संसार अन्धकारमय दिखाई देता था
February 1, 2009 at 2:59 AM | In आत्म-चरित, आत्मकथा, खण्ड-3, सरफ़रोशी की तमन्ना | 3 CommentsTags: शाहज़हाँपुर, अंगरेजी, प्रतिज्ञा, पुस्तक, तृतीय खण्ड, 500 रूपये, अन्धकारमय, पलायनावस्था, केथोराइन, लेखक ' बिस्मिल’, क्रान्तिकारी जीवन, पुस्तक प्रकाशक, बंगला, लेखन शैली का नियम, अरविन्द घोष, मासिक पत्रिकाओं, आगरा, कानपुर, कलकत्ता, हिन्दी के लेखकों, अनुभवहीनता, व्यर्थ के उद्योग, हिन्दी के लेखक
राजकीय घोषणा के पश्चात जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की अदभुत दशा देखी । कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था । जिसके पास मैं जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था । पुलिस वालों का बड़ा प्रकोप था । प्रत्येक समय छाया की भांति पीछे-पीछे फिरा करती थी । इस प्रकार का जीवन कब तक व्यतीत किया जावे । मैंने कपड़ा बिनने का काम सीखना आरम्भ किया । जुलाहे बड़ा कष्ट देते थे । कोई काम सिखाना न चाहता था । कड़ी कठिनता से मैंने कुछ काम सीखा । उसी समय एक कारखाने में मैनेजरी का स्थान खाली हुआ । मैंने भी उस स्थान के लिये प्रयत्न किया । मुझसे 500 रूपये की जमानत मांगी गई ।
उन दिनों मेरी बड़ी सोचनीय दशा थी । तीन-तीन दिवस तक भोजन प्राप्त नहीं होता था । क्योंकि मैने प्रतिज्ञा की थी, कि किसी से कुछ सहायता न लूंगा । पिता जी से बिना कुछ कहे मैं चला आया था । मैं पांच सौ रूपये कहां से लाता ? मैनें दो एक मित्रों से केवल दो सौ रूपये की जमानत देने की प्रार्थना की । उन्होने साफ इन्कार कर दिया । मेरे हृदय पर बज्रपात हुआ । संसार अन्धकारमय दिखाई देता था ! पर बाद को एक मित्र की कृपा से नौकरी मिल गई । अब अवस्था सुधरी । मैं भी सभ्य पुरूषों की भांति समय व्यतीत करने लगा । मेरे पास भी चार पैसे हो गये ।
वे ही मित्र जिनसे मैंने दो सौ रूपये जमानत देने की प्रार्थना की थी, अब मेरे पास अपने चार-चार हजार रूपयों की थैली, अपनी बन्दूक, लाइसेन्स इत्यादि सब डाल जाते थे कि मेरे यहां उनकी वस्तुएं सुरक्षित रहेंगी । समय के इस फेर को देखकर मुझे हंसी आती थी । इस प्रकार कुछ काल व्यतीत हुआ । दो चार ऐसे पुरूषों से भेंट हुई, जिनको पहले मैं बड़ी श्रृद्धा की दृष्टि से देखता था । उन लोगों ने मेरी पलायनावस्था के सम्बन्ध में कुछ समाचार सुने थे । मुझसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए । मेरी लिखी हुई पुस्तकें भी देखी ।
इस समय मैं तीसरी पुस्तक केथोराइन लिख चुका था । मुझे पुस्तकों के व्यवसाय में बहुत घाटा हो चुका था । मैने माला का प्रकाशन स्थगित कर दिया । केथोराइन एक प्रकाशक को दे दी । उन्होंने बड़ी कृपा की । उस पुस्तक को थोड़े से हेर-फेर के साथ प्रकाशित करा दिया । उन्होंने मुझे पुस्तक लिखते रहने के लिए बड़ा उत्साहित किया । मैंने स्वदेशी रंग नामक एक और पुस्तक लिख कर एक पुस्तक प्रकाशक को दी । वह भी प्रकाशित हो गई ।
