वो कवितायें, जो मुझे प्रिय रही हैं !
August 6, 2009 at 12:48 AM | In अंतिम समय की बातें, आत्मकथा, खण्ड-4, चँद शेर | 12 CommentsTags: उस पथ में, गाँधी, गोरखपुर जेल, जननि तेरी जय हो, तिलक, बिघ्न और बाधा, भूखे प्राण, वतन पर मरनें वालों का, शहीदों की चिताओं पर
प्रस्तुतिकर्ता टिप्पणी : आगे के साढ़े तीन पृष्ठ स्व० हुतात्मा अमर बिस्मिल जी ने अपनी कुछ प्रिय कविताओं का स्मरण किया है, और आने वाली पीढ़ियों को समर्पित करते हुये, इन्हें उनकी थाती बताया है । काश, इनको वह स्थान दिया जाता । - डा० अमर
इस अँतिम घड़ी में, मेरी यह इच्छा हो रही है कि मैं उन कविताओं में से भी चन्द का यहां उल्लेख कर दूं, जो कि मुझे प्रिय मालूम होती है और मैंने यथा-समय कंठस्थ की थीं । यह नवयुवकों को प्रेरणा प्रदान करे, प्रभु से यही प्रार्थना है !
- रामप्रसाद बिस्मिल
भूखे प्राण, तजै भले, के हरि खरू नहिं खाहिं ।
चातक प्यासे ही रहै, बिन स्वांती न अघाहिं ।।
बिन स्वांती न अघाहिं हंस मोती ही खावे ।
सती नारि पतिव्रता नेक नाह चित्त डिगावे ।।
तिमि प्रताप नहिं डिगे होंहि चहें सब किन रूखे ।
अरि सन्मुख नहिं नवें फिरै चहें बन-बन भूखे ।।
चाह नहीं है सुर बाला के गहनों में गूंथा जाउं ।
चाह नहीं है प्यारी के गल पड़ू हार मैं ललचाउं ।।
चाह नहीं है राजाओं के शव पर मैं डाला जाउं ।
चाह नहीं है देवों के सिर चढूं भाग्य पर इतराउं ।।
मुझे तोड़ कर हे बनमाली उस पथ में तू देना फेंक ।
मातृभूमि हित शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक ।।
भारत जननि तेरी जय हो विजय हो ।
तू शुद्ध और बुद्ध ज्ञान की आगार,
तेरी विजय सूर्य माता उदय हो ।।
हों ज्ञान सम्पन्न जीवन सुफल होवे,
सन्तान तेरी अखिल प्रेममय हो ।।
आयें पुनः कृष्ण देखें द्शा तेरी,
सरिता सरों में भी बहता प्रणय हो ।।
सावर के संकल्प पूरण करें ईश,
विध्न और बाधा सभी का प्रलय हो ।।
गांधी रहे और तिलक फिर यहां आवें,
अरविंद, लाला महेन्द्र की जय हो ।।
तेरे लिये जेल हो स्वर्ग का द्वार,
बेड़ी की झन-झन बीणा की लय हो ।।
कहता खलल आज हिन्दू-मुसलमान,
सब मिल के गाओं जननि तेरी जय हो ।।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
सुन्दर कली सेमर की देखी, सुअनाने मन मोहा ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
मारी चोंच भुआ जब देखा पटक-पटक शिर रोया ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
सुन्दर कली कमल की देखी, भंवरा का मन मोहा ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति ।
सारी रैन सम्पुट में बीती, तड़प-तड़प जी खोया ।
कोउ न सुख सोया कर के प्रीति । करके प्रीति० ।।
तू बह मये खूबी है अय जलवये जमाना ।
हर गुल है तेरा बुलबुल हर शमा है परवाना ।।
सर मस्ती में भी अपना साकी के कदम पर हो ।
इतना तो करम करना अय लगजिशे मस्ताना ।।
या रब इन्हीं हाथों से पीते रहें मस्ताना ।
या रब वहीं साकी हो या रब वही पैमाना ।।
आंखे है तो उसकी है किस्मत है तो उसकी है ।
जिसने तुझे देखा है अय जलवये जमाना ।।
छेड़ो न फिरिश्ते तुम जिक्र गमें जमाना ।
क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसाना ।।
यह चश्में हकीकी भी क्या तेरे सिवा देखें ।
मयकदे से हमें मतलब कावा हो या बुतखाना ।।
साकी को अब दिखा देंगे अन्दाज फकीराना ।
टूटी हुई बोतल है या टूटा हुआ पैमाना ।।
