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- अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल'ने दिसम्बर 1927 में गोरखपुर जेल में लिखी थी । उन्हें 19 दिसम्बर 1927 को फांसी दी गई थी । गोरखपुर में अपनी जेल की कोठरी में उन्होने अपनी जीवनी लिखनी शुरू की । जो फांसी के केवल तीन दिन पहले समाप्त हुई, और 18 दिसम्बर को अपनी माँ एवं मित्र श्रीयुत शिव वर्मा से जेल में अंतिम भेंट के समय इसकी पांडुलिपि खाने के डिब्बे में छिपा कर बाहर निकालने में सफल हुये । बाद में श्री शिव वर्मा के अग्रज़ श्री भगवतीचरण वर्मा जी ने इन पन्नों को पुस्तक रूप में छपवाया जो कि तत्काल ही ज़ब्त कर ली गयी थी ! सम्मुख है..
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- 5,960 उपस्थितियाँ
नवीनतम कड़ियों में
- श्री रामप्रसाद बिस्मिल
- कालकोठरी के गीत और अँतिम नोट
- वो कवितायें, जो मुझे प्रिय रही हैं !
- गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।
- राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।
- मैजिक लालटेन द्वारा तस्वीरें दिखाकर या…
- यह कैसा भारतवर्ष है
- उन्हीं के साथ विश्वासघात कर के निकल भागूँ ?
- अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही
- इतिहास को हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा
- फांसी की कोठरी है या, साधना की गुफा
- अशफ़ाकउल्ला ख़ाँ वारसी : अन्तिम समय में दो शब्द
- अन्तिम समय की बातें
- माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत है
- तलवार ख़ूँ में रंग लो, अरमान रह न जाये
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Martyr of Indian Independence अशफ़ाकउल्ला खाँ आत्म-चरित कट्टर काकोरी कांड काकोरी षड़यन्त्र काल कोठरी काला पानी क्रांतिकारी जीवन क्रांतिकारी दल क्रान्तिकारी आन्दोलन खु्श रहो अहले वतन खुफ़िया पुलिस गिरफ़्तारी गुप्त समिति गोरखपुर जेल ग्वालियर चतुर्थ खण्ड चम्बल तृतीय खण्ड द्वितीय खण्ड पुलिस कप्तान पुस्तक प्रतिज्ञा प्रथम खण्ड प्रयाग फांसी की सजा बंगला बिस्मिल भारतवर्ष माउज़र पिस्तौल रंग दे बसंती चोला रामप्रसाद 'बिस्मिल' रिवाल्वर रोशन सिंह वन्दे मातरम विवाह विश्वासघात शाहजहांपुर शाहज़हाँपुर संक्षिप्त विवरण सरफ़रोशी की तमन्ना सहारनपुर स्वामी सोमदेव सरस्वती हमारे अमर शहीदअनुक्रमणिका
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अत्यधिक सराहे गये
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काकोरीकाँड पन्ने दर पन्ने
- परिचय
- अभिलेख क्रम
- अश़्आर व कवितायें
- कैद की मुश्किल में है
- अपने मतलब का आशना देखा
- आज यह क्या दिल में है
- उनका पयाम आया तो क्या
- जितना सताना हो सता ले
- तुम जिक्र गमें जमाना
- दवा आके पिलाये कोई
- दिल खोल कर मातम करें
- न किसी के दिल का करार हूं
- नकशे पर है क्या मिटाता
- मुझ आशिके नाकाम की
- यही बाकी निशां होगा
- शिवा ने मां का बन्धन खोला
- सीस उतारे मुंह धरै तापै राखे पांव
- हजारों बेवतन पहिले
- हमें भेज दे कालेपानी
- आंसु बहाना है मना
- तेरी जय हो विजय हो
- राज्य तिहुंपुर को तजि डारों
- ऎ मादरे हिन्द न हो ग़मगीन
- और भी
दर्ज़ हैं हाल की प्रतिक्रियायें
A brave revolutionary who gave up his life smilingly for the sake of the Motherland. He was persecuted by an enraged foreign government, hunted by the police and betrayed by follow workers. And yet he lit the fire of revolution to burn down the slavery. He was the brave leader of the Kakori Rail Dacoity episode. His poetry is also a lamp lighted, at the altar of Mother Land.N.P.Shankara Narayan Rao
गैर-व्यवसायिक उपयोग हेतु
पूर्णतया सर्वाधिकार मुक्त है
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यह सामग्री वाईकी पर भी है
◄ ' बिस्मिल ' ►
Shaheed Ramprasad ‘Bismil’ Ji was hanged to death in the Gorakhpur jail on the Black day of 19th December 1927. He started writing his autobiography in his prison-cell at Gorakhpur jail and concluded it just three days prior to being hanged. As Last Call on 18 December 1927, his mother came to meet him in the jail, along with his close friend Shri Shiv Verma Ji. Ramprasad hid the hand written manuscript inside the tiffin box which his mother had brought, and handed it over to Shri Shiv Verma, who was successful in bringing the manuscript outside the jail premises. These pages were later got printed in the shape of this Book by his brother Shri Bhagvaticharan Verma. Soon thereafter, all the printed copies of the book were promptly ordered to be searched thoroughly to confiscate them and the publication was banned by the British Government.
समर्पणभावना एवं श्रेय : अमिता
अंतर्जाल पर मेरे अन्य प्रयास
इतिहास खँगालते चँद मित्र
कुछ अलग हट के
चिरऋणी भारत राष्ट्रवासी
लेखक:
रामप्रसाद ‘बिस्मिल‘
प्रकाशक:
भजनलाल बुकसेलर
सिन्ध
प्रथमवार] सन १९२७ [मूल्य २)
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आर्ट प्रेस, सिन्ध
प्रस्तुति: डा. अमर कुमार
सहयोग: अमिता श्रीवास्तव
रायबरेली, उ. प्र.
प्रोत्साहन: 'रवि रतलामी' भोपाल, म. प्र.
प्रयास वर्ष: 2008-2009

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गहरे पानी पैठ
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