टिगत किया गया है</em>–</font><em><font color="#9e9e9e"> </font><font color="#919191">डा० अमर</font></em></p>
<blockquote><p align="justify"><em><font color="#0000a8"><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/flying_bird.gif"><img style="display:inline;margin:0;" title="Flying_bird" alt="Flying_bird" align="left" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/flying_bird_thumb.gif?w=77&#038;h=53" width="77" height="53" /></a> परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है । मैं तो अपना कार्य कर चुका । मैने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकाल कर भारतवासियों को&#160; दिखला&#160; दिया, जो&#160; सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ । अब किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिये कि मुसलमानों पर विश्वास न करना चाहिये । पहला तजर्बा था जो पूरी तौर से कामयाब हुआ । </font></em></p>
<p align="justify"><em><font color="#0000a8">अब देशवासियों से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फांसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिये कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक दल एक हो कर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें । जो कांग्रेस तय करें, उसे&#160; सब&#160; पूरी&#160; तौर&#160; से&#160; मानें&#160; और&#160; उस&#160; पर&#160; अमल करें । ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत दूर न होगा जब कि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की मांग के सामने&#160; सिर&#160; झुकाना&#160; पड़े, और&#160; यदि&#160; ऐसा&#160; करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों की मांग के सामने सिर झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तबतो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जावेगा । </font></em></p>
<p align="justify"><em><font color="#0000a8">हिंदू-मुसलिम एकता ही हम लोगों की यादगार तथा अन्तिम इच्छा है, चाहे&#160; वह&#160; कितनी&#160; कठिनता से क्यों न हो । जो मैं कह राहा हूं वही श्री अशफ़ाक उल्ला खां बारसी का भी मत है, क्योंकि&#160; अपील&#160; के समय हम दोनों लखनउ जेल में फांसी की कोठरियों में आमने सामने कई दिन तक रहे थे । आपस में हर तरह की बातें हुई थी । गिरफतारी के बाद से हम लोगों की सजा पड़ने तक श्री अशफ़ाक उल्ला खां की बड़ी उत्कट इच्छा यही थी, कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा ने पूरी कर दी ।</font></em></p>
<p align="justify"><em><font color="#0000a8">श्री अशफ़ाक उल्ला खां तो अंग्रेजी सरकार से दया प्रार्थना करने पर राजी ही न थे । उन का तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबन्द करीम के अलावा किसी दूसरे से दया की प्रार्थना न करना चाहिय, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने सरकार से दया प्रार्थना की थी । इसका&#160; दोषी&#160; मैं&#160; ही&#160; हूं, जो&#160; अपने&#160; प्रेम&#160; के&#160; पवित्र&#160; अधिकारों&#160; का&#160; उपयोग&#160; करके&#160; श्री अशफ़ाकउल्ला खां को उन के दृढ़ निश्चय से विचलित किया । मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ द्वितीया के अवसर पर गोरखपुर जेल से श्री अशफ़ाक को पत्र लिख कर क्षमा प्रार्थना की थी । परमात्मा जाने&#160; कि&#160; वह&#160; पत्र&#160; उनके&#160; हाथों&#160; तक&#160; पहुंचा भी या नही, खैर ! </font></em></p>
<p align="justify"><em><font color="#0000a8">परमात्मा की&#160; ऐसी&#160; ही&#160; इच्छा थी&#160; कि&#160; हम&#160; लोगों&#160; को&#160; फांसी&#160; दी&#160; जावे, भारतवासियों&#160; के जले हुये दिलों पर नमक पड़े, वे&#160; बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उन के कार्य को देख कर सुखी हों । जब हम नवीन शरीर धारण कर के देशसेवा में योग देने को उद्यत हों, उस समय तक भारतवर्श की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई हो । जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जावे । ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जावें । </font></em></p>
<p align="justify"><em><font color="#0000a8">प्रीवीकौंसिल में अपील भिजवा कर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया उसका भी एक विशेष अर्थ था । सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु दण्ड उपयुक्त दण्ड नहीं । क्योंकि न जाने किस की गोली से आदमी मारा गया । अगर डकैती डालने की जिम्मेवारी के ख्याल से मृत्युदण्ड दिया गया तो चीफ कोर्ट के फैसले के अनुसार भी मैं ही डकैतियों का&#160; जिम्मेदार&#160; तथा&#160; नेता&#160; था, और&#160; प्रान्त&#160; का&#160; नेता&#160; भी&#160; मैं&#160; ही&#160; था&#160; अतएव&#160; मृत्यु दण्ड&#160; तो अकेला मुझे ही मिलना चाहिए था । अतः तीन को फांसी नहीं देना चाहिये था । इसके अतिरिक्त दूसरी सजायें सब स्वीकार होती । पर ऐसा क्यों होने लगा ? </font></em></p>
<p align="justify"><em><font color="#0000a8">मैं विलायती न्यायालय की भी परीक्षा कर के स्वदेशवासियों के लिए उदाहरण छोड़ना चाहता&#160; था, कि&#160; यदि&#160; कोई&#160; राजनैतिक&#160; अभियोग&#160; चले&#160; तो&#160; वे&#160; कभी&#160; भूल&#160; करके&#160; भी&#160; किसी अंग्रेजी अदालत का विश्वास न करें । तबियत आये तो जोरदार बयान दें । अन्यथा मेरी तो यही राय है कि अंग्रेजी अदालत के सामने न तो कभी कोई बयान दें और न कोई सफाई पेश करें । काकोरी षडयन्त्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें । इस अभियोग में सब प्रकार के उदाहरण मौजूद है । </font></em></p>
<p align="justify"><font color="#0000a8"><em>प्रीवीकौंसिल में अपील दाखिला कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख हटवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है, और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इस में मुझे बड़ी निराशा पूर्ण असफलता हुई । अन्त में मैने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूँ । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीनों फांसी वालों की फांसी की सजा माफ कर देनी पड़ेगी, और यदि न करते तो मैं करा लेता ।</em><strong> </strong></font></p>
<p align="justify"><font color="#0000a8"><em>मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु&#160; बाहर&#160; से&#160; कोई&#160;&#160; सहायता&#160; न&#160; मिल</em>&#160; <em>सकी</em><strong>&#160; </strong><em>यही&#160;&#160; तो&#160; <strong>हृदय&#160; पर&#160; आघात&#160; लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी&#160; दल खड़ा&#160; किया&#160; था, वहां&#160; से&#160; मुझे&#160; प्राणरक्षा&#160; के&#160; लिये&#160; एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं ।</strong> फांसी&#160; पाने&#160; का&#160; मुझे&#160; कोई&#160; भी&#160; शोक&#160; नहीं&#160; क्योंकि&#160; मैं&#160; इस&#160; नतीजे&#160; पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था । </em></font></p>
<p align="justify"><font color="#0000a8"><em>मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो&#160; अधिक&#160; उपयोगी&#160; सिद्ध हेागी ।</em> </font></p>
<p align="justify"><em><font color="#0000a8">परिस्थिति&#160; अनुकूल&#160; न&#160; होने&#160; से&#160; ऐसे&#160; आन्दोलनों&#160; से&#160; अधिकतर&#160; परिश्रम&#160; व्यर्थ&#160; जाता&#160; है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।          <br />देशवासियों&#160; से&#160; यही&#160; अन्तिम&#160; विनय&#160; है&#160; कि&#160; जो&#160; कुछ&#160; करें, सब&#160; मिल&#160; कर&#160; करें, और&#160; सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !</font></em></p>
<p align="justify"><font color="#0000a8">मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।        <br />होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।। </font></p>
<p align="justify"><strong><font color="#0000a8">रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल          <br />१५ दिसम्बर १९२७ ई०</font>&#160;</strong></p>
</blockquote>
<p align="justify"><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/silhouette.jpg"><img style="display:inline;border-width:0;" title="-silhouette" border="0" alt="-silhouette" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/silhouette_thumb.jpg?w=51&#038;h=44" width="51" height="44" /></a></p>
<div style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:03e98b85-adea-4a8a-b467-b483b6467143" class="wlWriterEditableSmartContent">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2" rel="tag">बिस्मिल</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+Indian+Struggle+for+Freedom" rel="tag">Martyrs of Indian Struggle for Freedom</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Kakori+kand" rel="tag">Kakori kand</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Ram+Prasad+Bismil" rel="tag">Ram Prasad Bismil</a></div>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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			<media:title type="html">apna kuchh am</media:title>
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			<media:title type="html">aankh ka noor hoon</media:title>
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		<title>वो कवितायें, जो मुझे प्रिय रही हैं !</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Aug 2009 19:18:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतिम समय की बातें]]></category>
		<category><![CDATA[आत्मकथा]]></category>
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		<category><![CDATA[जननि तेरी जय हो]]></category>
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		<category><![CDATA[वतन पर मरनें वालों का]]></category>
		<category><![CDATA[शहीदों की चिताओं पर]]></category>

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		<description><![CDATA[अब तक आपने पढ़ा.. “ वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहिये । सरकार ने अ्शफाक उल्ला को रामप्रसाद का [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=603&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font color="#0000ff">अब तक आपने पढ़ा..</font> <a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/07/21/unjustified-death-sentence-divide-and-rule/" target="_blank"><font size="2">“ वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहिये ।        <br />सरकार ने अ्शफाक उल्ला को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया । अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान हो कर पक्के आर्यसमाजी और रामप्रसाद&#160; के क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बन सकते है, तब क्या भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते ? “</font></a>&#160; <font color="#0000ff">इसके आगे पढ़े… </font></p>
<p align="justify"><font size="1"></font><font color="#b1b1b1"><strong><em>प्रस्तुतिकर्ता टिप्पणी :</em></strong> आगे के साढ़े तीन पृष्ठ स्व० हुतात्मा अमर बिस्मिल जी ने अपनी कुछ प्रिय कविताओं का स्मरण किया है, और आने वाली पीढ़ियों को समर्पित करते हुये, इन्हें उनकी थाती बताया है । काश, इनको वह स्थान दिया जाता ।<em>&#160;<strong>- डा० अमर</strong> </em></font></p>
<p align="justify"><strong>इस अँतिम घड़ी में, मेरी&#160; यह&#160; इच्छा&#160; हो&#160; रही&#160; है कि मैं उन कविताओं में से भी चन्द का यहां उल्लेख कर दूं, जो&#160; कि&#160; मुझे&#160; प्रिय&#160; मालूम&#160; होती है और मैंने यथा-समय&#160; कंठस्थ की थीं । यह नवयुवकों को प्रेरणा प्रदान करे, प्रभु से यही प्रार्थना है !</strong>     <br /><strong>- रामप्रसाद बिस्मिल</strong></p>
<blockquote>
<p><font color="#0000ff">भूखे प्राण, तजै भले, के हरि खरू नहिं खाहिं ।        <br />चातक प्यासे ही रहै, बिन स्वांती न अघाहिं ।।         <br />बिन स्वांती न अघाहिं हंस मोती ही खावे ।         <br />सती नारि पतिव्रता नेक नाह चित्त डिगावे ।।         <br />तिमि प्रताप नहिं डिगे होंहि चहें सब किन रूखे ।         <br />अरि सन्मुख नहिं नवें फिरै चहें बन-बन भूखे ।।</font> </p>
</p>
</blockquote>
<p> <a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/1.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="1" border="0" alt="1" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/1_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a><br />
<blockquote>
<p><font color="#0000ff">चाह नहीं है सुर बाला के गहनों में गूंथा जाउं ।        <br />चाह नहीं है प्यारी के गल पड़ू हार मैं ललचाउं ।।         <br />चाह नहीं है राजाओं के शव पर मैं डाला जाउं ।         <br />चाह नहीं है देवों के सिर चढूं भाग्य पर इतराउं ।।         <br />मुझे तोड़ कर हे बनमाली उस पथ में तू देना फेंक ।         <br />मातृभूमि हित शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक ।।</font></p>
</blockquote>
<p><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/2.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="2" border="0" alt="2" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/2_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a></p>
<blockquote><p><font color="#0000ff">भारत जननि तेरी जय हो विजय हो ।        <br />तू शुद्ध और बुद्ध ज्ञान की आगार,         <br />तेरी विजय सूर्य माता उदय हो ।।         <br />हों ज्ञान सम्पन्न जीवन सुफल होवे,         <br />सन्तान तेरी अखिल प्रेममय हो ।।         <br />आयें पुनः कृष्ण देखें द्शा तेरी,         <br />सरिता सरों में भी बहता प्रणय हो ।।         <br />सावर के संकल्प पूरण करें ईश,         <br />विध्न और बाधा सभी का प्रलय हो ।।         <br />गांधी रहे और तिलक फिर यहां आवें,         <br />अरविंद, लाला महेन्द्र की जय हो ।।         <br />तेरे लिये जेल हो स्वर्ग का द्वार,         <br />बेड़ी की झन-झन बीणा की लय हो ।।         <br />कहता खलल आज हिन्दू-मुसलमान,         <br />सब मिल के गाओं जननि तेरी जय हो ।।</font></p>
</blockquote>
<p> <a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/3.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="3" border="0" alt="3" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/3_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a><br />
<blockquote>
<p><font color="#0000ff">कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।        <br />सुन्दर कली सेमर की देखी, सुअनाने मन मोहा ।         <br />कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।         <br />मारी चोंच भुआ जब देखा पटक-पटक शिर रोया ।         <br />कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।         <br />सुन्दर कली कमल की देखी, भंवरा का मन मोहा ।         <br />कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।         <br />सारी रैन सम्पुट में बीती, तड़प-तड़प जी खोया ।         <br />कोउ न सुख सोया कर के प्रीति । करके प्रीति० ।।</font></p>
</blockquote>
<p><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/4.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="4" border="0" alt="4" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/4_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a> </p>
<blockquote><p><font color="#0000ff">तू बह मये खूबी है अय जलवये जमाना ।        <br />हर गुल है तेरा बुलबुल हर शमा है परवाना ।।         <br />सर मस्ती में भी अपना साकी के कदम पर हो ।         <br />इतना तो करम करना अय लगजिशे मस्ताना ।।         <br />या रब इन्हीं हाथों से पीते रहें मस्ताना ।         <br />या रब वहीं साकी हो या रब वही पैमाना ।।         <br />आंखे है तो उसकी है किस्मत है तो उसकी है ।         <br />जिसने तुझे देखा है अय जलवये जमाना ।।         <br />छेड़ो न फिरिश्ते तुम जिक्र गमें जमाना ।         <br />क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसाना ।।         <br />यह चश्में हकीकी भी क्या तेरे सिवा देखें ।         <br />मयकदे&#160; से हमें मतलब कावा हो या बुतखाना ।।         <br />साकी को अब दिखा देंगे अन्दाज फकीराना ।         <br />टूटी हुई बोतल है&#160; या&#160; टूटा हुआ पैमाना ।।</font></p>
</blockquote>
<p> <a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/5.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="5" border="0" alt="5" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/5_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a><br />
<blockquote>
<p><strong><font color="#0000ff">मुर्गे दिल मत रो यहां आंसु बहाना है मना ।          <br />अंदलीवों को कफस में चहचहाना है मना ।।           <br />हाय जल्लादों तो देखो कह रहा सयाद यह ।           <br />वक्त जिबहा बुलबुलों को तड़फड़ाना है मना ।।           <br />वक्त जिबहा जानवर को देते हैं पानी पिला ।           <br />हजरते इन्सान को पानी पिलाना है मना ।।           <br />मेरे खूं से हाथ रंग कर बोले क्या अच्छा है रंग ।           <br />अब हमें तो उम्र भर मेंहदी लगाना है मना ।।           <br />अय मेरे जख्में जिगर नासूर बनना है तो बन ।           <br />क्या करूं इस जखम पर मरहम लगाना है मना ।।           <br />खूने दिल पीते है असगर खाते हैं लख्ते जिगर ।           <br />इस कफस में कैदियों केा आबो दाना है मना ।।</font></strong></p>
</blockquote>
<p><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/6.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="6" border="0" alt="6" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/6_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a> </p>
<blockquote><p><font color="#0000ff" size="3"><em>अरूजे कामयाबी पर कभी तो हिन्दुस्तां होगा ।          <br />रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियां हेागा ।।           <br />चखायेगे मजा बरबादिये गुलशन का गुलची को ।           <br />बहार आयेगी उस दिन जब कि अपना बागवां होगा ।।           <br />वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है ।           <br />सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा ।।           <br />जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दें वतन हरगिज ।           <br />न जाने बाद मुर्दन मैं कहां.. और तू कहां होगा ।।           <br />यह आये दिन को छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे कातिल !           <br />बता कब फैसला उनके हमारे दरमियां होगा ।।           <br /></em><em><u>शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगें हर बरस मेले ।            <br />वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।।</u>           <br />इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज्य देखेंगे ।           <br />जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा ।।</em></font></p>
</blockquote>
<p><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/7.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="7" border="0" alt="7" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/7_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a> </p>
<blockquote><p><font color="#0000ff">इम्तहां सब का कर लिया हम ने,        <br />सारे आलम को आजमा देखा ।         <br />नजर आया न कोई यार जमाने में अज़ीज़,         <br />आंख जिस की तरफ उठा देखा ।।         <br />कोई अपना न निकला महरमे राज,         <br />जिस को देखा सो बेवफा देखा ।।         <br />अलग़रज सब को इस जमाने में,         <br />अपने मतलब का आशना देखा ।।</font> </p>
</blockquote>
<p><a href="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/8.gif"><img style="display:inline;border-width:0;" title="8" border="0" alt="8" src="http://kakorikand.files.wordpress.com/2009/08/8_thumb.gif?w=63&#038;h=63" width="63" height="63" /></a> </p>