मुर्गे दिल मत रो यहां आंसु बहाना है मना ।
अंदलीवों को कफस में चहचहाना है मना ।।
हाय जल्लादों तो देखो कह रहा सयाद यह ।
वक्त जिबहा बुलबुलों को तड़फड़ाना है मना ।।
वक्त जिबहा जानवर को देते हैं पानी पिला ।
हजरते इन्सान को पानी पिलाना है मना ।।
मेरे खूं से हाथ रंग कर बोले क्या अच्छा है रंग ।
अब हमें तो उम्र भर मेंहदी लगाना है मना ।।
अय मेरे जख्में जिगर नासूर बनना है तो बन ।
क्या करूं इस जखम पर मरहम लगाना है मना ।।
खूने दिल पीते है असगर खाते हैं लख्ते जिगर ।
इस कफस में कैदियों केा आबो दाना है मना ।।
अरूजे कामयाबी पर कभी तो हिन्दुस्तां होगा ।
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियां हेागा ।।
चखायेगे मजा बरबादिये गुलशन का गुलची को ।
बहार आयेगी उस दिन जब कि अपना बागवां होगा ।।
वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है ।
सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा ।।
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दें वतन हरगिज ।
न जाने बाद मुर्दन मैं कहां.. और तू कहां होगा ।।
यह आये दिन को छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे कातिल !
बता कब फैसला उनके हमारे दरमियां होगा ।।
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगें हर बरस मेले ।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।।
इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज्य देखेंगे ।
जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा ।।
इम्तहां सब का कर लिया हम ने,
सारे आलम को आजमा देखा ।
नजर आया न कोई यार जमाने में अज़ीज़,
आंख जिस की तरफ उठा देखा ।।
कोई अपना न निकला महरमे राज,
जिस को देखा सो बेवफा देखा ।।
अलग़रज सब को इस जमाने में,
अपने मतलब का आशना देखा ।।
12 Comments »
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अमर जी
इतनी अच्छी कविताओं के लिए आभार
भाई हो सके तो माखन लाल चतुर्वेदी जी की कविता (पुष्प की अभिलाषा )का पाठ सुधार लें, कविता इस तरह है-
चाह नहीं, मैं सुर बाला के गहनों में गूँथा जाउँ ।
चाह नहीं, प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।।
चाह नहीं,सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाउं ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ।।
मुझे तोड़ लेना बनमाली
उस पथ में देना तुम फेंक ।।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने ।
जिस पथ जावें वीर अनेक ।।
Comment by आभा — August 6, 2009 #
आभा जी, त्वरित टिप्पणी के लिये धन्यवाद !
यहाँ दी गयी सभी कविताओं को शब्दशः अविकल रूप में बिस्मिल जी की ज़ब्तशुदा आत्मकथा से ही दिया गया है ।
इस पुस्तक की मात्र 22 या 23 प्रति ही विश्व में सुरक्षित है, मेरा ध्येय इसे सामने लाना ही है, इससे अधिक कुछ नहीं । मेरी क्या मज़ाल की उनकी भावपूर्णता में ख़लल डालूँ ? केवल वर्तनी की अशुद्धि को ठीक कर फ़ारमेटिंग करने से अधिक मैं कूछ और नहीं करता ।
जो जैसा है.. उसे स्वीकार करें । सादर
Comment by अमर — August 6, 2009 #
बहुत बहुत आभार इन रचनाओं के लिए। क्रांतिकारिता भी एक रूमानियत है। जिस का काम कविताओं के बिना नहीं चलता।
Comment by दिनेशराय द्विवेदी — August 6, 2009 #
Chayanit kavitaon se in krantikariyon ke manobhavon ki jhalak bhi milti hai.