बड़े परिश्रम के साथ मैने एक पुस्तक क्रान्तिकारी जीवन लिखी । क्रान्तिकारी जीवन को कई पुस्तक प्रकाशकों ने देखा, पर किसी का साहस न हो सका कि उसको प्रकाशित करे । वह आगरा, कानपुर, कलकत्ता इत्यादि कई स्थानों में घूम-घाम कर पुस्तक मेरे पास लौट आई ।
कई मासिक पत्रिकाओं में राम तथा अज्ञात नाम से मेरे लेख प्रकाशित हुआ करते थें । लोग बड़े चाव से उन लेखों का पाठ करते थे । मैंने किसी स्थान पर लेखन शैली का नियम पूर्वक अध्ययन किया था । बैठे-बैठे खाली समय में कुछ लिखा करता और प्रकाशनार्थ भेज दिया करता था । अधिकतर बंगला तथा अंगरेजी की पुस्तकों से अनुवाद करने का ही विचार था । थोड़े समय के पश्चात श्रीयुत अरविन्द घोष की बंगला पुस्तक योगिन साधन का अनुवाद किया । दो एक पुस्तक प्रकाशकों को दिखाया, पर वे अति अल्प पारितोषिक देकर पुस्तक लेना चाहते थे ।
आज कल के समय में हिन्दी के लेखकों तथा अनुवादकों की अधिकता के कारण पुस्तक प्रकाशकों को भी बड़ा मान हो गया है । बड़ी कठिनता से बनारस के एक प्रकाशक ने योगिन साधन प्रकाशित करने का वचन दिया । पर थोड़े दिनों में वह स्वयं ही अपने साहित्य मन्दिर में ताला डाल कर कहीं पधार गये । पुस्तक का अब तक कोई भी पता न लगा । पुस्तक अति उत्तम थी ।
प्रकाशित हो जाने से हिन्दी सेवियों को शायद अच्छा लाभ होता । मेरे पास जो बोलशेविक करतूत तथा मन की लहर की प्रतियां बची थीं, वे मैने लागत से भी कम मूल्य पर कलकत्ता के एक व्यक्ति श्रीयुत दीनानाथ सगतिया को दे दीं । बहुत थोड़ी पुस्तकें मैंने बेची थी ।
दीनानाथ महाशय पुस्तकें हड़प कर गये । उनको मैंने नोटिस दिया । नालिश की लगभग 400 रू. की डिग्री भी हुई । किन्तु दीनानाथ महाशय का कहीं अनुसन्धान न मिला । वे कलकत्ता छोड़ कर पटना गये । पटना से भी कई गरीबों का रूपया मार कहीं अन्तरध्यान हो गये । अनुभवहीनता से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ी । कोई पथ प्रदर्शक तथा सहायक नहीं, जिस से परामर्श करता । व्यर्थ के उद्योग धन्धों तथा स्वतन्त्र कार्यों में शक्ति का व्यय करता रहा ।
3 Comments »
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उनके खट्टे मीठे अनुभवों के साथ जीवन यात्रा में हम भी आगे बढ़ते जा रहे हैं.रोचक तो है ही.
Comment by PN Subramanian — February 1, 2009 #
क्या दिन बिताये इन क्रांतिकारियों ने। नमन!
Comment by अनूप शुक्ल — February 1, 2009 #
यह सफर बहुत अच्छा चल रहा है. एक क्रांतिकारी के रोचक, रोमांचक और कठिन जीवनकाल की झलकियों से बहुत कुछ सीख मिल रही है. उस समय एक क्रांतिकारी की पुस्तकें हड़पने वाले दीनानाथ महाशय आजकल बड़ी-बड़ी कंपनियाँ हड़प रहे हैं.
Comment by Smart Indian — February 1, 2009 #