<div style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:b9f9ec8e-d4ec-4fe7-b475-1c636146f37d" class="wlWriterEditableSmartContent">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2" rel="tag">बिस्मिल</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+Indian+Struggle+for+Freedom" rel="tag">Martyrs of Indian Struggle for Freedom</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Kakori+kand" rel="tag">Kakori kand</a></div>
<br />Posted in अंतिम समय की बातें, आत्मकथा, खण्ड-4, चँद शेर Tagged: उस पथ में, गाँधी, गोरखपुर जेल, जननि तेरी जय हो, तिलक, बिघ्न और बाधा, भूखे प्राण, वतन पर मरनें वालों का, शहीदों की चिताओं पर <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/603/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/603/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/603/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/603/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/603/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/603/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/603/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=603&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।</title>
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		<pubDate>Tue, 21 Jul 2009 18:00:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतिम समय की बातें]]></category>
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		<description><![CDATA[अब तक आपने पढ़ा.. “ यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=569&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><em><font color="#0000df">अब तक आपने पढ़ा..</font></em> <a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/07/20/bismil-recounting-reasons-in-revolution/" target="_blank">“ यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।</a><strong><em></em></strong> “&#160; <em><font color="#0000df">अब आगे..</font></em></p>
<p>शतरंज&#160; के&#160; खेलने&#160; वाले&#160; भली-भांति&#160; जानते&#160; है&#160; कि&#160; आवश्यकता&#160; होने&#160; पर&#160; किस&#160; प्रकार&#160; अपने&#160; मोहरे&#160; भी मरवा&#160; देना&#160; पड़ते&#160; है । बंगाल&#160; आर्डिनेन्स&#160; के&#160; कैदियों&#160; के&#160; छोड़ने&#160; या&#160; उन&#160; पर&#160; खुली&#160; अदालत&#160; में&#160; मुकदमा चलाने&#160; के&#160; प्रस्ताव&#160; जब&#160; एसेम्बली&#160; में&#160; पेश&#160; किये&#160; गये,&#160; तो&#160; सरकार&#160;&#160; की&#160;&#160; ओर&#160;&#160; से&#160;&#160; बड़े&#160;&#160; जोरदार&#160;&#160; शब्दों&#160;&#160; में&#160;&#160; कहा&#160; गया&#160;&#160; कि, सरकार&#160; के&#160;&#160; पास&#160; सबूत&#160;&#160; मौजूद&#160;&#160; है । खुली&#160;&#160; अदालत&#160;&#160; में&#160;&#160; अभियोग&#160; चलाने&#160;&#160; से&#160;&#160; गवाहों&#160; पर&#160; आपत्ति&#160; आ सकती है । </p>
<p>आर्डिनेन्स के कैदियों के छोड़ने या उन पर खुली अदालत में मुकदमा चलाने के प्रस्ताव जब ऐसेम्बली में पेश किये गये, तो सरकार की ओर से बड़े जोरदार शब्दों में कहा गया कि सरकार के पास पूरा सबूत मौजूद है इसलिये खुली अदालत में अभियोग चलाने से गवाहों पर आपत्ति आ सकती है । यदि आर्डिनेन्स के कैदी लेखबद्ध प्रतिज्ञापत्र दाखिल कर दें कि वे भविष्य में क्रान्तिकारी आन्दोलन से कोई&#160; सम्बन्ध न रखेंगे, तो सरकार उन्हें रिहाई देने के विषय में विचार कर सकती है । बंगाल में दक्षिणेश्वर तथा सोवा बाजार बम केस आर्डिनेन्स के बाद चले । खुफिया विभाग के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट के कत्ल का मुकदमा भी खुली अदालत में हुआ, और भी कुछ हथियारों के मुकदमें खुली अदालत में चलाये गये किन्तु कोई एक भी दुर्घटना या हत्या की सूचना पुलिस न दे सकी । </p>
<p>काकोरी षडयन्त्र-केस पूरे डेढ़ साल तक खुली अदालतों में चलता रहा । सबूत की ओर से लगभग तीन सौ गवाह पेशकिये गये । कई मुखबिर तथा इकबाली खुली तौर से घूमते रहे, पर कहीं कोई दुर्घटना या किसी को धमकी देने की पुलिस ने कोई सूचना न दी । सरकार की इन बातों की पोल खोलने की गरज से ही मैंने एक लेखबद्ध बंधेज सरकार को दिया । यदि सरकार&#160; के&#160; कथनानुसार&#160; जिस&#160; प्रकार&#160; बंगाल आर्डिनेन्स के कैदियों के सम्बन्ध में सरकार के पास पूरा सबूत था और सरकार उन में से अनेकों को भयंकार षडयन्त्रकारी दल का सदस्य तथा हत्याओं का जिम्मेदार समझती तथा कहती थी, तो इसी प्रकार काकोरी के षडयन्त्रकारियों के लेखबद्ध प्रतिज्ञा करने पर कोई गौर क्यों न किया ? </p>
<blockquote><p><em><font color="#0000df">बात यह है कि जबरा मारे रोने न देय ।</font> मुझे तो भली भांति मालूम था कि संयुक्त प्रान्त में जितने राजनैतिक अभियोग चलाये जाते है, उनके&#160; फैसले&#160; खुफिया&#160; पुलिस&#160; के इच्छानुसार लिखे जाते है । बरेली पुलिस कान्स्टेबिलों की हत्या के अभियोग में नितान्त निर्दोष नवयुवकों को फंसाया गया और सी०आई०डी० वालों ने अपनी डायरी दिखला कर फैसला लिखाया । <font color="#0000df">काकोरी&#160; षडयन्त्र&#160; में&#160; भी&#160; अन्त&#160; में ऐसा&#160; ही&#160; हुआ ।</font> सरकार की सब चालों को जानते हुए भी मैने यह सब&#160; कार्य&#160; उस&#160; की लम्बी -लम्बी बातों&#160; की पोल खोलने के लिये ही किये ।</em> </p>
</blockquote>
<p>काकोरी के मृत्यु-दण्ड पाये हुओं की दया प्रार्थना न स्वीकार करने का कोई विशेष कारण सरकार के पास नही । सरकार ने बंगाल आर्डिनेन्स के कैदियों के सम्बन्ध में जो कुछ कहा था, वही&#160; काकोरी&#160; वालों&#160; ने किया । मृत्यु दण्ड को रदद कर देने से देश में किसी प्रकार की शाति भंग होने अथवा किसी विप्लव हो जाने की सम्भावना न था । विशेषतया जब कि देश भर के सब प्रकार के हिन्दू मुसलमान एसेम्बली के सदस्यों ने इस की सिफारि्श की थी । षडयन्त्रकारियों की इतनी बड़ी सिफारि्श इस से पहले कभी नहीं हुई । किन्तु सरकार तो अपना पासा सीधा रखना चाहती है । उसे अपने बल पर विश्वास है । </p>
<p>सर विलियम मेरिस ने ही स्वयं शाहजहांपुर तथा इलाहाबाद के हिन्दू-मुस्लिम दंगे के अभियुक्तों के मृत्यु-दण्ड रदद किये है, जिन को कि इलाहाबाद हाईकोर्ट से मृत्यु-दण्ड ही देना उचित समझा गया था और उन लोगों पर दिन दहाड़े हत्या करने के सीधे सबूत मौजूद थे । ये सजायें ऐसे समय माफ की गई थी, जब&#160; कि&#160; नित्य&#160; नये&#160; हिन्दू-मुसलिम&#160; दंगे&#160; बढ़ते&#160; ही&#160; जाते&#160; हैं । यदि काकोरी के कैदियों को मृत्यु दण्ड माफ कर के, दूसरी&#160; सजा देने से दूसरों का भी क्राँति के लिये उत्साह बढ़ता तो क्या इसी प्रकार मजहबी दंगों के सम्बन्ध में भी नहीं हो सकता था ? </p>
<p>मगर वहां तो मामला कुछ और ही है, जो अब भारतवासियों के नरम से नरम दल के नेताओं के भी शाही कमीशन के मुकर्रर होने और उस में एक भी भारतवासी के न चुने जाने, पार्लमेंट&#160; में भारत सचिव लार्ड बर्कनहेड के तथा अन्य मजदूर दल के नेताओें के भा्षणों से भली-भांति समझ में आया है कि किस प्रकार भारतवर्ष को गुलामी की जंजीर में जकड़े रहने की चालें चली जा रही है ।</p>
<blockquote><p><em><font color="#0000df">मुझे प्राण त्यागते समय निरा्श हो जाना नहीं पड़ रहा है कि हम लोगों के बलिदान व्यर्थ गये । मेरा तो विश्वास है कि हम लोगों की छिपी हुई आहों का ही यह नतीजा हुआ कि लार्ड वर्कनहेड के दिमाग में परमात्मा ने एक विचार उपस्थित किया कि हिन्दुस्तान के हिंदू-मुसलिम झगड़ों का लाभ उठाओ और भारतवर्ष की जंजीरें और कस दो । गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।</font></em> </p>
</blockquote>
<p>भारतवर्ष के प्रत्येक विख्यात राजनैतिक दल ने और हिन्दुओं के तो लगभग सभी तथा मुसलमानों के भी अधिकतर नेताओे ने एक स्वर हो कर रायल कमी्शन की नियुक्ति तथा उस के सदस्यों के विरूद्ध घोर विरोध किया है, और अगली मद्रास कांग्रेस सभा पर सब राजनैतिक दल के नेता तथा हिंदू मुसलमान एक होने जा रहे हैं । वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहिये । </p>
<p><em>सरकार ने अ्शफाक उल्ला को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया । अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान हो कर पक्के आर्यसमाजी और रामप्रसाद&#160; के क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बन सकते है, <font color="#0000df">तब क्या भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते ?</font></em></p>
<div style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:080ab63f-97f5-4934-8337-c9f7555f9036" class="wlWriterEditableSmartContent">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2" rel="tag">बिस्मिल</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Kakori+Conspiracy" rel="tag">Kakori Conspiracy</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Hindu" rel="tag">Hindu</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Viceroy" rel="tag">Viceroy</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Autobiography" rel="tag">Autobiography</a>,<a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a5%9b%e0%a4%b9%e0%a4%ac%e0%a5%80+%e0%a4%a6%e0%a4%81%e0%a4%97%e0%a5%87" rel="tag">मज़हबी दँगे</a></div>
<br />Posted in अंतिम समय की बातें, आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4 Tagged: अशफ़ाकउल्ला खाँ, आर्डिनेन्स, काकोरी षड़यन्त्र, खुफ़िया पुलिस, प्रतिज्ञापत्र, बिस्मिल, मृत्युदण्ड, शाहज़हाँपुर, हाईकोर्ट, हिन्दु-मुसलमान <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/569/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=569&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।</title>
		<link>http://kakorikand.wordpress.com/2009/07/20/bismil-recounting-reasons-in-revolution/</link>
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		<pubDate>Sun, 19 Jul 2009 19:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
		<category><![CDATA[आत्मकथा]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[देश की दुर्व्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[काकोरी कांड]]></category>
		<category><![CDATA[देशसेवा]]></category>
		<category><![CDATA[बिस्मिल]]></category>
		<category><![CDATA[षड़यन्त्रकारी]]></category>
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		<description><![CDATA[अब तक आपने पढ़ा…&#160; उनको&#160; उचित&#160; है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता&#160; प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और&#160; उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।&#160; इसके आगे स्व० बिस्मिल लिखते हैं.. जो धनी मानी स्वदेश सेवार्थ बड़े-बड़े विद्यालयों तथा पाठशालाओं की स्थापना [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=564&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kakorikand.wordpress.com/googled955323cbabdc2f1"></a></p>
<p><em><font color="#1515ff">अब तक आपने पढ़ा…</font></em>&#160; <a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/07/10/bismls-dream-wishes/" target="_blank">उनको&#160; उचित&#160; है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता&#160; प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और&#160; उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।</a>&#160; <em><font color="#1515ff">इसके आगे स्व० बिस्मिल लिखते हैं..</font></em></p>
<p>जो धनी मानी स्वदेश सेवार्थ बड़े-बड़े विद्यालयों तथा पाठशालाओं की स्थापना करते है, उनको उचित है कि विद्यापीठों के साथ-साथ उद्योगपीठ, शिल्पविद्यालय तथा कलाकौ्शल भवनों की स्थापना भी करें । इन विद्यालयों के विद्यार्थियों को नेतागीरी के लोभ से बचाया जावे । विद्यार्थियों का जीवन सादा हो और विचार उच्च हों । इन्हीं विद्यालयों में एक-एक उपदेशक विभाग भी हो, जिस में विद्यार्थी प्रचार करने का ढंग सीख सकें । जिन युवकों के हृदय में स्वदेश सेवा के भाव हो उनको कष्ट सहन करने की आदत डालकर सुसंगठित रूपसे ऐसा कार्य करना चाहिये, जिसका परिणाम स्थायी हो । </p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Catherine_II_of_Russia#The_reign_of_Peter_III_and_the_coup_d.27.C3.A9tat_of_July_1762" target="_blank">कैथोराइन ने इसी प्रकार कार्य किया था ।</a> उदर पूर्ति के निमित्त कैथोराइन के अनुयायी ग्रामों में जाकर कपड़े सीते या जूट बनाते और रात्रि के समय किसानों को उपदे्श देते थें जिस समय से मैंने कैथोराइन की जीवनी का अंग्रेजी भाषा में अध्ययन किया, मुझ पर उस का बहुत प्रभाव हुआ।&#160; मैंने तुरन्त उस की जीवनी कैथोराइन नाम से हिन्दी में प्रकाशित कराई । </p>
<blockquote><p><em><font color="#0000df">मैं भी उसी प्रकार काम करना चाहता था, पर बीच ही में क्रान्तिकारी दल में फंस गया । <u>मेरा तो अब दृढ़ निश्चय हो गया है कि अभी पचास वर्ष तक क्रान्तिकारी दल की भारतवर्ष में सफलता नहीं हो सकती,</u> क्योंकि&#160; यहां&#160; की&#160; जनता&#160; उसके&#160; उपयुक्त&#160; नहीं । अतएव क्रान्तिकारी दल का संगठन कर के व्यर्थ में नवयुवकों के जीवन को कष्ट करना और शक्ति का दुरूपयोग करना बड़ी भूल है । इससे लाभ के स्थान में हानि की सम्भावना बहुत अधिक है ।</font></em></p>
</blockquote>
<p><strong>नवयुवकों को मेरा अन्तिम सन्देश</strong> यही है कि वे रिवाल्वर या पिस्तौल को अपने पास रखने की इच्छा केा त्याग कर सच्चे देशसेवक बने । पूर्ण स्वाधीनता उन का ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी बनने का प्रयत्न करते रहें । फल की इच्छा छोड़ कर सच्चे प्रेम से कार्य करें । परमात्मा सदैव उनका भली ही करेगा ।</p>
<p><font size="2"><em>यदि देश हित मरना पड़े मुझ को सहस्त्रों बार भी ।       <br />तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाउं कभी ।।        <br />हे ई्ष भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो ।        <br />कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।</em></font></p>
<p><em>सर फ़रोशाने वतन फिर देखलो मकतल में है ।     <br />मुल्क पर कुर्बान हो जाने के अरमां दिल में हैं ।।      <br />तेरा है जालिम की यारों और गला मजलूम का ।      <br />देख लेंगे हौसला कितना दिले कातिल में है ।।      <br />शोरे महशर बावपा है मार का है धूम का ।      <br />बलबले जोशे शहादत हर रगे बिस्मिल में है ।।</em></p>
<blockquote><p><strong>आज 17 दिसम्बर 1927 ई0 को निम्नलिखित पक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जब कि 19 दिसम्बर 1927&#160; ई0 सोमवार पौष कृष्ण 11 सम्वत् 1984 को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है । अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ही । यह सब सर्वशक्तिमान प्रभु की लीला है । सब कार्य उसके इच्छानुसार ही होते है । यह परम पिता परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किस को शरीर त्यागना होता है । </strong></p>
</blockquote>
<p>मृत्यु के सकल उपक्रम निमित्त मात्र है । जब तक कर्म क्षय नहीं होता, आत्मा को जन्म-मरण के बन्धन में पड़ना ही होता है, यह शास्त्रों का निश्चय है । यद्यपि यह, वह परमब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणाम स्वरूप कौन सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा, किन्तु अपने लिये ये मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही पुनः भारतवर्ष में ही किसी निकटवर्ती सम्बन्धी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण करूंगा, क्योंकि मेरा जन्म जन्मान्तर यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो</p>
<blockquote><p><em>कोई किसी पर हुकूमत न करें । सारे संसार में जनतन्त्र की स्थापना हो । वर्तमान समय में भारतवर्ष की बड़ी सोचनीय अवस्था है । अतएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब तक कि भारतवर्ष के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण स्वतन्त्र न हो जावेंगे, परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना होगी कि वह मुझे इसी देश में जन्म दें, ताकि मैं उसकी पवित्र वाणी वेद वाणी का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक पहुंचाने में समर्थ हो सकूं ।</em> </p>
<p><em><font color="#0000df" size="2">सम्भव है कि मैं मार्ग निर्धारण में भूल करूं, पर&#160; इसमें&#160; मेरा&#160; कोई&#160; विशेष&#160; दोष&#160; नहीं, क्योंकि मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं । भूल&#160; न&#160; करना&#160; केवल&#160; सर्वज्ञ&#160; से&#160; ही&#160; सम्भव है । हमें&#160; परिस्थितियों&#160; के&#160; अनुसार&#160; ही&#160; सब&#160; कार्य&#160; करने&#160; पड़े&#160; और&#160; करने&#160; होंगे । परमात्मा&#160; अगले&#160; जन्म&#160; में&#160; सुबुद्धि&#160; प्रदान&#160; करें&#160; कि&#160; मैं&#160; जिस&#160; मार्ग&#160; का&#160; अनुसरण&#160; करूं, वह&#160; त्रुटि&#160; रहित&#160; ही&#160; हो ।</font></em></p>
</blockquote>
<p>अब मैं उन बातों का भी उल्लेख कर देना उचित समझता हूं जो काकोरी षड्यन्त्र के अभियुक्तों के सम्बन्ध में सेशन जज के फैसला सुनाने के पश्चात घटित हुई । 6 अप्रैल सन 27 ई को सेशन जज ने फैसला सुनाया था। 18 जुलाई सन 27 ई0 को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई । इसमें कुछ की सजायें बढ़ी और एकाध को कम भी हुई । अपील होने की तारीख से पहले मैं ने संयुक्त प्रान्त के गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि अब भविष्य में क्रान्तिकारी दल से कोई सम्बन्ध न रखूंगा । इस मेमोरिलय का जिक्र मैंने अपनी अन्तिम दया प्रार्थना पत्र में जो मैं ने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था, उसमें कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना न स्वीकार की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमें की बहस लिखकर भेजी, जो छापी गई । </p>
<p>जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी, तो उन्हें बड़ा सन्देह हुआ कि वह बहस मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का यह नतीजा निकला कि चीफ कोर्ट अवध से मुझे महा भयंकर षड्यन्त्रकारी की पदवी दी गई । मेरे पश्चाताप पर जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा का प्रकाश इस प्रकार किया कि यदि यह रामप्रसाद छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा । बुद्धि की प्रखरता तथा समझ पर कुछ प्रकाश डालते हुए निर्दयी हत्यारे के नाम से विभूषित किया गया । लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु काकारी षड़यन्त्र का चीफ कोर्ट आद्योपान्त, फैसला पढ़ने से भली भांति विदित होता है कि मुझे मुत्युदण्ड किस ख्याल से दिया गया । </p>
<p>यह निश्चय किया गया कि रामप्रसाद ने सेशन जज के&#160; विरूद्ध&#160; अपशब्द&#160; कहे&#160; है, खुफिया&#160; विभाग&#160; के कार्यकर्ताओं पर लांछन लगाये हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके विरूद्ध आवाज उठाई है, अतएव रामप्रसाद सबसे बड़ा गुस्ताख मुलजिम है । अब माफी चाहे वह किसी भी रूप में मांगे, नहीं दी जा सकती । चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रान्तीय गवर्नर तथा फिर वाइसराय के पास दया प्रार्थना की गई । रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लहरी, रोशनसिंह तथा अ्शफ़ाक़उल्ला खां के मृत्यु दण्ड को बदलकर अन्य दूसरी सजा देने की सिफारि्श करते हुए मेम्बरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन पत्र दिया । मेरे पिता ने ढाई सौ रईस, आनरेरी&#160; मजिस्ट्रेट&#160; तथा&#160; जमींदारों&#160; के&#160; हस्ताक्षर&#160; से&#160; एक अलग प्रार्थना पत्र भेजा, किन्तु श्रीमान सर बिलियम मेरिस की सरकार ने एक भी न सुनी । </p>
<p>उसी समय लेज़िस्लेटिव एसेम्बली तथा कौंसिल आफ स्टेट के 78 सदस्यों&#160; ने&#160; भी&#160; हस्ताक्षर&#160; करके वाइसराय के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि काकोरी षड़यन्त्र के मृत्युदण्ड पाये हुओं को मृत्युदण्ड की सजा बदलकर दूसरी सजा कर दी जावे, क्योंकि दौरा जज ने सिफारिश की है कि यदि यह लोग पश्चाताप करें तो सरकार दण्ड कम कर दें । चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है । </p>