Comment by Abhishek Mishra — August 6, 2009 #
Waakai shaandaar rachnaayen hain.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
Comment by tasliim — August 6, 2009 #
अमर जी ,अक्सर आप की जानकारी पूर्ण पोस्ट देखा करती थी।. जहाँतक मुझे ध्यान है मैने आप की कविता की कोई पोस्ट नहीं देखी , फिर कल रात जब मै ब्लाग पर आई तो ऊपर से पहली ही पोस्ट आप की दिखी मुझे लगा देखूं आप की प्रिय कविता । अब आप से निवेदन है कि आप उस किताब की कवर और पेज नम्बर छाप दें , क्यों कि मैनेअभी पिछले महीने पढ़ा है, ईस संग्रह के मुताबिक यह कविताएं माखन लाल जी की हैं ।
Comment by abha — August 6, 2009 #
इन्हीं शहीदों के कटे हुये सिरों से निकले हुये लहू से लहलहाती फसलों का धन-धान्य हम खा रहे हैं. हम निरे कृतघ्न हैं जो अपने पूर्वजों को लजा रहे हैं. बिना सींग, पूंछ के पशु हैं हम. खामखाह अपने ऊपर इतराते हैं.
Comment by indian citizen — August 6, 2009 #
इन्हीं शहीदों के कटे हुये सिरों से निकले हुये लहू से लहलहाती फसलों का धन-धान्य हम खा रहे हैं. हम निरे कृतघ्न हैं जो अपने पूर्वजों को लजा रहे हैं. बिना सींग, पूंछ के पशु हैं हम. खामखाह अपने ऊपर इतराते हैं. इनकी पुण्य तिथि और जन्म तिथि को भी भूल जाते हैं.
Comment by indian citizen — August 6, 2009 #
@ आभा जी
एवँ सभी जिज्ञासुगण , जो ऎसी दिलचस्पी रखते हों ।
उद्धरित कविताओं का स्रोत : पुस्तक – काकोरी षड़यन्त्र
पृष्ठ सँख्या १७३, १७४, १७५
लेखक:
रामप्रसाद ‘बिस्मिल‘
प्रकाशक:
भजनलाल बुकसेलर
सिन्ध
प्रथमवार
सन १९२७
मूल्य २)
…………….
आर्ट प्रेस, सिन्ध
यहाँ यह बात गौर करने की है, कि बिस्मिल जी ने केवल यह स्वीकार किया है कि, ” इस अँतिम घड़ी में, मेरी यह इच्छा हो रही है कि मैं उन कविताओं में से भी चन्द का यहां उल्लेख कर दूं, जो कि मुझे प्रिय मालूम होती है और मैंने यथा-समय कंठस्थ की थीं । यह नवयुवकों को प्रेरणा प्रदान करे, प्रभु से यही प्रार्थना है ! – रामप्रसाद बिस्मिल ”
गौर किया जाय कि बिस्मिल जी ने यह कहा है कि जो उन्हें प्रिय मालूम होती थीं, और उन्होंनें इन्हें कँठस्थ कर लिया था । बस, इतना ही तो…
Comment by अमर — August 6, 2009 #
ये ऐसी कविताएँ हैं जो किसी भी देश भक्त को प्रिय हो सकती हैं, विस्मिल जी तो शहीदों के सरताज और असल भारत रत्न हैं, उन्हें श्रद्धा से प्रणाम करती हूँ, आपकी आभारी हूँ…..
Comment by आभा — August 6, 2009 #
इस कड़ी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!
शहीदों की प्रिय रचनाओं के बारे में जानकार अच्छा लगा. “इंडियन सिटिज़न” की टिप्पणी सटीक है. खुशी की बात है कि इस संकलन में से दो रचनाएं तो आज भी मकबूल हैं.
Comment by Smart Indian - अनुराग शर्मा — August 8, 2009 #
[...] वतन, गीत, गोरखपुर जेल, राष्ट्र्वासी अपनी प्रिय कविताओं के उल्लेख के बाद शहीद बिस्मिल ने अपनी कालकोठरी [...]
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