<p>किन्तु वाइसराय महोदय ने भी एक न सुनी । इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा अन्य एसेम्बली के कुछ सदस्यों ने भी वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु दण्ड न दिया जावे । इतना होने पर सबको आ्शा थी कि वायसराय महोदय अवश्यमेव मृत्युदण्ड की आज्ञा रदद कर देंगे । इसी हालत में चुपचाप विजयाद्शमी से दो दिन पहले जेलों को तार भेज दिये गये, कि दया नहीं होगी । सब को फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई । </p>
<p>जब मुझे सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल ने तार सुनाया, मैंने भी कह दिया कि आप अपना कार्य कीजिये । किन्तु सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया प्रार्थना का सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम सा बना रखा है कि प्रत्येक फांसी के कैदी की ओर से जिसकी दया भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहां से खारिज हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रान्तीय सरकार के पास अवश्य भेजते हैं कोई दूसरा जेल सुपरिन्टेन्डेण्ट ऐसा नहीं करता । उपरोक्त तार लिखते समय मेरा कुछ विचार हुआ कि प्रिवीकौंसिल इग्लैण्ड में अपील की जावे । मैंने श्रीयुत मोहनलाल सक्सेना वकील लखनउ को इस प्रकार की सूचना दी । </p>
<p>बाहर किसी को वाइसराय की अपील खारिज होने की बात पर विश्वास भी न हुआ । जैसे तैसे करके श्रीयुत मोहनलाल द्वारा प्रिवीकौंसिल में अपील कराई गई । नतीजा पहले से ही मालूम था। वहां से भी अपील खारिज हुई । यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? <strong><em>क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ?</em></strong> <em>इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं,</em> <strong><em>मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।</em></strong></p>
<div style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:fc1737f3-a470-460e-b4a8-002d6f934408" class="wlWriterEditableSmartContent">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/Kakori+Conspiracy" rel="tag">Kakori Conspiracy</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Martyrs+Of+Indian+Independence" rel="tag">Martyrs Of Indian Independence</a>,<a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%9e%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b6%e0%a5%80+%e0%a4%95%e0%a5%80+%e0%a4%a4%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a4%be" rel="tag">सरफ़रोशी की तमन्ना</a></div>
<br />Posted in आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था Tagged: काकोरी कांड, देशसेवा, बिस्मिल, षड़यन्त्रकारी, Bismil, Martyr of Indian Independence, Sarfaroshi ki tammana <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/564/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/564/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/564/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/564/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/564/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/564/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/564/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/564/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/564/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/564/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/564/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/564/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/564/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/564/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=564&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>मैजिक लालटेन द्वारा तस्वीरें दिखाकर या…</title>
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		<pubDate>Fri, 10 Jul 2009 17:29:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्मकथा]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[देश की दुर्व्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[खद्दरधारी]]></category>
		<category><![CDATA[मैज़िक लालटेन]]></category>
		<category><![CDATA[सामाचार पत्र]]></category>
		<category><![CDATA[स्वदेश भक्त]]></category>
		<category><![CDATA[Bismil]]></category>
		<category><![CDATA[Martyr of Indian Independence]]></category>
		<category><![CDATA[Pre independent India]]></category>

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		<description><![CDATA[अब तक आपने पढ़ा… “ इसी कारण महामना देशबन्धु चितरंजन दास ने अन्तिम समय ग्राम संगठन ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था । मेरे विचार से ग्राम संगठन का सब से सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़ कर ग्रामीण जीवन से प्रीति उत्पन्न हो । जो युवक मिडिल, [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=562&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अब तक आपने पढ़ा… “ <a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/07/09/contemporary-social-scenerio/" target="_blank">इसी कारण महामना देशबन्धु चितरंजन दास ने अन्तिम समय ग्राम संगठन ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था । मेरे विचार से ग्राम संगठन का सब से सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़ कर ग्रामीण जीवन से प्रीति उत्पन्न हो । जो युवक मिडिल, इटेंस, एफ0 ए0, बी0ए0 पास करने में हजारों रूपये नष्ट करके दस, पन्द्रह, बीस या तीस रूपये की नौकरी के लिये ठोकरें खाते फिरते है, उन्हें नौकरी का आसरा छोड़कर कोई उद्योग जैसे बढ़ईगिरी, लुहारगिरी, दर्जी का काम, धोबी का काम, जूते बनाना, कपड़ा बुनना, मकान बनाना, राजगीरी का इत्यादि सीख लेना चाहिए ।</a> अब आगे पढ़िये…&#160; </p>
<p>यदि जरा साफ सुथरे रहना हो तो वैद्यक सीखे । किसी बड़े ग्राम या कस्बे में जाकर काम शुरू करें । उपरोक्त कामों में से कोई काम भी ऐसा नहीं है, जिस में चार या पांच घण्टा मेहनत करके तीस रूपये मासिक की आय न हो जावे । ग्राम में तीस रूपये मासिक शहर के साठ रूपये से अधिक है । क्योंकि ग्राम में लकड़ी या कण्ड़ा का मूल्य बहुत कम होता है और यदि किसी जमींदार की कृपा हो गई तो एक सूखा हुआ वृक्ष कटवा दिया तो छः महीने के लिए के लिए ईंधन की छुटटी हो गई । </p>
<p>शुद्ध घी, दूध सस्ते दामों में मिल जाता है और यदि स्वयं एक या दो गाय या भैंस पाल ली, तब तो आम के आम गुठलियों के दाम ही मिल गये। चारा सस्ता मिलता है । घी दूध बाल-बच्चे खाते हैं । कण्डों का ईंधन होता है । और यदि किसी की कृपा हो गई तो फसल पर एक दो भुस की गाड़ी बिना मूल्य ही मिल जाती है । अधिकतर कामकाजियेां को गांव में चारा लकड़ी के लिये पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। हजारों अच्छे-अच्छे ग्राम है, जिनमें वैद्य, दर्जी, धोबी निवास ही नहीं करते । उन ग्रामों के लोगों को दस, बीस कोस दूर दौड़ना पड़ता है । वे इतने दुखी हेाते है कि जिस का अनुमान करना बड़ा कठिन है । विवाह आदि अवसरों पर यथा समय कपड़े नहीं मिलते । काष्ठादि&#160; औषधियां बड़े-बड़े कस्बों में नहीं मिलती । यदि मामूली अत्तार बन ही कस्बें में बैठ जावे, और दो चार किताबें देखकर ही औषधि दिया करे तेा भी तीस, चालीस रूपये मासिक की आय तो कहीं गई ही नहीं । </p>
<p>इस प्रकार उदर-निर्वाह तथा परिवार का प्रबन्ध हो जाता है । ग्रामों में अधिक जन संख्या से परिचय हो जाता है । परिचय ही नहीं, जिसका एक समय आवश्यकता पर कार्य निकल गया, वह आभारी हो जाता है , उसकी आंख नीची रहती है । जरूरत पड़ने पर तुरन्त सहायक होता है।&#160; ग्राम में कौन ऐसा पुरूष है जिसका लुहार, बढ़ई, धोबी, दर्जी, कुम्हार या वैद्य से काम नहीं पड़ता । मेरा पूर्ण अनुभव है कि इन लोगों की भले-भले ग्रामवासी खु्शामद करते रहते है ।</p>
<p>रोजाना काम पड़ते रहने से और अधिक सम्बन्ध होने से यदि थोड़ी सी चे्ष्टा की जावे और ग्रामवासियों को थोड़ा सा उपदेश दे कर उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया जावे तो बड़ी जल्दी काम बने । थोड़े से समय में ही वे सच्चे स्वदेश भक्त खद्दरधारी बन जावें, यदि उनमें एक दो शिक्षित हो तो उत्साहित करके उसके पास एक समाचार-पत्र मंगाने का प्रबन्ध कर दिया जावे । देश की दशा का भी उन्हें कुछ-कुछ ज्ञान होता रहे । इसी तरह सरल-सरल पुस्तकों की कथायें सुनाकर उनमें से कुप्रथाओं को भी छुड़ाया जा सकता है । कभी-कभी स्वयं रामायण या भागवत की कथा भी सुनाया करे ।&#160; यदि नियमित रूप से कथा कहें तो पर्याप्त धन भी चढ़ावे में आ सकता है, जिससे एक पुस्तकालय स्थापित कर दें । </p>
<p>कथा कहने के अवसर पर बीच-बीच में चाहे कितनी राजनीति का समावेश कर जावें, कोई खुफिया पुलिस का रिर्पोटर नहीं बैठा जो रिपोर्ट करें । वैसे यदि कोई खद्दरधारी ग्राम में पहुंचकर उपदेश करना चाहे्गा तो तुरन्त जमींदार पुलिस में खबर होगी और यदि कस्बें के वैद्य, लड़के पढ़ाने वाले, कथा कहने वाले पंडित कोई बात कहें तो सब चुपचाप सुनकर उस पर अमल करने की कोशिश करते है और उन्हें कोई पूछता भी नहीं । इस प्रकार अनेक सुविधायें मिल सकती है, जिनके सहारे ग्रामीणों की सामाजिक दशा सुधारी जा सकती है । रात्रि पाठशालायें खोलकर निर्धन तथा अछूत जातियों के बालकों को शिक्षा दे सकते हैं ।</p>
<p>श्रमजीवी संघ स्थापित करने में शहरी जीवन तो व्यतीत हो सकता है । किन्तु इसके लिये उनके साथ अधिक समय रहकर व्यतीत करना पड़गा जिस समय वे अपने-अपने काम से छुटटी पाकर आराम करते है, उस समय उनके साथ वार्तालाप करके मनोहर उपदेशों द्वारा उनको उनकी दशा का दिग्दर्शन कराने का अवसर मिल सकता है । इन लोगों के पास समय बहुत कम होता है, इस कारण से अति उत्तम हो यदि चित्ताकर्षक साधनों द्वारा कोई उपदेश करने की रीति से, जैसे मैजिक लालटेन द्वारा तस्वीरें दिखाकर&#160; या किसी दूसरे उपाय&#160; से उनको एक स्थान पर&#160; एकत्रित किया जैसे गाना बजाना&#160; वगैरा जा सके, तथा रात्रि पाठशालायें खोलकर उन्हें तथा उनके बच्चे को शिक्षा देने का भी प्रबन्ध किया जावे । जितने युवक उच्च शिक्षा प्राप्त करके व्यर्थ में धन व्यय करने की इच्छा रखते हैं, उनको&#160; उचित&#160; है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता&#160; प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और&#160; उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।</p>
<div style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:2d22fa17-57be-40f6-a012-16d593c46990" class="wlWriterEditableSmartContent">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/Martyrs+Of+Indian+Indepence" rel="tag">Martyrs Of Indian Indepence</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Bismil" rel="tag">Bismil</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Sarfaroshi" rel="tag">Sarfaroshi</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Magic+Latern" rel="tag">Magic Latern</a></div>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>यह कैसा भारतवर्ष है</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Jul 2009 23:37:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्मकथा]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[देश की दुर्व्यवस्था]]></category>
		<category><![CDATA[अछूत]]></category>
		<category><![CDATA[असहयोग आन्दोलन]]></category>
		<category><![CDATA[किसान]]></category>
		<category><![CDATA[बिस्मिल]]></category>
		<category><![CDATA[Deshbandhu Chittranjan Das]]></category>
		<category><![CDATA[Freedom Struggle of India]]></category>
		<category><![CDATA[Pre independent India]]></category>

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		<description><![CDATA[अब तक आपने पढ़ा … “ मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो&#160; हमारा&#160; उद्योग&#160; क्रान्तिकारी&#160; आन्दोलन&#160; से&#160; कहीं&#160; अधिक&#160; लाभदायक होता, जिसका&#160; परिणाम&#160; स्थायी&#160; होता । अति उत्तम होगा कि भारत की भावी सन्तान तथा नवयुवक [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=558&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><em><font color="#0000ca">अब तक आपने पढ़ा …</font></em> “ <a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/06/25/bismil-in-lucknow-jail/" target="_blank"><u>मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो&#160; हमारा&#160; उद्योग&#160; क्रान्तिकारी&#160; आन्दोलन&#160; से&#160; कहीं&#160; अधिक&#160; लाभदायक होता, जिसका&#160; परिणाम&#160; स्थायी&#160; होता । अति उत्तम होगा कि भारत की भावी सन्तान तथा नवयुवक वृन्द क्रान्तिकारी संगठन करने की अपेक्षा जनता की प्रवृत्ति को देश सेवा की ओर लगाने का प्रयत्न करें और श्रमजीवियों तथा कृ्षकों का संगठन कर के उन को जमींदारों तथा रईसों के अत्याचारों से बचावें ।</u></a><u> </u>“ <em><font color="#0000ca">अब इसके आगे..</font></em></p>
<p>भारतवर्ष के रईस तथा जमींदार सरकार के पक्षपाती है । मध्य श्रेणी के लोग किसी न किसी प्रकार इन्हीं तीनों के आश्रित हैं उन्हें भी इन्हीं के मुंह की ओर ताकना पड़ता है । रह गये श्रमजीवी तथा कृषक सो उनको उदर पूर्ति के उद्योग से ही समय नहीं मिलता, जो धर्म, समाज तथा राजनीति की ओर कुछ ध्यान दे सकें । मद्यपानादि दुर्व्यसनों के कारण उनका आचारण भी ठीक नहीं रह सकता । व्यभिचार, सन्तान-वृद्धि, अल्पायु में मृत्यु तथा अनेक प्रकार के रोगों से जीवन भर उनकी मुक्ति नहीं हो सकती ।</p>
<p>कृषकों में उद्योग का तो नाम भी नहीं पाया जाता । यदि एक किसान को जमींदार की मजदूरी करने या हल चलाने की नौकरी करने पर ग्राम में आज से बीस वर्ष पूर्व दो आने रोज या चार रूपये मासिक मिलते थे, तो आज भी वही वेतन बंधा चला आ रहा है । बीस वर्ष पूर्व वह अकेला था, अब उसकी स्त्री तथा चार सन्तान भी है । पर उसी वेतन में उसे निर्वाह करना पड़ता है । उसे उसी पर सन्तोष करना पड़ता है । सारे दिन जेठ की लू तथा धूप में गन्ने के खेत में पानी देते देते उसको रतौंधी आने लगती है , अंधेरा होते ही आंख से दिखाई नहीं देता, पर उसके उपलक्ष्य में आध सेर सड़े हुये शीरे तथा शरबत या आध सेर चना तथा छः पैसे रोज मजदूरी मिलती है,जिसमें ही उसे अपने परिवार का पेट पालना पड़ता है ।</p>
<blockquote><p>जिस के हृदय में भारतवर्ष की सेवा के&#160; भाव उपस्थित हों, या जो भारतभूमि को स्वतन्त्र देखने या स्वाधीन बनाने की इच्छा रखता हो, उसको उचित है कि ग्रामीण संगठन कर के कृषकों की दशा सुधार कर, उनके हृदय से भाग्य-निर्भरता को हटा कर उद्योगी बनाने की शिक्षा दें । कल, कारखाने, रेलवे, जहाज तथा खानों में जहां कहीं श्रमजीवी हों, उन की दशा को सुधारने के लिये श्रमजीवियों के संगठन की स्थापना की जावे ताकि उनको उनकी अवस्था का ज्ञान हो सके और कारखानों के मालिक मनमाने अत्याचार न कर सकें और अछूतों को, जिनकी संख्या इस देश में लगभग छः करोड़ है, पर्याप्त शिक्षा प्राप्त कराने का प्रबन्ध हो, उनको सामाजिक अधिकारों में समानता हो । </p>
</blockquote>
<p>
<table border="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#fff9f1">
<tbody>
<tr>
<td>जिस देश में छः करोड़ मनुष्य अछूत समझे जाते हों, उस देशवासियों को स्वाधीन बनने का अधिकार ही क्या है ? इसी के साथ ही साथ स्त्रियों की दशा भी इतनी सुधारी जावे कि वे अपने आप को मनुष्यजाति का अंग समझने लगे । वे पैर की जूती तथा घर की गुड़ियां न समझी जावें । इतने कार्य हो जाने के बाद जब भारत की जनता का अधिकांश शिक्षित हो जावेगा,वे अपनी भलाई-बुराई समझने के योग्य हो जायेंगे, उस समय प्रत्येक आन्दोलन, जिस का शिक्षित जनता समर्थन करेगी, अवश्य सफल होगा । संसार की बड़ी से बड़ी् शक्ति भी उस के दबाने में समर्थ न हो सकेगी । </td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>रूस में जब तक किसान संगठन नहीं हुआ, रूस सरकार की ओर से देश सेवकों पर मनमाने अत्याचार होते रहे। जिस समय से केथोराइन ने ग्रामीण संगठन का कार्य अपने हाथ में लिया, स्थान &#8211; स्थान पर कृषक सुधाकर संगठनों की स्थापना की, घूम-घूम कर रूस के युवक तथा युवतियों ने जारशाही के विरूद्ध प्रचार आरम्भ किया । फिर किसानों को अपनी वास्तविक अवस्था का ज्ञान होने लगा । वे अपने मित्र तथा शत्रु को समझने लगे, उसी समय से जारशाही की नींव हिलने लगी । श्रमजीवियों के संगठन भी स्थापित हुए । रूस में हड़तालों का आरम्भ हुआ । उसी समय से जनता की प्रवृति को देख कर मदान्धों के नेत्र खुल गये ।</p>
<p>भारतवर्षमें सब से बड़ी कमी यही है कि इस देश के युवकों में शहरी जीवन व्यतीत करने की बान पड़ गई है । युवक वृंद साफ-सुथरे कपड़े पहनने, पक्की सड़कों पर चलने, मीठा-खटटा तथा चटपटा भोजन करने, विदेशी सामग्री से सुसज्जित बाजारों में घूमने, मेज-कुर्सी पर बैठने तथा विलासिता में फंसे रहने के आदी हो गये हैं । ग्रामीण-जीवन को वे नितान्त नीरस तथा शुष्क समझते हैं । उनकी समझ में ग्रामों में अर्ध सभ्य या जंगली लोग निवास करते है। यदि कभी किसी अंगेजी स्कूल या कालेज में पढ़ने वाला विद्यार्थी किसी कार्यवश अपने किसी सम्बन्धी के यहां ग्राम में पहुंच जाता है, तो उसे वहां दो-चार दिन काटना बड़ा कठिन हो जाता है, वे या तो कोई उपन्यास साथ ले जाते है, जिसे अलग बैठे पढ़ा करते है, या पड़े-पड़े सोया करते है । किसी ग्रामवासी से बात-चीत करने से उन का दिमाग थक जाता है । या उन से बात-चीत करना अपनी शान के खिलाफ समझते है । </p>
<p>ग्रामवासी जमींदार या रईस जो अपने लड़कों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं, उनकी भी यही इच्छा रहती है कि जिस प्रकार हो सके उनके लड़के कोई सरकारी नौकरी पा जायें । ग्रामीण बालक जिस समय शहर में पहुंच कर शहरी शान देखते है, इतनी बुरी तरह से उन पर फैशन का भूत सवार होता है कि उन के समान फैशन बनाने की चिन्ता किसी को भी नहीं रहती । थोड़े दिनों में उनके आचरण पर भी इस का प्रभाव पड़ता है और वे स्कूल के गन्दे लड़कों के हाथ में पड़ कर बड़ी बुरी-बुरी कुटेवों के घर बन जाते हैं । उनसे जीवन पर्यन्त अपना ही सुधार नहीं हो पाता, फिर वे ग्रामवासियों का सुधार क्या खाक कर सकेंगे ?</p>
<p><em>असहयोग आन्दोलन में कार्यकर्ताओं की इतनी अधिक संख्या होने पर भी सब के सब शहर के प्लेटफार्मों पर लेक्चरबाजी करना ही अपना कर्तव्य समझते थे । ऐसे बहुत थोड़े कार्यकर्ता थे, जिन्होंने ग्रामों में कुछ कार्य किया । उन में भी अधिकतर ऐसे थे जो केवल हुल्लड़ कराने में ही देशोद्धार समझते थे । परिणाम यह हुआ कि आन्दोलन में थोड़ी सी शिथिलता आते ही सब कार्य अस्त-व्यस्त हो गया ।</em> </p>
<p>इसी कारण महामना देशबन्धु चितरंजन दास ने अन्तिम समय ग्राम संगठन ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था । मेरे विचार से ग्राम संगठन का सब से सुगम रीति यही हो सकती है कि युवकों में शहरी जीवन छोड़ कर ग्रामीण जीवन से प्रीति उत्पन्न हो । जो युवक मिडिल, इटेंस, एफ0 ए0, बी0ए0 पास करने में हजारों रूपये नष्ट करके दस, पन्द्रह, बीस या तीस रूपये की नौकरी के लिये ठोकरें खाते फिरते है, उन्हें नौकरी का आसरा छोड़कर कोई उद्योग जैसे बढ़ईगिरी, लुहारगिरी, दर्जी का काम, धोबी का काम, जूते बनाना, कपड़ा बुनना, मकान बनाना, राजगीरी का इत्यादि सीख लेना चाहिए । </p>
<br />Posted in आत्मकथा, खण्ड-4, देश की दुर्व्यवस्था Tagged: अछूत, असहयोग आन्दोलन, किसान, बिस्मिल, Deshbandhu Chittranjan Das, Freedom Struggle of India, Pre independent India <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/558/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=558&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>उन्हीं के साथ विश्वासघात कर के निकल भागूँ ?</title>
		<link>http://kakorikand.wordpress.com/2009/06/25/bismil-in-lucknow-jail/</link>
		<comments>http://kakorikand.wordpress.com/2009/06/25/bismil-in-lucknow-jail/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 24 Jun 2009 18:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्मकथा]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास में हमारे प्रयत्न]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[आजादी]]></category>
		<category><![CDATA[कटी हुई सलाखों]]></category>
		<category><![CDATA[कृ्षकों का संगठन]]></category>
		<category><![CDATA[कोतवाली की हवालात]]></category>
		<category><![CDATA[देवता के समान]]></category>
		<category><![CDATA[पंo चम्पालाल जी]]></category>
		<category><![CDATA[भारत की भावी सन्तान]]></category>
		<category><![CDATA[लखनऊ जेल]]></category>
		<category><![CDATA[विश्वासघात न करूंगा]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछली कड़ी में..निश्चित किया कि अब भाग चलूं । पाखाने के बहाने से बाहर निकाला गया । एक सिपाली कोतवाली से बाहर दूसरे स्थान में शौच के निमित्त लिवा गया । दूसरे सिपाहियों ने उससे बहुत कुछ कहा कि रस्सी डाल लो । उस ने कहा मुझे विश्वास है यह भागेंगे नहीं । अब आगे.. [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=556&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><em><font color="#ff0000">पिछली कड़ी में</font></em>..<a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/06/04/bismil-got-" target="_blank">निश्चित किया कि अब भाग चलूं । पाखाने के बहाने से बाहर निकाला गया । एक सिपाली कोतवाली से बाहर दूसरे स्थान में शौच के निमित्त लिवा गया । दूसरे सिपाहियों ने उससे बहुत कुछ कहा कि रस्सी डाल लो । उस ने कहा मुझे विश्वास है यह भागेंगे नहीं ।</a> <em><font color="#0000ce">अब आगे..</font></em></p>
<p>पाखाना नितान्त निर्जन स्थान में था । मुझे पाखाने में भेज कर वह सिपाही खड़े होकर सामने कुश्ती देखने लगा । मैंने दीवार पर पैर रखा और बढ़ कर देखा कि सिपाही महोदय कुश्ती देखने में मस्त हैं । हाथ बढ़ाते ही दीवार के उपर और एक क्षण में बाहर हो जाता, फिर मुझे कौन पाता ? किन्तु तुरन्त विचार आया कि जिस सिपाही ने विश्वास करके तुम्हें इतनी स्वतन्त्रता दी, उसके साथ विश्वासघात करके भाग कर उस को जेल में डालोगे ? क्या यह अच्छा होगा ? </p>
<p>उस के बाल बच्चे क्या कहेंगे ? इस भाव ने हृदय पर एक ठोकर लगाई । एक ठंडी सांस भरी, दीवार से उतर कर बाहर आया और सिपाही महोदय को साथ ले कर कोतवाली की हवालात में आकर बन्द हो गया । लखनउ जेल में काकोरी के अभियुक्तेां को बड़ी भारी आजादी थी । </p>
<p>राय साहब पं0 चम्पालाल जेलर की कृपा से कभी यह भी न समझ सके कि हम लोग जेल में हैं या किसी रिश्तेदार के यहां मेहमानी कर रहे हैं । जैसे मातापिता से छोटे-छोटे लड़के बातचीत पर बिगड़ जाते हैं, यही हमारा हाल था । </p>
<p>हम लोग जेल वालों से बात-बात में ऐंठ जाते । पंo चम्पालाल जी का ऐसा हृदय था कि वे हम लोगों से अपनी सन्तान से अधिक प्रेम करते थे, हममें से किसी को जरा सा कष्ट होता था, तो उन्हें बड़ा दुख होता था । हमारे जरा से कष्ट को भी वह स्वयं न देख सकते थे । और हम लोग की क्यों उन के जेल में किसी कैदी, सिपाही जमादार या मुँशी किसी को भी कोई कष्ट नहीं ! </p>
<p>सब बड़े प्रसन्न रहते है । इसके अतिरिक्त मेरी दिनचर्या तथा नियमों का पालन देख कर पहरे के सिपाही अपने गुरू से भी अधिक मेरा सम्मान करते थे । मैं यथानियम जाड़ा गर्मी तथा बरसात प्रातःकाल तीन बजे उठ कर सन्ध्यादि से निवृत हो नित्य हवन भी करता था । </p>
<p>प्रत्येक पहरे का सिपाही देवता के समान मेरा पूजन करता था । यदि किसी के बाल बच्चे को कष्ट होता था, तो वह हवन की विभूति ले जाता था, और कोई जंत्र मांगता था । उनके विश्वास के कारण उन्हें आराम भी होता था, तथा उन की और भी श्रद्धा बढ़ जाती थी । परिणाम स्वरूप जेल के प्रत्येक विभाग तथा स्थान का हाल मुझे मालूम रहता । </p>
<p>मैंने जेल से निकल जाने का पूरा प्रबन्ध कर लिया । जिस समय चाहता चुपचाप निकल जाता । एक रात्रि को तैयार हो कर उठ खड़ा हुआ । बैरक के नम्बरदार तो मेरे सहारे पहरा देते थे । जब जी में आता सोते जब इच्छा होती बैठ जाते, क्योंकि वे जानते थे कि यदि सिपाही या जमादार सुपरिण्टेन्डेण्ट जेल के सामने पेश करना चाहेंगे तो मैं बचा लूंगा । सिपाही तो कोई चिन्ता ही न करते थे । </p>
<blockquote><p>चारो ओर शान्ति थी । केवल इतना प्रयत्न करना था कि लोहे की कटी हुई सलाखों को उठा कर बाहर हो जाउं । चार महीने पहले से लोहे की सलाखें काट ली थीं । काटकर उन्हें ऐसे ढंग से जमा दी थीं कि सलाखें धोई गईं, रंगत लगवाई गई, तीसरे दिन झाड़ी जाती, आठवें दिन हथोड़े से ठोंकी जाती और जेल के अधिकारी नित्य प्रति सायंकाल घूम कर सब ओर दृष्टि डाल जाते थे, पर किसी को कोई पता न चला । </p>
</blockquote>
<p>जैसे ही मैं जेल से भागने का विचार करके के उठा था, ध्यान आया कि जिन पं० चम्पालाल की कृपा से सब प्रकार के आनन्द भोगने की जेल में स्वतन्त्रता प्राप्त हुई, उन के बुढ़ापे में जब कि थोड़ा सा समय ही उन की पेंशन के लिये बाकी है, क्या उन्हीं के साथ विश्वासघात करके निकल भांगू ? सोचा जीवन भर किसी के साथ विश्वासघात न किया, तो अब भी विश्वासघात न करूंगा । </p>
<blockquote><p>उस समय मुझे यह भलीभांति मालूम हो चुका था कि मुझे फांसी की सजा होगी, पर उपरोक्त बात सोच कर भागना स्थगित ही कर दिया । <strong>उपरोक्त सब बातें चाहे प्रलाप ही क्यों न मालूम हो किन्तु सब अक्षरशः सत्य हैं,</strong> इन सबकें प्रमाण विद्यमान है </p>
</blockquote>
<p>
<table border="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#f9fcff">
<tbody>
<tr>
<td><font color="#0000df">मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो&#160; हमारा&#160; उद्योग&#160; क्रान्तिकारी&#160; आन्दोलन&#160; से&#160; कहीं&#160; अधिक&#160; लाभदायक होता, जिसका&#160; परिणाम&#160; स्थायी&#160; होता । अति उत्तम होगा कि भारत की भावी सन्तान तथा नवयुवक वृन्द क्रान्तिकारी संगठन करने की अपेक्षा जनता की प्रवृत्ति को देश सेवा की ओर लगाने का प्रयत्न करें और श्रमजीवियों तथा कृ्षकों का संगठन कर के उन को जमींदारों तथा रईसों के अत्याचारों से बचावें ।</font></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&#160;</p>
<div style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:9e8ba54c-17c9-4025-9446-1de68b7d964c" class="wlWriterEditableSmartContent">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/Martyr+of+India" rel="tag">Martyr of India</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Bismil" rel="tag">Bismil</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Kakori+Conspiracy" rel="tag">Kakori Conspiracy</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Struggle+for+Freedom+of+India" rel="tag">Struggle for Freedom of India</a></div>
<br />Posted in आत्मकथा, इतिहास में हमारे प्रयत्न, खण्ड-4 Tagged: आजादी, कटी हुई सलाखों, कृ्षकों का संगठन, कोतवाली की हवालात, देवता के समान, पंo चम्पालाल जी, भारत की भावी सन्तान, लखनऊ जेल, विश्वासघात न करूंगा <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/556/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/556/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/556/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/556/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/556/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/556/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/556/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/556/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/556/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/556/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/556/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/556/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/556/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/556/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=556&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही</title>
		<link>http://kakorikand.wordpress.com/2009/06/04/bismil-got-arrested/</link>
		<comments>http://kakorikand.wordpress.com/2009/06/04/bismil-got-arrested/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 03 Jun 2009 19:32:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्मकथा]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[सरफ़रोशी की तमन्ना]]></category>
		<category><![CDATA[अशफ़ाकउल्ला खाँ]]></category>
		<category><![CDATA[अख़बार]]></category>
		<category><![CDATA[कोतवाली]]></category>
		<category><![CDATA[क्रांतिकारी दल]]></category>
		<category><![CDATA[गिरफतारी]]></category>
		<category><![CDATA[रामप्रसाद 'बिस्मिल']]></category>
		<category><![CDATA[रोशन सिंह]]></category>

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		<description><![CDATA[अब विचारने की बात यह कि भारतवर्षमें क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ?  गत पृष्ठों में मैंने अपने अनुभवों का उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों को उदर-पूर्ति तक के लिये कितना कष्ट उठाना पड़ा । प्राण-पण से चेष्टा करने पर भी असहयोग आन्दोलन के पश्चात कुछ थोड़े [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=525&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/05/20/2005bismilkranti-ek-vichar/" target="_blank"><span style="color:#ff80c0;">अब विचारने की बात यह कि भारतवर्षमें क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ?</span></a></p>
<p align="justify"> <strong><span style="font-size:small;">गत पृष्ठों में</span></strong> मैंने अपने अनुभवों का उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों को उदर-पूर्ति तक के लिये कितना कष्ट उठाना पड़ा । प्राण-पण से चेष्टा करने पर भी असहयोग आन्दोलन के पश्चात कुछ थोड़े से ही गिने चुने युवक सँयुक्त प्रान्त में ऐसे मिल सके, जो क्रान्तिकारी आन्दोलन का समर्थन करके सहायता लेने को उद्यत हुये । इन गिने चुने व्यक्तियों में भी हार्दिक सहानुभूति रखने वाले, अपने जान पर खेल जाने वाले कितने थे उस का कथन ही क्या है ?</p>
<p align="justify">कैसी बड़ी-बड़ी आशायें बंधा कर इन व्यक्तियों को क्रान्तिकारी समिति का सदस्य बनाया गया था, और इस अवस्था में, जब कि असहयोगियों ने सरकार की ओर से घृणा उत्पन्न कराने में कोई कसर न छोड़ी थी, खुले रूप में राज्यद्रोही बातों का पूर्ण प्रचार किया गया था । इस पर भी बोलशेविक सहायता की आशायें बंधा-बंधा कर तथा क्रान्तिकारियों के उंचे-उंचे आदर्शों तथा बलिदानों का उदाहरण दे देकर प्रोत्साहन किया जाता था ।</p>
<p align="justify"><strong>नवयुवकों के हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति बड़ा प्रेम तथा श्रद्धा होती है ।</strong> उनकी अस्त्र शस्त्र रखने की स्वाभाविक इच्छा तथा रिवाल्वर या पिस्तौल से प्राकृतिक प्रेम उन्हें क्रान्तिकारी दल से सहानुभूति उत्पन्न करा देता है । मैंने अपने क्रान्तिकारी जीवन में एक भी युवक ऐसा न देखा जो एक रिवाल्वर या पिस्तौल पास रखने की इच्छा न रखता हो । <strong>जिस समय उन्हें रिवाल्वर के दर्शन होते हैं,वे समझते हैं कि इष्टदेव के दर्शन प्राप्त हुये आधा जीवन सफल हो गया ।</strong> उसी समय वे समझते हैं कि क्रान्तिकारी दल के पास इस प्रकार के सहस्त्रों अस्त्र होंगे, तभी तो यह इतनी  बड़ी सरकार से युद्ध करने का प्रयत्न कर रहे हैं । वह सोचते हैं कि धन की भी कोई कमी न होगी ।</p>
<p align="justify">अब क्या, अब तो समिति के व्यय से दॆश भ्रमण का अवसर भी प्राप्त होगा, बड़े-बड़े त्यागी महात्माओं के दर्शन होंगे सरकारी गुप्तचर विभाग का भी हाल मालूम हो सकेगा, सरकार द्वारा जब्त किताबें कुछ तो पहले ही पढ़ा दी जाती है, रही सही की आशा रहती है कि बड़ा उच्च साहित्य भी देखने को मिलेगा, जो यों कभी प्राप्त नहीं हो सकता । <strong>साथ ही साथ ख्याल होता है कि क्रान्तिकारियों ने दॆश के राजा महाराजाओं को तो अपने पक्ष में कर ही लिया होगा । अब क्या थोड़े दिन की ही कसर है फिर तो लौट दिया सरकार का राज्य ! </strong>बम बनाना सीख ही जायेंगे । अमर बूटी प्राप्त हो जावेगी, इत्यादि । परन्तु जैसे ही एक युवक क्रान्तिकारी दल का सदस्य बन कर हार्दिक प्रेम से समिति के कार्यों में योग देता है, थोड़े दिनों में ही उसे विशेष सदस्य होने के अधिकार प्राप्त होते है, वह ऐक्टिव मेम्बर बनता है, उसे संस्था का कुछ असली भेद मालूम होता है,तब समझ में आता है कि कैसे भीषण कार्य में उसने हस्तक्षेप किया है । फिर तो वही द्शा हो जाती है, जो नकटा-पथ के सदस्यों की थी ।</p>
<p align="justify">जब चारों ओर से असफलता तथा अविश्वास की घटायें दिखाई देती है, तब यही विचार होता है कि ऐसे दुर्गम पथ में ये परिणाम तो होते ही हैं । दूसरे दॆश के क्रान्तिकारियों के मार्ग में भी ऐसी ही बाधायें उपस्थित हुई होंगी । वीर वही कहलाता है, जो अपने लक्ष्य सो नहीं छोड़ता, इसी प्रकार की बातों से मन को शान्त किया जाता है । भारत के जन साधारण की तो कोई बात ही नही , अधिकांश शिक्षित समुदाय भी यह नहीं जानता कि क्रान्तिकारी दल क्या पदार्थ है । फिर उन से सहानुभूति कौन रक्खे ? अतएव <strong>बिना  दॆशवासियों  की  सहानुभूति  के  अथवा  जनता  की  आवाज  के  साथ  नहीं  होने  से सरकार  भी किसी बात की कुछ चिन्ता नहीं करती ।</strong> दो चार पढ़े लिखे एक दो अंग्रेजी अखबार में दबे हुये शब्दों में यदि दो एक लेख लिख दे, तो वे अरण्य रोदन के समान कुछ भी प्रभाव नहीं रखते ! उन की ध्वनि व्यर्थ में ही आकाश में विलीन हो जाती है ।</p>
<blockquote>
<p align="justify"><strong>तमाम बातों को देख कर अब तो मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही । भागने की मुझे सुविधायें थी । गिरफतारी से पहले ही मुझे अपने गिरफतारी का पूरा पता चल गया था । गिरफतारी के पूर्व भी यदि इच्छा करता तो पुलिस वालों को मेरी हवा भी न मिलती, किन्तु मुझे अपने शक्ति की परीक्षा करनी थी । गिरफतारी के बाद सड़क पर आध घण्टे तक बिना किसी बन्धन के घूमता रहा । पुलिस वाले शान्ति पूर्वक बैठे हुये थे । जब पुलिस कोतवाली में पहुंचा, दो पहर के समय पुलिस कोतवाली ने दफ़्तर में बिना किसी बन्धन के खुला हुआ बैठा था । केवल एक सिपाही निगरानी के लिये पास बैठा हुआ था, जो रात भर का जगा था । सब पुलिस अफसर भी रात भर के जगे थे, क्योंकि गिरफ़्तारियों में लगे रहे थे । सब आराम करने चले गये थे । निगरानी वाला सिपाही भी घोर निद्रा में सो गया । दफतर में केवल एक मुन्शी लिखा पढ़ी कर रहे थे ।</strong></p>
</blockquote>
<p align="justify">वह श्रीयुत रोशनसिंह अभियुक्त के फूफीजात भाई थे । यदि मैं चाहता तो धीरे से उठ कर चल देता । पर मैं ने विचारा कि मुन्शी जी महाशय बुरे फसेंगे । मैंने मुन्शी जी को बुला कर कहा कि यदि भावी आपत्ति के लिये तैयार हो तो मैं जाउं । वे  मुझे  पहले  से  जानते  थे, पैरों पड़ गये कि गिरफ़्तार हो जाउंगा, बाल-बच्चे भूखों मर जावेंगे । मुझे दया आ गई । <strong>एक घण्टा बाद श्री अशफाकउल्ला खां के मकान की तलाशी ले कर पुलिस वाले लौटे ।</strong> श्री अशफाकउल्ला खां  भाई  के  कारतूसी  बन्दूक  और कारतूसों  से  भरी  हुई  पेटी लाकर उन्हीं मुन्शीजी के पास रख दी गई, और मैं पास ही कुर्सी पर खुला हुआ बैठा था । केवल एक सिपाही खाली हाथ पास में खड़ा था । इच्छा हुई कि बन्दूक उठा कर कारतूसों की पेटी गले में डाल लूं फिर कौन सामने आयेगा । <strong><em>पर फिर सोचा कि मुन्शी जी पर आपत्ति आवेगी, विश्वासघात करना ठीक नहीं ।</em></strong> उसी समय खुफिया पुलिस के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट सामने छत पर आये </p>
<p align="justify">उन्होंने देखा कि मेरे एक ओर कारतूस तथा बन्दूक पड़ी है, उधर दूसरी ओर श्रीयुत प्रेमकृष्ण का माउजर पिस्तौल तथा कारतूस रखे है, क्योंकि यह सब चीजें मुन्शी जी के पास आ कर जमा होती थी । <strong>मैं बिना किसी बन्धन के बीच में खुला हुआ बैठा हूं ।</strong> डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट को तुरन्त सन्देह हुआ,उन्होंने तत्काल ही  बन्दूक  पिस्तौल वहां से हटवा कर मालखाने में बन्द करा दिये । सायंकाल को पुलिस की हवालात में बन्द किया गया । <strong>निश्चित किया कि अब भाग चलूं ।</strong> पाखाने के बहाने से बाहर निकाला गया । एक सिपाली कोतवाली से बाहर दूसरे स्थान में शौच के निमित्त लिवा गया । दूसरे सिपाहियों ने उससे बहुत कुछ कहा कि रस्सी डाल लो । <strong>उस ने कहा मुझे विश्वास है यह भागेंगे नहीं ।</strong>  </p>
<div id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:a3528fc5-f228-446e-9d76-b323793d208a" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+India">Martyrs of India</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Struggle+for+Freedom+of+India">Struggle for Freedom of India</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Bismil">Bismil</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Kakori+Conspiracy">Kakori Conspiracy</a></div>
<br />Posted in आत्मकथा, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना Tagged: अशफ़ाकउल्ला खाँ, अख़बार, कोतवाली, क्रांतिकारी दल, गिरफतारी, रामप्रसाद 'बिस्मिल', रोशन सिंह <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/525/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/525/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/525/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/525/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/525/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/525/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/525/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/525/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/525/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/525/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/525/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/525/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/525/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/525/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=525&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>इतिहास को हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा</title>
		<link>http://kakorikand.wordpress.com/2009/05/20/2005bismilkranti-ek-vichar/</link>
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		<pubDate>Tue, 19 May 2009 23:15:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतिम समय की बातें]]></category>
		<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास में हमारे प्रयत्न]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
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		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p>ऐतिहासिक दृष्टि से हम लोगों के कार्य का बहुत बड़ा मूल्य है । जिस प्रकार भी हो, यह तो मानना ही पड़ेगा&#160; कि इस&#160; गिरी&#160; हुई&#160; अवस्था&#160; में&#160; भी, अधिकाँश भारतवासी युवकों के हृदय में स्वाधीन होने के भाव विराजमान हैं । वे यथा शक्ति स्वतंत्र होने की चेष्टा भी करते है । यदि परिस्थितियां अनुकूल होती तो यही इने गिने नवयुवक अपने चेष्टाओं से संसार को चकित कर देते । उस समय भारतवासियों को भी फ्रांसीसियों की भांति कहने का सौभाग्य प्राप्त होता, जो कि उस जाति के नवयुवकों ने फ्रांसीसी प्रजातंत्र की स्थापना करते हुए कहा था,<strong> “स्वाधीनता&#160; का&#160; जो&#160; स्मारक&#160; निर्माण&#160; किया&#160; गया&#160; है&#160; वह&#160; अत्याचारियों के&#160; लिये&#160; शिक्षा&#160; का&#160; कार्य&#160; करे&#160; और&#160; अत्याचार&#160; पीड़ितों&#160; के&#160; लिये&#160; उदाहरण&#160; बने “</strong></p>
<p><font size="2">ग़ाज़ी&#160; <strong>मुस्तफा कमालपाशा </strong>जिस&#160; समय&#160; तुर्की&#160; से&#160; भागे&#160; थे, उस&#160; समय&#160; केवल&#160; इक्कीस&#160; युवक आपके साथ थे कोई साजोसामान न था, मौत का वांरट पीछे-पीछे घूम रहा था । पर समय ने ऐसा पलटा खाया कि उसी कमाल ने अपने कमाल से संसार को आश्चर्यान्वित कर दिया । वही कातिल कमालपाशा टर्की का भाग्य निर्माता बन गया । <strong>लेनिन </strong>को&#160; एक दिन शराब&#160; के&#160; पीपों&#160; में&#160; छिप&#160; कर&#160; भागना पड़ा&#160; था, नहीं&#160; तो&#160; मृत्यु में कुछ देर न थी । वही लेनिन रूस के भाग्य विधाता बने । </font></p>
<p><font size="2">श्री शिवाजी डाकू एवँ लुटेरे समझे जाते थे । पर समय आया जब कि हिन्दू जाति ने उन्हें अपना शिरमौर बना,गौ एवँ ब्राह्मण-रक्षक <strong>छत्रपति शिवाजी</strong> बना दिया । भारत सरकार को भी अपने स्वार्थ के लिये छत्रपति के स्मारक निर्माण कराने पड़े । <strong>क्लाइव </strong>एक उददण्ड&#160; विद्यार्थी&#160; था&#160; ।&#160; जो&#160; अपने&#160; जीवन&#160; से निराश हो चुका था । समय के फेर ने उसी उददण्ड विद्यार्थी को अंग्रेज जाति का राज्य स्थापनाकर्ता लार्ड क्लाइव बना दिया । श्री सनयात सैन <strong>चीन के अराजकवादी पलायक</strong> भागे हुये थे । समय ने उसी पलायक को चीनी प्रजातन्त्र का सभापति बना दिया ।</font> </p>
<blockquote><p><strong><font size="2">सफलता&#160; ही&#160; हृदय&#160; एवँ&#160; मनुष्य&#160; के&#160; भाग्य&#160; का&#160; निर्माण करती&#160; है । असफल&#160; होने&#160; पर&#160; उसी&#160; को&#160; बर्बर, डाकू, अराजक, राज्यद्रोही तथा हत्यारे के नामों से विभूषित किया जाता है । सफलता&#160; उन्हीं&#160; सब&#160; नामों&#160; को&#160; बदल&#160; कर&#160; दयालु, प्रजापालक, न्यायकारी, प्रजातन्त्रवादी&#160; तथा&#160; महात्मा&#160; बना&#160; देती&#160; है ।</font></strong></p>
</blockquote>
<p><font size="2">भारतवर्ष के इतिहास में हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा ।</font> किन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि भारतवर्ष की राजनैतिक, धार्मिक&#160; तथा&#160; सामाजिक&#160; किसी&#160; प्रकार&#160; की&#160; परिस्थिति&#160; इस&#160; समय क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में नहीं है । जिस का कारण यही है कि भारतवासियोंमें शिक्षा का अभाव है । वे साधारण सामाजिक उन्नति करने से भी असमर्थ है । </p>
<p>फिर राजनैतिक क्रान्ति की बात कौन कहे ? राजनैतिक&#160; क्रान्ति&#160; के&#160; लिये&#160; सर्वप्रथम&#160; क्रान्तिकारियों&#160; का संगठन ऐसा होना चाहिये कि अनेक विध्न तथा बाधाओं के उपस्थित होने पर भी संगठन में किसी प्रकार की त्रुटि न आवे । सब कार्य यथावत चलते रहें । कार्यकर्ता इतने योग्य तथा पर्याप्त संख्या में होने चाहिये कि एक की अनुपस्थिति में दूसरा स्थान-पूर्ति के लिये सदा उद्यत रहे । भारतवर्ष में कई बार कितने षड़यन्त्रों का संगठन हुआ । किन्तु थोड़ा सा भेद खुलते ही, पूर्ण षडयन्त्र का भण्डा फूट गया और सब किया कराया ना्श को प्राप्त हो गया । जब क्रान्तिकारी दलों की यह अवस्था है तो फिर क्रान्ति के लिये उद्योग कौन करे ?</p>
<blockquote><p><strong><font size="2">देशवासी इतने शिक्षित हों कि वे वर्तमान सरकार की नीति को समझ कर अपने हानि-लाभ को जानने में समर्थ हो सकें । वे यह भी पूर्णतया समझते हों कि वर्तमान सरकार को हटाना आवश्यक है या नहीं । साथ ही साथ उन में इतनी बुद्धि भी होनी चाहिये कि किस रीति से सरकार को हटाया जा सकता है ।</font></strong></p>
</blockquote>
<p>क्रान्तिकारी दल क्या है ? वह क्या करना चाहता है ? क्यों करना चाहता है ? इन सारी बातों को जनता अधिक संख्या में समझ सके, क्रान्तिकारियों के साथ जनता की पूर्ण सहानुभूति हो, तब कहीं क्रान्तिकारी दल को दे्श में पैर रखने का स्थान मिल सकता है । यह तो क्रान्तिकारी दल की स्थापना की प्रारम्भिक बातें है । रह गई, क्रान्ति, सो तो बहुत दूर की बात है ।</p>
<p>क्रान्ति&#160; का&#160; नाम&#160; ही&#160; बड़ा&#160; भयंकर&#160; है । प्रत्येक&#160; प्रकार&#160; की&#160; क्रान्ति&#160; विपक्षियों&#160; को&#160; भयभीत&#160; कर&#160; देती&#160; है&#160; जैसे&#160; कि&#160; जहां पर&#160; रात्रि&#160; होती&#160; है&#160; तो&#160; दिन&#160; का&#160; आगमन&#160; होने&#160; से&#160; निशिचरों&#160; को&#160; दुख&#160; होता&#160; है । ठंडे जलवायं में रहने वाले&#160; पशुपक्षी&#160; गरमी&#160; के&#160; आने&#160; पर&#160; उस&#160; देश&#160; को&#160; भी&#160; त्याग&#160; देते&#160; हैं । फिर&#160; राजनैतिक&#160; क्रान्ति&#160; की&#160; बात ही&#160; बड़ी&#160; भयावनी&#160; होती&#160; है । </p>
<p><strong>मनु्ष्य अभ्यासों का समूह है ।</strong> अभ्यासों के अनुसार ही उस की प्रकृति भी बन जाती है । उस के विपरीत जिस समय कोई बाधा उपस्थित होती है, तो उनको भय प्रतीत होता है, इसके अतिरिक्त प्रत्येक सरकार के सहायक अमीर और जमीदार होते हैं । ये लोग कभी नहीं चाहते कि उन के&#160; ऎशो-आराम में किसी प्रकार की बाधा पड़े । इसलिये वे हमेशा क्रान्तिकारी आन्दोलन को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं । </p>
<p>यदि किसी प्रकार दूसरे दे्शों की सहायता लेकर समय पाकर क्रान्तिकारी दल क्रान्ति के उद्योग में सफल हो जावे, देश में क्रान्ति हो जावे, तो भी योग्य नेता न होने से अराजकता फैल कर व्यर्थ की नर हत्या होती है, और उस प्रयत्न में अनेकों सुयोग्य वीरों तथा विद्वानों का ना्श हो जाता है । जिसका ज्वलन्त उदाहरण सन 1857 ई0 का&#160; गदर&#160; है । यदि फ्रांस तथा अमेरिका की भांति क्रान्ति द्वारा राजतंत्र को पलट कर प्रजा तंत्र स्थापित भी कर लिया जावे तो बड़े-बड़े धनी पुरूष अपने धन-बल से सब प्रकारों के अधिकारों को दबा बैठते है । कार्यकारिणी समितियों में बड़े-बड़े अधिकार धनियों को प्राप्त हो जाते है ।</p>
<p>दे्श के शासन में धनिकों का मत ही उच्च आदर पाता है । धन-बल&#160; से&#160; देश&#160; के&#160; समाचार पत्रों, कल कारखानों तथा खानों पर उनका ही अधिकार होता है । मजबूरन जनता की अधिक संख्या धनियों का समर्थन करने का बाध्य हो जाती है । जो दिमाग वाले होते है, वह भी समय पाकर बुद्धिबल से जनता की खरी-कमाई से प्राप्त किये अधिकारों को हड़प बैठते है ।</p>
<p>स्वार्थ के वशीभूत जन श्रमजीवियों तथा कृषकों को उन्नति के अवसर नहीं देते । अन्त में ये लोग भी धनिकों के पक्षपाती हो कर राजतंत्र के स्थान में धनिक तंत्र की स्थापना करते है । रूसी क्रान्ति के पश्चात यही हुआ था। रूस के क्रान्तिकारी इस बात को पहले से ही जानते थे । अतएव उन्होंने राजसत्ता के विरूद्ध युद्ध कर के राजतंत्र की समाप्ति की । इसके बाद जैसे ही धनी तथा बुद्धिमानों ने अडंगा लगाना चाहा कि उसी समय उन से भी युद्ध कर के उन्होंने वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना की ।</p>
<p>अब विचारने की बात यह कि भारतवर्ष में क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ? </p>
<div style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:f3e16714-9fc6-4926-8460-15095296e755" class="wlWriterEditableSmartContent">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+India" rel="tag">Martyrs of India</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Struggle+for+Freedom+of+India" rel="tag">Struggle for Freedom of India</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Bismil" rel="tag">Bismil</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Kakori+Conspiracy" rel="tag">Kakori Conspiracy</a></div>
<br />Posted in अंतिम समय की बातें, आत्म-चरित, इतिहास में हमारे प्रयत्न, खण्ड-4, सरफ़रोशी की तमन्ना Tagged: अराजकता, कार्यकारिणी, क्रान्तिकारी आन्दोलन, भारतवर्ष, राजनीति <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/522/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/522/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/522/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/522/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/522/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/522/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/522/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/522/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/522/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/522/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/522/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/522/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/522/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/522/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=522&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>फांसी की कोठरी है या, साधना की गुफा</title>
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		<pubDate>Mon, 18 May 2009 18:47:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[चँद शेर]]></category>
		<category><![CDATA[फाँसी]]></category>
		<category><![CDATA[सरफ़रोशी की तमन्ना]]></category>
		<category><![CDATA[काला पानी]]></category>
		<category><![CDATA[कोठरी]]></category>
		<category><![CDATA[गोरखपुर जेल]]></category>
		<category><![CDATA[प्राणत्याग]]></category>
		<category><![CDATA[फांसी की सजा]]></category>
		<category><![CDATA[भग्वतगीता]]></category>
		<category><![CDATA[वकीलों की जिरह]]></category>
		<category><![CDATA[साधना के साधन]]></category>

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		<description><![CDATA[फांसी की कोठरी अन्तिम समय निकट है । दो फांसी की सजायें सिर पर झूल रहा है । पुलिस को साधारण जीवन में और समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी भर के कोसा है । खुली  अदालत  में  जज  साहब, खुफिया पुलिस  के  अफसर, मजिस्टेट, सरकारी  वकील  तथा  सरकार  को  खूब  आड़े  हाथों लिया [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=519&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#0000c6;font-size:medium;">फांसी की कोठरी</span></strong><br />
अन्तिम समय निकट है । दो फांसी की सजायें सिर पर झूल रहा है । पुलिस को साधारण जीवन में और समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी भर के कोसा है । खुली  अदालत  में  जज  साहब, खुफिया पुलिस  के  अफसर, मजिस्टेट, सरकारी  वकील  तथा  सरकार  को  खूब  आड़े  हाथों लिया है । हर एक के दिल में मेरी बातें चुभ रही है । कोई दोस्त अपना अथवा यार मददगार नहीं जिसका सहारा हो । एक परमपिता परमात्मा की याद है । गीता का पाठ करते हुए सन्तोष है कि</p>
<p><strong><span style="color:#ca0000;">जो कुछ किया सो तै किया, मैं कुछ कीन्हा नाहिं ।<br />
जहां कहीं कुछ मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ।।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#ca0000;">ब्रह्मरण्या धाय कर्माणि संगंत्यक्त्वा करोति यः ।<br />
लिश्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा ।।</span></strong> <em><span style="color:#7d7d7d;font-size:x-small;"> भगवद्गीता । 5।10</span></em><br />
जो फल की इच्छा को त्यागकर के कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार जल में रहकर भी कमलपत्र जल में लिप्त नहीं होता । जीवन पर्यन्त जो कुछ किया, स्वदेश की भलाई समझ कर किया । यदि शरीर की पालना की तो इसी विचार से कि सु्दृढ़ शरीर से भले प्रकार स्वदेश सेवा हो सके । बड़े प्रयत्नों से यह शुभ दिन प्राप्त हुआ ।</p>
<p><strong><span style="color:#0000e6;">संयुक्त प्रान्त में इस तुच्छ शरीर का ही सौभाग्य होगा, जो सन 1857 के गदर की घटनाओं के पश्चात क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्बन्ध में इस प्रान्त के निवासी का पहला बलिदान मातृवेदी पर होगा ।</span></strong> सरकार की इच्छा है कि मुझे घोट-घोट कर मारें इसी कारण से इस गरमी की ऋतु में साढ़े तीन महीने बाद अपील की तारीख नियत की गई ।</p>
<blockquote><p>साढ़े तीन महीने तक फांसी की कोठरी में भूंजा गया । यह कोठरी प़क्षी के पिंजरे से भी खराब हैं गोरखपुर जेल की फांसी की कोठरी मैदान में बनी है । किसी प्रकार की छाया निकट नहीं । प्रातःकाल आठ बजे से रात्रि के आठ बजे तक सूर्य देवता की कृपा से तथा चारों ओर रेतीली जमीन होने से अग्नि वर्षण होता है । नौ फीट लम्बी तथा नौ फीट चैड़ी कोठरी में केवल एक छः फीट लम्बा तथा दो फीट चौड़ा द्वार है । पीछे की ओर जमीन से आठ या नौ फीट की उंचाई पर, एक 2 फीट लम्बी 1 फीट चैड़ी खिड़की है । इसी कोठरी में भोजन, स्नान, मल-मूत्र तथा शयानादि होता है । मच्छड़ अपनी मधुर ध्वनि रात भर सुनाया करते है । बड़े प्रयन्त से रात्रि में तीन या चार घंटे निद्रा आती है, किसी किसी दिन एक दो घण्टे ही सो कर निर्वाह करना पड़ता है । मिटटी के पात्रों में भोजन दिया जाता है । ओढ़ने बिछाने को दो कम्बल मिले हैं । बड़े त्याग का जीवन है । <span style="color:#0000f4;"><strong>साधना के सब साधन एकत्रित है ।</strong></span> प्रत्येक क्षण शिक्षा दे रहा है &#8211; अन्तिम समय के लिये तैयार हो जाओ, परमात्मा का भजन करो ।</p></blockquote>
<p>मुझे तो इस कोठरी में बड़ा आनन्द आ रहा है । मेरी इच्छा थी कि किसी साधु की गुफा पर कुछ दिन निवास कर के योगाभ्यास किया जाता । अन्तिम समय वह इच्छा भी पूर्ण हो गई <span style="font-size:small;">। </span><span style="font-size:small;"><strong><span style="font-size:small;">साधु की गुफा न मिली तो क्या साधना की गुफा तो मिल गई,</span> </strong></span>इसी  कोठरी  में  यह  सुयोग  प्राप्त  हो गया, कि  अपनी  कुछ  अन्तिम  बात  लिख  कर  देशवासियों  के  अर्पण  कर  दूं । सम्भव है मेरे जीवन के अध्ययन से किसी आत्मा का भला हो जावे । बड़ी कठिनता से यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ ।</p>
<blockquote><p><strong>महसूस हो रहे है वादे फना के झोकें ।<br />
खुलने लगे हैं मुझ पर इसरार जिन्दगी के ।।<br />
बारे अलम उठाया रंगे निशात देखा ।<br />
आये नहीं हैं यूं ही अंदाज बेहिसी के ।।</strong><br />
<strong><span style="color:#0000f4;font-size:x-small;">वफ़ा पर दिल को सदके जान को नज़रे ज़फा कर दे ।<br />
मुहब्बत में यह लाज़िम है कि जो कुछ हो फिदा कर दे ।।</span><br />
<span style="font-size:small;">अब तो यही इच्छा है-</span></strong><br />
<strong>बहे बहरे फ़ना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की।<br />
कि भूखी मछलियां है जौहरे शमशीर कातिल की।।</strong><br />
<span style="font-size:small;"><strong>किन्तु</strong></span><br />
<strong><span style="color:#0000f4;">समझ कर फूँकना इस को जरा ऐ दागे नाकामी ।<br />
बहुत से घर भी हैं आबाद इस उजड़े हुये दिल से ।। </span></strong></p></blockquote>
<p><span style="color:#0000e6;"><strong>परिणाम</strong><br />
</span>ग्यारह वर्ष पर्यन्त यथाशक्ति प्राणपण से चेष्टा करने पर भी हम अपने उद्देश्य में कहां तक सफल हुये ? क्या लाभ हुआ ? इस का विचार करने से कुछ अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा, क्योंकि हम ने लाभ हानि अथवा जय पराजय के विचार से क्रान्तिकारी दल में योग नहीं दिया था । हम ने जो कुछ किया वह अपना कर्तव्य समझ कर किया । कर्तव्य निर्णय  में  हमने  कहां  तक  बुद्धिमत्ता  से  काम  लिया, इस का विवेचन करना उचित जान पड़ता है । राजनैतिक दृष्टि से हमारे कार्यों का इतना ही मूल्य है कि कतिपय होनहार नवयुवकों के जीवन को कष्टमय बना कर नीरस कर दिया और उन्हीं में से कुछ ने व्यर्थ में जाने गंवाईं । कुछ धन भी खर्च किया ।</p>
<blockquote>
<p align="justify"><strong>हिन्दू शास्त्र के अनुसार किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती, जिसका जिस विधि से जो काल होता है, वह उसी विधि समय पर ही प्राण त्याग करता है । केवल निमित्त मात्र कारण उपस्थित हो जाते हैं ।</strong></p>
</blockquote>
<p>लाखों भारतवासी महामारी, हैजे, ताउन इत्यादि अनेक प्रकार के रोगों में मर जाते हैं । करोड़ों दुर्भिक्ष में अन्न बिना प्राण त्यागते हैं तो उस का उत्तरदायित्व किस पर है ? रह गया धन का व्यय, सो इतना धन तो भले आदमियों के विवाहोत्सवों में व्यय हो जाता है । गणमान्य व्यक्तियों की तो केवल विलासिता की सामग्री  का  मासिक  व्यय  इतना  होगा, जितना  कि  हमने  एक  षडयन्त्र  के  निर्माण  में  व्यय  किया । <strong>हमलोगों को डाकू बता कर फांसी और काले पानी की सजायें दी गयी है ।</strong><br />
किन्तु हम समझते हैं कि वकील और डाक्टर हम से कहीं बड़े डाकू है । वकील डाक्टर दिन दहाड़े बड़े-बड़े तालुकेदारों की जायदादें लूट कर खा गये । वकीलों के चाटे हुये अवध के ताल्लुकेदारों को ढूंढ़े रास्ता भी नहीं दिखाई देता, और वकीलों को उंची अटटालिकायें उन पर खिलखिला कर हंस रही है । इसी प्रकार लखनउ में डाक्टरों के भी उंचे-उंचे महल बन गये । किन्तु इस समय राज्य  में  दिन  के  डाकुओं  की प्रतिष्ठा है । अन्यथा रात के साधारण डाकुओं में और दिन के इन डाकुओं वकीलों तथा डाक्टरों में कोई भेद नहीं है । दोनों अपने-अपने मतलब के लिये बुद्धि की कुशलता से प्रजा का धन लूटते है ।</p>
<p> </p>
<div id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:1645d374-08af-4d7e-bbe6-216e6c274fc4" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+India">Martyrs of India</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Struggle+for+Freedom+of+India">Struggle for Freedom of India</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Bismil">Bismil</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Kakori+Conspiracy">Kakori Conspiracy</a></div>
<br />Posted in आत्म-चरित, खण्ड-4, चँद शेर, फाँसी, सरफ़रोशी की तमन्ना Tagged: काला पानी, कोठरी, गोरखपुर जेल, प्राणत्याग, फांसी की सजा, भग्वतगीता, वकीलों की जिरह, साधना के साधन <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/519/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/519/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/519/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/519/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/519/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/519/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/519/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/519/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/519/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/519/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/519/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/519/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/519/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/519/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=519&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>अशफ़ाकउल्ला ख़ाँ वारसी : अन्तिम समय में दो शब्द</title>
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		<pubDate>Mon, 18 May 2009 00:00:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
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		<description><![CDATA[नमस्कार ! एक  अँतराल  के  पश्चात  यह  कड़ियाँ  प्रारँभ  करने  का  मन बनाया है । किसी हुतात्मा की अवमानना सहन न कर पाना,एक प्रमुख कारण रहा था । न जाने कब, हम इन सिरफिरों को गँभीरता से ले पायेंगे ?यदि इनके स्थान पर कोई स्वयँ का सम्बन्धी शहीद हो गया होता.. तो ?              इस प्रस्तुति [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=515&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#fffafa">
<tbody>
<tr>
<td><span style="color:#0000c6;"><strong>नमस्कार !</strong> एक  अँतराल  के  पश्चात  यह  कड़ियाँ  प्रारँभ  करने  का  मन बनाया है ।<strong> किसी हुतात्मा की अवमानना सहन न कर पाना,एक प्रमुख कारण रहा था ।</strong> न जाने कब, हम इन सिरफिरों को गँभीरता से ले पायेंगे ?यदि इनके स्थान पर कोई स्वयँ का सम्बन्धी शहीद हो गया होता.. तो ?             <br />
</span><span style="color:#0000c6;"><strong>इस प्रस्तुति पर होली की शुभकामनायें, और फ़ोलो-मी जैसे सँदेश क्या दर्शाते हैं ?<br />
</strong>मेरी  धर्मपत्नी  श्रीमती  रूबी  मज़ूमदार,  सहयोगिनी अमिता  श्रीवास्तव  एवँ  कतिपय  अन्य  मित्रों  का  मानना है, कि  अपनों  से  ऎसी  खिन्नता  के  चलते  हिन्दी जगत  और  विश्व समुदाय  को  क्षति पहुँचाने का मेरा अधिकार नहीं बनता है । किंवा यह चूक अनजाने में होने जा रही थी । अस्तु</span><span style="color:#0000d9;">, </span><span style="color:#fd0000;">आत्मकथा की शेष कड़ियाँ</span> <span style="color:#0000c6;">आज से प्रारँभ हो रहीं हैं । यह सुनिश्चित कर लिया गया है, कि पाठ का क्रम मूल पुस्तक का ही रहे ।  <strong>सुधी पाठक अबतक की अनुपस्थिति एवँ पीड़ा के लिये क्षमा करें -</strong></span></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><strong><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/18/1702/" target="_blank"><em>तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये ।</em></a><br />
<a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/18/1702/" target="_blank"><em>बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये</em></a><em> ।।</em></strong></p>
<p><em>….. उनकी बला से कि कोई तकलीफ उठावें । यदि कोई एक दो चालाक हुए भी तो थोड़े दिन बड़े ओहदे की फिराक में काम दिखाया,  दौड़ धूप की,  कुछ पदवृद्धि हो गई और सब काम बन्द । इस प्रान्त में कोई बाकायदा पुलिस का गुप्तचर विभाग नहीं, जिस को नियमित रूप से शिक्षा दी जाती हो । फिर काम करते-करते अनुभव हो ही जाता है ।</em> <strong>इसके आगे ’ बिस्मिल ’ जी  लिखते हैं :</strong></p>
<p>मैनपुरी षडयन्त्र तथा इस षडयन्त्र से इसका पूरा पता लग गया, कि थोड़ी सी कुशलता से कार्य करने पर पुलिस के लिये पता पाना बड़ा कठिन है । वास्तव में उनके कुछ भाग्य ही अच्छे होते है । जब से इस मुकदमें की जांच शुरू हुई, पुलिस ने इस प्रान्त के सन्दिग्ध क्रान्तिकारी व्यक्तियों पर दृष्टि डाली, उनसे मिली, बातचीत की । एक दो को कुछ धमकी दी । चोर की दाढ़ी में तिनका वाली जनश्रुति के अनुसार एक महाशय से पुलिस को सारा भेद मालूम हो गया । हम सबके सब बड़े चक्कर में थे, कि इतनी जल्दी पुलिस ने मामले का पता कैसे लगा लिये। उक्त महाशय की ओर तो ध्यान भी न जा सकता था ।</p>
<p>पर गिरफतारी के समय मुझसे तथा पुलिस के अफसर से जो बातें हुई, उनमें पुलिस अफसर ने वे सब बातें मुझ से कहीं जिन को मेरे तथा उक्त महाशय के  अतिरिक्त कोई भी दूसरा जान ही न सकता था । और भी बड़े पक्के तथा बुद्धि गम्य प्रमाण मिल गये, कि जिन बातों को उक्त महाशय जान सके थे, वे ही पुलिस जान सकी । जो बातें आप को मालूम न थी, वे पुलिस को किसी प्रकार न मालूम हो सकी । उन बातों से यह निश्चय हो गया कि यह काम उन्हीं महाशय का है । यदि ये महाशय पुलिस के हाथ न आते और भेद न खोल देते, तो पुलिस सिर पटक कर रह जाती, कुछ भी पता न चलता ।</p>
<p>बिना दृढ़ प्रमाणों के भयकंर से भयंकर व्यक्ति पर भी हाथ रखने का साहस नहीं होता, क्योंकि जनता में आन्दोलन फैलने से बदनामी हो जाती है । सरकार पर जवाबदेही आती है । अधिक से अधिक दो चार मनुष्य पकड़े जाते, और अन्त में उन्हें भी छोड़ना पड़ता । परन्तु जब पुलिस को वास्तविक सूत्र हाथ आ गया, उसने अपने सत्यता को प्रमाणित करने के लिये लिखा हुआ प्रमाण पुलिस कोदिया, उस अवस्था में भी यदि पुलिस गिरफतारियां न करती, तो फिर कब करती ? जो  भी  हुआ, परमात्मा  उन  का  भी  भला करे ।  अपना तो जीवन भर यही उसूल रहा-</p>
<p><strong>सताये तुझ को जो कोई बे वफ़ा बिस्मिल ।<br />
तो मुंह से कुछ न कहना आह! कर लेना ।।<br />
हम शहीदा ने वफा का दीनो ईमां और है ।<br />
सिजदा करते हैं हमेशा पांव पर जल्लाद ।।</strong></p>
<p>मैंने इस अभियोग में जो भाग लिया अथवा जिनको जिन्दगी की जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी, उन में से सब से ज्यादा हिस्सा <strong><span style="color:#0000ff;">श्रीयुत अशफाकउल्ला खां वारसी</span></strong> का है । मैं अपनी कलम से उन के लिये भी अन्तिम समय में दो शब्द लिख देना अपना कर्तव्य समझता हूं ।</p>
<p><span style="color:#fd0000;font-size:small;"><strong>अशफ़ाक</strong></span><br />
मुझे भली भांति याद है कि मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहांपुर आया था, तो तुम से स्कूल में भेंट हुई थी । तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी।  तुम ने मुझ से मैनपुरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करना चाही थी । मैंने यह समझा कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझ से इस प्रकार की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि से दिया था । तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था । तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों का प्रकाश हो रहा था ।</p>
<p>तुम ने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने इरादे पर डटे रहे । जिस प्रकार हो सका कांग्रेस में बातचीत की । अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का वि्श्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नही, तुम्हारे दिल में मुल्क की खिदमत करने की ख्वाहि्श थी । अन्त में तुम्हारी विजय हुई । तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली । तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे । यह जान कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे भाई बन कर तुम्हें संतोष न हुआ ।</p>
<p>तुम समानता के अधिकार चाहते थे, तुम मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे । वही हुआ ? तुम मेरे सच्चे मित्र थे । सब को  आश्चर्य  था  कि  एक  कटटर  आर्य  समाजी  और  मुसलमान  का  मेल  कैसा ? <strong>मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था ।</strong> आर्यसमाज मन्दिर में मेरा निवास था,किन्तु तुम इन बातों की किंचितमात्र चिन्ता न करते थे । मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे । मेरे पास आर्यसमाज मन्दिर में आते-जाते थे । हिंदू-मुसलिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लम खुल्ला गालियां देते थे, काफिर  के  नाम  से पुकारते थे, पर तुम कभी भी उन के विचारों से सहमत न हुये ।</p>
<p>सदैव हिन्दू मुसलिम ऐक्य के पक्षपाती रहे । तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त थे । <strong><span style="color:#0000ff;">तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही था कि मुसलमानों को खुदा अकल देता कि वे हिन्दुओं के साथ मेल कर के हिन्दोस्तांन की भलाई करते ।</span></strong> जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी पढ़ सकें ?</p>
<p>तुमने स्वदेश भक्ति के भावों को भी भली भांति समझाने के लिये ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया । अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुंह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे, जिससे सबको बड़ा आ्श्चर्य होता था । तुम्हारी इस प्रकार की प्रकृति देख कर बहुतों को संदेह होता था, कि कहीं इस्लाम-धर्म त्याग कर शुद्धि न करा ले । पर तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार से अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली । बहुधा  मित्र मण्डली में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विष्वास करके धोखा न खाना ।</p>
<p>तुम्हारी जीत हुई, मुझ में तुम में कोई भेद न था । <strong>बहुधा मैंने तुमने एक थाली में भोजन किये ।</strong> मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि हिन्दू मुसलमान में कोई भेद है । तुम मुझ पर अटल विश्वास तथा अगाध प्रीति रखते थे, हां ! तुम मेरा नाम लेकर नहीं पुकार सकते थे । तुम तो सदैव राम कहा करते थे । एक समय जब तुम्हें हृदय-कम्प का दौरा हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुंह से बारम्बार राम, हाय राम ! के शब्द निकल रहे थे । <strong>पास खड़े हुए भाई बान्धवों को आष्चर्य था कि राम, राम कहता है ।</strong></p>
<p><strong>कहते थे कि अल्लाह, अल्लाह कहो, पर तुम्हारी राम-राम की रट थी ।</strong> उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को जानते थे । तुरन्त मैं बुलाया गया । मुझसे मिलने पर तुम्हें षान्ति हुई,  तब सब लोग राम-राम के भेद को समझे । अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथा मित्रता का परिणाम क्या हुआ ? मेरे विचारों के रंग में तुम भी रंग गये । तुम भी एक कट्टर क्रान्तिकारी बन गये ।  अब तो तुम्हारा दिन-रात प्रयत्न यही था, कि जिस प्रकार हो सके मुसलमान नवयुवकों में भी क्रान्तिकारी भावों का प्रवेष हो सके। वे भी क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दे ।</p>
<p>जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे, सब  पर  तुमने  अपने  विचारों  का  प्रभाव  डालने  का  प्रयत्न  किया । बहुधा क्रान्तिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैने कैसे एक मुसलमान को क्रान्तिकारी दल का प्रतिश्ठित सदस्य बना लिया । <strong>मेरे साथ तुमने जो कार्य किये, वे सराहनीय है !</strong>  तुम ने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना न की । एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर रहते थे । तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था । तुम्हारे भाव बड़े उच्च थे ।</p>
<p><strong>मुझे यदि शान्ति है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुंह उज्जवल कर दिया । भारत के इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गई, कि अशफाकउल्ला ख़ाँ ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दिया ।</strong> अपने भाई बन्धु तथा सम्बन्धियों के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया । गिरफतार हो जाने पर भी अपने विचारों में दृढ़ रहा ! जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे, वैसे ही मानसिक वीर तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए । इन सबके  परिणाम  स्वरूप <strong>अदालत  में तुमको  मेरा सहकारी ठहराया गया, और जज ने हमारे मुकदमें का फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में भी जयमाल फांसी की रस्सी पहना दी । </strong></p>
<p>प्यारे भाई तुम्हे यह समझ कर सन्तोष होगा कि जिसने अपने माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश-सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट कर दिया, जिसने अपना तन मन धन सर्वस्व मातृसेवा में अर्पण करके अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया,  उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया ।</p>
<p><strong>असगर हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है ।<br />
रखना कभी न पांव, यहां सर लिये हुये ।।<br />
</strong>सहायक काकोरी शडयन्त्र का भी फैसला जज साहब की अदालत से हो गया। श्री अशफाकउल्ला खां वारसी को तीन फांसी और दो काले पानी की आज्ञायें हुईं । श्रीयुत शचीन्द्रनाथ बख़्शी को पांच काले पानी की आज्ञायें हुई । <span style="font-size:small;"><strong>एक सन्देश</strong><br />
</span>वे मरते समय देशवासियों के नाम एक सन्दे्श भी छोड़ गये । सन्दे्श का सारांश यहां दिया जाता है -</p>
<table border="1" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#fffafa">
<tbody>
<tr>
<td><span style="color:#0000f4;">भारतमाता के रंग-मंच पर अपना पार्ट अब हम अदा कर चुके । हम ने गलत सही जो कुछ किया, वह स्वतन्त्रता प्राप्त की भावना से किया । हमारे इस काम की कोई प्रशंसा करेंगे और कोई निन्दा । <strong>किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ी है । क्रान्तिकारी बड़े वीर योद्धा और बड़े अच्छे वेदान्ती होते है । वे सदैव अपने देश की भलाई सोचा करते है ।</strong> लोग कहते हैं कि हम देश को भय त्रस्त करते है,किन्तु बात ऐसी नहीं है । इतनी लम्बी मियाद तक हमारा मुकदमा चला मगर हम ने किसी एक गवाह तक को भयत्रस्त करने की चेष्टा नहीं की,न किसी मुखबिर को गोली मारी । हम चाहते तो किसी गवाह,या किसी खुफिया पुलिस के अधिकारी या किसी अन्य ही आदमी को मार सकते थे । किन्तु हमारा यह उदेश्य नहीं था । हम तो कन्हाई लाल दत्त,खुदीराम बोस, गोपी मोहन साहा आदि की स्मृति में फांसी पर चढ़ जाना चाहते थे ।</span></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<div id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:db87f1e7-6881-48ea-9564-32e8e62b82cd" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Struggle+for+Freedom+of+India">Struggle for Freedom of India</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Kakori+Conspiracy">Kakori Conspiracy</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Bismil">Bismil</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+India">Martyrs of India</a></div>
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		<title>अन्तिम समय की बातें</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Mar 2009 19:51:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतिम समय की बातें]]></category>
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		<description><![CDATA[आज 17 दिसम्बर 1927 ई0 को निम्नलिखित पक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जब कि 19 दिसम्बर 1927&#160; ई0 सोमवार पौष कृष्ण 11 सम्वत् 1984 को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है । अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ही । यह सब सर्वशक्तिमान प्रभु की लीला है । सब कार्य उसके इच्छानुसार ही होते है । यह परम पिता परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किस को शरीर त्यागना होता है । <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=506&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं</span>  :  <span style="color:#8b8b8b;">श्री बिस्मिल की इस स्वीकारोक्ति में मेरी असहमति का कोई स्थान नहीं है । कदाचित मुझे लगने लगा था, कि हम अपने देश के शहीदों के प्रति उदासीन हैं.. निश्चित ही यह हतोत्साहित करने का कारक हो सकता था.. पर ऎसा नही है ! हम उदासीन न सही पर उनको ठीक से जान पाने को उत्सुक अवश्य रहे हैं.. अनिश्चय से उत्पन्न इस स्थिति से .. इन कड़ियों को जारी रख पाने में इस अनावश्यक विलम्ब के लिये हुतात्मा क्षमा करें !<br />
साथ ही .. इस प्रकार के प्रस्तुतिकरण में पृष्ठक्रम को तोड़ना कितना उचित है.. यह तो नहीं जानता, पर  </span><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/18/1702/" target="_blank"><span style="color:#8b8b8b;">‘माशूक के थोड़े से एहसान</span></a><span style="color:#8b8b8b;">  ‘ के बाद के पन्नों को प्रस्तुत करने से पहले, इसी पुस्तक से &#8216; अंतिम समय की बातें &#8216; को यहाँ पहले रखने का लोभ संवरण नही कर पा रहा हूँ..<br />
इसके उपरांत </span><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/18/1702/" target="_blank"><span style="color:#8b8b8b;">‘ थोड़े से एहसान ‘</span></a><span style="color:#8b8b8b;">  के बाद की कड़ियाँ यथावत जारी रहेंगी ! शुभस्तुः</span> </p>
<p align="justify"><span style="color:#0000f9;">सर फ़रोशाने वतन फिर देखलो मकतल में है ।<br />
मुल्क पर कुर्बान हो जाने के अरमां दिल में हैं ।।<br />
तेरा है जालिम की यारों और गला मजलूम का ।<br />
देख लेंगे हौसला कितना दिले कातिल में है ।।<br />
शोरे महशर बावपा है मार का है धूम का ।<br />
बलबले जोशे शहादत हर रगे बिस्मिल में है ।।</span>
</p>
<p align="justify"><strong>आज 17 दिसम्बर 1927 ई0 को निम्नलिखित पक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जब कि 19 दिसम्बर 1927  ई0 सोमवार पौष कृष्ण 11 सम्वत् 1984 को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है । अतएव नियत समय पर यह लीला संवरण करनी होगी ही । यह सब सर्वशक्तिमान प्रभु की लीला है । सब कार्य उसके इच्छानुसार ही होते है । यह परम पिता परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किस को शरीर त्यागना होता है । </strong></p>
<p><span style="color:#00009b;">मृत्यु के सकल उपक्रम निमित्त मात्र है । जब तक कर्म क्षय नहीं होता, आत्मा को जन्म-मरण के बन्धन में पड़ना ही होता है, यह शास्त्रों का निश्चय है । यद्यपि यह, वह परमब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणाम स्वरूप कौन सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा, किन्तु अपने लिये ये मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही पुनः भारतवर्ष में ही किसी निकटवर्ती सम्बन्धी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण करूंगा, क्योंकि मेरा जन्म जन्मान्तर यही उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्राकृतिक पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो</span></p>
<p><span style="color:#00009b;">कोई किसी पर हुकूमत न करें । सारे संसार में जनतन्त्र की स्थापना हो । वर्तमान समय में भारतवर्ष की बड़ी सोचनीय अवस्था है । अतएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब तक कि भारतवर्ष के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण स्वतन्त्र न हो जावेंगे, परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना होगी कि वह मुझे इसी देश में जन्म दें, ताकि मैं उसकी पवित्र वाणी वेद वाणी का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक पहुंचाने में समर्थ हो सकूं । </span></p>
<p><span style="color:#00009b;">सम्भव है कि मैं मार्ग निर्धारण में भूल करूं, पर इसमें मेरा कोई विशेष दोष नहीं, क्योंकि मैं भी तो अल्पज्ञ जीव मात्र ही हूं । भूल न करना केवल सर्वज्ञ से ही सम्भव है । हमें परिस्थितियों के अनुसार ही सब कार्य करने पड़े और करने होंगे । परमात्मा अगले जन्म में सुबुद्धि प्रदान करें कि मैं जिस मार्ग का अनुसरण करूं, वह त्रुटि रहित ही हो ।</span></p>
<p><span style="color:#00009b;">अब मैं उन बातों का भी उल्लेख कर देना उचित समझता हूं जो काकोरी षड्यन्त्र के अभियुक्तों के सम्बन्ध में सेशन जज के फैसला सुनाने के पश्चात घटित हुई । 6 अप्रैल सन 27 ई को सेशन जज ने फैसला सुनाया था। 18 जुलाई सन 27 ई0 को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई । इसमें कुछ की सजायें बढ़ी और एकाध को कम भी हुई । अपील होने की तारीख से पहले मैं ने संयुक्त प्रान्त के गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि अब भविष्य में क्रान्तिकारी दल से कोई सम्बन्ध न रखूंगा । इस मेमोरिलय का जिक्र मैंने अपनी अन्तिम दया प्रार्थना पत्र में जो मैं ने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था, उसमें कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना न स्वीकार की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमें की बहस लिखकर भेजी, जो छापी गई । </span></p>
<p><span style="color:#00009b;">जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी, तो उन्हें बड़ा सन्देह हुआ कि वह बहस मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का यह नतीजा निकला कि चीफ कोर्ट अवध से मुझे महा भयंकर षड्यन्त्रकारी की पदवी दी गई । मेरे पश्चाताप पर जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा का प्रकाश इस प्रकार किया कि यदि यह रामप्रसाद छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा । बुद्धि की प्रखरता तथा समझ पर कुछ प्रकाश डालते हुए निर्दयी हत्यारे के नाम से विभूषित किया गया । लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु काकारी षड़यन्त्र का चीफ कोर्ट आद्योपान्त, फैसला पढ़ने से भली भांति विदित होता है कि मुझे मुत्युदण्ड किस ख्याल से दिया गया । </span></p>
<p><span style="color:#00009b;">यह निश्चय किया गया कि रामप्रसाद ने सेशन जज के विरूद्ध अपशब्द कहे है, खुफिया विभाग के कार्यकर्ताओं पर लांछन लगाये हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके विरूद्ध आवाज उठाई है, अतएव रामप्रसाद सबसे बड़ा गुस्ताख मुलजिम है । अब माफी चाहे वह किसी भी रूप में मांगे, नहीं दी जा सकती । चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रान्तीय गवर्नर तथा फिर वाइसराय के पास दया प्रार्थना की गई । रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लहरी, रोशनसिंह तथा अ्शफ़ाक़उल्ला खां के मृत्यु दण्ड को बदलकर अन्य दूसरी सजा देने की सिफारि्श करते हुए मेम्बरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन पत्र दिया । मेरे पिता ने ढाई सौ रईस, आनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदारों के हस्ताक्षर से एक अलग प्रार्थना पत्र भेजा, किन्तु श्रीमान सर बिलियम मेरिस की सरकार ने एक भी न सुनी । </span></p>
<p><span style="color:#00009b;">उसी समय लेज़िस्लेटिव एसेम्बली तथा कौंसिल आफ स्टेट के 78 सदस्यों ने भी हस्ताक्षर करके वाइसराय के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि काकोरी षड़यन्त्र के मृत्युदण्ड पाये हुओं को मृत्युदण्ड की सजा बदलकर दूसरी सजा कर दी जावे, क्योंकि दौरा जज ने सिफारिश की है कि यदि यह लोग पश्चाताप करें तो सरकार दण्ड कम कर दें । चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है । </span></p>
<p><span style="color:#00009b;">किन्तु वाइसराय महोदय ने भी एक न सुनी । इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा अन्य एसेम्बली के कुछ सदस्यों ने भी वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु दण्ड न दिया जावे । इतना होने पर सबको आ्शा थी कि वायसराय महोदय अवश्यमेव मृत्युदण्ड की आज्ञा रदद कर देंगे । इसी हालत में चुपचाप विजयाद्शमी से दो दिन पहले जेलों को तार भेज दिये गये, कि दया नहीं होगी । सब को फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई । </span></p>
<p><span style="color:#00009b;">जब मुझे सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल ने तार सुनाया, मैंने भी कह दिया कि आप अपना कार्य कीजिये । किन्तु सुपरिन्टेन्डेण्ट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया प्रार्थना का सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम सा बना रखा है कि प्रत्येक फांसी के कैदी की ओर से जिसकी दया भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहां से खारिज हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रान्तीय सरकार के पास अवश्य भेजते हैं कोई दूसरा जेल सुपरिन्टेन्डेण्ट ऐसा नहीं करता । उपरोक्त तार लिखते समय मेरा कुछ विचार हुआ कि प्रिवीकौंसिल इग्लैण्ड में अपील की जावे । मैंने श्रीयुत मोहनलाल सक्सेना वकील लखनउ को इस प्रकार की सूचना दी । </span></p>
<p><span style="color:#00009b;">बाहर किसी को वाइसराय की अपील खारिज होने की बात पर विश्वास भी न हुआ । जैसे तैसे करके श्रीयुत मोहनलाल द्वारा प्रिवीकौंसिल में अपील कराई गई । नतीजा पहले से ही मालूम था। वहां से भी अपील खारिज हुई । यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ?</span>  <strong>क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ?</strong>  <span style="color:#00009b;"><em>इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं,</em></span> <strong>मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।   </strong></p>
<br />Posted in अंतिम समय की बातें, आत्मकथा, खण्ड-4, चँद शेर Tagged: अन्तिम समय, इंग्लैण्ड, क्रांतिकारी दल, चतुर्थ खण्ड, परिस्थितियों के अनुसार, पश्चाताप, प्रतिज्ञा, प्रार्थना, मृत्युदण्ड, राजनीति, वायसराय, विजयादशमी, शतरंज़, सम्राट <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/506/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/506/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/506/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/506/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/506/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/506/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/506/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/506/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/506/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/506/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/506/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/506/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/506/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/506/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=506&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत है</title>
		<link>http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/18/1702/</link>
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		<pubDate>Wed, 18 Feb 2009 15:27:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
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		<category><![CDATA[हिन्दू मुस्लिम झगड़े]]></category>

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		<description><![CDATA[तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये । बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।। अब आगे पृष्ठ 131 से जारी है…. समिति के सदस्यों ने इस प्रकार का व्यवहार किया । बाहर जो साधारण जीवन के सहयोगी थे,&#160; उन्होंने भी अद्धभुत रूप धारण किया । एक ठाकुर साहब के [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=484&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font color="#000075"><strong><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/16/1402/" target="_blank">तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये ।</a>         <br /><font color="#269aae">बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।।</font></strong>       <br /><em><font color="#fb0000">अब आगे पृष्ठ 131 से जारी है….</font></em> समिति के सदस्यों ने इस प्रकार का व्यवहार किया । बाहर जो साधारण जीवन के सहयोगी थे,&#160; उन्होंने भी अद्धभुत रूप धारण किया । एक ठाकुर साहब के पास काकोरी डकैती का नोट मिल गया था । वह कहीं से शहर में पा गये थे । जब गिरफ़्तारी हुई,&#160; मजिस्टेट के यहाँ से जमानत नामंजूर हुई जज साहब ने चार हजार की जमानत मांगी । </font><font color="#000075">कोई जमानती न मिलता था । आपके वृद्ध भाई मेरे पास आये । पैरों पर सिर रख कर रोने लगे । </font></p>
<p align="justify"><font color="#000075">मैंने जमानत कराने का प्रयत्न किया । मेरे माता-पिता कचहरी जा कर खुले रूप से पैरवी करने को मना करते रहे कि पुलिस खिलाफ है,&#160; रिपोर्ट हो जायेगी, पर मैंने एक न सुनी । कचहरी जा कर, कोशिश करके जमानत दाखिल कराई । जेल से उन्हें स्वयं जा कर छुड़वा लाया । पर जब मैंने उक्त महाशय का नाम उक्त घटना की गवाही देने के लिये सूचित किया, तब पुलिस ने उन्हें धमकाया और उन्होंने पुलिस को तीन बार लिख कर दिया कि वह रामप्रसाद को जानते भी नहीं । </font></p>
<p align="justify"><font color="#000075">हिन्दू मुसलिम झगड़े में जिनके घरों की रक्षा की थी,&#160; जिनके बाल बच्चे मेरे सहारे मुहल्ले में निर्भयता से निवास करते रहे,&#160; उन्होंने ही मेरे खिलाफ झूठा गवाहियां बनवाकर भेजी । कुछ मित्रों के भरोसे पर उन का नाम गवाही में दिया कि जरूर गवाही देंगे,&#160; संसार लौट जावे पर वे नहीं डिग सकते । किन्तु वचन दे चुकने पर भी जब पुलिस का दबाव पड़ा,&#160; वे भी गवाही देने से इन्कार कर गये । </font></p>
<p align="justify"><font color="#000075">जिनको अपना हृदय, सहोदर तथा मित्र समझ कर हर आवश्यकता होता यथा शक्ति उनको पूर्ण करने की प्राणपण से चेष्टा करता था, उनसे इतना भी न हुआ कि कभी जेल पर आकर दर्शन दे जाते, फांसी की कोठरी में ही आकर सन्तोषदायक दो बातें कर जातें । एक दो सज्जनों ने इतनी कृपा तथा साहस किया कि दस मिनट के लिये अदालत में दूर खड़े होकर दर्शन दे गये । </font></p>
<p align="justify"><font color="#000075"></font><font color="#000075">यह सब इसलिये कि पुलिस का आतंक छाया हुआ था कि कहीं गिरफ़्तार न कर लिये जावें । इस पर भी जिसने जो कुछ किया और दिया, मैं उसी को अपना सौभाग्य समझता हूं,&#160; और उनका आभारी हूं &#8211;        <br /></font><em><font size="2"><strong><font color="#009f9f">वह&#160; फूल चढ़ाते है तुरबत भी दबी जाती है ।</font>             <br /></strong></font><font size="2"></font><font color="#0000ff"><strong>माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत है ।।</strong></font></em></p>
<p align="justify"><font color="#000075"><em><font size="2"></font><font color="#0000ff"></font></em></font><font color="#000075">परमात्मा से यही प्रार्थना है कि सब प्रसन्न तथा सुखी रहें । मैंने तो सब बातों को जानकर ही इस मार्ग में पैर रखा था । मुकद्दमें के पहले संसार का कोई अनुभव ही न था । न कभी जेल देखा, न किसी अदालत का कोई तर्जुबा ही न था ।&#160; जेल में जाकर मालूम हुआ कि किसी नई दुनिया में पहुंच गया । मुकद्दमें के पहले मैं यह भी न जानता था, कि कोई लेखन-कल-विज्ञान भी है । इसका भी कोई दक्ष भी होता है, जो लेखन शैली को देखकर लेखकों का निर्णय कर सकता है । </font></p>
<p align="justify"><font color="#000075">यह भी नहीं पता था कि लेख किस प्रकार मिलाये जाते है, एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य के लेख में क्या भेद होता है, क्यों भेद होता है, लेखन कला का दक्ष हस्ताक्षर को प्रमाणित कर सकता है, तथा लेखक के वास्तविक लेख में तथा बनावटी लेख में भेद कर सकता है । इस प्रकार का कोई भी अनुभव तथा ज्ञान न था । अनुभव तथा ज्ञान न रखते हुये भी एक प्रान्त की क्रान्तिकारी समिति का सम्पूर्ण भार लेकर उसका संचालन कर रहा था । </font></p>
<div align="center">
<table cellpadding="3" width="100%" bgcolor="#4682b4" border="0">
<tbody>
<tr>
<td>
<p align="justify"><font color="#ffff00">बात यह है कि क्रान्तिकारी कार्य की शिक्षा देने के लिये कोई पाठशाला तो है ही नहीं । यही हो सकता था कि पुराने अनुभवी क्रान्तिकारियों से कुछ सीखा जावे । न जाने कितने व्यक्ति बंगाल तथा पंजाब षड़यन्त्रों में गिरफ़्तार हुए, पर किसी ने भी यह उद्योग न किया कि एक इस प्रकार की पुस्तक लिखी जावे जिससे नवागन्तुकों को कुछ अनुभव की बातें मालूम होती । </font></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table></div>
<p align="justify"><font color="#000075">लोगों को इस बात की बड़ी उत्कण्ठा होगी कि क्या यह पुलिस का भाग्य ही था, जो सब बना बनाया मामला हाथ आ गया ! क्या पुलिस वाले परोक्ष ज्ञानी होते है ? कैसे गुप्त बातों का पता चला लेते है ?</font></p>
<p align="justify"><font color="#000075">इनकी सफलता पर&#160; यह कहना पड़ता है कि यह इस पराधीन देश का दुर्भाग्य ! ब्रिटिश सरकार का सौभाग्य !! बंगाल पुलिस के सम्बन्ध में तो अधिक कहा नहीं जा सकता, क्योंकि मेरा कुछ विशेषानुभव नहीं । इस प्रान्त की खुफिया पुलिस वाले तो महान भांदू होते हैं । जिन्हें साधारण ज्ञान भी नहीं होता । </font><font color="#000075">साधारण पुलिस से खुफिया में आते हैं साधारण पुलिस की दारोगाई करते हैं,&#160; मजे में लम्बी-लम्बी घूस खा कर बड़े-बड़े पेट बढ़ा आराम करते हैं । </font></p>
<p align="justify"><font color="#000075">उनकी बला से कि कोई तकलीफ उठावें । यदि कोई एक दो चालाक हुए भी तो थोड़े दिन बड़े ओहदे की फिराक में काम दिखाया,&#160; दौड़ धूप की,&#160; कुछ पदवृद्धि हो गई और सब काम बन्द । इस प्रान्त में कोई बाकायदा पुलिस का गुप्तचर विभाग नहीं,&#160; जिस को नियमित रूप से शिक्षा दी जाती हो । फिर काम करते-करते अनुभव हो ही जाता है । </font></p>
<div class="wlWriterEditableSmartContent" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:3af2d392-ebf0-43ae-a583-f2467185368f" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b6+%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0" rel="tag">ब्रिटिश सरकार</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+Indian+Independence" rel="tag">Martyrs of Indian Independence</a>,<a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6+'%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e2%80%99" rel="tag">रामप्रसाद &#8216;बिस्मिल’</a></div>
<br />Posted in आत्म-चरित, खण्ड-4, चँद शेर Tagged: अदालत, काकोरी डकैती, क्रान्तिकारी समिति, गवाही, चतुर्थ खण्ड, जेल, परमात्मा, पराधीन देश, पुलिस के दरोगा, ब्रिटिश सरकार, मुकद्दमा, लेखन शैली का नियम, षड़्यन्त्र, हिन्दू मुस्लिम झगड़े <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/484/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/484/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/484/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/484/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/484/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/484/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/484/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/484/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/484/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/484/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/484/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/484/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/484/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/484/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=484&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये</title>
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		<pubDate>Sun, 15 Feb 2009 19:33:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
		<category><![CDATA[काकोरी के शहीद]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[अशफाक उल्ला खां]]></category>
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		<description><![CDATA[उसने अपना बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया गया । यह कुछ अधिक जानता था । उसके बयान से क्रान्तिकारी पत्र के पार्सलों का पता चला । बनारस के डाकखाने से जिन-जिन के पास पार्सल भेजे गये थे उन को पुलिस ने गिरफतार किया । कानपुर में गोपीनाथ ने जिस के पास [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=480&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><span style="color:#000075;"><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/14/1302-2/" target="_blank">उसने अपना बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया गया । यह कुछ अधिक जानता था ।</a></span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">उसके बयान से क्रान्तिकारी पत्र के पार्सलों का पता चला । बनारस के डाकखाने से जिन-जिन के पास पार्सल भेजे गये थे उन को पुलिस ने गिरफतार किया । कानपुर में गोपीनाथ ने जिस के पास पारसल गया था गिरफतार होते ही पुलिस को बयान दे दिया और सरकारी गवाह बना लिया गया । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">इसी प्रकार रायबरेली में स्कूल के विद्यार्थी कुंवर बहादुर के पास पार्सल आया था, उसने भी गिरफ़्तार होते ही बयान दे दिया और सरकारी गवाह बना लिया गया । इसके पास मनीआर्डर भी आया करते थे, क्योंकि यह बनवारीलाल का पोस्ट बाक्स डाक पाने वाला था । इस ने बनवारी लाल  के एक रिश्तेदार का पता बताया, जहां पर तलाशी लेने से बनवारी लाल का एक ट्रँक मिला । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">इस ट्रँक में एक कारतूसी पिस्तौल, एक कारतूसी फौजी रिवाल्वर तथा कुछ जिन्दा कारतूस पुलिस के हाथ लगे । श्री बनवारी लाल की खोज हुई । बनवारीलाल भी पकड़ लिये गये । श्रीयुत बनवारीलाल ने काकोरी डकैती में अपना सम्मिलित होना बताया था । गिरफतारी के थोड़े दिनों बाद ही पुलिस वाले मिले, उल्टा सीधा सुझाया और बनवारीलाल ने भी अपना बयान दे दिया |</span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">वह इकबालिया मुलजिम बनाये गये ।उधर कलकत्ते में दक्षिणेश्वर में एक मकान में बम बनाने का सामान, एक बना हुआ बम, 7 रिवाल्वर, पिस्तौल तथा कुछ राजद्रोही साहित्य पकड़ा गया । इसी मकान में श्रीयुत राजेन्द्रनाथ लहरी बी0 ए0 जो इस मुकद्दमें में फरार थे गिरफतार हुए । इन्द्रभूषण के गिरफ़्तार हो जाने के बाद उसके हेडमास्टर को एक पत्र मध्यप्रान्त से मिला, जिसे उसने हार्टन साहब के पास वैसा ही भेज दिया । इस पत्र से एक व्यक्ति मोहनलाल खत्री का चन्दा में पता चला । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">वहां से पुलिस ने खोज लगा कर पूना में श्रीयुत रामकृष्ण खत्री को गिरफ़्तार करके लखनउ भेजा । बनारस में भेजे हुये पार्सलों के सम्बन्ध में से जबलपुर में श्रीयुत प्रणवेश कुमार चटर्जी को गिरफ़्तार कर के लखनउ भेजा गया । कलकत्ता से श्रीयुत शचीन्द्रनाथ सान्याल जिन्हें बनारस षड़यन्त्र में आजन्म कालेपानी की सजा हुई थी और जिन्हें बांकुरा में क्रान्तिकारी पर्चें बांटने के कारण दो वर्ष की सजा हुई और </span>वह <span style="color:#000075;">इस मुकद्दमें में लखनउ भेजे गये । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">श्रीयुत योगेशचन्द्र चटर्जी बंगाल आर्डीनेन्स के कैदी हजारी बाग जेल से भेजे गये । आप अक्तूबर सन 1924 ई0 में कलकत्ता में गिरफ़्तार हुये थे । आप के पास दो कागज पाये गये थे, जिन में संयुक्त प्रान्त के सब जिलों का नाम था, और लिखा था कि बाईस जिलों में समिति का कार्य हो रहा है । ये कागज इस षड़यन्त्र के सम्बन्ध के समझे गये । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">श्रीयुत् राजेन्द्रलाहिरी दक्षिणेश्वर बम केस में दस वर्ष के दीपान्तर की सजा पाने के बाद, इस मुकद्दमें में लखनउ भेजे गये । अब लगभग छत्तीस मनुष्य गिरफ़्तार हुये थे । बाकी अठ्ठाइस मनुष्यों पर मजिस्टेट की अदालत में मुकद्दमा चला । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">तीन व्यक्ति <strong>1-</strong> श्रीयुत शचीन्द्रनाथ बख़्शी <strong>2-</strong> श्रीयुत चन्द्रशेखर आजाद <strong>3-</strong> श्रीयुत अशफाक उल्ला खां फरार रहे, बाकी मुकद्दमें के अदालत में आने से पहले ही छोड़ दिये गये । अठ्ठाइस में से दो पर से मजिस्टेट की अदालत में मुकद्दमा उठा लिया गया । दो सरकारी गवाह बनाकर उन्हें माफी दी गई । अन्त में मजिस्टेट ने इक्कीस व्यक्तियों को सेशन सुपुर्द किया । सेशन में मुकद्दमा आने पर श्रीयुत सेठ दामोदर स्वरूप बहुत बीमार हो गये । अदालत न आ सकते थे । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">अतः अन्त में बीस व्यक्ति रह गये । बीस में से दो व्यक्ति श्रीयुत शचीन्द्रनाथ विश्वास तथा श्रीयुत हरगोविन्द सेशन की अदालत से मुक्त हुये । बाकी अट्ठारह को सजाएं हुई ।</span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">श्री बनवारीलाल इकबाली मुलजिम हो गये । वे पहले रायबरेली जिला कांग्रेस कमेटी के मन्त्री भी रह चुके है । उन्होंने असहयोग आन्दालन में छः मास का कारावास भी भोगा था । इस पर भी पुलिस की धमकी से प्राण संकट में पड़ गये । आप ही हमारी समिति के ऐसे सदस्य थे कि जिन पर सबसे अधिक धन व्यय किया गया । प्रत्येक मास आपको पर्याप्त धन भेजा जाता था । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">मर्यादा की रक्षा के लिये हम लोग यथाशक्ति बनवारी लाल को मासिक शुल्क दिया करते थे । अपने पेट काट कर इनको मासिक व्यय दिया गया । फिर भी इन्होंने अपने सहायकों की गर्दन पर छुरी चलाई । अधिक से अधिक द्स वर्ष की सजा हुई । जिस प्रकार का सबूत इनके विरूद्ध था, वैसा ही, इसी प्रकार के दूसरे अभियुक्तों पर था, जिन्हें दस-दस वर्ष की सजा हुई । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">यही नहीं पुलिस के बहकाने से सेशन में बयान देते समय जो नई बातें इन्होंने जोड़ी, उन में मेरे सम्बन्ध में कहा कि मालूम हुआ कि रामप्रसाद डकैतियों के इन रूपये से अपने परिवार का निर्वाह करता है । इस बात को सुन कर मुझे हंसी भी आई, पर हृदय पर बड़ा आघात लगा, कि जिनकी उदर पूर्ति के लिये प्राणों को संकट में डाला, दिन को दिन और रात को रात न समझा, बुरी तरह से मार खाई, माता पिता का कुछ भी ख्याल न किया, वही इस प्रकार आक्षेप करें ।<br />
</span><span style="color:#fb0000;">तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये ।<br />
</span><span style="color:#008844;">बिस्मिल के सर पे कोई अहसान रह न जाये ।।</span> </p>
<div id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:636529c1-508d-4815-9a0e-0e054516bf5e" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/'Bismil'">&#8216;Bismil&#8217;</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80">क्रान्तिकारी</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+Indian+Independence">Martyrs of Indian Independence</a></div>
</p>
<p align="justify"><em><span style="color:#0000ff;">अंतर्जाल प्रकाशकीय नोट:</span></em><br />
<span style="color:#888888;">यह कड़ी आज यहीं रोकता हूँ । मन विचलित हो चला है । श्रद्धेय बिस्मिल बारंबार बनवारीलाल एवं रायबरेली का उल्लेख कर अपने ठगे जाने के क्षोभ को जैसे छिपा नहीं पा रहे हैं । संयमित भाषा में अंतिम दो पंक्तियाँ उनके हृदय के हाहाकार को प्रतिबिम्बित कर रही हैं । मन खिन्न हो चला है । क्या यह संयोग मात्र है, कि उत्तरी बिहार के सूदूरवर्ती गाँव से मैं इस शहर पर लगे कलंक के टीके को पोंछने का निमित्त बनने को ही आ बसा हूँ </span><span style="color:#000000;"><strong>?</strong></span>  <span style="color:#0000ff;"><em>डा. अमर कुमार <a class="wp-caption-dd" title="." href="http://kakorikand.wordpress.com/googled955323cbabdc2f1.html" target="_blank">.</a></em></span></p>
<br />Posted in आत्म-चरित, काकोरी के शहीद, खण्ड-4 Tagged: अशफाक उल्ला खां, चन्द्रशेखर आजाद, दक्षिणेश्वर बम केस, बंगाल आर्डीनेन्स, बनवारी लाल, बनारस षड़यन्त्र, मर्यादा की रक्षा, योगेशचन्द्र चटर्जी, रामकृष्ण खत्री, रायबरेली, रायबरेली जिला कांग्रेस कमेटी, शचीन्द्रनाथ बख़्शी, हजारी बाग जेल <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/480/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/480/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/480/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/480/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/480/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/480/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/480/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/480/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/480/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/480/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/480/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/480/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/480/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/480/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=480&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>अभियोग वा सन्देह</title>
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		<comments>http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/14/1302-2/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 14 Feb 2009 11:48:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
		<category><![CDATA[काकोरी षड़यंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[खण्ड-4]]></category>
		<category><![CDATA[अन्तरात्मा]]></category>
		<category><![CDATA[क्रान्तिकारी समिति]]></category>
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		<category><![CDATA[रामप्रसाद 'बिस्मिल']]></category>
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		<description><![CDATA[मैंने नमस्ते कर उत्तर दिया कि आप के चरणों की कृपा है । क्योंकि इस मुकद्में के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह को सुन कर मैंने भी साहस किया था ।&#160; अब आगे.. इस के बाद सब से पहले मुख्य नेता महाशय के [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=473&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><span style="color:#000075;"><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/14/1302/" target="_blank">मैंने नमस्ते कर उत्तर दिया कि आप के चरणों की कृपा है । क्योंकि इस मुकद्में के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह को सुन कर मैंने भी साहस किया था ।</a>&#160; <em><span style="color:#fb0000;">अब आगे..</span> </em>इस के बाद सब से पहले मुख्य नेता महाशय के विषय में सरकारी वकील ने बहस करना शुरू की । खूब ही आड़े हाथों लिया । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">अब तो मुख्य नेता महाशय का बुरा हाल था । क्योंकि उन्हें आशा थी कि सम्भव है सबूत की कमी से वे छूट जावें या अधिक से अधिक पांच या दस वर्ष की सजा हो जावे । आखिर चैन न पड़ा । सी. आई. डी. अफसरों को बुला कर जेल में उन से एकान्त में डेढ़ घण्टे तक बातें हुई । युवक मण्डल को इसका पता चला । सब मिल कर मेरे पास आये । कहने लगे इस समय सी. आई. डी. अफसर से क्यों मुलाकात की जा रही है ? मेरी जिज्ञासा पर उत्तर मिला कि सजा होने के बाद जेल में क्या व्यवहार होगा, इस सम्बन्ध में बातचीत कर रहे हैं । मुझे सन्तोष न हुआ । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">दो या तीन दिन बाद मुख्य नेता महाशय एकान्त में बैठकर कई घण्टा तक कुछ लिखते रहे । लिख कर कागज जेल में रख कर भोजन करने गये । मेरी अन्तरात्मा ने कहा, उठ देख तो क्या हो रहा है ? मैंने जेब से कागज निकाल कर पढ़े । पढ़कर शोक तथा आश्चर्य की सीमा न रही । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">पुलिस द्वारा सरकार को क्षमा-प्रार्थना भेजी जा रही थी । भविष्य के लिये किसी प्रकार के हिंसात्मक आन्दोलन या कार्य में भाग न लेने की प्रतिज्ञा की गई थी । अण्डरटेकिंग दी गई थी । </span><span style="color:#000075;">मैंने मुख्य कार्यकर्ताओं से सब विवरण कह कर इस सब का कारण पूछा कि क्या हम लोग इस योग्य भी नहीं रहे जो हम से किसी प्रकार का परामर्श किया जावे ?&#160; तब तक उत्तर मिला कि व्यक्तिगत बात थी । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">मैंने बड़े जोर के साथ विरोध किया कि यह सब कदापि व्यक्तिगत बात नहीं हो सकती और खूब फटकार&#160; बतलाई । मेरी बातों को सुन चारों ओर खलबली पड़ी | मुझे बड़ा क्रोध आया कि इनके द्वारा कितनी धूर्तता से काम लिया गया । मुझे चारो ओर से चढ़ाकर लड़ने के लिये प्रस्तुत किया गया । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">मेरे विरूद्ध षड़यन्त्र रचे गये । मेरे उपर अनुचित आक्षेप कियें | नवयुवकों के जीवनों का भार ले कर लीडरी की शान झाड़ी गई और थोड़ी सी आपत्ति पड़ने पर इस प्रकार बीस वर्ष के युवकों को बड़ी-बड़ी सजायें दिला,&#160; जेल में सड़ने को डालकर स्वयं बंधेज दे निकल जाने का प्रयत्न किया गया । धिक्कार है ऐसे जीवन को, किन्तु सोच समझ कर चुप रहा ।</span></p>
<p><font size="3"></font><font color="#0000ff"><span style="color:#000075;"><strong><em><span style="font-size:small;color:#a7d8e0;">अभियोग</span></em></strong></span>        <br /></font><font color="#000075">काकोरी में रेलवे टेन लुट जाने के बाद ही पुलिस का विशेष विभाग उक्त घटना का पता लगाने के लिये तैनात किया गया । एक विशेष व्यक्ति मि0 हार्टन इस विभाग के निरीक्षक थे । उन्होंने घटनास्थल तथा रेलवे पुलिस की रिर्पोटों को देख कर अनुमान किया कि सम्भव है कि यह कार्य क्रान्तिकारियों का हो ।</font></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">प्रान्त के क्रान्तिकारियों की जांच शुरू हुई । उसी समय शाहजहांपुर में रेलवे डकैती के तीन नोट मिले । चोरी गये नोटों की संख्या सौ से अधिक थी जिनका मूल्य लगभग एक हजार रूपये के होगा । इन में से लगभग सात सौ या आठ सौ रूपये के मूल्य के नोट सीधे सरकार के खजाने में पहुंच गयें | </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">अतः सरकार नोटों के मामले को चुपचाप पी गई । ये नोट लिस्ट में प्रकाशित होने से पूर्व ही सरकारी खजाने में पहुंच चुके थे । पुलिस का लिस्ट प्रकाशित करना व्यर्थ हुआ । सरकारी खजाने में से ही जनता के पास कुछ नोट लिस्ट प्रकाशित होने के पूर्व ही पहुंच गये थे | </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">इस कारण वे जनता के पास निकल आये । उन्हीं दिनों में जिला, खुफिया पुलिस को मालूम हुआ कि मैं 8, 9 तथा 10 अगस्त सन 1925&#160; ई0&#160; को शाहजहांपुर में नही था । मेरी अधिक जांच होने लगी । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">इसी जांच पड़ताल में पुलिस को मालूम हुआ कि गवर्नमेंट स्कूल शाहजहांपुर के इन्द्रभूषण मित्र नामी एक विद्यार्थी के पास मेरे क्रान्तिकारी दल सम्बन्धी पत्र आते हैं तो वह मुझे दे आता है । स्कूल के हेड मास्टर द्वारा इन्द्रभूषण के पास आये हुये पत्रों की नकल करा के हार्टन साहब के पास भेजी जाती रही ।</span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">इन्हीं पत्रों से हार्टन साहब को मालूम हुआ कि मेरठ में प्रान्त की क्रान्तिकारी समिति की बैठक होने वाली है । उन्होंने एक सब इन्स्पेक्टर को मेरठ अनाथालय में जहां पर मीटिंग होने का पता चला था, भेजा । उन्हीं दिनों हार्टन साहब को किसी विशेष सूत्र द्वारा मालूम हुआ कि शीघ्र ही कनखल में डाका डालने का प्रबन्ध क्रान्तिकारी समिति के सदस्य कर रहे हैं | </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">और सम्भव है कि किसी बड़े शहर में डाकखाने का आमदनी भी लूटी जावे । हार्टन साहब को एक सूत्र से एक पत्र मिला जो मेरे हाथ का लिखा था । इस पत्र में सितम्बर मे होने वाले श्राद्ध का जिक्र था जिस की 13 तारीख निश्चित की गई थी । पत्र में था कि दादा का श्राद्ध नं0 1 पर 13 सितम्बर हो होगा, अवश्य पधारिये । मैं अनाथालय में मिलूंगा । पत्र पर रूद्र के हस्ताक्षर थे । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">आगामी डकैतियों को रोकने के लिये हार्टन साहब ने प्रान्त भर में 26 सितम्बर सन्1925 ई0 को लगभग तीस मनुष्यों को गिरफतार किया । उन्हीं दिनों में इन्द्रभूषण के पास आये हुये पत्र से पता लगा कि कुछ वस्तुयें बनारस में किसी विद्यार्थी की कोठरी में बन्द हैं । अनुमान किया गया कि सम्भव है कि वे हथियार हों, अनुसंधान करने से हिंदू विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी की कोठरी से दो रायफलें निकलीं । उस विद्यार्थी को कानपुर में गिरफतार किया गया । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">इन्द्रभूषण ने मेरी गिरफतारी की सूचना एक पत्र द्वारा बनारस को भेजी । जिसके पास पत्र भेजा था उसे पुलिस गिरफतार कर चुकी थी, क्योंकि उसी श्री रामनाथ पाण्डेय के पते का पत्र मेरी गिरफतारी के समय मेरे मकान से पाया गया था । रामनाथ पाण्डेय के पत्र पुलिस के पास पहुंचे थे । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">अतः इन्द्रभूषण का पत्र देखकर इन्द्रभूषण को भी गिरफ़्तार किया । इन्द्रभूषण ने दूसरे दिन अपना बयान दे दिया । गिरफतार किये हुये व्यक्तियों में से कुछ से मिल मिला कर बनारसीलाल ने भी जो शाहजहांपुर के जेल में था, अपना बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया गया । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">यह कुछ अधिक जानता था । </span></p>
<div class="wlWriterEditableSmartContent" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:7f0ee54a-ab6d-4a62-a89d-2c66916924f5" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a href="http://technorati.com/tags/Ram+Prasad+'Bismil'" rel="tag">Ram Prasad &#8216;Bismil&#8217;</a>,<a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80" rel="tag">क्रान्तिकारी</a>,<a href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+Indian+Independence" rel="tag">Martyrs of Indian Independence</a></div>
<br />Posted in आत्म-चरित, काकोरी षड़यंत्र, खण्ड-4 Tagged: अन्तरात्मा, क्रान्तिकारी समिति, गिरफ़्तारी, चतुर्थ खण्ड, बनारसीलाल, रामप्रसाद 'बिस्मिल', शाहजहांपुर, सरकारी खजाने, सी. आई. डी. अफसर, हिंदू विश्वविद्यालय <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/kakorikand.wordpress.com/473/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/kakorikand.wordpress.com/473/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/kakorikand.wordpress.com/473/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/kakorikand.wordpress.com/473/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/kakorikand.wordpress.com/473/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/kakorikand.wordpress.com/473/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/kakorikand.wordpress.com/473/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/kakorikand.wordpress.com/473/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/kakorikand.wordpress.com/473/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/kakorikand.wordpress.com/473/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/kakorikand.wordpress.com/473/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/kakorikand.wordpress.com/473/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/kakorikand.wordpress.com/473/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/kakorikand.wordpress.com/473/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=473&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">काकोरी के शहीद</media:title>
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		<title>मैं मन ही मन घुटा करता</title>
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		<pubDate>Fri, 13 Feb 2009 19:25:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[आत्म-चरित]]></category>
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		<description><![CDATA[एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया,  जिसमें तीन डाक्टर थे । उन बुद्धू की जब कुछ समझ में न आया, तो यह कह दिया गया कि सेठ जी को कोई भी बीमारी ही नहीं है । अब आगे.. जब से काकोरी षड़्यन्त्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से उनमें एक अद्भुत परिवर्तन [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=kakorikand.wordpress.com&amp;blog=5815180&amp;post=454&amp;subd=kakorikand&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#008000;"><a href="http://kakorikand.wordpress.com/2009/02/13/1202/" target="_blank">एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया,  जिसमें तीन डाक्टर थे । उन बुद्धू की जब कुछ समझ में न आया, तो यह कह दिया गया कि सेठ जी को कोई भी बीमारी ही नहीं है ।</a></span> <em><span style="color:#fb0000;">अब आगे..</span></em></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">जब से काकोरी षड़्यन्त्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से उनमें एक अद्भुत परिवर्तन का समावेश हुआ, जिसका अवलोकन कर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही । जेल में सब से बड़ी बात तो यह थी कि प्रत्येक आदमी अपनी अपनी नेतागिरी की दुहाई देता था । कोई भी बड़े छोटे का भेद न रहा । बड़े अनुभवी पुरूषों की बातों की अवहेलना होने लगी । डिसप्लिन का नाम भी न रहा । बहुधा उल्टे जवाब मिलने लगे । छोटी सी छोटी बातों पर मतभेद हो जाता । इस प्रकार का मतभेद कभी-कभी वैमनस्य तक का रूप धारण कर लेता । आपस में झगड़ा भी हो जाता । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">खैर ! जहां चार बर्तन रहते हैं वहां खटकाते ही हैं । ये लोग तो मनुष्य देहधारी थे । परन्तु लीडरी की धुन ने पार्टी बन्दी का ख्याल पैदा कर दिया । जो नवयुवक जेल के बाहर अपने से बड़ों की आज्ञा को वेद-वाक्य के समान मानते थे वे ही उन लोगों का तिरस्कार तक करने लगे । इसी प्रकार आपस का वादा विवाद कभी-कभी भयंकर रूप धारण कर लिया करता । प्रान्तीय प्रश्न छिड़ जाता । बंगाली तथा संयुक्त प्रान्त वासियों के कार्य की आलोचना होने लगती । इसमें कोई सन्देह नहीं कि, बंगाल ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में दूसरे प्रान्तों से अधिक कार्य किया है । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">किन्तु बंगालियों की हालत यह है कि जिस कार्यालय या दफतर में एक भी बंगाली पहुंच जावेगा थोड़े ही दिनों में ही उस स्थान पर बंगाली ही बंगाली दिखाई देंगे । जिस शहर में बंगाली रहते हैं उनकी बस्ती अलग ही बसती है । बोली भी अलग । खान-पान भी एकदम अलग । यही सब जेल में अनुभव हुआ । जिन महानुभावों में त्याग की मूर्ति समझता था, उनके अन्दर बंगालीपने का भाव देखा । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">मैंने जेल से बाहर कभी स्वप्न में भी यह विचार न किया था कि क्रान्तिकारी दल के सदस्यों में भी प्रान्तीय भावों का समावेश होगां । मैं तो यही समझता रहा कि क्रान्तिकारी तो समस्त भारतवर्ष को स्वतन्त्र करने का प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें किसी प्रान्त विशेष से क्या सम्बन्ध । परन्तु साक्षात् अनुभव कर लिया कि प्रत्येक बंगाली के दिमाग में कविवर रवीन्द्र नाथ का गीत आमार सोनार बांगला, आमितोमा के भालो वासी मेरे सोने का बंगाल मैं तुझ से मुहब्बत करता हूं  इत्यादि ठूंस-ठूंस कर भरा था,  जिसका उनके नेमित्तिक जीवन में पग-पग पर प्रकाश होता था । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">अनेक प्रयत्न करने पर भी जेल के बाहर इस प्रकार का अनुभव कदापि न प्राप्त हो सकता था । बड़ी भयंकर से भयंकर आपत्ति में भी मेरे मुंह से कभी आह न निकली । प्रिय सहोदर का देहान्त होने पर भी आंख से आंसू न गिरा, किन्तु इस दल के कुछ व्यक्ति ऐसे थे जिनक आज्ञा को मैं संसार में सब से श्रेष्ठ मानता था, जिनकी जरा से कड़ी दृष्टि भी मैं सहन न कर सकता था, जिन के कटु वचनों के कारण मेरे हृदय पर चोट लगती थी, और अश्रुओं का श्रोत उबल पड़ता था । मेरी इस अवस्था को देख कर दो चार मित्रों को जो मेरी प्रकृति को जानते थे बड़ा आश्चर्य होता था । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">लिखते हुये हृदय कम्पित होता है कि उन्हीं सज्जनों में बंगाली तथा अबंगाली का भाव इस प्रकार भरा था कि बंगालियों की बड़ी से बड़ी भूल, हठधर्मी तथा भीरूता की अवहेलना की गई । यह देखकर पुरूषों का साहस बढ़ता था, नित्य नई चालें चलीं जाती थी । आपस में ही एक दूसरे के विरूद्ध षड़्यन्त्र रचे जाते थे । बंगालियों का न्याय अन्याय सब सहन कर लिया जाता था । इन सारी बातों ने मेरे हृदय को टूक-टूक कर डाला । सब कृत्यों को देख मैं मन ही मन घुटा करता ।</span> </p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">एक बार विचार हुआ कि सरकार से समझौता कर लिया जावे । बैरिस्टर साहब ने खुफिया पुलिस के कप्तान से परामर्श आरम्भ किया । किन्तु यह सोचकर कि इससे क्रान्तिकारी दल की निष्ठा न मिट जावे, यह विचार छोड़ दिया गया, युवकबृन्द की सम्मति हुई कि अनशन व्रत कर के सरकार से हवालाती की हालत में ही मांगें पूरी करा ली जावें । क्योंकि लम्बी-लम्बी सजायें होंगी । संयुक्त प्रान्त के जेलों में साधारण कैदियों का भोजन खाते हुये सजा काट कर जेल से जिन्दा निकलना कोई सरल कार्य नहीं ।</span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">जितने राजनैतिक कैदी षड़यन्त्रों के सम्बन्ध में सजा पाकर इस प्रान्त के जेलों में रखे गये उनमें से पांच छः महात्माओं ने इस प्रान्त के जेलों के व्यवहार के कारण ही जेलों में प्राण त्याग किये । इस विचार के अनुसार काकोरी के लगभग सब हवालातियों ने अनशन व्रत आरम्भ कर दिया । दूसरे ही दिन सब पृथक कर दिये गये । कुछ व्यक्ति डिस्टिक्ट जेल में रखे गये, कुछ सेन्टल जेल भेजे गये । अनशन करते पन्द्रह दिवस व्यतीत हो गये, सरकार के कान पर जूं  न रेंगी । उधर सरकार का काफी नुकसान हो रहा था ।</span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">जज साहब तथा दूसरे कचहरी के कार्यकर्ताओं को घर बैठे का वेतन देना पड़ता था । सरकार को स्वयं चिन्ता थी कि किसी प्रकार अनशन छूटे । जेल अधिकारियों ने पहले आठ आने रोज </span>तय <span style="color:#000075;">किये थे । मैंने उस समझौते को अस्वीकार कर दिया । और बड़ी कठिनता से दस आने रोज पर ले आया । उस अनशन व्रत में पन्द्रह दिवस तक मैंने केवल जल पी कर निर्वाह किया था । मुझे सोलहवें दिन नाक से दूध पिलाया गया था । </span><span style="color:#000075;">श्रीयुत् रोषनसिंह जी ने भी इसी प्रकार मेरा साथ दिया था । वे पन्द्रह दिन तक लगभग बराबर चलते फिरते रहे थे । स्नानादि करके अपने नैमित्तिक कर्म भी कर लिया करते थे । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">दस दिन तक तो मेरे मुंह को देखकर अनजान पुरूष यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि मैं अन्न नहीं खाता । </span><span style="color:#000075;">समझौते के जिन खुफिया पुलिस के अधिकारियों से मुख्य नेता महोदय का वार्तालाप बहुधा एकान्त में हुआ करता था, समझौते की बात खत्म हो जाने पर भी आप उन लोगों से मिलते रहे । मैंने कुछ   विशेष ध्यान न दिया । यदा कदा दो एक बात से पता चलता  कि समझौते के अतिरिक्त कुछ  दूसरी तरह की बातें भी होती है । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">मैंने इच्छा प्रकट की कि मैं भी एक समय सी0आई0डी0 के कप्तान से मिलूं, क्योंकि मुझ से पुलिस बहुत असंतुष्ट थी । मुझे पुलिस से न मिलने दिया गया । परिणाम स्वरूप सी0आईडी0 वाले मेरे पूरे दुश्मन हो गये । सब मेरे व्यवहार की ही शिकायत किया करते । पुलिस अधिकारियों से बातचीत करके मुख्य नेता महाशय को कुछ आशा बंध गई । आप का जेल से निकलने का उत्साह जाता रहा । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">जेल से निकलने के उद्योग में जो उत्साह था, वह बहुत ढीला हो गया । नवयुवकों की श्रद्धा को मुझसे हटाने के लिये अनेकों प्रकार की बातें की जाने लगीं । मुख्य नेता महोदय ने स्वयं कुछ कार्य कर्ताओं से मेरे सम्बन्ध में कहा कि ये कुछ रूपये खा गये । मैंने एक-एक पैसे का हिसाब रखा था । जैसे ही मैंने इस प्रकार की बातें सुनी, मैंने कार्यकारिणी के सदस्यों के सामने रख कर हिसाब देना चाहा, और अपने विरूद्ध आक्षेप करने वाले को दण्ड देने का प्रस्ताव उपस्थित किया । </span></p>
<p align="justify"><span style="color:#000075;">अब तो बंगालियों का साहस न हुआ कि मुझ से हिसाब समझें । मेरे आचरण पर भी आक्षेप किये गये । जिस दिन सफाई की बहस में मैंने समाप्त की, सरकारी वकील ने उठ कर मुक्त कंठ से मेरी बहस की प्रशंसा की कि सैकड़ों वकीलों से अच्छी बहस की । मैंने नमस्ते कर उत्तर दिया कि आप के चरणों की कृपा है । क्योंकि इस मुकद्में के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह को सुन कर मैंने भी साहस किया था ।          </span></p>
<div id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:bb8c70a5-3be7-4b30-bcbf-f53b27b6b184" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;">Technorati Tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/RamPrasad+'Bismil'">RamPrasad &#8216;Bismil&#8217;</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Martyrs+of+Indian+Independence">Martyrs of Indian Independence</a>,<a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Hunger+Strike">Hunger Strike</a></div>
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